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नीति आयोग ने “ट्रेड वॉच क्वार्टरली” का नौवां संस्करण जारी किया


नीति आयोग के उपाध्यक्ष, श्री अशोक कुमार लाहिड़ी ने 16 सितंबर 2026 को नई दिल्ली में नीति आयोग के सीईओ एवं अन्य वरिष्ठ अधिकारियों के साथ मिलकर वित्त वर्ष 2027 की पहली तिमाही (अप्रैल-जून 2026) के लिए “ट्रेड वॉच क्वार्टरली” प्रकाशन का नवीनतम संस्करण जारी किया।

‘ट्रेड वॉच क्वार्टरली’ का नया संस्करण, भू-राजनीतिक एवं व्यापार नीति से जुड़ी बढ़ती अनिश्चितताओं के बीच वैश्विक एवं घरेलू व्यापार के रुझानों का विस्तृत आकलन प्रस्तुत करता है, हालांकि वैश्विक व्यापार लचीला बना हुआ है। वर्ष 2026 की पहली छमाही में वैश्विक वस्तु व्यापार 13.7 ट्रिलियन डॉलर तक पहुंच गया, जिसमें साल-दर-साल 12.5 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई, जबकि सेवाओं के व्यापार में 10.5 प्रतिशत की बढ़ोत्तरी हुई। इस पृष्ठभूमि में, भारत में वस्तु एवं सेवा व्यापार में भी बढ़ोत्तरी जारी रही, जिसमें कुल व्यापार वित्त वर्ष 2027 की पहली तिमाही में 506.9 बिलियन डॉलर तक पहुंच गया और साल-दर-साल 15.5 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई। इस संस्करण का विषयगत ध्यान भारत के धातु एवं अयस्क व्यापार है, जो विनिर्माण, अवसंरचना, ऊर्जा परिवर्तन एवं उन्नत उद्योगों के लिए रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण क्षेत्र है। यह अध्ययन धातुओं एवं अयस्कों में भारत की निर्यात प्रतिस्पर्धा और बढ़ती आयात निर्भरता की जांच करता है, जिसमें महत्वपूर्ण खनिजों और उच्च-मूल्य वाले अलौह धातुओं पर विशेष ध्यान दिया गया है, साथ ही घरेलू मूल्य संवर्धन, निवेश, बाजार विविधीकरण एवं वैश्विक प्रतिस्पर्धा को मजबूत करने के लिए संरचनात्मक बाधाओं एवं अवसरों का आकलन किया गया है।

वित्त वर्ष 2027 की पहली तिमाही में भारत के वस्तु निर्यात में ज़बरदस्त बढ़ोतरी दर्ज की गई। इसमें मिनरल फ़्यूल, इलेक्ट्रिकल मशीनरी, न्यूक्लियर रिएक्टर, लोहा एवं इस्पात और गाड़ियों का अहम योगदान रहा। साथ ही, पेट्रोलियम उत्पादों, इस्पात, इंजीनियरिंग के सामान और ऑटोमोबाइल के शिपमेंट में भी बढ़ोतरी हुई। आयात ने भारत की औद्योगिक और ऊर्जा संबंधी आवश्यकताओं को पूरा करना जारी रखा, जिसमें पूंजीगत वस्तुओं, इलेक्ट्रॉनिक घटकों और तांबे के आयात में उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की गई। यह प्रवृति घरेलू निवेश गतिविधियों की मज़बूती, औद्योगिक क्षमता के विस्तार और वैश्विक मूल्य श्रृंखला के साथ भारतीय उद्योग के बढ़ते एकीकरण को दर्शाता है।

भारत के निर्यात गंतव्यों में विविधता निरंतर जारी रही, जिसमें तंजानिया एवं दक्षिण अफ्रीका शीर्ष दस बाजारों के रूप में उभरकर सामने आए, साथ ही सिंगापुर को निर्यात में भी उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की गई। लैटिन अमेरिका और पश्चिम अफ्रीका से होने वाले आयात में उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की गई, जिसमें कच्चे तेल की खरीद में विविधता लाने का भी योगदान रहा; इससे भारत के आयात में मजबूती एवं लचीलेपन में बढ़ोतरी हुई है। इसी समय, उत्तर-पूर्व एशिया, पश्चिम एशिया-जीसीसी और आसियान आयात के महत्वपूर्ण स्रोत बने रहे, जो कुल मिलाकर भारत के संपूर्ण आयात का लगभग आधा हिस्सा रहे। एफटीए साझेदारों के साथ व्यापार ने भी अपनी गति जारी रखी और निर्यात में 36.3 प्रतिशत और आयात में 10.0 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई, जो आर्थिक साझेदारियों के सुदृढ़ होने एवं वैश्विक व्यापार तथा आपूर्ति शृंखलाओं के साथ भारत के मजबूत एकीकरण को दर्शाता है।

डिजिटल रूप से प्रदान की जाने वाली सेवाओं (डीडीएस) के मामले में भी भारत की स्थिति मज़बूत हुई है। इसका निर्यात 2024 में 277 बिलियन डॉलर से बढ़कर 2025 में 317 बिलियन डॉलर हो गया, जो साल-दर-साल 15 प्रतिशत की बढ़ोतरी दर्शाता है। नतीजतन, भारत डीडीएस निर्यात करने वाले देशों की सूची में पांचवें स्थान से चौथे स्थान पर आ गया है; अब उससे आगे सिर्फ़ अमेरिका, ब्रिटेन एवं आयरलैंड हैं।

इस संस्करण का विषय भारत के धातु एवं खनिज व्यापार पर केंद्रित है, जो विनिर्माण, अवसंरचना विकास, ऊर्जा परिवर्तन और उन्नत उद्योगों के लिए इस क्षेत्र के रणनीतिक महत्व को उजागर करता है। 2025 में धातुओं का निर्यात 34.8 बिलियन डॉलर तक पहुंच गया, जिसमें लोहा और इस्पात, लोहा और इस्पात की वस्तुएं, और एल्यूमिनियम मिलकर कुल निर्यात का लगभग 78 प्रतिशत हैं। भारत ने इन क्षेत्रों में मजबूत प्रतिस्पर्धा स्थापित की है, जो आगे विस्तार एवं मूल्य संवर्धन के लिए एक ठोस आधार प्रदान करती है। साथ ही, उच्च-मूल्य वाले अलौह धातुओं और महत्वपूर्ण खनिजों की बढ़ती वैश्विक मांग भारत के लिए अपनी क्षमताओं को और मजबूत करने, घरेलू मूल्य श्रृंखलाओं को सुदृढ़ करने और इन रणनीतिक तथा उभरते क्षेत्रों में अपनी स्थिति मजबूत करने के महत्वपूर्ण अवसर प्रदान करती है।

भारत के बढ़ते विनिर्माण, अवसंरचना विकास, ऊर्जा परिवर्तन की आवश्यकताओं के कारण, विशेषकर तांबा, लिथियम, कोबाल्ट और निकेल जैसे अहम औद्योगिक और रणनीतिक खनिजों की मांग बढ़ी है। इसी कारण से धातु एवं अयस्कों का आयात 2015 में 32.2 बिलियन डॉलर से बढ़कर 2025 में 60.5 बिलियन डॉलर हो गया है। बढ़ती हुई मांग घरेलू स्तर पर अन्वेषण, प्रसंस्करण और विशिष्ट उत्पादन क्षमताओं को मजबूत करने तथा धातुओं एवं खनिजों की मूल्य श्रृंखला में मूल्य संवर्धन बढ़ाने के महत्वपूर्ण अवसरों को उजागर करती है।

हाल के सुधारें, जैसे कि खान और खनिज (विकास और विनियमन) अधिनियम, 1957 के तहत, जिसमें एमएमडीआर सुधार अधिनियम, 2026 भी शामिल है, वित्तीय पूर्वानुमान को मजबूत कर सकती हैं और अन्वेषण, खदान विकास एवं महत्वपूर्ण खनिजों में निवेश को बढ़ावा दे सकती हैं। वहीं, यूरोपीय संघ के कार्बन बॉर्डर एडजस्टमेंट मैकेनिज्म (ईयू सीबीएएम) इस बात को रेखांकित करता है कि इस्पात एवं एल्युमिनियम के निर्यात की प्रतिस्पर्धा बढ़ाने की आवश्यकता है। संसाधन सुरक्षा, सुव्यवस्थित प्रक्रियाएं, कम रसद एवं वित्तपोषण लागत, व्यापार सुरक्षा उपाय, नवीकरणीय-ऊर्जा तक पहुंच, सीबीएएम की तैयारी, उन्नत सामग्रियों एवं महत्वपूर्ण खनिजों के पुनर्चक्रण को शामिल करने वाला एक समन्वित मूल्य-श्रृंखला दृष्टिकोण वैश्विक बाजारों में भारत की स्थिति को और मजबूत कर सकता है।

इस अवसर पर श्री अशोक कुमार लाहिड़ी ने कहा कि “भारत की व्यापार प्रतिस्पर्धा को मज़बूत करने के लिए निर्यात बाज़ारों एवं उत्पादों में लगातार विविधता लाने, वैश्विक एवं क्षेत्रीय मूल्य श्रृंखला के साथ गहरे जुड़ाव, रणनीतिक क्षेत्रों में मज़बूत घरेलू क्षमताओं और ऐसे नीतिगत माहौल की आवश्यकता होगी जो कंपनियों को अंतरराष्ट्रीय बाज़ारों में प्रभावी ढंग से प्रतिस्पर्धा करने में सक्षम बनाए।”

यह संस्करण नीति-निर्माताओं, उद्योग जगत, शोधकर्ताओं एवं शिक्षाविदों के लिए एक बहुमूल्य संसाधन है। यह डेटा पर आधारित जानकारी और भविष्य की नीतियों के लिए सुझाव देता है ताकि सही निर्णय लेने में मदद मिल सके और बदलते वैश्विक माहौल में भारत की व्यापारिक प्रतिस्पर्धात्मकता को मज़बूत किया जा सके।

पूरा प्रकाशन यहां देखा जा सकता है: https://www.niti.gov.in/sites/default/files/2026-09/Trade-Watch-Quarterly-January-March-Q1-FY27.pdf

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