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हिमालय का संरक्षण एक राष्ट्रीय जिम्मेदारी, इसमें हर नागरिक की हिस्सेदारी है: डॉ. जितेंद्र सिंह


हिमालयी पर्यावरण पर्यटन, कृषि और आजीविका को सहारा देते हुए झरने, जल निकायों और नदी के स्रोतों को संजोए रखता है: डॉ. जितेंद्र सिंह

विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन बेहद जरूरी, केंद्रीय मंत्री ने अनधिकृत निर्माण और अनियंत्रित गतिविधियों के खिलाफ आगाह किया

विज्ञान और प्रौद्योगिकी मंत्रालय की पहलों में हिमालयी पर्यावरण अनुसंधान केंद्र, ग्लेशियर मॉनिटरिंग, ग्लेशियोलॉजी प्रशिक्षण और जलवायु परिवर्तन शोध शामिल हैं: डॉ. जितेंद्र सिंह

अरोमा मिशन और पर्पल रिवोल्यूशन ने जम्मू-कश्मीर को एक राष्ट्रीय पहचान दी है, यह इस बात का प्रमाण है कि विज्ञान और बाजार की पहुंच मिलकर कैसे आजीविका के नए अवसर पैदा कर सकते हैं — डॉ. जितेंद्र सिंह

प्रधानमंत्री मोदी के मन की बात और गणतंत्र दिवस की झांकी ने जम्मू-कश्मीर की पर्पल क्रांति को राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा का केंद्र बनाया — डॉ. जितेंद्र सिंह

केंद्रीय विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी राज्य मंत्री  (स्वतंत्र प्रभार) डॉ. जितेंद्र सिंह ने मंगलवार को कहा कि हिमालय और उसके पर्यावरण की रक्षा करना हम सबकी राष्ट्रीय जिम्मेदारी है, क्योंकि इस अनमोल प्राकृतिक संसाधन से हर नागरिक का हित जुड़ा है। उन्होंने जोर देकर कहा कि हिमालयी क्षेत्र को सुरक्षित रखना केवल सरकार या वैज्ञानिकों का ही नहीं, बल्कि देश के हर एक नागरिक का दायित्व है।

शेर-ए-कश्मीर कृषि विज्ञान और प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय (SKUAST-K) के शालीमार कन्वेंशन सेंटर में आयोजित यह विशेष सत्र, 13वें ऑल इंडिया सस्टेनेबल माउंटेन डेवलपमेंट समिट (ASMD_13) का हिस्सा था। “काउंटरिंग सस्टेनेबल हिमालयन लैंडस्केप्स फॉर इन्क्लूसिव विकसित भारत” थीम पर आधारित यह सम्मेलन 12 से 14 अक्टूबर तक आयोजित किया जा रहा है। इस सम्मेलन का आयोजन SKUAST-K और इंटीग्रेटेड माउंटेन इनिशिएटिव (IMI) द्वारा संयुक्त रूप से किया गया है, जिसमें विचार-विमर्श सस्टेनेबल माउंटेन डेवलपमेंट और जम्मू-कश्मीर सस्टेनेबल माउंटेन डेवलपमेंट पॉलिसी 2026 के मसौदे पर केंद्रित है।

इस अवसर पर विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी सचिव बबीला रकवाल, SKUAST-K के कुलपति प्रो. नजीर ए. गनाई के अलावा शिक्षा जगत और पर्वतीय विकास समुदाय के प्रतिनिधि उपस्थित थे।

विशेष सत्र को संबोधित करते हुए डॉ. जितेंद्र सिंह ने कहा कि हिमालय देश की पारिस्थितिक सुरक्षा के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है और यह झरने, जल निकायों, नदी के स्रोतों व ग्लेशियरों को जीवन प्रदान करता है। यह क्षेत्र पर्यटन, कृषि और आजीविका को भी सहारा देता है, जिससे पर्यावरण सुरक्षा और समावेशी आर्थिक विकास दोनों के लिए इसका संरक्षण अनिवार्य हो जाता है।

डॉ. जितेंद्र सिंह ने कहा कि सबसे बड़ी चुनौती विकास की जरूरतों और आजीविका के अवसरों के बीच एक नाज़ुक पर्वतीय पर्यावरण को संरक्षित करने के बीच संतुलन बनाना है। अनधिकृत निर्माण, अनियंत्रित गतिविधियां और अन्य मानवीय त्रुटियां संवेदनशील पर्वतीय क्षेत्रों में जोखिम को और बढ़ा सकती हैं। इसलिए, स्थानीय समुदायों और अन्य हितधारकों के बीच जिम्मेदार सार्वजनिक आचरण और अधिक जागरूकता के समर्थन से, विकास की योजना में पर्यावरण सुरक्षा उपायों को हमेशा शामिल रखा जाना चाहिए।

डॉ. जितेंद्र सिंह ने क्लाइमेट चेंज पर नेशनल एक्शन प्लान के तहत हिमालयन इकोसिस्टम को बनाए रखने के राष्ट्रीय मिशन के अंतर्गत विज्ञान और प्रौद्योगिकी मंत्रालय के विज्ञान और प्रौद्योगिकी विभाग (डीएसटी) के कार्यों का जिक्र किया। डीएसटी ने जलवायु परिवर्तन औरहिमालयन इकोसिस्टम पर अनुसंधान को मजबूत करने के लिए कश्मीर विश्वविद्यालय, सिक्किम विश्वविद्यालय और तेजपुर विश्वविद्यालय में तीन केंद्रों की पहचान की है। भारतीय हिमालयी क्षेत्र में राज्य-स्तरीय पहलों के माध्यम से जलवायु परिवर्तन अनुसंधान और संस्थागत क्षमता बढ़ाने को भी समर्थन दिया जा रहा है।

उन्होंने 2015 से लद्दाख और डोडा क्षेत्र में वाडिया इंस्टीट्यूट ऑफ हिमालयन जियोलॉजी द्वारा किए जा रहे ग्लेशियर मॉनिटरिंग और फील्ड-आधारित शोध का हवाला दिया। इस कार्य में ऑटोमैटिक वेदर स्टेशन और सिस्मोग्राफ का उपयोग शामिल है, साथ ही भूस्खलन और पहले आए भूकंपों से संबंधित अध्ययन भी किए जा रहे हैं। डॉ. जितेंद्र सिंह ने क्षेत्र के बदलते पर्यावरण की वैज्ञानिक समझ और विशेषज्ञता को मजबूत करने के प्रयासों के तहत कश्मीर में ग्लेशियोलॉजी में क्षमता बढ़ाने का भी जिक्र किया।

मौसम की सटीक जानकारी देने की क्षमता का जिक्र करते हुए डॉ. जितेंद्र सिंह ने कहा कि भारत का मौसम रडार नेटवर्क 2014 के 16 रडार से बढ़कर अब 50 तक पहुंच गया है और ‘मिशन मौसम’ के तहत ऐसे 50 और रडार लगाने की योजना है। इस तरह का वैज्ञानिक इंफ्रास्ट्रक्चर मौसम की निगरानी और तैयारियों को मजबूत करता है, खासकर उन क्षेत्रों में जो खराब मौसम और प्राकृतिक आपदाओं के प्रति संवेदनशील हैं।

डॉ. सिंह ने जम्मू-कश्मीर के 10 गांवों में वाडिया इंस्टीट्यूट द्वारा शुरू किए गए एक पायलट अध्ययन का भी जिक्र किया। इसके निष्कर्ष स्थानीय स्तर पर सही उपाय करने और उचित उपायों को आगे बढ़ाने में मददगार साबित हो सकते हैं। उन्होंने सुझाव दिया कि जम्मू-कश्मीर सस्टेनेबल माउंटेन डेवलपमेंट पॉलिसी का परीक्षण इसी संदर्भ में किया जाना चाहिए।

डॉ. जितेंद्र सिंह ने जम्मू-कश्मीर में विज्ञान आधारित आजीविका सृजन के उदाहरण के रूप में ‘अरोमा मिशन’ और ‘पर्पल रेवोल्यूशन’ का हवाला दिया। गुलमार्ग और पाडर जैसे क्षेत्रों में लैवेंडर की खेती ने किसानों और ग्रामीण उद्यमियों के लिए अवसर पैदा किए हैं, जो स्थानीय आर्थिक गतिविधि को बढ़ावा देने में क्षेत्र-विशेष की फसलों की क्षमता को प्रदर्शित करते हैं।

उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि इस तरह की पहलों के लिए केवल खेती करने से कहीं अधिक की आवश्यकता होती है। इन अवसरों को लंबे समय तक बनाए रखने के लिए उत्पादकों को सुगंध और इत्र उद्योगों से जोड़ने वाली मजबूत बाजार कड़ियां, तकनीक और वित्त तक पहुंच, तथा उद्यमिता के लिए समर्थन आवश्यक हैं। महिलाओं के स्वयं-सहायता समूह और युवा उद्यमी भी आजीविका के अवसरों को बढ़ाने में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। जम्मू-कश्मीर का यह अनुभव अन्य क्षेत्रों के लिए भी सबक प्रदान करता है जो अपनी प्राकृतिक और कृषि संबंधी खूबियों के आधार पर स्थानीय अर्थव्यवस्थाओं का निर्माण करना चाहते हैं।

सामूहिक कार्रवाई की आवश्यकता को दोहराते हुए, डॉ. जितेंद्र सिंह ने कहा कि वैज्ञानिक उपायों और सरकारी कार्यक्रमों को जमीन पर जिम्मेदार निर्णयों के साथ जोड़ा जाना चाहिए। हिमालय की रक्षा करना न केवल इस क्षेत्र के समुदायों और आजीविका के लिए आवश्यक है, बल्कि देश की दीर्घकालिक पर्यावरणीय सुरक्षा के लिए भी उतना ही महत्वपूर्ण है।

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