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डॉ. जितेंद्र सिंह ने पात्र लाभार्थियों तक लाभ सुनिश्चित करने के लिए हितधारकों के बीच एक लाख करोड़ रुपये के आरडीआई कोष के बारे में व्यापक जागरूकता का आह्वान किया


प्रौद्योगिकी और अनुसंधान हितधारकों तक कोष की पहुंच सुनिश्चित करने और राष्ट्रीय आर्थिक विकास में योगदान देने के लिए व्यापक सपंर्क की आवश्यकता है

प्रौद्योगिकी विकास बोर्ड को भविष्य के प्रौद्योगिकी क्षेत्रों के रणनीतिक प्रवर्तक के रूप में विकसित होना चाहिए: डॉ. जितेंद्र सिंह

केंद्रीय विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी मंत्री डॉ. जितेंद्र सिंह ने आज हितधारकों के बीच 1 लाख करोड़ रुपये के “अनुसंधान, विकास और नवाचार कोष” (आरडीआई) के बारे में जागरूकता और जानकारी का आह्वान किया ताकि सही आवेदक इसके उद्देश्य, पात्रता और सहायता प्राप्त करने की प्रक्रिया को समझ सकें।

डॉ. जितेंद्र सिंह ने प्रौद्योगिकी विकास बोर्ड (टीडीबी) के 30वें स्थापना दिवस के अवसर पर कहा कि आरडीआई कोष के पीछे की भावना, सहायता के लिए पात्र हितधारकों और कंपनियों के बारे में जागरूकता और वे इस फंड का लाभ कैसे उठा सकते हैं, इस पर ध्यान केंद्रित किया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि प्राप्त आवेदनों की बड़ी संख्या यह दर्शाती है कि आरडीआई कोष के उद्देश्य के बारे में अधिक स्पष्टता और व्यापक प्रचार-प्रसार की आवश्यकता है।

डॉ. जितेंद्र सिंह ने कहा कि हजारों आवेदन प्राप्त हो रहे हैं, जिनमें उन आवेदकों के भी आवेदन शामिल हैं जिन्हें आरडीआई कोष की प्रकृति और उद्देश्य की समझ नहीं है। उन्होंने आगाह किया कि यह कोष केवल वित्त का एक और स्रोत या एक पारंपरिक ऋण सुविधा है, और वित्तपोषण प्रक्रिया के बारे में किसी भी प्रकार की भ्रांति न हो।

डॉ. जितेंद्र सिंह ने कहा कि आरडीआई कोष का उद्देश्य प्रौद्योगिकी विकास और अनुसंधान को इस तरह से समर्थन देना है जिससे विज्ञान और अनुसंधान की प्रगति में योगदान मिले और ये गतिविधियां राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था के समग्र विकास का हिस्सा बन सकें। उन्होंने यह सुनिश्चित करने के प्रयासों का आह्वान किया कि हितधारक कोष की भावना और उद्देश्य को समझें ताकि इसका लाभ उचित लाभार्थियों तक पहुंच सके।

डॉ. जितेंद्र सिंह ने इस बात पर बल दिया कि वित्तपोषण प्रक्रिया पहले से ही पारदर्शी है और इसमें उचित सुरक्षा उपाय मौजूद हैं, हालांकि सरकार जहां भी संभव हो, अतिरिक्त सुरक्षा उपायों के लिए सुझावों का स्वागत करती है। उन्होंने कहा कि बेहतर जागरूकता से सही तरह के लोगों को वैज्ञानिक और अनुसंधान प्रगति के हित और राष्ट्रीय आर्थिक विकास में इसके योगदान के लिए सहायता प्राप्त करने में मदद मिलेगी।

डॉ. जितेंद्र सिंह ने टीडीबी की भूमिका का उल्लेख करते हुए कहा कि बोर्ड को उन लोगों को शिक्षित करने में भी भूमिका निभानी चाहिए जिनके लिए ये पहलें बनाई गई हैं। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि प्रौद्योगिकी और नीतिगत ढांचे तेजी से बदल रहे हैं, इसलिए हितधारकों की मानसिकता में भी बदलाव की आवश्यकता है।

डॉ. जितेंद्र सिंह ने कहा कि टीडीबी की स्थापना इस सोच के साथ की गई थी कि प्रौद्योगिकियां केवल प्रयोगशालाओं तक ही सीमित न रहें, बल्कि उत्पादों, समाधानों और उद्यमों में परिवर्तित हों जो नागरिकों के जीवन को सुगम बना सकें, आजीविका प्रदान कर सकें और देश की समग्र अर्थव्यवस्था में योगदान दे सकें। उन्होंने कहा कि टीडीबी का 30वां स्थापना दिवस इस भावना को आगे बढ़ाने में हुई प्रगति का अवलोकन करने का अवसर है।

डॉ. जितेंद्र सिंह ने कहा कि पिछले 12 वर्षों में यह भावना सही साबित हुई है और उन्होंने प्रधानमंत्री श्री नरेन्‍द्र मोदी को विज्ञान, प्रौद्योगिकी और नवाचार को सरकारी प्राथमिकताओं में उच्च स्थान देने का श्रेय दिया। उन्होंने इस अवधि को देश में वैज्ञानिक पुनर्जागरण का दशक बताया और विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में उपलब्धियों के साथ-साथ लागत प्रभावी सफलताएं हासिल करने की देश की क्षमता को उजागर किया।

डॉ. जितेंद्र सिंह ने सोच में बदलाव के महत्व पर बल देते हुए कहा कि तेज तकनीकी विकास के साथ तालमेल बनाए रखने के लिए निरंतर सीखना और जिज्ञासा आवश्यक होगी। उन्होंने कहा कि हितधारकों को नीति निर्माताओं द्वारा प्रदान किए गए अनुकूल वातावरण का सर्वोत्तम उपयोग करना चाहिए।

डॉ. जितेंद्र सिंह ने स्टार्टअप इकोसिस्टम के विकास पर प्रकाश डाला और उद्यमिता से जुड़ी प्रचलित भ्रांतियों को दूर करने का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि स्टार्टअप केवल बेंगलुरु या हैदराबाद तक ही सीमित नहीं हैं, बल्कि 50 प्रतिशत से अधिक स्टार्टअप छोटे शहरों से हैं और उद्यमिता केवल युवाओं तक ही सीमित नहीं है। उन्होंने इकोसिस्टम में महिलाओं की भागीदारी पर भी बल दिया।

डॉ. जितेंद्र सिंह ने निजी क्षेत्र की भागीदारी में खुलेपन के महत्व पर बल दिया और कहा कि अंतरिक्ष, जैव प्रौद्योगिकी और परमाणु क्षेत्र सहित कई क्षेत्रों में इसी दृष्टिकोण का पालन किया गया है। उन्होंने इस बात पर बल दिया कि संस्थानों और हितधारकों के बीच संसाधनों का एकत्रीकरण और एकीकरण इकोसिस्‍टम को मजबूत करने के लिए महत्वपूर्ण है।

डॉ. जितेंद्र सिंह ने प्रयोगशाला से बाजार तक सहयोग में टीडीबी की भूमिका की सराहना की और कहा कि बोर्ड ने व्यवहार में सीमित क्षेत्रों से परे जाकर भी सहयोग प्रदान किया है। उन्होंने स्काईरूट और बॉटलैब जैसे उदाहरणों का उल्लेख करते हुए कहा कि पारंपरिक नौकरशाही दृष्टिकोण से हटकर काम करने से टीडीबी उभरते प्रौद्योगिकी इकोसिस्‍टम का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बन सका है।

उन्‍होंने अनुसंधान में परोपकार की संस्कृति की आवश्यकता पर भी बल दिया। उन्होंने कहा कि ऐसे अनुसंधान को वित्तपोषित करना जो अंततः मानव जाति के कल्याण में योगदान देता है, उसे भी मान्यता दी जानी चाहिए और ऐसी संस्कृति के सृजन का आह्वान किया।

डॉ. जितेंद्र सिंह ने भविष्य की योजनाओं पर चर्चा करते हुए कहा कि टीडीबी को प्रारंभिक और बाद के दोनों चरणों में प्रौद्योगिकी विकास में सहयोग देना चाहिए। उन्होंने बताया कि आरडीआई कोष टीआरएल4 स्तर पर बाद के चरण में सहयोग प्रदान कर रहा है और टीडीबी ने सबसे पहले अपने प्रस्ताव पेश किए हैं।

उन्होंने कहा कि टीडीबी ने सार्वजनिक से निजी क्षेत्र में बदलाव और तकनीकी आत्मनिर्भरता का एक मॉडल स्थापित किया है जो भारत की अर्थव्यवस्था का एक महत्वपूर्ण स्तंभ बन सकता है और न केवल भारत बल्कि विकासशील देशों के लिए भी योगदान दे सकता है। उन्होंने आगे कहा कि भारत की तकनीकी क्षमताओं को मजबूत करने से विकासशील देशों और विश्व भर में देश की भू-राजनीतिक स्थिति भी मजबूत होगी।

उन्‍होंने कहा कि टीडीबी के पहले तीस वर्ष प्रयोगशाला और बाजार के बीच सेतु बनाने पर केंद्रित थे, जबकि अगले तीस वर्ष भारत को वैश्विक प्रौद्योगिकी क्षेत्र में अग्रणी बनने पर केंद्रित होने चाहिए। उन्‍होंने विचारों से नवाचार, नवाचार से उद्योग और वर्ष 2047 तक विकसित भारत की ओर बढ़ने की आवश्यकता पर बल दिया गया।

डॉ. जितेंद्र सिंह ने टीडीबी से प्रौद्योगिकी विकास, सार्वजनिक से निजी क्षेत्र की ओर बदलाव तथा प्रौद्योगिकी आत्मनिर्भरता में अपनी भूमिका को आगे बढ़ाने का आह्वान किया।

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