निम्न पृथ्वी कक्षा – एलईओ यानी 2000 किलोमीटर से कम ऊंचाई पर मौजूद उपग्रह इस क्षेत्र में अधिक संख्या में अंतरिक्ष मलबे और अन्य अंतरिक्ष वस्तुओं की मौजूदगी के कारण टक्कर के खतरे के प्रति अधिक संवेदनशील होते हैं। भारत के कुल 22 सक्रिय उपग्रहों में से एलईओ में मौजूद 20 सक्रिय उपग्रहों पर टक्कर का खतरा अधिक है।
भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) ने वर्ष 2025 में 20 और वर्ष 2026 में अब तक 9 टक्कर बचाव अभियान (सीएएम) किए हैं।
भारतीय अंतरिक्ष वस्तुओं से तीसरे पक्ष को होने वाले नुकसान के लिए राज्य की देयता और बीमा संबंधी पहलुओं को ध्यान में रखते हुए इन-स्पेस द्वारा तैयार किया गया “भारतीय अंतरिक्ष वस्तुओं से उत्पन्न तीसरे पक्ष के नुकसान के प्रति राज्य की देयता से संबंधित नीति ढांचा और दिशा-निर्देश” फिलहाल विचाराधीन है।
भारत अंतरिक्ष मलबे के प्रबंधन पर अंतर्राष्ट्रीय सहयोग ढांचे में एक सक्रिय भागीदार है। जैसे कि अंतर-एजेंसी मलबा समन्वय समिति (आईएडीसी), दीर्घकालिक स्थिरता पर संयुक्त राष्ट्र कार्य समूह (यूएन-एलटीएस), अंतरिक्ष स्थिति जागरूकता का विशेषज्ञ समूह (एसएसए), इंटरनेशनल एकेडमी ऑफ एस्ट्रोनॉटिक्स (आईएए), अंतरिक्ष यातायात प्रबंधन (एसटीएम) कार्य समूह (डब्ल्यूजी), अंतर्राष्ट्रीय अंतरिक्ष यात्री संघ (आईएएफ) अंतरिक्ष मलबा डब्ल्यूजी। ये संस्थाएं अंतरिक्ष मलबे को कम करने से जुड़े तकनीकी और नीतिगत मुद्दों पर काम करती हैं।
इसरो ने संशोधित आईएडीसी अंतरिक्ष मलबा शमन दिशानिर्देशों में महत्वपूर्ण योगदान दिया है और तकनीकी अध्ययनों के आधार पर इनपुट प्रदान किए हैं। अंतरिक्ष मलबे को कम करने की प्रतिबद्धता के अंतर्गत भारत ने वर्ष 2024 में मलबा मुक्त अंतरिक्ष मिशन पहल की घोषणा की थी। इसरो का लक्ष्य निकट भविष्य में सरकारी और निजी क्षेत्र सहित सभी भारतीय अंतरिक्ष गतिविधियों से शून्य मलबा सुनिश्चित करना है।
वर्तमान में श्रीहरिकोटा स्थित मल्टी-ऑब्जेक्ट ट्रैकिंग रडार (एमओटीआर) निम्न पृथ्वी कक्षा में बड़े आकार की वस्तुओं को ट्रैक करने में सक्षम है और इसका उपयोग अंतरिक्ष वस्तुओं की निगरानी के लिए किया जा रहा है। वहीं, नेटवर्क फॉर स्पेस ऑब्जेक्ट ट्रैकिंग एंड एनालिसिस परियोजना के अंतर्गत लद्दाख के हानले में स्थापित किया जा रहा ऑप्टिकल टेलीस्कोप लगभग पूरा होने वाला है। यह जी ई ओ ऊंचाई पर 30 सेंटीमीटर या उससे बड़ी वस्तुओं को ट्रैक करने में सक्षम होगा।
मानव अंतरिक्ष उड़ान कार्यक्रम के लिए पहली बार कई महत्वपूर्ण तकनीकों का विकास किया जा रहा है। इनमें बायोमेडिकल और जीवन रक्षक प्रणालियां भी शामिल हैं। ये तकनीकें विकास और जमीनी परीक्षण के विभिन्न चरणों में हैं। आगे चलकर इन तकनीकों का सत्यापन विभिन्न गगनयान मिशनों के माध्यम से किया जाएगा। मानव अंतरिक्ष अभियानों के लिए नई तकनीकों के सफल प्रदर्शन के बाद इन्हें सामाजिक उपयोग के लिए भी अपनाया जा सकता है।
यह जानकारी विज्ञान और प्रौद्योगिकी, पृथ्वी विज्ञान, प्रधानमंत्री कार्यालय, कार्मिक, लोक शिकायत और पेंशन, परमाणु ऊर्जा और अंतरिक्ष मंत्रालय के राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) डॉ. जितेंद्र सिंह ने आज लोकसभा में एक लिखित उत्तर में दी।
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