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आईएएफ ड्रोनथॉन 2026


भारतीय वायु सेना ड्रोनथॉन-2026 का आयोजन कर रही है, जिसका उद्देश्य घरेलू निर्माताओं को मानवरहित हवाई प्रणालियों (यूएएस) और मानवरहित हवाई प्रणालियों की प्रतिकार (सीयूएएस) में अपनी क्षमताओं और प्रगति को प्रदर्शित करने का अवसर प्रदान करना है। इस आयोजन का उद्देश्य हितधारकों को उभरती हुई ड्रोन और काउंटर ड्रोन प्रौद्योगिकियों के साथ-साथ उनके परिचालन प्रदर्शन को देखने और आपसी ज्ञानवर्धन को बढ़ावा देने में सहायता करना है।

यह आयोजन 14 से 16 सितंबर 2026 तक जैसलमेर के पोखरण रेंज में आयोजित किया जाएगा। इसमें स्थिर प्रदर्शन और लाइव प्रदर्शन शामिल होंगे। इससे समकालीन समाधानों की पहचान करने और उनकी युद्ध प्रभावशीलता का मूल्यांकन करने में मदद मिलेगी। प्रमुख फोकस क्षेत्रों में निगरानी और टोही, ऑटोनोमस ऑपरेशन, समूह प्रौद्योगिकी और इलेक्ट्रॉनिक युद्धकला शामिल हैं।

आत्मनिर्भर भारत के राष्ट्रीय विजन के अनुरूप, ड्रोनथॉन-2026 का उद्देश्य उद्योग विशेषज्ञों, स्टार्टअप्स और नवप्रवर्तकों को एकीकृत करके स्वदेशी रक्षा प्रणाली को मजबूत करना है। इन पहलों के माध्यम से, भारतीय वायु सेना तेजी से बदलते प्राचालनगत परिवेश में सुरक्षा चुनौतियों का सामना करने में सक्षम, प्रौद्योगिकीय रूप से उन्नत, स्वदेशी और भविष्य के लिए तैयार बल के निर्माण के लिए प्रतिबद्ध है।

पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय  (एमओईएस) और राष्ट्रीय समुद्र प्रौद्योगिकी संस्थान (एनआईओटी) ने नॉलेज पार्टनर ईवाई और नीति आयोग के सहयोग से नई दिल्ली स्थित डॉ. अंबेडकर इंटरनेशनल सेंटर में “गहरे समुद्र में खनन – व्यावसायिक अवसर और रणनीतिक महत्व” विषय पर एक उच्चस्तरीय उद्योग संपर्क कार्यशाला का आयोजन किया।

इस ऐतिहासिक आयोजन में वैश्विक और घरेलू नीति निर्माताओं, नियामकों, प्रौद्योगिकी विकासकर्ताओं, अनुसंधान संस्थानों और वित्तीय नेताओं को एक साथ लाया गया ताकि भारत की नीली अर्थव्यवस्था की दिशा को मजबूत किया जा सके।

भारत के लिए गहरे समुद्र में खनन रणनीतिक रूप से इतना महत्वपूर्ण क्यों है?

महत्वपूर्ण खनिज आपूर्ति सुनिश्चित करना: स्वच्छ ऊर्जा प्रौद्योगिकियां, उन्नत विनिर्माण, उच्च-स्तरीय कंप्यूटिंग प्रणालियां और विद्युत गतिशीलता निकेल, कोबाल्ट, तांबा और मैंगनीज जैसे महत्वपूर्ण खनिजों पर बहुत अधिक निर्भर करती हैं। भारत की दीर्घकालिक आर्थिक और भू-राजनीतिक सुरक्षा के लिए वैकल्पिक संसाधन क्षेत्रों का विकास अत्यंत आवश्यक है।

विशाल स्वदेशी भंडार: भारत के पास मध्य हिंद महासागर बेसिन (सीआईओबी) में 75,000 वर्ग किलोमीटर से अधिक क्षेत्र में अंतर्राष्ट्रीय समुद्री तल प्राधिकरण (आईएसए) का एक अनन्य अन्वेषण अनुबंध है, जिसमें लगभग 366 से 380 मिलियन टन पॉलीमेटैलिक नोड्यूल होने का अनुमान है। इसके अतिरिक्त, भारत पॉलीमेटैलिक सल्फाइड के लिए दो अन्वेषण अनुबंध रखने वाला पहला देश है, जिसमें कार्ल्सबर्ग रिज के लिए हाल ही में हुआ समझौता भी शामिल है।

स्वदेशी प्रौद्योगिकी को बढ़ावा देना: ₹4,077 करोड़ की राष्ट्रीय डीप ओशन मिशन के तहत, एनआईओटी ने हिंद महासागर में 5,000 मीटर से अधिक की गहराई पर स्वदेशी डीप-सी माइनिंग क्रॉलर सिस्टम का सफलतापूर्वक प्रदर्शन किया है, जो महत्वपूर्ण सबसी इंजीनियरिंग क्षमताओं को साबित करता है।

औद्योगिक एकीकरण और विकास: अन्वेषण से वाणिज्यिक क्षमता की ओर बढ़ने से एक एकीकृत “खनन से धातु तक” पारिस्थितिकी तंत्र का निर्माण होगा। इससे अपतटीय इंजीनियरिंग, समुद्री रोबोटिक्स, जहाज निर्माण, धातुकर्म और डाउनस्ट्रीम बैटरी विनिर्माण जैसे क्षेत्रों में आकर्षक व्यावसायिक अवसर खुलेंगे।

यह कार्यशाला वैज्ञानिक क्षमता और निजी क्षेत्र की भागीदारी के बीच सेतु बनाने के लिए एक महत्वपूर्ण रणनीतिक निवेश मंच के रूप में आयोजित की गई। इसने आगामी नीतिगत ढांचे, वित्तीय रूप से व्यवहार्य परियोजना रोडमैप और गहरे समुद्र में खनन पर आगामी श्वेत पत्र की आधारशिला रखी, जो भारत के औद्योगिक एकीकरण को दिशा देने में सहायक होगा।

यह ध्यान देने योग्य है कि अंतर्राष्ट्रीय जलक्षेत्र में नोड्यूल का वाणिज्यिक खनन केवल अंतर्राष्ट्रीय समुद्री तल प्राधिकरण द्वारा शोषण संहिता जारी किए जाने के बाद ही शुरू हो सकता है।

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