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नमामि गंगे अभियान के अंतर्गत परियोजनाएं

नमामि गंगे अभियान-II (एनजीएम-II) के अंतर्गत, वर्ष 2025 के दौरान कुल 70 सीवरेज अवसंरचना परियोजनाओं (एसटीपी) का क्रियान्वयन किया गया, जिनमें चालू किए गए 25 सीवरेज उपचार संयंत्र भी शामिल हैं।

नमामि गंगे कार्यक्रम के अंतर्गत जून 2026 तक 4,263 एमएलडी सीवेज उपचार क्षमता का सृजन किया गया है। प्रदूषित नदी खंड (पीआरएस) 2025 के संबंध में सीपीसीबी की रिपोर्ट के अनुसार, गंगा की मुख्यधारा के प्रदूषण के विषय में निम्नलिखित सूचना उपलब्ध है:

गंगा मुख्य धारा – राज्यवारतुलना (वर्ष 2018 की तुलना में वर्ष 2025)

राज्यवर्ष 2018 प्रदूषित खंडप्राथमिकता(वर्ष 2018)प्रदूषितखंड वर्ष 2025 प्राथमिकता(2025)प्रवृत्ति/अवलोकन
उत्तराखंडहरिद्वार→सुल्तानपुरIVकोई पीआरएस नहीं सुधार हुआ और पीआरएस हटा दिया गया
उत्तर प्रदेशकन्नौज→वाराणसीIVबिजनौर→तरीघाट IV/Vआंशिक सुधार
बिहारबक्सरसेभागलपुरVभागलपुरडी/एस→खलगांवडी/एस Vआंशिक प्रदूषण
झारखंडकोई पीआरएस नहींकोई पीआरएस नहीं 
पश्चिम बंगालत्रिवेणी→डायमंडहार्बरIIIबहरामपुर→डायमंड हार्बर Vसुधार हुआ

वर्ष 2024-25 के दौरान गंगा नदी और उसकी सहायक नदियों के किनारे 50 स्थलों और यमुना नदी और उसकी सहायक नदियों के किनारे 26 स्थलों पर की गई जैव निगरानी के अनुसार, जैविक जल गुणवत्ता (बीडब्ल्यूक्यू) ज़्यादातर ‘अच्छा’ से ‘मध्यम’ था। विविध प्रकार की बेंथिक मैक्रो-इनवर्टिब्रेट प्रजातियों की उपस्थिति नदियों में जलीय जीवन बनाए रखने की पारिस्थितिक क्षमता को दर्शाती है।

नमामि गंगे कार्यक्रम के अंतर्गत, वैज्ञानिक शोध, प्राकृतिक आवास की बहाली, प्रजातियों के संरक्षण, मत्स्य पालन संरक्षण, आर्द्रभूमि (वेटलैंड) की बहाली और वृक्षारोपण के माध्यम से नदी संरक्षण में जैव-विविधता संरक्षण को एक प्रमुख घटक के रूप में शामिल किया गया है।

नमामि गंगे कार्यक्रम के तहत, वैज्ञानिक आकलन, आवास बहाली, प्रजातियों के संरक्षण और सामुदायिक भागीदारी के माध्यम से जैव-विविधता संरक्षण का कार्य शुरु किया गया है। नदी खंडों के लगभग 7,680 किलोमीटर के क्षेत्र में किए गए वैज्ञानिक सर्वेक्षणों में 3,037 घड़ियाल पाए गए, जिसके आधार पर ‘राष्ट्रीय घड़ियाल संरक्षण कार्य योजना’ तैयार की गई। भारतीय वन्यजीव संस्थान, देहरादून में राष्ट्रीय नदी अनुसंधान केंद्र की स्थापना की गई और चार जलीय जीव बचाव और पुनर्वास केंद्रों के साथ-साथ भारत की पहली डॉल्फ़िन बचाव एम्बुलेंस ने जलीय जीवों के बचाव, पुनर्वास और निगरानी, ​​तथा गंगा डॉल्फ़िन, कछुओं और अन्य जलीय जीवों के पुनर्वास को सुदृढ़ किया है। इस कार्यक्रम के तहत लगभग 6,800 जलीय जीवों को बचाया और पुनर्वासित किया गया है। संरक्षण एवं प्रजनन कार्यक्रमों के माध्यम से ताजे पानी के कछुओं के 1,500 से अधिक नवजात कछुए पैदा किए गए हैं, 711 कछुओं को गंगा नदी में छोड़ा गया है, जबकि 893 घड़ियाल के बच्चों और 1,899 कछुओं को उनके प्राकृतिक आवास में छोड़ा गया है। एनएमसीजी ‘टर्टल सर्वाइवल अलायंस फ़ाउंडेशन इंडिया’ (टीएसएएफआई) के माध्यम से गंभीर रूप से लुप्तप्राय ‘रेड-क्राउंड रूफ़्ड टर्टल’ (बटागुर कचुगा) को छोड़े जाने और छोड़े जाने के बाद उनकी निगरानी में भी मदद कर रहा है।

वैज्ञानिक अध्ययनों से गंगा नदी में मछली की 215 प्रजातियों (206 देशी और 9 विदेशी) का दस्तावेजीकरण किया गया है। आईसीएआर – केंद्रीय अंतर्देशीय मत्स्य अनुसंधान संस्थान (सीआईएफआरआई) के साथ मिलकर, एनएमसीजी ने देशी मछलियों की संख्या को फिर से बढ़ाने के लिए वैज्ञानिक ‘रिवर रैंचिंग’ (नदी में मछलियाँ छोड़ने का कार्य) शुरू किया है। गंगा और उसकी सहायक नदियों में लगभग 2.05 करोड़ मछली के बीज (जिनमें इंडियन मेजर कार्प, महाशीर और हिलसा शामिल हैं) छोड़े गए हैं। उत्तर प्रदेश में सात गंगा बायोडायवर्सिटी पार्क बनाकर, गंगा बेसिन वाले पाँच राज्यों में राज्य वन विभागों के सहयोग से स्थानीय प्रजातियों का उपयोग करते हुए 33,024 हेक्टेयर भूमि पर पेड़ लगाकर, और 113 ज़िलों में 5,500 से अधिक गंगा प्रहरियों को एकत्रित करके बायोडायवर्सिटी संरक्षण को सुदृढ़ किया जा रहा है।

एनएमसीजी ने गंगा बेसिन वाले राज्यों में पर्यावरण की दृष्टि से महत्वपूर्ण आर्द्रभूमियों की वैज्ञानिक पहचान और उन्हें प्राथमिकता देने और आर्द्रभूमि प्रबंधन योजनाएँ तैयार करने तथा आर्द्रभूमि (संरक्षण और प्रबंधन) नियम, 2017 के तहत आर्द्रभूमि की अधिसूचना जारी करने में सहायता की है। आर्द्रभूमि की बहाली और वैज्ञानिक प्रबंधन का विस्तार बिहार, झारखंड, उत्तर प्रदेश और दिल्ली में किया गया है। एक महत्वपूर्ण परिणाम के तौर पर, उत्तर प्रदेश सरकार ने हाल ही में 20 आर्द्रभूमि को अधिसूचित किया है। नदी डॉल्फ़िन की पहली देशव्यापी आबादी के अनुमान (वर्ष 2021–2023) के अनुसार, भारत में गंगा डॉल्फ़िन की अनुमानित आबादी 6,327 है। (संदर्भ: “भारत में नदी डॉल्फ़िन की आबादी की स्थिति – वर्ष 2024” संबंधी पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय की रिपोर्ट)।

निर्मल और अविरल धारा के लक्ष्यों को प्राप्त करने हेतु, गंगा और उसकी सहायक नदियों में जल की गुणवत्ता में सुधार के लिए राष्ट्रीय स्वच्छ गंगा मिशन (एनएमसीजी) द्वारा निम्नलिखित कदम उठाए हैं:

  1. प्रदूषित नदियों को साफ करने के लिए ₹35,970 करोड़ रुपये की अनुमानित लागत से कुल 219 सीवरेज अवसंरचना परियोजनाओं (एसटीपी) की शुरूआत की गई है जिससे कुल 6,610 मिलियन लीटर प्रति दिन (एमएलडी) की सीवेज उपचार क्षमता तैयार हुई है। कुल 4,263 एमएलडी की संचयी उपचार क्षमता वाले 146 सीवरेज अवसंरचना परियोजनाएं पूरी की जा चुकी हैं।
  2. औद्योगिक प्रदूषण को कम करने के लिए, 3 सामान्य अपशिष्ट उपचार संयंत्र (सीईटीपी) अर्थात जाजमऊ सीईटीपी (20 एमएलडी), बंथेर सीईटीपी (4.5 एमएलडी) और मथुरा सीईटीपी (6.25 एमएलडी) को मंज़ूरी दी गई है। इनमें से दो परियोजनाएं- मथुरा सीईटीपी (6.25 एमएलडी) और जाजमऊ सीईटीपी (20 एमएलडी) पूरी हो चुकी हैं।
  3. एनएमसीजी ने माह अक्टूबर 2018 में अधिसूचित न्यूनतम ई-फ्लो नियमों को सफलतापूर्वक लागू किया, जिससे गंगा नदी में लगातार पर्यावरणीय प्रवाह सुनिश्चित हुआ। केंद्रीय जल आयोग द्वारा इसके नियमित अनुपालन की प्रभावी ढंग से निगरानी की जा रही है।
  4. नदी संरक्षण के लिए प्रकृति-आधारित समाधान के तौर पर प्राथमिकता वाली आर्द्रभूमियों का संरक्षण और पुनरूद्धार।
  5. देशी (स्थानीय) प्रजातियों का उपयोग करते हुए नदी तटीय क्षेत्रों में वनीकरण का विस्तार तथा खराब नदी तटीय आवासों का पुनर्स्थापन।
  6. वैज्ञानिक निगरानी, आवास सुधार, बचाव और पुनर्वास कार्यक्रमों के माध्यम से गंगा डॉल्फ़िन, घड़ियाल, ताजे पानी के कछुओं, ऊदबिलाव और स्थानीय मछली के प्रजातियों के आवासों का संरक्षण और बहाली।
  7. भारतीय वन्यजीव संस्थान (डब्ल्यूआईआई) और आईसीएआर-सीआईएफआरआई जैसे संस्थानों के माध्यम से दीर्घकालिक पारिस्थितिक निगरानी, जैव विविधता आकलन और नदी पारिस्थितिकी तंत्र अनुसंधान को सुदृढ़ करना।
  8. मत्स्य पालन संसाधनों तथा जलीय पारिस्थितिकी को बेहतर बनाने के लिए हिलसा सहित वैज्ञानिक तरीके से नदियों में मछलियाँ पालने और देशी मछली प्रजातियों का संरक्षण करना।
  9. गंगा प्रहरी नेटवर्क के माध्यम से समुदाय आधारित संरक्षण का विस्तार करना तथा राज्य वन विभागों, स्थानीय समुदायों तथा अन्य हितधारकों की भागीदारी को सुदृढ़ करना।
  10. पारंपरिक प्रदूषण नियंत्रण उपायों को पूरा करने और ‘निर्मल’ व ‘अविरल’ गंगा के लक्ष्यों को समर्थन देने के लिए गंगा बायोडायवर्सिटी पार्कों, आर्द्रभूमि संरक्षण तथा एकीकृत पारिस्थितिकी तंत्र-आधारित प्रबंधन का निरंतर विकास।

यह सूचना जल शक्ति राज्यमंत्री श्री राज भूषण चौधरी द्वारा लोकसभा में लिखित प्रश्न के उत्तर में प्रदान की गई है।

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