रक्षा मंत्री ने कहा- कुछ देश और पक्ष अपने संकीर्ण और एकतरफा लाभ के लिए महासागरों के महत्व का गलत लाभ उठाना चाहते हैं; आज की आपस में जुड़ी दुनिया में मौजूद कमजोरियों का समाधान ‘अनुकूलन’ विकसित करने में ही है
श्री राजनाथ सिंह ने कहा- उभरते खतरों के साथ समुद्री सुरक्षा को भी विकसित होना चाहिए; आज के समय की मांग है कि नई तकनीकों का भरपूर इस्तेमाल किया जाए
रक्षा मंत्री ने कहा- तकनीक देशों के बीच असमानता का एक और कारण नहीं बननी चाहिए; अगर इसका लाभ केवल कुछ ही लोगों को मिले, तो इससे सामूहिक मजबूती का लक्ष्य हासिल नहीं किया जा सकता
श्री राजनाथ सिंह ने कहा- आर्थिक विकास और पर्यावरण के प्रति जिम्मेदारी, दोनों को साथ-साथ आगे बढ़ना चाहिए; महासागरों को संसाधनों का असीमित स्रोत नहीं माना जा सकता
रक्षा मंत्री ने कहा- भारत की ‘विकसित भारत’ यात्रा में समुद्री क्षेत्र एक मुख्य चालक होगा; सरकार एक व्यापक समुद्री इकोसिस्टम विकसित करने के लिए लगातार प्रयास कर रही है
रक्षा मंत्री श्री राजनाथ सिंह ने वैश्विक समुद्री सुरक्षा वातावरण में बढ़ते तनाव के बीच, क्षेत्रीय साझेदारों के बीच आपसी निर्भरता और अधिक सुरक्षित तथा मजबूत बनाने का आह्वान किया है। इसके लिए उन्होंने आपूर्ति श्रृंखलाओं में विविधता लाने, भरोसेमंद समुद्री बुनियादी ढांचे के निर्माण, समुद्री जागरूकता बढ़ाने और आपसी सहयोग को मजबूत करने पर बल दिया। रक्षा मंत्री ने किसी भी तरह की बाधा का पहले से अनुमान लगाने, उसका सामना करने और उससे उबरने की क्षमता विकसित करने की आवश्यकता भी बताई। श्री राजनाथ सिंह ने आज नई दिल्ली में आयोजित ‘हिंद-प्रशांत क्षेत्रीय संवाद (आईपीआरडी) को संबोधित करते हुए ये बात कही। यह कार्यक्रम भारतीय नौसेना का एक वार्षिक, उच्च-स्तरीय अंतरराष्ट्रीय रणनीतिक सम्मेलन है।
रक्षा मंत्री ने महासागरों को राष्ट्रों और सभ्यताओं के बीच ‘बाधा’ के बजाय ‘सेतु’ यानी पुल के रूप में वर्णित किया। उन्होंने बताया कि महासागर किस तरह आजीविका को बनाए रखने और वस्तुओं, ज्ञान तथा संस्कृति के आदान-प्रदान को सुगम बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। उन्होंने कहा कि भले ही अंतरराष्ट्रीय समुदाय इन वैश्विक निर्भरताओं के बारे में जानता है, फिर भी कुछ पक्ष और देश अपने संकीर्ण और एकतरफा लाभ के लिए महासागरों की इस महत्ता का गलत फायदा उठाने की कोशिश करते हैं। उन्होंने कहा, “जानबूझकर व्यापार में बाधाएं पैदा करने से वैश्विक समुद्री सुरक्षा का वातावरण तनावपूर्ण हो गया है। हम नौवहन की स्वतंत्रता के सामने खुली चुनौतियां देख रहे हैं। समुद्री रास्तों को हथियारों की तरह इस्तेमाल किया जा रहा है। समुद्री क्षेत्र में बढ़ती यह अस्थिरता व्यापक अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था पर भी गहरा असर डालती है।”

श्री राजनाथ सिंह ने कहा कि आपस में जुड़ी दुनिया की कमजोरियों का समाधान ‘अनकूलन’ विकसित करने में है। उन्होंने जोर देकर कहा कि किसी भी तरह की रुकावट आने पर वैश्वीकरण को नहीं छोड़ा जा सकता, और न ही उन समुद्री क्षेत्रों को बंद किया जाना चाहिए जिन्होंने मानव प्रगति में योगदान दिया है। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि हमारा लक्ष्य आपसी निर्भरता को और अधिक सुरक्षित बनाना होना चाहिए।
रक्षा मंत्री ने समुद्री सुरक्षा के बदलते स्वरूप का उल्लेख करते हुए कहा कि चुनौतियां केवल पारंपरिक सैन्य गतिविधियों से ही नहीं, बल्कि समुद्री डकैती, तस्करी, अवैध मछली पकड़ने, साइबर हमलों और प्राकृतिक आपदाओं जैसे गैर-पारंपरिक खतरों से भी आ सकती हैं। उन्होंने कहा कि समुद्री सुरक्षा को भी बदलते समुद्री परिवेश के साथ विकसित होने की जरूरत है। उन्होंने कहा, “आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस डेटा को प्रोसेस करने के तरीके को बदल रहा है, जबकि स्वचालित प्रणालियां निगरानी और अभियानों की संभावनाओं का विस्तार कर रहे हैं। नए सेंसर महासागरों पर नजर रखने की हमारी क्षमता को बेहतर बना रहे हैं। सामग्री विज्ञान, जैव प्रौद्योगिकी और डेटा विश्लेषण में हुई प्रगति अनुसंधान और अनुप्रयोग के नए रास्ते खोल रही है। इन विकासों का समुद्री सुरक्षा और आर्थिक गतिविधियों पर गहरा असर पड़ता है। लेकिन, केवल तकनीक ही इसका समाधान नहीं है। सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह है कि हम वास्तविक चुनौतियों से निपटने के लिए तकनीक का उपयोग कैसे करते हैं।”
श्री राजनाथ सिंह ने इस बात पर भी जोर दिया कि तकनीक को देशों के बीच असमानता का एक और कारण नहीं बनना चाहिए, क्योंकि हिंद-प्रशांत क्षेत्र में ऐसे देश शामिल हैं जिनकी तकनीकी और आर्थिक क्षमता का स्तर अलग-अलग है। उन्होंने कहा, “कुछ देशों के पास उन्नत अनुसंधान बुनियादी ढांचा है। वहीं, अन्य देश अब भी ऐसे संस्थागत और मानव संसाधन विकसित कर रहे हैं, जो इस बदलाव में पूरी तरह से शामिल होने के लिए जरूरी हैं। अगर तकनीकी प्रगति का लाभ केवल कुछ ही देशों को मिलता है, तो हम उस सामूहिक मजबूती को हासिल नहीं कर पाएंगे जिसकी हमारे क्षेत्र को जरूरत है।”

रक्षा मंत्री ने अनुसंधान, शिक्षा, नवाचार और क्षमता निर्माण में सहयोग को बढ़ावा देने का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि किसी एक देश की मजबूत वैज्ञानिक क्षमता पूरे क्षेत्र की सुरक्षा और समृद्धि में योगदान दे सकती है। उन्होंने छोटे समुद्री राष्ट्रों और विकासशील देशों के लिए इसे विशेष रूप से महत्वपूर्ण बताते हुए कहा कि सबसे उपयोगी तकनीक का जरूरी नहीं कि सबसे महंगी या जटिल होना ही हो; बल्कि वह तकनीक सबसे उपयोगी है जो किसी वास्तविक समस्या का समाधान करे।
श्री राजनाथ सिंह ने इस बात पर जोर दिया कि जैसे-जैसे भारत वर्ष 2047 तक ‘विकसित भारत’ की ओर बढ़ रहा है, देश समुद्री क्षेत्र देश के राष्ट्रीय कायाकल्प में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा। उन्होंने प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व वाली सरकार के उन प्रयासों का उल्लेख किया, जिनका उद्देश्य बंदरगाह बुनियादी ढांचे और कनेक्टिविटी में निवेश, ‘सागरमाला’ के अंतर्गत बंदरगाह-आधारित विकास, तटीय आर्थिक गतिविधियों को बढ़ावा देने और समुद्री औद्योगिक आधार को मजबूत करने के माध्यम से एक व्यापक समुद्री इकोसिस्टम विकसित करना है। उन्होंने ‘समुद्री अमृत काल परिकल्पना 2047’ को इस बदलाव के लिए एक राष्ट्रीय रूपरेखा बताया, जिसमें तकनीक, नवाचार, अनुसंधान, शिक्षा और कौशल पर विशेष जोर दिया गया है।
रक्षा मंत्री ने आर्थिक विकास और पर्यावरणीय जिम्मेदारी को एक साथ आगे बढ़ाने की आवश्यकता पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि महासागरों को संसाधनों का असीमित स्रोत नहीं माना जा सकता। उन्होंने समुद्री इकोसिस्टम के संरक्षण, समुद्री संसाधनों के जिम्मेदार उपयोग और विकास कार्यों के केंद्र में तटीय समुदायों के हितों को रखने का समर्थन किया। उन्होंने कहा, “राष्ट्रीय समृद्धि और पारिस्थितिक जिम्मेदारी एक-दूसरे की विरोधी नहीं हैं। बल्कि, इन्हें एक-दूसरे को मजबूत करना चाहिए।”
श्री राजनाथ सिंह ने एक मुक्त, समावेशी और नियमों पर आधारित समुद्री तंत्र के प्रति भारत की प्रतिबद्धता दोहराते हुए, ‘महासागर’ यानी क्षेत्रीय सुरक्षा और विकास के लिए पारस्परिक और समग्र उन्नति के दृष्टिकोण का उल्लेख किया। यह दृष्टिकोण राष्ट्रों के बीच सुरक्षा और समृद्धि के परस्पर जुड़े स्वरूप को मान्यता देता है और इस बात पर जोर देता है कि हिंद-प्रशांत क्षेत्र के समुद्री भविष्य को कोई एक देश अकेले तय नहीं कर सकता। उन्होंने प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी द्वारा वर्ष 2019 में घोषित ‘हिंद-प्रशांत महासागर पहल’ को भी एक व्यावहारिक ढांचे के रूप में बताया, जो सात परस्पर जुड़े क्षेत्रों में समुद्री सहयोग को आगे बढ़ाने का काम करता है।

श्री राजनाथ ने क्षेत्रीय सहयोग को ठोस नतीजों में बदलने की ज़रूरत पर ज़ोर दिया। रक्षा मंत्री नेहिंद-प्रशांत क्षेत्रीय संवाद के प्रतिभागियों से आग्रह किया कि वे केवल चुनौतियों की पहचान करने से आगे बढ़ें और व्यावहारिक कदमों पर ध्यान दें। उन्होंने मज़बूत वैज्ञानिक नेटवर्क, संयुक्त शोध, विश्वविद्यालयों और समुद्री संस्थानों के बीच आपसी आदान-प्रदान तथा आम चुनौतियों के लिए किफायती तकनीकी समाधान विकसित करने का समर्थन किया। श्री राजनाथ ने इस बात पर ज़ोर दिया कि हिंद-प्रशांत क्षेत्रीय संवाद में होने वाली चर्चाओं के ठोस नतीजे निकलने चाहिए। उन्होंने कहा कि बातचीत से निकले विचारों को साझेदारियों, परियोजनाओं और मापने योग्य परिणामों में बदला जाना चाहिए।
श्री राजनाथ सिंह ने कहा, “हिंद-प्रशांत क्षेत्र का भविष्य केवल तकनीक से तय नहीं होगा। यह इस बात से तय होगा कि हम उस तकनीक का इस्तेमाल कितनी समझदारी से करते हैं, हम कैसी साझेदारियां बनाते हैं और विभिन्न देशों के बीच कितना भरोसा पैदा करते हैं।” उन्होंने इस सामूहिक प्रयास में योगदान देने के लिए भारत की प्रतिबद्धता को भी दोहराया।
रक्षा मंत्री ने व्यक्त की कि इन विचार-विमर्शों से सार्थक बातचीत और व्यावहारिक सहयोग का मार्ग प्रशस्त होगा। उन्होंने अपनी बात समाप्त करते हुए कहा कि हमें “साझा चुनौतियों से साझा समझ की ओर, साझा समझ से साझा ज्ञान की ओर, और साझा ज्ञान से साझा अनुकूलन तथा साझा समृद्धि की ओर” आगे बढ़ना चाहिए।
अपने संबोधन में, नौसेना प्रमुख एडमिरल कृष्ण स्वामीनाथन ने महासागरों के आपस में जुड़े होने और हिंद-प्रशांत क्षेत्र में वैज्ञानिक ज्ञान, अनुसंधान बुनियादी ढांचे तथा तकनीकी क्षमताओं के असमान वितरण का उल्लेख किया। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि समुद्री सहयोग केवल उपकरणों की खरीद तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि इसका विस्तार टिकाऊ क्षमताओं के निर्माण तक होना चाहिए, ताकि सहयोगी देश तकनीकों का संचालन, रखरखाव, अनुकूलन और उन्नयन कर सकें।

नौसेना प्रमुख ने समुद्री चुनौतियों से निपटने के लिए एक व्यापक और एकीकृत दृष्टिकोण की आवश्यकता पर जोर देते हुए महासागर विज्ञान और अनुसंधान में सामूहिक निवेश बढ़ाने, वैज्ञानिक डेटा और तकनीक के बेहतर आदान-प्रदान, तथा संयुक्त वैज्ञानिक अभियानों सहित सहयोगात्मक अनुसंधान पहलों का आह्वान किया। उन्होंने विश्वास, पारदर्शिता और समावेशी महासागरीय शासन के माध्यम से मौजूदा क्षेत्रीय संस्थानों और तंत्रों को मजबूत करने के महत्व का उल्लेख किया।
नौसेना प्रमुख ने कहा कि हिंद-प्रशांत क्षेत्रीय संवाद-2026 साझा समुद्री हितों को व्यावहारिक परिणामों में बदलने और हिंद-प्रशांत क्षेत्र में विज्ञान, प्रौद्योगिकी तथा शैक्षणिक सहयोग को मजबूत करने के लिए ठोस और भविष्य के अनुकूल सुझाव तैयार करने हेतु एक महत्वपूर्ण मंच प्रदान करता है।
सम्मेलन में मौजूद अन्य गणमान्य व्यक्तियों में थल सेनाध्यक्ष जनरल धीरज सेठ, वायु सेनाध्यक्ष एयर चीफ मार्शल आशुतोष दीक्षित, और पूर्व नौसेना प्रमुख तथा राष्ट्रीय समुद्री फाउंडेशन के अध्यक्ष एडमिरल दिनेश के. त्रिपाठी (सेवानिवृत्त) शामिल थे।

भारतीय नौसेना द्वारा राष्ट्रीय समुद्री फाउंडेशन (एनएमएफ) के सहयोग से आयोजित तीन दिवसीय हिंद प्रशांत क्षेत्रीय संवाद 2026 की शुरुआत 3 नवंबर, 2026 को हुई। इस संवाद के दूसरे दिन क्षेत्रीय समुद्री अनुकूलन से जुड़े दो महत्वपूर्ण मुद्दों-समुद्र में हो रही गतिविधियों की बेहतर साझा समझ, और पर्यावरणीय बदलावों का पूर्वानुमान लगाने तथा उन पर प्रतिक्रिया देने के लिए अधिक मजबूत वैज्ञानिक क्षमता पर ध्यान केंद्रित किया गया।
कार्यक्रम के दौरान आज एक मंत्री-स्तरीय सत्र भी आयोजित हुआ, जिसमें विज्ञान और प्रौद्योगिकी तथा पृथ्वी विज्ञान राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) डॉ. जितेंद्र सिंह ने विशेष संबोधन दिया। उन्होंने राष्ट्रीय समुद्री फाउंडेशन का एक प्रकाशन भी जारी किया, जिसका शीर्षक है – ‘भविष्य की भारतीय नौसेना के लिए जहाज के ढांचे के वैकल्पिक स्वरूप।
हिंद प्रशांत क्षेत्रीय संवाद 2026 के मुख्य विषय में नौसैनिक दृष्टिकोण को शामिल करते हुए, ‘फ्लैग ब्रिज से दृष्टिकोण’ नामक एक बातचीत का सत्र आयोजित किया गया। इसमें भारतीय नौसेना के पूर्व प्रमुख – एडमिरल आर.के. धवन, एडमिरल सुनील लांबा, एडमिरल करमबीर सिंह और एडमिरल दिनेश के. त्रिपाठी के साथ-साथ श्रीलंका नौसेना के पूर्व कमांडर एडमिरल जयनथा परेरा शामिल हुए। इस चर्चा का संचालन एनएमएफ के महानिदेशक, वाइस एडमिरल प्रदीप चौहान ने किया। इस सत्र में समुद्री रणनीति, तकनीकी बदलाव और क्षेत्रीय सहयोग के बीच संबंधों पर अत्यंत महत्वपूर्ण विचार साझा किए गए। इसमें विशेष रूप से ‘हिंद महासागर नौसैनिक संगोष्ठी’ के अंतर्गत नौसैनिक सहयोग पर चर्चा हुई, जिसकी अध्यक्षता वर्तमान में भारतीय नौसेना कर रही है।
इसके अलावा, भारतीय नौसेना के कमोडोर अभिनव बर्वे द्वारा संचालित एक सत्र ‘समुद्र विज्ञान और जलवायु अनुकूलन’पर केंद्रित था। इस सत्र में वक्ताओं ने क्षेत्रीय तैयारियों के वैज्ञानिक आधारों पर चर्चा की। इसमें मॉरीशस और सेशेल्स जैसे हिंद महासागर के द्वीपीय देशों में जलवायु अनुकूलन के लिए ‘सहयोगात्मक समुद्री नेटवर्क’ पर विशेष जोर दिया गया। सत्र के दौरान समुद्र विज्ञान को नीति में बदलने और समुद्री डेटा को साझा करने के विभिन्न पहलुओं पर भी बात हुई। इसमें अनुसंधान जहाजों, निगरानी नेटवर्क, पूर्वानुमान क्षमताओं और डेटा साझा करने की उचित व्यवस्थाओं के माध्यम से आपसी सहयोग जैसे विषय शामिल थे।
हिंद-प्रशांत क्षेत्रीय संवाद-2026 के दूसरे दिन हुए दो मंत्रिस्तरीय सत्रों ने सम्मेलन को रणनीतिक दिशा प्रदान की। साथ ही, हिंद-प्रशांत क्षेत्र में समुद्री सुरक्षा संबंधी चिंताओं को दूर करने के लिए भारत के सहयोगात्मक दृष्टिकोण पर एक व्यापक परिप्रेक्ष्य भी प्रस्तुत किया।
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