देश में जलीय कृषि क्षेत्र निरंतर प्रगति कर रहा है। उत्पादन में वृद्धि, अधिक लोगों की भागीदारी और बाजार से बेहतर जुड़ाव ने इस क्षेत्र को नई गति दी है। हालांकि, विस्तार को बढ़ावा देने वाले यही कारक जोखिम को भी बढ़ाते हैं। रोग, बाढ़ और जलवायु संबंधी उतार-चढ़ाव जलीय कृषि के पूरे उत्पादन चक्र को प्रभावित कर सकते हैं और किसानों पर वित्तीय दबाव डाल सकते हैं। प्रधानमंत्री मत्स्य किसान समृद्धि सह-योजना (पीएम-एमकेएसएसवाई) के तहत जलीय कृषि बीमा पहल इसी वास्तविकता को ध्यान में रखते हुए जोखिम कवरेज के लिए एक सुव्यवस्थित ढांचा उपलब्ध कराती है। इसे व्यापक स्तर पर प्रभावी बनाने के लिए पारदर्शिता, शीघ्र कार्रवाई और समयबद्ध दावों के निपटान के माध्यम से किसानों और बीमा कंपनियों के बीच विश्वास कायम करना आवश्यक है।
वर्ष 2024 में वैश्विक मत्स्य और जलीय कृषि उत्पादन 235 मिलियन टन तक पहुंच गया, जिसमें जलीय जीवों की संख्यां में 195 मिलियन टन वृद्धि शामिल थी। इस क्षेत्र से प्रथम बिक्री स्तर पर अनुमानित 565 अरब अमेरिकी डॉलर का मूल्य सृजित हुआ, जबकि जलीय उत्पादों का अंतरराष्ट्रीय व्यापार 186 अरब अमेरिकी डॉलर तक पहुंच गया। वैश्विक जलीय खाद्य प्रणालियों में जलीय कृषि लगातार विकास का प्रमुख आधार बनी हुई है, जबकि प्राकृतिक मत्स्य उत्पादन लगभग 92 मिलियन टन पर स्थिर रहा। अंतर्देशीय मत्स्य उत्पादन भी रिकॉर्ड 12.3 मिलियन टन तक पहुंच गया, जो दुनिया भर में खाद्य सुरक्षा और आजीविका के लिए इसके बढ़ते महत्व को दर्शाता है।
वैश्विक परिदृश्य में जलीय कृषि क्षेत्र में भारत का योगदान महत्वपूर्ण है और इसमें अभी और विस्तार की व्यापक संभावनाएं हैं। वर्ष 2024-25 में भारत का वार्षिक मछली उत्पादन रिकॉर्ड 19.8 मिलियन टन तक पहुंच गया, जिससे भारत लगभग 8 प्रतिशत हिस्सेदारी के साथ विश्व का दूसरा सबसे बड़ा मछली उत्पादक देश बन गया है। मीठे पानी में कार्प मछलियों का तालाब पालन, खारे पानी में झींगा एवं प्रॉन पालन, केज कल्चर तथा ठंडे पानी और समुद्री प्रजातियों की बढ़ती विविधता का अब भारत के कुल मछली उत्पादन में लगभग 74 प्रतिशत से अधिक का योगदान है।
भारत का कुल मछली उत्पादन वर्ष 2013-14 के 9.6 मिलियन टन से बढ़कर वर्ष 2024-25 में 19.8 मिलियन टन हो गया है। इसी अवधि में अंतर्देशीय मछली उत्पादन 6.1 मिलियन टन से बढ़कर 14.74 मिलियन टन हो गया। यह परिवर्तन देश के उन क्षेत्रों में से एक की उल्लेखनीय प्रगति को दर्शाता है, जहां विकास की व्यापक संभावनाएं मौजूद हैं। निर्यात के क्षेत्र में भी भारत की स्थिति मजबूत हुई है। भारत विश्व के प्रमुख समुद्री खाद्य निर्यातकों में शामिल है और अकेले फ्रोजन झींगा से कुल समुद्री खाद्य निर्यात आय का लगभग 66 प्रतिशत प्राप्त होता है। भारत का समुद्री उत्पाद निर्यात वर्ष 2013-14 के 5.08 अरब अमेरिकी डॉलर से बढ़कर वर्ष 2025-26 में 8.46 अरब अमेरिकी डॉलर हो गया, जो वैश्विक बाजारों में इस क्षेत्र की बढ़ती प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता को दर्शाता है। वर्ष 2025-26 में भारत ने विश्व के विभिन्न बाजारों में 8.46 अरब अमेरिकी डॉलर मूल्य के समुद्री खाद्य उत्पादों का निर्यात किया।
मत्स्य क्षेत्र 3 करोड़ से अधिक लोगों को आजीविका प्रदान करता है, जिनमें मछुआरे, जलीय किसान, व्यापारी, प्रसंस्करणकर्ता और परिवहन से जुड़े लोग शामिल हैं। इनमें से अधिकांश तटीय, जनजातीय और आर्थिक रूप से कमजोर समुदायों से हैं। ऐसे समय में, जब कृषि क्षेत्र से जुड़ी आर्थिक चुनौतियां लगातार बनी हुई हैं, मत्स्य क्षेत्र, विशेष रूप से जलीय कृषि उत्पादन के माध्यम से, ग्रामीण आर्थिक गतिशीलता को गति देने वाले महत्वपूर्ण क्षेत्रों के रुप में उभर रहा है।
भारत के जलीय कृषि क्षेत्र में हाल के वर्षों में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है और इसके साथ ही आगे विस्तार की भी व्यापक संभावनाएं बनी हुई हैं। देश में 1.95 लाख किलोमीटर लंबी नदियां और नहरें, 31.5 लाख हेक्टेयर जलाशय, 22.1 लाख हेक्टेयर तालाब एवं टैंक तथा 14.1 लाख हेक्टेयर खारा जल क्षेत्र उपलब्ध है। इनमें से केवल लगभग 17 प्रतिशत क्षेत्र ही जलीय कृषि के लिए विकसित किया गया है। वर्ष 2013-14 के 9.6 मिलियन टन से वर्ष 2024-25 में 19.8 मिलियन टन तक मछली उत्पादन में 106 प्रतिशत से अधिक की वृद्धि हुई है। वहीं, औसत जलीय कृषि उत्पादकता बढ़कर 4.77 टन प्रति हेक्टेयर हो गई है, जबकि पीएमएमएसवाई के तहत सरकार ने 5 टन प्रति हेक्टेयर उत्पादकता का लक्ष्य निर्धारित किया है। इससे स्पष्ट है कि यह क्षेत्र एक ओर अप्रयुक्त संभावनाओं से भरपूर है और दूसरी ओर तेजी से विस्तार कर रहा है। इतने बड़े पैमाने पर विकसित हो रहे क्षेत्र में उत्पन्न वित्तीय जोखिमों का सामना कोई भी किसान अकेले नहीं कर सकता।
जैसे-जैसे जलीय कृषि का विस्तार नए फार्मों के माध्यम से क्षैतिज रूप से और मौजूदा फार्मों में उत्पादन की तीव्रता बढ़ाकर ऊर्ध्वाधर रूप से हो रहा है, वैसे-वैसे यह क्षेत्र विभिन्न प्रकार के जोखिमों के प्रति अधिक संवेदनशील हो रहा है। रोगों का प्रकोप, गर्मियों में होने वाली ऐसी मत्स्य क्षति जिसे रोका नहीं जा सकता, प्रदूषण, भूकंप, चक्रवात, बाढ़ और अन्य प्राकृतिक आपदाएं ऐसे बार-बार आने वाले जोखिम हैं, जो निवेश को पूरी तरह प्रभावित कर सकते हैं।
इन जोखिमों का छोटे और सीमांत किसानों पर संचयी वित्तीय प्रभाव गंभीर होता है। अधिकांश किसान सीमित लाभ मार्जिन पर कार्य करते हैं और ऊंची ब्याज दरों पर अनौपचारिक ऋण पर निर्भर रहते हैं। एक फसल चक्र के विफल होने से किसान को केवल तत्काल आर्थिक नुकसान ही नहीं होता, बल्कि वह ऐसे ऋण-जाल में भी फंस सकता है, जिससे बाहर निकलने में कई वर्ष लग सकते हैं। इन व्यक्तिगत नुकसान का सामूहिक प्रभाव क्षेत्र की विकास क्षमता को सीमित करता है, निवेश को हतोत्साहित करता है और उन किसानों की विस्तार संबंधी महत्वाकांक्षाओं को प्रभावित करता है, जो अन्यथा अपने उत्पादन का विस्तार कर सकते हैं। इसलिए जोखिम कम करने का आर्थिक आधार केवल किसान कल्याण तक सीमित नहीं है, बल्कि यह क्षेत्र की उत्पादकता और राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा से भी सीधे जुड़ा हुआ है।
उपलब्ध जोखिम प्रबंधन साधनों में बीमा की विशिष्ट भूमिका है। बीमा नुकसान को रोकता नहीं है, लेकिन यह किसानों को वित्तीय संकट से सुरक्षा प्रदान करता है और उन्हें उत्पादन जारी रखने की क्षमता तथा लचीलापन प्रदान करता है। इसी को ध्यान में रखते हुए भारत सरकार ने 8 फरवरी 2024 को प्रधानमंत्री मत्स्य किसान समृद्धि सह-योजना को मंजूरी दी। इस उप-योजना के घटक 1-बी के अंतर्गत जलीय कृषि बीमा को अपनाने के लिए प्रोत्साहन का प्रावधान किया गया है। इसके तहत लाभ राष्ट्रीय मत्स्य डिजिटल प्लेटफॉर्म (एनएफडीपी) के माध्यम से प्रदान किए जाते हैं, जिससे किसानों को प्रत्यक्ष लाभ अंतरण (डीबीटी) के जरिए सीधे लाभ पहुंचाया जा सके।
प्रधानमंत्री मत्स्य किसान समृद्धि सह-योजना के तहत जलीय कृषि बीमा की पहल का उद्देश्य बीमा की वहनीयता से जुड़ी प्रमुख चुनौती का समाधान करना है। इसके अंतर्गत जलीय कृषि किसानों को एक फसल चक्र के लिए जलीय कृषि बीमा पॉलिसी खरीदने पर डीबीटी के माध्यम से एकमुश्त मौद्रिक प्रोत्साहन प्रदान किया जाता है। योजना के तहत पात्र लाभार्थियों को बीमा प्रीमियम की लागत का 40 प्रतिशत तक प्रोत्साहन दिया जाता है। तालाब जलीय कृषि के लिए यह प्रोत्साहन जल प्रसार क्षेत्र के प्रति हेक्टेयर अधिकतम 25,000 रुपये तक सीमित है तथा अधिकतम 1,00,000 रुपये का प्रोत्साहन 4 हेक्टेयर तक के क्षेत्र के लिए उपलब्ध है। एक हेक्टेयर से कम क्षेत्र वाले फार्मों के लिए प्रोत्साहन आनुपातिक आधार पर प्रदान किया जाता है।
केज कल्चर, पुनर्चक्रण मत्स्य पालन प्रणाली (आरएएस), बायोफ्लॉक, रेसवे तथा इसी प्रकार की उन्नत जलीय कृषि प्रणालियों के लिए बीमा प्रीमियम का 40 प्रतिशत प्रोत्साहन दिया जाता है। इसके तहत अधिकतम प्रोत्साहन 1,00,000 रुपये और पात्र इकाई का अधिकतम आकार 1,800 घन मीटर निर्धारित किया गया है। इसके अतिरिक्त, अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और महिला लाभार्थियों को सामान्य श्रेणी के लिए देय प्रोत्साहन के अतिरिक्त 10 प्रतिशत की दर से अतिरिक्त प्रोत्साहन प्रदान किया जाता है।
दावे के निपटान के संबंध में, बीमित जोखिम घटित होने पर लाभार्थी को दावा प्रक्रिया शुरू करने के लिए तत्काल बीमा कंपनी को इसकी सूचना देनी होती है। बीमाधारक को पॉलिसी की शर्तों के अनुसार आवश्यक दस्तावेजी साक्ष्य प्रस्तुत करना होता है, जिसके बाद बीमा कंपनी नुकसान के आकलन के लिए एक क्षति मूल्यांकनकर्ता नियुक्त करती है। मूल्यांकन रिपोर्ट के आधार पर दावे की प्रक्रिया पूरी की जाती है और बीमाधारक को भुगतान किया जाता है। साथ ही, बीमा कंपनी के पोर्टल के माध्यम से दावे की स्थिति के संबंध में समय-समय पर जानकारी उपलब्ध कराई जाती है। संपूर्ण दावा निपटान प्रक्रिया झींगा पालन के लिए 30 दिनों और अन्य जलीय कृषि गतिविधियों के लिए 45 दिनों के भीतर पूरी की जानी है।
वर्तमान में चार बीमा कंपनियां—ओरिएंटल इंश्योरेंस कंपनी लिमिटेड (ओआईसीएल), एग्रीकल्चर इंश्योरेंस कंपनी ऑफ इंडिया लिमिटेड (एआईसीएल), न्यू इंडिया एश्योरेंस कंपनी लिमिटेड (एनआईएएल) और यूनाइटेड इंडिया इंश्योरेंस कंपनी लिमिटेड (यूआईआईसी) झींगा, मीठे पानी की मछलियों तथा ठंडे पानी की प्रजातियों के लिए बीमा कवरेज उपलब्ध करा रही हैं। बीमा इकोसिस्टम को और मजबूत करने के लिए निजी बीमा कंपनियों को भी इससे जोड़ने की प्रक्रिया जारी है।
योजना के तहत एकमुश्त प्रोत्साहन घटक के कार्यान्वयन में भी उत्साहजनक प्रगति हुई है। अब तक कुल 316 आवेदन प्राप्त हुए हैं, जिनमें 730.61 हेक्टेयर क्षेत्र शामिल है। इनमें से 127 आवेदनों को मंजूरी प्रदान कर प्रोत्साहन राशि वितरित की जा चुकी है। इसके तहत 321.74 हेक्टेयर क्षेत्र के किसानों को लाभ मिला है और कुल 40.03 लाख रुपये की राशि वितरित की गई है।
जलीय कृषि बीमा का पूरा लाभ तभी प्राप्त होगा, जब किसानों और बीमा कंपनियों के बीच संबंध निष्पक्ष आकलन और बिना अनावश्यक विलंब के दावों के निपटान के प्रति विश्वास पर आधारित हों। अब आवश्यकता है कि दावों के प्रबंधन में निरंतर सुधार किया जाए, सत्यापन के लिए प्रौद्योगिकी का प्रभावी उपयोग हो तथा मामलों का समयबद्ध समाधान सुनिश्चित किया जाए, ताकि किसानों के लिए बीमा केवल कागजी प्रक्रिया न रहकर नुकसान के समय भरोसेमंद सुरक्षा का माध्यम बने।
सरकार का उद्देश्य केवल प्रीमियम पर सब्सिडी उपलब्ध कराना नहीं है, बल्कि जलीय कृषि बीमा के लिए एक टिकाऊ और आत्मनिर्भर बाजार तैयार करना है। इसके लिए सभी हितधारकों के बीच समन्वित और सहयोगात्मक दृष्टिकोण आवश्यक है। केंद्र सरकार नीति दिशा और डिजिटल ढांचा उपलब्ध कराएगी, राज्य सरकारें पहुंच और जमीनी स्तर पर सहायता सुनिश्चित करेंगी, बीमा कंपनियां विश्वसनीय बीमा उत्पादों का विकास और प्रभावी सेवा प्रदान करेंगी, किसान जोखिम सुरक्षा को कृषि प्रबंधन का अभिन्न हिस्सा बनाएंगे तथा तकनीकी संस्थान जोखिम आकलन, निगरानी और नुकसान के सत्यापन को मजबूत करेंगे।
पीएम-एमकेएसएसवाई की परिकल्पना भी यही है कि इन पहलों के माध्यम से समय के साथ जलीय कृषि बीमा उत्पादों के लिए एक सुदृढ़ बाजार तैयार हो। यह बाजार तभी टिकाऊ बन सकेगा, जब सभी हितधारक जलीय कृषि से जुड़े जोखिमों के व्यावहारिक, शीघ्र और समन्वित समाधान के लिए मिलकर कार्य करेंगे। इससे बीमा केवल सरकारी समर्थन से संचालित पहल न रहकर एक सुदृढ़ और लचीली जलीय कृषि अर्थव्यवस्था का अभिन्न अंग बन जाएगा।
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