चिन्मय मिशन ने दशकों से समुदायों की सेवा की है और भारत के आध्यात्मिक ज्ञान को दुनिया के साथ साझा किया है: प्रधानमंत्री
चिन्मय मिशन सिर्फ एक संस्था नहीं है, यह एक गहन ‘चिन्मय’ विचार है, जिसकी स्थापना एक ‘चिन्मय’ ऋषि ने की थी; इसकी दशकों लंबी यात्रा ‘चिन्मय’ संकल्पों से भरी रही है और जो ‘चिन्मय’ है, वह प्राकृतिक रूप से अमर और शाश्वत अमृत से परिपूर्ण है: प्रधानमंत्री
हमारा राष्ट्र ही हमारी संस्कृति की जन्मभूमि है, यही राष्ट्र हमारे अस्तित्व की नींव है: प्रधानमंत्री
चिन्मय मिशन के प्रयासों से प्रेरित होकर, आज लाखों युवा भारत के सांस्कृतिक ब्रांड एंबेसडर के रूप में सेवा कर रहे हैं और भारतीय मूल्यों को नई पीढ़ी तक पहुंचा रहे हैं: प्रधानमंत्री
प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी ने आज नई दिल्ली स्थित भारत मंडपम में चिन्मय अमृत महोत्सव वैश्विक सम्मेलन का उद्घाटन किया। इस अवसर पर अपने संबोधन में प्रधानमंत्री ने संतों के स्नेह और आशीर्वाद से प्राप्त गहरी आध्यात्मिक अनुभूति का उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि चिन्मय मिशन केवल एक संस्था नहीं, बल्कि एक अमर चेतना है, जिसकी स्थापना एक ऋषि ने की और जो दशकों के पवित्र संकल्पों से प्रेरित है। इसी संदर्भ में उन्होंने इस सम्मेलन के नाम की सार्थकता को रेखांकित किया।
श्री मोदी ने कहा कि आधुनिक तकनीक ने होलोबोट के माध्यम से श्रद्धेय गुरुदेव स्वामी चिन्मयानंद के साथ संवाद को संभव बनाकर इस कार्यक्रम को और भी भावनात्मक बना दिया। इस अनुभव का उल्लेख करते हुए प्रधानमंत्री ने कहा कि यह उन्हें 33 साल पहले, 1993 में वडोदरा में गुरुदेव से हुई मुलाकात की यादों में ले गया। गुरुदेव की आत्मीयता, संवाद और आशीर्वाद को स्मरण करते हुए उन्हें ऐसा लगा, मानो वे एक बार फिर उनकी साक्षात उपस्थिति में खड़े हों। उन्होंने इस भावपूर्ण श्रद्धांजलि के लिए मिशन के सदस्यों का हार्दिक आभार व्यक्त किया और कहा कि यह उनके लिए बेहद भावनात्मक अनुभव है।
स्वामी विवेकानंद के ऐतिहासिक संबोधन के 100 वर्ष पूरे होने के उपलक्ष्य में आयोजित विश्व धर्म संसद के शताब्दी समारोह में स्वामी चिन्मयानंद को शिकागो आमंत्रित करने के लिए फरवरी-मार्च 1993 में की गई अपनी यात्रा को याद करते हुए प्रधानमंत्री ने बताया कि कैसे गुरुदेव ने 3 अगस्त को सैन डिएगो में निधन होने से पहले इस आयोजन के लिए पूरे अमेरिका में लोगों को एकजुट करने का अथक प्रयास किया था। प्रधानमंत्री ने स्मरण किया कि 11 सितंबर को शिकागो में आयोजित सभा में गुरुदेव की अनुपस्थिति कितनी गहराई से महसूस की गई थी। उन्होंने गुरुदेव के साथ अपनी अंतिम बातचीत का भी उल्लेख किया, जो युवा शक्ति को विकसित करने पर केंद्रित थी। श्री मोदी ने कहा कि उस संवाद का मूल सार युवा शक्ति का निर्माण करना और उसके माध्यम से एक मजबूत व सक्षम भारत का निर्माण करना था।
उस बैठक के कुछ वर्षों बाद गुजरात के मुख्यमंत्री का पद संभालने से लेकर सरकार के प्रमुख के रूप में निरंतर सेवा की अपनी 25 साल की यात्रा का उल्लेख करते हुए प्रधानमंत्री ने कहा कि देश के युवा हमेशा उनकी नीतियों के केंद्र में रहे हैं। उन्होंने चिन्मय अमृत महोत्सव के युवा स्वयंसेवकों की सराहना की, जिन्होंने महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां निभाईं और एक लाख से अधिक युवा नागरिकों से जुड़ने के लिए 300 दिनों में 40,000 किलोमीटर की यात्रा की। प्रधानमंत्री ने इस अद्भुत प्रयास के लिए पूरी टीम को भी बधाई दी।
उपनिषद के “वयम् अमृतस्य पुत्र” श्लोक का उल्लेख करते हुए प्रधानमंत्री ने कहा कि भारत सहस्राब्दियों से ज्ञान और प्रकाश का साधक बना हुआ है, क्योंकि उसकी चेतना और ज्ञान अमर हैं। इसी भावना ने उन्हें स्वतंत्रता की 75वीं वर्षगांठ पर अमृत महोत्सव का आह्वान करने की प्रेरणा दी। यह महोत्सव विकसित भारत की आधारशिला रखने के साथ-साथ मानवता के कल्याण के प्रति भारत की सहस्राब्दियों पुरानी प्रतिबद्धता को पुनर्जीवित करने का अवसर भी है। उन्होंने उल्लेख किया कि अनेक आध्यात्मिक, सांस्कृतिक और सामाजिक संस्थाओं ने महत्वपूर्ण पड़ावों पर पवित्र संकल्प लिए हैं और देश के अमृत काल अभियान में चिन्मय मिशन की सहभागिता का स्वागत किया। श्री मोदी ने कहा कि यह हमारे “अमृतस्य पुत्र” होने का सच्चा प्रमाण है।
राष्ट्र को जागृत करने और उसके उत्थान के लिए वैदिक आह्वान “वयं राष्ट्रे जागृयाम पुरोहिताः” का उल्लेख करते हुए प्रधानमंत्री ने कहा कि स्वामी चिन्मयानंद ने राष्ट्रीय प्राथमिकताओं पर भी उतनी ही मुखरता से विचार रखे, जितनी आध्यात्मिकता पर। उन्होंने सिखाया कि राष्ट्र हमारी संस्कृति और अस्तित्व का आधार है, इसलिए आध्यात्मिक उन्नति को व्यक्तिगत विकास के साथ-साथ राष्ट्रीय प्रगति का भी माध्यम बनना चाहिए। राष्ट्रीय स्वाभिमान जगाने और उपनिषदों, वेदांत तथा शास्त्रों का ज्ञान जन-जन तक पहुंचाने के लिए स्वामीजी ने गीता ज्ञान यज्ञ की शुरुआत की। इसी प्रेरणा से आज चिन्मय मिशन के लाखों युवा सांस्कृतिक दूत बनकर भारतीय मूल्यों को आगे बढ़ा रहे हैं। श्रद्धेय गुरुदेव का यह योगदान भारत के सांस्कृतिक और आध्यात्मिक पुनर्जागरण का एक महत्वपूर्ण अध्याय है।
2015 में गुरुदेव की जन्म-शताब्दी के अवसर पर स्मारक सिक्के के विमोचन को याद करते हुए प्रधानमंत्री ने स्वामीजी के जीवन को ज्ञान, कर्म और भक्ति का अद्भुत संगम बताया। उन्होंने कहा कि स्वामीजी ने अपने गुरु स्वामी शिवानंद के आशीर्वचन- “जाओ, शेर की तरह दहाड़ो” को सार्थक किया। स्वामीजी की आवाज में झलकते आत्मविश्वास और आंतरिक शक्ति ने श्रोताओं के हृदय पर उनके विचारों की अमिट छाप छोड़ी। वहीं, उनके आर्ट ऑफ मैन मेकिंग रेडियो कार्यक्रम ने अनगिनत लोगों को जीवन में मार्गदर्शन दिया।
महान हस्तियों का मिशन उनके जीवनकाल के बाद भी जारी रहता है—इस बात को रेखांकित करते हुए प्रधानमंत्री ने चिन्मय मिशन द्वारा स्थापित व्यापक शैक्षणिक नेटवर्क पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि देश भर में 100 से अधिक चिन्मय शैक्षणिक संस्थान लाखों छात्रों के भविष्य को आकार दे रहे हैं। इन संस्थानों में विद्यार्थी आधुनिक शिक्षा प्राप्त करने के साथ-साथ भारतीय मूल्यों को भी आत्मसात कर रहे हैं।
स्वामी चिन्मयानंद जैसे विचारकों की स्वतंत्रता के बाद की परिकल्पना को वर्तमान शासन के प्रयासों से जोड़ते हुए प्रधानमंत्री ने कहा कि देश नए भारत के निर्माण के लिए शिक्षा को आधुनिक बनाने का अपना दायित्व सक्रिय रूप से निभा रहा है। उन्होंने राष्ट्रीय शिक्षा नीति का उल्लेख किया, जो भारतीय ज्ञान परंपरा, मातृभाषा में शिक्षा, आधुनिक विज्ञान और प्रौद्योगिकी को एक साथ समाहित करती है। श्री मोदी ने कहा कि नई शिक्षा नीति में इन सभी पहलुओं को महत्व दिया गया है।
भारतीय विरासत के संरक्षण के प्रति स्वामीजी के आजीवन समर्पण पर प्रकाश डालते हुए प्रधानमंत्री ने याद किया कि गुरुदेव ने कन्याकुमारी में समुद्र के बीच विवेकानंद रॉक मेमोरियल के निर्माण के लिए एकनाथ रानाडे के संकल्प का दृढ़ समर्थन किया था और इस परियोजना के लिए पहला आर्थिक योगदान भी दिया था। उन्होंने कहा कि आज यह स्मारक दुनिया भर के लाखों लोगों के लिए प्रेरणा का स्रोत है। प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि भारतीय विरासत पर गर्व करना और उसका संरक्षण करना स्वामीजी के जीवन का एक और मिशन था।
उत्तर से दक्षिण और पूर्व से पश्चिम तक देश में हो रहे व्यापक सांस्कृतिक पुनर्जागरण का उल्लेख करते हुए प्रधानमंत्री ने सांस्कृतिक स्थलों को यूनेस्को की विश्व धरोहर सूची में शामिल किए जाने के साथ-साथ काशी विश्वनाथ धाम, अयोध्या में श्री राम मंदिर, उज्जैन के महाकाल महालोक तथा केदारनाथ और बद्रीनाथ के भव्य पुनरोद्धार की ओर ध्यान दिलाया। उन्होंने कहा कि पहले चोरी की गई भारतीय पुरावशेषों को बिना किसी रोक-टोक के विदेशों में बेच दिया जाता था, जबकि पिछले 12 वर्षों में ऐसी धरोहरों को देश वापस लाने के लिए महत्वपूर्ण प्रयास किए गए हैं। इस अवधि में साढ़े छह सौ से अधिक प्राचीन मूर्तियां वापस लाई गई हैं।
स्वामी जी द्वारा भारतीय दर्शन को विश्व तक पहुंचाने और आज अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस के माध्यम से दुनिया को भारत से जोड़ने के बीच समानता रेखांकित करते हुए प्रधानमंत्री ने कहा कि अपनी विरासत पर देश का बढ़ता गर्व और औपनिवेशिक मानसिकता से मुक्ति इस बात के प्रमाण हैं कि राष्ट्र प्राचीन ऋषियों और देशभक्तों द्वारा परिकल्पित मार्ग पर आगे बढ़ रहा है। उन्होंने जोर देकर कहा कि इन महान विभूतियों की बौद्धिक विरासत इस यात्रा में देश की सबसे बड़ी ताकत बनी हुई है।
इस बात पर जोर देते हुए कि विभिन्न संगठन भले ही अलग-अलग लक्ष्यों की दिशा में काम करते हों, लेकिन उनके सभी रास्ते अंततः राष्ट्रीय विकास और गौरव के साझा गंतव्य तक पहुंचते हैं, प्रधानमंत्री ने कहा कि जिस तरह स्वामी चिन्मयानंद ने अपने युग की चुनौतियों के अनुरूप संकल्प लिए थे, उसी तरह आज की पीढ़ी को आधुनिक सामाजिक विकृतियों और चुनौतियों का समाधान करना चाहिए। उन्होंने विभाजनकारी ताकतों के खिलाफ समाज को एकजुट करने, आत्मनिर्भरता को बढ़ावा देने और प्रत्येक नागरिक को 2047 तक विकसित भारत के लक्ष्य से जोड़ने के लिए सक्रिय प्रयासों का आह्वान किया।
2047 में भारत की स्वतंत्रता के सौ वर्ष और चिन्मय मिशन की शताब्दी यात्रा के ऐतिहासिक संगम का उल्लेख करते हुए प्रधानमंत्री ने कहा कि दोनों यात्राओं के लक्ष्य समान हैं और उन्हें साथ-साथ आगे बढ़ना चाहिए। उन्होंने पूर्ण विश्वास जताया कि मिशन के आचार्यों, साधकों और स्वयंसेवकों का वैश्विक परिवार गुरुदेव की विरासत और दशकों के अनुभव का उपयोग विकसित भारत के निर्माण में योगदान देने के लिए करेगा। उन्होंने सभी को विभिन्न पर्वों की शुभकामनाएं देते हुए कहा कि चिन्मय मिशन की शताब्दी यात्रा और विकसित भारत की यात्रा साथ-साथ आगे बढ़ेंगी।
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