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जनजातीय समुदायों की बेदखली

आज लोकसभा में एक सवाल का जवाब देते हुए केंद्रीय जनजातीय कार्य राज्य मंत्री श्री दुर्गादास उइके ने बताया कि उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश और उत्तर प्रदेश के वन गुज्जर समुदायों से ‘अनुसूचित जनजाति और अन्य परंपरागत वन निवासी (वन अधिकारों की मान्यता) अधिनियम, 2006’ (संक्षेप में एफआरए) के तहत अधिकारों से जुड़े मुद्दों पर मंत्रालय को जो अभ्यावेदन प्राप्त हुए थे, उनकी जांच की गई। चूंकि एफआरए को लागू करने की ज़िम्मेदारी राज्य सरकारों और संघ राज्य क्षेत्र प्रशासनों की है, इसलिए इन आवेदनों को संबंधित राज्य सरकारों और ज़िला प्रशासनों के पास भेज दिया गया, ताकि वे एफआरए और अन्य लागू कानूनों के प्रावधानों के अनुसार इनकी जांच कर सकें और ज़रूरी कार्रवाई कर सकें।

जनजातीय कार्य मंत्रालय सभी राज्य सरकारों/संघ राज्य क्षेत्र प्रशासनों से एफआरए (वन अधिकार अधिनियम) के प्रावधानों का पालन करने का आग्रह करता रहा है। एफआरए के तहत हुई प्रगति का आकलन करने के लिए राज्य सरकारों/ संघ राज्य क्षेत्र प्रशासनों के साथ नियमित समीक्षा बैठकें की जाती हैं। इसके अतिरिक्त, एफआरए के प्रावधानों के उल्लंघन के संबंध में मंत्रालय को मिलने वाली शिकायतों/अभ्यावेदनों को संबंधित राज्यों/संघ राज्य क्षेत्रों को भेजा जाता है, ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि वैध दावेदारों को उनके वन अधिकारों से वंचित न किया जाए।

जनजातीय कार्य मंत्रालय ने राज्यों/संघ राज्य क्षेत्रों को सलाह दी है कि वे उपखण्ड स्तरीय समिति (एसडीएलसी) / जिला स्तरीय समिति (डीएलसी) सदस्यों के लिए समय-समय पर प्रशिक्षण आयोजित करें और एफआरए के तहत निर्धारित प्रक्रिया का पालन सुनिश्चित करें। सभी प्रशिक्षण मॉड्यूल/पैम्फलेट नियमित रूप से राज्यों/संघ राज्य क्षेत्रों के साथ साझा किए जा रहे हैं। राज्य सरकारों/संघ राज्य क्षेत्र प्रशासनों द्वारा क्षमता निर्माण और प्रशिक्षण के उपाय किए जा रहे हैं।

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