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ब्लैक होल के शक्तिशाली जेट का प्रहार आकाशगंगाओं के भविष्य को आकार देता है


खगोलशास्त्रियों ने एक संभावित प्रक्रिया की खोज की है, जिसके माध्यम से आकाशगंगाओं के केंद्र में स्थित ब्लैक होल अपनी मेजबान आकाशगंगाओं के चारों ओर मौजूद गैस के विशाल, विरल भंडार को प्रभावित कर सकते हैं और अंततः आकाशगंगाओं के भविष्य को आकार दे सकते हैं।

जब कोई आकाशगंगा के बारे में सोचता है, तो मन में सुंदर सर्पिल संरचनाओं के भीतर चमकते धूल और तारों की छवि उभरती है। लेकिन आकाशगंगा की डिस्क के किनारे से आगे एक विरल, धुंधला आवरण फैला हुआ है, जो आकाशगंगा के आकार से 10–20 गुना ज्‍़यादा दूर तक फैला हुआ है। गैस के इस भंडार को सर्कमगैलेक्टिक मीडियम या सीजीएम कहा जाता है। यह सीजीएम तारों के निर्माण के लिए ईंधन उपलब्ध कराता है।

लेकिन यदि सीजीएम की सीमा के भीतर मौजूद पूरी गैस वास्तव में एकत्रित होकर तारों में परिवर्तित हो जाए, तो बड़ी संख्या में तारों वाली अत्यंत चमकीली आकाशगंगाएं बन जाएंगी। लेकिन ऐसी आकाशगंगाएं वास्तव में अस्तित्व में नहीं हैं। एक दशक से अधिक समय से खगोलशास्त्रियों ने प्रस्तावित किया है कि आकाशगंगाओं के केंद्र में स्थित अतिविशाल ब्लैक होल (एसएमबीएच) से निकलने वाली ऊर्जा गैस को ठंडा होने और तारों में संकुचित होने से रोक रही हो सकती है। लेकिन इस पर अभी तक कोई सर्वसम्मति नहीं बनी है कि ऐसा किस प्रकार हो रहा है। इस प्रक्रिया को समझने से पहले, एसएमबीएच और आकाशगंगा के सापेक्ष आकार को समझना उपयोगी होगा, जिससे प्रभाव के पैमाने को समझा जा सके।

हालांकि एक औसत एसएमबीएच का आकार सौर मंडल जितना हो सकता है, फिर भी यह उस आकाशगंगा की तुलना में बेहद छोटा होता है, जिसमें ऐसे 100 अरब तारकीय तंत्र समा सकते हैं।

रमन अनुसंधान संस्थान (आरआरआई), जो विज्ञान और प्रौद्योगिकी विभाग (डीएसटी) का एक स्वायत्त संस्थान है, और एरिज़ोना स्टेट यूनिवर्सिटी जैसे संस्थानों के शोधकर्ताओं की एक टीम ने एक ऐसे तरीके का पता लगाया है, जिसके माध्यम से केंद्र में स्थित छोटा-सा ब्लैक होल अपनी मेज़बान आकाशगंगा के विशाल सीजीएम को ऊर्जात्मक रूप से प्रभावित कर सकता है।

हालांकि ब्लैक होल की कल्पना अक्सर ऐसे विशाल शून्य के रूप में की जाती है, जो अपने आसपास की गैस और धूल को निगल जाते हैं, लेकिन वे अक्सर अत्यधिक गर्म प्लाज्मा के जेट भी बाहर निकालते हैं, जो आवेशित कणों का एक गर्म मिश्रण होता है। भारत और अमेरिका के वैज्ञानिकों से बनी इस टीम ने यह पता लगाया कि क्या यह जेट सीजीएम तक फैली गैस को प्रभावित करता है।

उन्होंने पाया कि जब ब्लैक होल से निकलने वाला जेट पहली बार सीजीएम का सामना करता है, तो वह सीजीएम में मौजूद गैस से टकराता है और एक झटका पैदा करता है, जिससे गैस ऊर्जावान हो जाती है। सीजीएम में मौजूद यह चमकीली, ऊर्जावान गैस आकाशगंगा में तारों के निर्माण को रोक सकती है।

ऊर्जावान और आयनित गैस—अर्थात ऐसी गैस जिसके परमाणुओं में इलेक्ट्रॉन जुड़ने या निकलने से उनमें आवेश आ जाता है—एक विशेष प्रकार की चमक उत्सर्जित करती है। टीम ने सीजीएम में इस चमक की तलाश की। जब उन्होंने आकाशगंगाओं के चारों ओर सभी दिशाओं में किए गए मापों का औसत निकाला, तो उन्हें कोई संकेत नहीं मिला।

आरआरआई के खगोल विज्ञान और खगोल भौतिकी प्रभाग की सहायक प्रोफेसर और आज द एस्ट्रोफिजिकल जर्नल लेटर्स  में प्रकाशित शोधपत्र की प्रमुख लेखिका नम्रता रॉय ने कहा , “हालांकि, जब हमने जेट की दिशा में जांच की, तो हमें एक मजबूत संकेत मिला। इससे पता चला कि जेट केवल अपने मार्ग में आने वाली गैस को प्रकाशित कर रहा था, न कि सभी दिशाओं में गैस को समान रूप से प्रभावित कर रहा था।”

इसके अलावा, उन्होंने पाया कि यह संकेत दो स्थानों पर सबसे अधिक मजबूत है—तारकीय डिस्क के किनारे पर, जहां जेट पहली बार सीजीएम का सामना करता है, और फिर सीजीएम की बाहरी सीमा पर, जहां पहले से धीमा हो चुका जेट सीजीएम में मौजूद गैस से पहली बार टकराता है। यह किसी कठोर वस्तु पर मुक्का मारने और उससे झटका महसूस होने जैसा है। इसमें ऊर्जा का निक्षेपण होता है और यही ऊर्जा गैस को ऊर्जावान बनाती है, जिससे तारों का निर्माण रुकता है।

चित्र: केंद्रीय अतिविशाल ब्लैक होल (जिन्हें “सक्रिय गांगेय नाभिक”/एजीएन भी कहा जाता है) से निकलने वाले सापेक्षिक जेट द्वारा आकाशगंगा के आसपास मौजूद गैसीय भंडार को प्रभावित करने का एक चित्रकार द्वारा प्रस्तुत चित्रण

छवि सौजन्य: हेली नेल्सन, एरिज़ोना स्टेट यूनिवर्सिटी (एएसयू)

ठंडी गैस एकत्रित होकर तारों का निर्माण करती है। लेकिन ब्लैक होल से निकलने वाला जेट सक्रिय होकर अपने मार्ग में आने वाली गैस को विक्षुब्ध करता है, जिससे वह एकत्रित नहीं हो पाती और तारों के निर्माण की प्रक्रिया दब जाती है। इस प्रकार, आकाशगंगा के केंद्र में स्थित ब्लैक होल आकाशगंगा को शांत तथा निष्क्रिय बना कर उसके भविष्य को निर्धारित करता है। एरिज़ोना स्टेट यूनिवर्सिटी की एसोसिएट प्रोफेसर और इस अध्ययन की सह-लेखिका संचयीता बोर्थाकुर कहती हैं, “इसका व्यापक निहितार्थ यह है कि ब्लैक होल आकाशगंगाओं के जीवन को उस छोटे केंद्रीय क्षेत्र से कहीं आगे तक प्रभावित कर सकते हैं, जहां वे स्थित होते हैं। [यह ऐसा है] जैसे भारत में बैठी एक चींटी अमेरिका में कहीं बहुत बड़ा प्रभाव डाल रही हो।”

फिलहाल, रॉय, बोर्थाकुर और उनके सहयोगी इस बात से संतुष्ट हो सकते हैं कि वे उस ज्वलंत निशान को पहचानने से नहीं चूके, जिसे इस चींटी जैसे ब्लैक होल ने उस विशाल आकाशगंगा में छोड़ा है, जिसमें वह स्थित है।

प्रकाशन लिंक: DOI 10.3847/2041-8213/ae9cbd

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