अगर पेट्रोल में इथेनॉल का मिश्रण न होता, तो वैश्विक तेल कीमतों में उछाल के दौरान इसकी कीमत लगभग 125 रुपए प्रति लीटर होती
इथेनॉल मिश्रित पेट्रोल (ईबीपी) कार्यक्रम भारत की ऊर्जा सुरक्षा को बढ़ाने, आयातित कच्चे तेल पर निर्भरता कम करने और खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करते हुए किसानों का समर्थन करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण राष्ट्रीय पहल है। हाल ही में किए गए कुछ दावों ने कार्यक्रम की अधूरी और भ्रामक तस्वीर पेश की है। निम्नलिखित स्पष्टीकरण इन मुद्दों का समाधान करते हैं और तथ्यात्मक स्थिति को स्पष्ट करते हैं।
दावा: सरकार ने एफसीआई का 37 रुपये प्रति किलो मूल्य का चावल डिस्टिलरी को 23 रुपये प्रति किलो के भाव से बेचा, जिससे 10,000 करोड़ रुपये का नुकसान हुआ। सरकार ने यह भी स्वीकार किया है कि इथेनॉल पेट्रोल से अधिक महंगा है, इसलिए ई20 का अस्तित्व केवल करदाताओं द्वारा दी जाने वाली सब्सिडी के कारण ही बना हुआ है।
खाद्य सुरक्षा पर कोई समझौता नहीं — इथेनॉल कभी भी गरीबों की कीमत पर नहीं आएगा
- यह आरोप न केवल गुमराह करने वाला है, बल्कि यह सच्चाई से पूरी तरह विपरीत है।
- प्रत्येक अनाज का सर्वप्रथम सार्वजनिक वितरण प्रणाली (पीडीएस), राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम (एनएफएसए), कल्याणकारी योजनाओं और अनिवार्य बफर भंडारों में उपयोग किया जाता है। एमएसपी पर खरीदा गया अनाज भारत की खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित होने से पहले इथेनॉल के लिए उपयोग नहीं किया जाता है।
- खाद्य सुरक्षा संबंधी सभी दायित्वों को पूरा करने के बाद खाद्य एवं सार्वजनिक वितरण विभाग द्वारा प्रमाणित अधिशेष को ही इथेनॉल उत्पादन के लिए अनुमोदित किया जाता है ।
- वास्तव में इथेनॉल कार्यक्रम में क्षतिग्रस्त अनाज, टूटे हुए चावल और मानव उपभोग के लिए अनुपयुक्त खाद्यान्न शामिल होते हैं- या फिर ऐसे भंडार जो गोदामों में सड़ जाते हैं।
- यह गरीबों से भोजन छीनना नहीं है बल्कि यह कचरे को धन में बदलने, आयात को कम करने के साथ भारतीय किसानों के हाथों में अधिक धन देता है।
- यह कार्यक्रम और भी आगे बढ़ रहा है। प्रधानमंत्री जीवन योजना के माध्यम से, भारत कृषि अवशेषों से दूसरी पीढ़ी के इथेनॉल का तेजी से विस्तार कर रहा है, जिससे खाद्यान्नों पर निर्भरता पूरी तरह से कम हो रही है।
- तथ्य स्पष्ट हैं: सरकार खाद्य सुरक्षा के लिए आवश्यक प्रत्येक अनाज की रक्षा करती है, और उसके बाद ही अधिशेष और अपशिष्ट को स्वच्छ ऊर्जा में परिवर्तित करती है। यह दावा न केवल गलत है, बल्कि यह उन सुरक्षा उपायों की अनदेखी भी करता है जो भारत के इथेनॉल कार्यक्रम को दुनिया के सबसे जिम्मेदार कार्यक्रमों में से एक बनाते हैं।
चावल को कोई विशेष वरीयता नहीं दी गई।
- इस दावे से यह धारणा बनती है कि एफसीआई का चावल इथेनॉल उत्पादकों को असामान्य रूप से सस्ते दाम पर बेचा गया था। यह बिल्कुल सच नहीं है।
- एफसीआई चावल इथेनॉल बनाने में इस्तेमाल होने वाले कई अनुमोदित कच्चे माल में से एक है और इसकी कीमत अन्य सभी फीडस्टॉक की तरह ही सरकारी मूल्य निर्धारण ढांचे के अंतर्गत तय की जाती है।
| फीडस्टॉक (ईएसआई 2025-26) | भुगतान की गई इथेनॉल की कीमत |
| मक्का | 71.86 रुपए प्रति लीटर |
| गन्ने का रस/सीरा | 65.61 रुपए प्रति लीटर |
| क्षतिग्रस्त अनाज | 64.00 रुपए प्रति लीटर |
| बी-भारी गुड़ | 60.73 रुपए प्रति लीटर |
| एफसीआई चावल | 60.32 रुपए प्रति लीटर |
| सी-भारी सीरा | 57.97 रुपए प्रति लीटर |
यह कार्यक्रम चावल पर निर्भर नहीं है। इसमें जो भी अनुमोदित कच्चा माल उपलब्ध होता है, उसका उपयोग किया जाता है।
- ईएसवाई 2023-24 में, एफसीआई चावल का योगदान इथेनॉल उत्पादन में लगभग नगण्य था—केवल 0.02 प्रतिशत।
- ईएसवाई 2025-26 तक, इसकी हिस्सेदारी बढ़कर केवल 24.64 प्रतिशत हो गई क्योंकि खाद्य सुरक्षा की सभी जरूरतों को पूरा करने के बाद एफसीआई का अधिशेष स्टॉक उपलब्ध हो गया था।
- इसी अवधि के दौरान, मक्का की हिस्सेदारी 42.6 प्रतिशत से घटकर 35.96 प्रतिशत हो गई, जिससे पता चलता है कि उत्पादक उपलब्धता के आधार पर विभिन्न फीडस्टॉक के बीच अदला-बदली करते रहते हैं।
- इथेनॉल सस्ते चावल पर आधारित नहीं है। यह अनुमोदित कच्चे माल के अनुकूल मिश्रण पर आधारित है, जिसमें खाद्य सुरक्षा संबंधी सभी दायित्वों को पूरा करने के बाद प्रमाणित अधिशेष स्टॉक उपलब्ध होने पर ही एफसीआई द्वारा प्रमाणित चावल का उपयोग किया जाता है।
असली प्रश्न यह नहीं है कि इथेनॉल सस्ता है या नहीं, बल्कि यह है कि क्या भारत बेहतर तरीके से सुरक्षित है।
- असली प्रश्न यह है: अगर वैश्विक तेल की कीमतों में उछाल के दौरान इथेनॉल की मिलावट नहीं होती, तो भारतीयों को कितना भुगतान करना पड़ता?
- जब भारतीय कच्चे तेल की कीमत बढ़कर लगभग 135 अमेरिकी डॉलर प्रति बैरल हो गई, तो दिल्ली में इथेनॉल मिश्रण रहित पेट्रोल की कीमत लगभग 125 रुपये प्रति लीटर होने का अनुमान लगाया गया था।
- इसके बजाय, उपभोक्ताओं ने 94.77 रुपए प्रति लीटर का भुगतान किया क्योंकि प्रत्येक लीटर का 20 प्रतिशत घरेलू स्तर पर उत्पादित इथेनॉल था, जिसे स्थिर, पूर्व-सहमत कीमतों पर प्राप्त किया गया था जो वैश्विक कच्चे तेल की कीमतों में अचानक वृद्धि से अप्रभावित थीं।
- इसका परिणाम क्या हुआ? संकट के चरम पर पहुंचने के दौरान पेट्रोल पंप पर प्रति लीटर लगभग 30 रुपए की बचत हुई।
- यही इथेनॉल मिश्रण का असली महत्व है। इसका उद्देश्य हर दिन सबसे सस्ता ईंधन उपलब्ध कराना नहीं है। इसका उद्देश्य भारतीय उपभोक्ताओं को वैश्विक तेल बाजारों में अत्यधिक अस्थिरता से बचाना, भारत की ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत करना और देश के ईंधन बिल का अधिक हिस्सा विदेशों में भेजने के बजाय भारतीय अर्थव्यवस्था के भीतर ही रखना है।
- कार्यक्रम के परिणाम स्वयं ही सब कुछ स्पष्ट करते हैं। ईबीपी कार्यक्रम ने पहले ही निम्नलिखित उपलब्धियां हासिल कर ली हैं:
- विदेशी मुद्रा में 1.97 लाख करोड़ रुपए से अधिक बचत;
- 316 लाख मीट्रिक टन से अधिक कच्चे तेल के आयात का प्रतिस्थापन;
- 950 लाख मीट्रिक टन से अधिक सीओ₂ उत्सर्जन में कमी; और
- किसानों और डिस्टिलर को 1.66 लाख करोड़ रुपये से अधिक का भुगतान किया गया, जिससे कृषि उत्पादों के लिए एक स्थिर घरेलू बाजार का निर्माण हुआ।
- इथेनॉल मिश्रण का उद्देश्य आयातित कच्चे तेल पर भारत की निर्भरता को कम करना है, जो अभी भी हमारी तेल आवश्यकता का लगभग 88 प्रतिशत पूरा करता है। यह वैश्विक तेल संकटों के खिलाफ एक बीमा पॉलिसी है, न कि दिन-प्रतिदिन की मूल्य प्रतिस्पर्धा।
इथेनॉल ब्लेंडिंग करदाताओं की सब्सिडी नहीं है। यह भारत की ऊर्जा सुरक्षा है और संकट के समय इसने अपना वादा पूरा किया।
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