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वन अधिकार अधिनियम

जनजातीय कार्य राज्यमंत्री दुर्गादास उइके ने कहा कि अनुसूचित जनजाति और अन्य परंपरागत वन निवासी (वन अधिकारों की मान्यता) अधिनियम, 2006 (संक्षेप में एफआरए) और इसके तहत बने नियमों के अनुसार, इस अधिनियम के विभिन्न प्रावधानों के क्रियान्वयन की ज़िम्मेदारी राज्य सरकारों और संघ राज्यक्षेत्रों (यूटी) प्रशासनों की है, जबकि जनजातीय कार्य मंत्रालय राज्यों/संघ राज्य क्षेत्रों से मासिक प्रगति रिपोर्ट (एमपीआर) संकलित करता है। राज्यों/संघ राज्य क्षेत्रों द्वारा दी गई सूचना और वित्त वर्ष 2023-24 से वित्त वर्ष 2025-26 (यानी 01.04.2023 से 31.03.2026) के दौरान एमपीआर में संकलित जानकारी के अनुसार, कुल 8,56,159 दावे (8,21,908 व्यक्तिगत और 34,251 सामुदायिक दावे) दायर किए गए हैं; कुल 2,34,352 दावों (2,18,899 व्यक्तिगत और 15,453 सामुदायिक दावों) को मंज़ूरी दी गई है/अधिकार पत्र (टाइटल) बांटे गए हैं; और कुल 14,462 दावों (13,756 व्यक्तिगत और 706 सामुदायिक दावों) को अस्वीकार कर दिया गया है। राज्य-वार ब्यौरे जनजातीय कार्य मंत्रालय की वेबसाइट https://tribal.nic.in/FRA.aspx पर उपलब्ध हैं।

उन्होंने कहा कि वन अधिकार अधिनियम और उसके नियमों में, दायर दावे के निपटारे के लिए कोई समय-सीमा तय नहीं की गई है और जनजातीय कार्य मंत्रालय द्वारा ऐसी कोई जानकारी केंद्रीय स्तर पर नहीं रखी जाती है।

कुछ राज्य सरकारों से मिली जानकारी के आधार पर, दावों के खारिज होने के मुख्य कारण- दावा की गई ज़मीन पर 13 दिसंबर 2005 से पहले कब्ज़ा न होना, एक ही ज़मीन पर एक से ज़्यादा दावे करना, गैर-वन भूमि पर दावे, साक्ष्यों की कमी आदि हैं।

यह जानकारी आज राज्यसभा में जनजातीय कार्य राज्यमंत्री दुर्गादास उइके ने एक प्रश्न के लिखित उत्तर में दी।

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