सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय ने आज माननीय न्यायमूर्ति ए. एम. सप्रे [सेवानिवृत्त], सर्वोच्च न्यायालय सड़क सुरक्षा समिति के अध्यक्ष की अध्यक्षता में मुंबई में पश्चिमी राज्यों – महाराष्ट्र, गुजरात, गोवा और केंद्र शासित प्रदेश दादरा नगर हवेली और दमन एवं दीव – के लिए ई-प्रवर्तन, एकीकृत डेटा प्रणालियों, सुरक्षित वाहनों, बेहतर आपातकालीन प्रतिक्रिया और जिला स्तर पर सुदृढ़ क्षमता के माध्यम से सड़क सुरक्षा को मजबूत करने के लिए विचार-विमर्श हेतु एक क्षेत्रीय मंथन सम्मेलन का आयोजन किया। श्री संजय बंद्योपाध्याय, सदस्य, सर्वोच्च न्यायालय सड़क सुरक्षा समिति और श्री महमूद अहमद, एएस (टी), सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय सहित अन्य वरिष्ठ अधिकारियों ने भी सम्मेलन में भाग लिया। सम्मेलन के दौरान निम्नलिखित विषयों पर विस्तार से विचार-विमर्श किया गया:-
क. शून्य मृत्यु वाला जिला पहल: जहां सबसे ज़्यादा ज़रूरी है, उसे लक्ष्य करना
अच्छे इरादों और अच्छी योजनाओं को सटीकता के साथ लक्षित किया जाना चाहिए। शून्य मृत्यु वाला जिला (ज़ेडएफ़डी) पहल इस प्रश्न के प्रति हमारी रणनीतिक प्रतिक्रिया है: हम सबसे पहले कहां कार्रवाई करें और व्यापक रूप से कैसे कार्रवाई करें? ज़ेडएफ़डी मॉडल का राष्ट्रीय स्तर पर विस्तार किया गया है, जिसके तहत 15 राज्यों में 100 महत्वपूर्ण जिलों की पहचान की गई है, जहां इंजीनियरिंग, प्रवर्तन, आपातकालीन देखभाल और शिक्षा को सम्मिलित करते हुए केंद्रित, 360-डिग्री हस्तक्षेप किया जाएगा। इन 100 जिलों में से प्रत्येक में प्रति वर्ष औसतन 400 से अधिक मृत्यु दर्ज की गई हैं। प्रत्येक जिले के विशिष्ट दुर्घटना प्रोफाइल के अनुरूप तैयार किया गया ज़ेडएफ़डी ढांचा मृत्यु दर में उल्लेखनीय कमी लाने के लिए एक प्रमाणित रणनीति प्रस्तुत करता है।
- . प्रधानमंत्री राहत: देखभाल के अभाव में किसी भी पीड़ित की मृत्यु नहीं होनी चाहिए
शोध से पता चलता है कि यदि पीड़ित को पहले एक घंटे के भीतर, अर्थात् स्वर्णिम घंटे में, अस्पताल में भर्ती कराया जाए, तो 50% मामलों में मौत को टाला जा सकता है। फिर भी, पूरे देश में पीड़ित बिना देखभाल के पड़े रहते हैं, परिवार नकदी की व्यवस्था के लिए भागदौड़ करते हैं और अस्पताल भुगतान की सुनिश्चितता के बिना उपचार करने में हिचकिचाते हैं। प्रधानमंत्री राहत योजना इस त्रासदी के प्रति हमारी निर्णायक प्रतिक्रिया है।
प्रधानमंत्री राहत दुर्घटना की तारीख से 7 दिनों तक 1.5 लाख रुपये तक का कैशलेस उपचार प्रदान करती है, जिसमें बीमा की स्थिति की परवाह किए बिना सभी सड़क दुर्घटना पीड़ित शामिल हैं। इस योजना को वास्तव में परिवर्तनकारी बनाने वाली इसकी प्रौद्योगिकी-आधारित संरचना है, जिसमें ई-डीएआर (सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय) का टीएमएस 2.0 (एनएचए) के साथ निर्बाध एकीकरण और 112 आपातकालीन हेल्पलाइन के साथ जुड़ाव शामिल है। पहली बार, परिवहन, स्वास्थ्य और पुलिस विभाग एक ही डेटा के आधार पर, रिअल टाइम में, एक ही उद्देश्य की दिशा में कार्य कर रहे हैं, और वह ये कि देखभाल में देरी के कारण किसी भी पीड़ित की मृत्यु न हो।
- ग. राह-वीर: नेक मददगार के साहस का सम्मान
सबसे अच्छी आपातकालीन देखभाल प्रणाली भी तब तक काम नहीं कर सकती, जब तक दुर्घटना स्थल पर उन शुरुआती महत्वपूर्ण क्षणों में कोई कार्रवाई न करे। यहीं राह-वीर योजना की भूमिका सामने आती है। राह-वीर भारत सरकार द्वारा नेक मददगारों को औपचारिक मान्यता और पुरस्कार प्रदान करने की पहल है, अर्थात ऐसे व्यक्ति जो अनिश्चितता और जोखिम के बावजूद रुककर, दुर्घटना पीड़ित को स्वर्णिम घंटे के भीतर अस्पताल पहुंचाकर उसकी जान बचाने का निर्णय लेते हैं।
गंभीर दुर्घटना में जीवन बचाने वाले प्रत्येक राह-वीर, जिसमें बड़ी शल्य चिकित्सा, मस्तिष्क या रीढ़ की हड्डी की चोट, कम से कम तीन दिनों तक अस्पताल में भर्ती रहना या उपचार के दौरान मृत्यु का मामला शामिल है, को प्रति घटना 25,000 रुपये की नकद राशि और प्रशंसा प्रमाण-पत्र प्रदान किया जाता है। महत्वपूर्ण रूप से, इन नेक मददगारों को कानून द्वारा भी संरक्षण प्रदान किया जाता है, अर्थात् किसी भी राह-वीर की सहमति के बिना उसके विरुद्ध कानूनी कार्यवाही नहीं की जा सकती। प्रधानमंत्री राहत और राह-वीर मिलकर एक संपूर्ण आपातकालीन देखभाल श्रृंखला का निर्माण करते हैं, अर्थात् दुर्घटना के क्षण से लेकर पूर्ण स्वस्थ होने तक।
- . सड़क सुरक्षा मित्र: सड़क सुरक्षा के चैंपियनों का समुदाय तैयार करना
सड़क दुर्घटनाओं के आंकड़ों से पता चलता है कि इन दुर्घटनाओं में से 66.1% लोग 18–45 वर्ष के आयु वर्ग के होते हैं, जो सड़क सुरक्षा पहलों में युवाओं को शामिल करने की तत्काल आवश्यकता को रेखांकित करता है। इसी उद्देश्य से, सड़क सुरक्षा मित्र (एसएसएम) कार्यक्रम को सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय और युवा कार्यक्रम एवं खेल मंत्रालय द्वारा संयुक्त रूप से परिकल्पित युवा-नेतृत्व वाली सड़क सुरक्षा पहल के रूप में शुरू किया गया।
यह कार्यक्रम माईभारत प्लेटफॉर्म के माध्यम से प्रशिक्षित युवा स्वयं-सेवकों को शामिल करके जिला स्तर पर सड़क सुरक्षा संबंधी हस्तक्षेपों को सुदृढ़ करने का प्रयास करता है, जिसमें देश के 100 सर्वाधिक मृत्यु-दर वाले जिलों पर विशेष ध्यान दिया गया है, जहां जिला सड़क सुरक्षा समितियां (डीआरएससी) प्राथमिक शासन तंत्र के रूप में कार्य करती हैं। ये स्वयं-सेवक निष्क्रिय दर्शक नहीं हैं; वे सुव्यवस्थित सड़क सुरक्षा पेशेवरों के रूप में कार्य करते हैं और क्रैश सीन समन्वयक, सड़क सुरक्षा ऑडिटरों के लिए डेटा संग्रहकर्ता तथा जागरूकता एवं सहभागिता प्रमुख के रूप में निर्धारित भूमिकाएं निभाते हैं। प्रत्येक भूमिका जिला स्तर पर सड़क सुरक्षा कार्रवाई के एक विशिष्ट आयाम में योगदान देती है, जिससे मृत्यु की संख्या कम करने और अधिक सुरक्षित सड़कों को बढ़ावा देने के लिए समर्पित युवा नेताओं का एक समूह तैयार होता है।
- . डेटा-आधारित अति-स्थानीय हस्तक्षेप: समाधान के पीछे का विज्ञान
यह जानना कि दुर्घटनाएं कहां होती हैं, केवल पहला कदम है। इस जानकारी के आधार पर व्यवस्थित रूप से, व्यापक स्तर पर और सही साधनों के साथ कार्रवाई करना अधिक कठिन चुनौती है। डेटा-आधारित अति-स्थानीय हस्तक्षेप (डीडीएचआई) ढांचा इसी उद्देश्य के लिए तैयार किया गया है। डीडीएचआई जिला सड़क सुरक्षा समितियों (डीआरएससी) को अंतर्ज्ञान-आधारित योजना से साक्ष्य-आधारित कार्रवाई की ओर जाने में सक्षम बनाता है।
डीडीएचआई रोडमैप एक सुव्यवस्थित पांच-चरण चक्र का अनुसरण करता है: संरेखण बैठक, क्षमता विकास, हस्तक्षेपों की योजना, कार्यान्वयन और प्रभाव आकलन। प्रत्येक जिला कार्यक्रम के उद्देश्यों के संबंध में संरेखण से शुरुआत करता है, फिर क्षमता विकास की प्रक्रिया से गुजरता है, जो प्रक्रियाओं को सरल बनाती है और लोगों के कौशल को उन्नत करती है, फिर इसके बाद उस जिले की विशिष्ट दुर्घटना प्रोफाइल के अनुरूप अति-स्थानीय हस्तक्षेपों की पहचान और कार्यान्वयन किया जाता है।
ये पांच कार्यक्रम केवल अलग-अलग प्रयास नहीं हैं। ये एक सुसंगत, एकीकृत सड़क सुरक्षा व्यवस्था के परस्पर जुड़े हुए घटक हैं। एसएसएम के माध्यम से सामुदायिक सहभागिता जिला स्तर की योजना में योगदान देती है, डेटा संबंधी जानकारी प्रवर्तन और इंजीनियरिंग संबंधी उपायों का मार्गदर्शन करती है, नेक मददगार आपातकालीन देखभाल तक पहुंच बनाने में महत्वपूर्ण कड़ी का कार्य करते हैं और कैशलेस उपचार यह सुनिश्चित करता है कि स्वर्णिम घंटे का कोई भी क्षण व्यर्थ न जाए। अतः प्रत्येक राज्य और जिला अधिकारी से आग्रह किया गया कि वे इस कार्यशाला से प्राप्त सीख को अपने-अपने क्षेत्र में ले जाएं और इन कार्यक्रमों को अपनी सड़क सुरक्षा योजनाओं में एकीकृत करें।
सम्मेलन ने पुनः पुष्टि की, कि सड़क दुर्घटनाओं में होने वाली मृत्यु को कम करने के लिए प्रौद्योगिकी, प्रवर्तन, वाहन सुरक्षा, आपातकालीन देखभाल, दुर्घटना जांच और संस्थागत क्षमता के क्षेत्र में समन्वित कार्रवाई आवश्यक है।
राज्यों और जिलों से आग्रह किया गया कि वे इन चर्चाओं को धरातल पर समयबद्ध कार्रवाई में परिणत करें तथा अधिक सुरक्षित सड़कों और शून्य मृत्यु वाले जिलों के लक्ष्य की दिशा में प्रवर्तन और सड़क सुरक्षा प्रणालियों को सुदृढ़ करें।
सम्मेलन के अंत में यह सहमति बनी कि राज्य सड़क दुर्घटनाओं में होने वाली मृत्यु के मूल कारणों का विश्लेषण करेंगे, सड़क दुर्घटनाओं और मृत्यु की संख्या को कम करने के लिए कार्य-योजना तैयार करेंगे तथा साल 2030 तक सड़क दुर्घटनाओं में होने वाली मृत्यु को 50% तक कम करने के भारत के लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए जिला सड़क सुरक्षा योजना तैयार करेंगे।
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