सरकारी हिंदी सरल, समझने में आसान और रोज़मर्रा की बोलचाल के करीब होनी चाहिए: केंद्रीय मंत्री
डॉ. जितेंद्र सिंह ने कहा कि सरकारी कामकाज में हिंदी अनुवाद की गुणवत्ता में टेक्नोलॉजी और एआई ने काफी सुधार किया है:
प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी के कार्यभार संभालने के बाद पिछले 10-12 वर्षों में हिंदी के इस्तेमाल में काफी बढ़ोतरी हुई है, दक्षिण भारत के अधिकारी भी बड़े पैमाने पर हिंदी का इस्तेमाल कर रहे हैं: डॉ. जितेंद्र सिंह
कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग-डीओपीटी हिंदी सलाहकार समिति के सुझावों पर गंभीरता से विचार करेगा और अपने अधिकार क्षेत्र से बाहर के मामलों को संबंधित मंत्रालयों को भेजेगा
विज्ञान और प्रौद्योगिकी, पृथ्वी विज्ञान राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) और पीएमओ, कार्मिक, लोक शिकायत, पेंशन, परमाणु ऊर्जा और अंतरिक्ष राज्य मंत्री डॉ. जितेंद्र सिंह ने आज इस बात पर ज़ोर दिया कि हिंदी को बढ़ावा देने का आधार भाषा के इस्तेमाल को थोपने की बजाय उसमें ज़्यादा अवसर और भागीदारी का सृजन करके होना चाहिए। उन्होंने कार्मिक, लोक शिकायत और पेंशन मंत्रालय की हिंदी सलाहकार समिति की तीसरी बैठक को संबोधित करते हुए कहा कि जब भाषा का ज्ञान रोज़गार और पेशेवर तरक्की के मौके पैदा करेगा, तो हिंदी का इस्तेमाल स्वाभाविक रूप से बढ़ेगा। इस मौके पर कार्मिक और प्रशिक्षण विभाग की ‘कौशल पत्रिका’ का भी शुभारंभ किया गयाशुााशुलॉन्च ।
डॉ. जितेंद्र सिंह ने कहा कि हिंदी सलाहकार समिति के सदस्यों से प्राप्त सुझावों पर ध्यान दिया गया है और विभाग उनके कार्यान्वयन के लिए गंभीरता से प्रयास करेगा। उन्होंने कहा कि विभाग के अधिकार क्षेत्र से बाहर आने वाले सुझावों को संबंधित मंत्रालयों और विभागों को भेजा जाएगा ताकि उचित स्तर पर उनकी जांच की जा सके।
मंत्री ने कौशल विकास मंत्रालय द्वारा आयोजित प्रतियोगिताओं में भाषा विकल्पों के संबंध में एक सुझाव का जिक्र करते हुए कहा कि ऐसे विकल्प छोटे कस्बों, शहरों और ग्रामीण क्षेत्रों के लाभार्थियों के लिए इन पहलों को अधिक सुलभ बनाने में सहायक हो सकते हैं। उन्होंने सुझाव दिया कि उपयुक्त मौखिक घटकों सहित भाषा विकल्प, इन पहलों को और अधिक सुलभ बना सकते हैं और कहा कि यह सुझाव संबंधित मंत्रालय को भेजा जा सकता है।
डॉ. जितेंद्र सिंह ने विद्यालयों में हिंदी शिक्षण कार्यक्रमों में हिंदी सलाहकार समिति के सदस्यों को शामिल करने के सुझाव का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि ऐसे प्रस्तावों को शिक्षा मंत्रालय के समक्ष रखा जा सकता है, विशेषकर उन कार्यक्रमों में जिनमें शिक्षक और शिक्षण संस्थान शामिल हों क्योंकि कार्मिक विभाग स्वयं ऐसे कार्यों को करने में सक्षम नहीं हो सकता है।
मंत्री ने इस बात पर जोर दिया कि यद्यपि विभाग में काफी काम पहले से ही हिंदी में किया जाता है, फिर भी हिंदी का शत प्रतिशत प्रयोग अनिवार्य करना हमेशा व्यावहारिक नहीं हो सकता, विशेष रूप से गैर-हिंदी भाषी राज्यों के साथ आधिकारिक संचार में। उन्होंने कहा कि विभिन्न भाषाई क्षेत्रों के लोगों और अधिकारियों की संवेदनशीलता और सुविधा का ध्यान रखना आवश्यक है।
डॉ. जितेंद्र सिंह ने सरल और सुलभ आधिकारिक हिंदी की आवश्यकता पर जोर देते हुए कहा कि सरकारी संचार में अनावश्यक रूप से कठिन या अत्यधिक औपचारिक हिंदी का प्रयोग नहीं किया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि आधिकारिक कार्यों में प्रयुक्त भाषा ऐसी होनी चाहिए जिसे रोजमर्रा की बातचीत में आसानी से समझा जा सके, न कि वह अंग्रेजी से शाब्दिक अनुवाद जैसी लगे।
मंत्री ने कहा कि प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी के सत्ता संभालने के बाद पिछले 10-12 वर्षों में हिंदी के प्रयोग में महत्वपूर्ण बदलाव आया है, जिसमें देश के दक्षिणी भागों के अधिकारियों द्वारा हिंदी का बढ़ता उपयोग भी शामिल है। उन्होंने वैज्ञानिक और तकनीकी संस्थानों में कार्यरत अधिकारियों और कर्मचारियों के उदाहरण दिए, जो मुख्य रूप से गैर-हिंदी भाषी क्षेत्रों में तैनात होने के बावजूद अपने आधिकारिक कार्यों में हिंदी का व्यापक रूप से उपयोग करते हैं।
डॉ. जितेंद्र सिंह ने सरकारी कार्यों में अनुवाद की गुणवत्ता में हुए सुधारों पर भी प्रकाश डाला। उन्होंने पहले होने वाले गलत और कभी-कभी भ्रामक अनुवादों का जिक्र करते हुए कहा कि ऐसी समस्याएं काफी हद तक कम हो गई हैं। उन्होंने बताया कि प्रौद्योगिकी और एआई-आधारित प्रणालियों के साथ-साथ बड़े डेटासेट की उपलब्धता से तकनीकी रूप से संवेदनशील क्षेत्रों सहित अनुवाद में सुधार हो रहा है।
मंत्री ने हिंदी के प्रयोग को ज्ञान और व्यावसायिक दक्षता की व्यापक आवश्यकता से अलग करके देखने के प्रति आगाह किया। उन्होंने कहा कि केवल हिंदी पर जोर देना, विशेष रूप से विशिष्ट क्षेत्रों में जहां पर्याप्त साहित्य और शब्दावली आसानी से उपलब्ध न हो, ज्ञान प्राप्ति में बाधा नहीं बनना चाहिए। उन्होंने चिकित्सा शिक्षा में हिंदी को लागू करने के अनुभव का हवाला देते हुए इस बात पर जोर दिया कि जहां आवश्यक हो, मूल तकनीकी शब्दों को बरकरार रखा जा सकता है, जबकि व्याख्या और शिक्षण हिंदी में प्रदान किए जा सकते हैं।
डॉ. जितेंद्र सिंह ने इस बात पर ज़ोर दिया कि किसी भाषा के प्रति रुचि पैदा करना, उसे थोपने मात्र से कहीं अधिक प्रभावी होता है। उन्होंने कहा कि जैसे-जैसे हिंदी रोजगार और पेशेवर अवसरों के लिए अधिक उपयोगी होती जाएगी, लोगों को इसे सीखने और उपयोग करने की स्वाभाविक प्रेरणा मिलेगी। उन्होंने उन क्षेत्रों में भी हिंदी सीखने की बढ़ती मांग का उल्लेख किया जहां यह परंपरागत रूप से कम प्रचलित थी और इस रुचि को उभरते रोजगार अवसरों से जोड़ा।
मंत्री ने कहा कि हिंदी सलाहकार समिति विभाग को उपयोगी सुझाव और मार्गदर्शन प्रदान करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। उन्होंने सदस्यों से लिखित रूप में या अन्य उपयुक्त माध्यमों से अपने विचार और सुझाव साझा करते रहने का आग्रह किया और कहा कि विभाग उनके मार्गदर्शन के आधार पर सुधार की दिशा में काम करता रहेगा।
डॉ. जितेंद्र सिंह ने कहा कि व्यापक उद्देश्य हिंदी को सरल, स्वाभाविक और समावेशी तरीके से बढ़ावा देना होना चाहिए, ताकि इसके प्रयोग से किसी प्रकार का थोपा हुआ भाव उत्पन्न न हो। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि अंतिम लक्ष्य हिंदी के प्रयोग और प्रसार को बढ़ाना है, साथ ही यह सुनिश्चित करना है कि यह देश की भाषाई विविधता और रोजमर्रा की संचार आवश्यकताओं के अनुरूप बनी रहे।
इस बैठक में हिंदी सलाहकार समिति के सदस्यों को सरकारी कामकाज में हिंदी के प्रचार-प्रसार और व्यापक उपयोग से संबंधित मामलों पर विभाग के समक्ष अपने सुझाव रखने का अवसर भी मिला।




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