मध्य प्रदेश ने मत्स्य निवेश एवं निर्यात दिशा-निर्देश, 2026 जारी किए; एकीकृत केज कल्चर इकाइयों का वर्चुअल माध्यम से उद्घाटन
केंद्रीय मत्स्य विभाग ने अंतर्देशीय राज्यों की निर्यात क्षमता बढ़ाने हेतु मानक संचालन प्रक्रिया जारी की
मध्य प्रदेश सरकार के मत्स्य विभाग ने केंद्रीय मत्स्य पालन, पशुपालन एवं डेयरी मंत्रालय के मत्स्य विभाग तथा राष्ट्रीय मात्स्यिकी विकास बोर्ड के सहयोग से आज भोपाल में मत्स्य निवेशक एवं निर्यातक सम्मेलन 2026 का आयोजित किया। सम्मेलन का उद्देश्य अंतर्देशीय मत्स्य पालन क्षेत्र में निवेश, प्रसंस्करण, मूल्य संवर्धन और निर्यात अवसरों को सुदृढ़ बनाना था।
सम्मेलन में मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव, केंद्रीय मत्स्य पालन, पशुपालन एवं डेयरी तथा पंचायती राज मंत्री श्री राजीव रंजन सिंह, केंद्रीय राज्य मंत्री प्रो. एस. पी. सिंह बघेल तथा मध्य प्रदेश सरकार के मत्स्य कल्याण एवं मत्स्य विकास विभाग मंत्री श्री नारायण सिंह पंवार शामिल हुए। केंद्रीय मत्स्य विभाग सचिव डॉ. अभिलक्ष लिखी और मध्य प्रदेश सरकार के मुख्य सचिव श्री अशोक बर्णवाल सहित केंद्र एवं राज्य सरकारों के वरिष्ठ अधिकारी भी इसमें मौजूद रहे। सम्मेलन में देश-विदेश के निवेशकों, निर्यातकों, मछली पालकों, उद्यमियों तथा मत्स्य मूल्य शृंखला से जुड़े हितधारकों ने भाग लिया।


सम्मेलन में निवेशकों, निर्यातकों, मछुआरों, मध्य प्रदेश के विभिन्न क्षेत्रों से आए एक हजार से अधिक मत्स्य पालकों, मत्स्य सहकारी समितियों, मत्स्य उत्पादक संगठनों, उद्यमियों, स्टार्टअप, प्रसंस्करण इकाइयों, वित्तीय संस्थानों, अनुसंधान संगठनों और मत्स्य क्षेत्र से जुड़े अन्य हितधारक एकत्रित हुए।
वर्ष 2024-25 में भारत का कुल मत्स्य उत्पादन 197.75 लाख मीट्रिक टन तक पहुंच गया था, जिसमें अंतर्देशीय मत्स्य पालन का योगदान 151.60 लाख मीट्रिक टन रहा। यह देश के कुल मत्स्य उत्पादन का लगभग तीन-चौथाई है। वर्ष 2025-26 में भारत का समुद्री खाद्य निर्यात 73,890 करोड़ रूपए का रहा। सम्मेलन में इस प्रचुर उत्पादन क्षमता को प्रसंस्करण, शीत भंडारण अवसंरचना, गुणवत्ता, बाजार पहुंच और निर्यात से जोड़ने पर जोर दिया गया।
केंद्रीय मत्स्य पालन, पशुपालन एवं डेयरी तथा पंचायती राज मंत्री श्री राजीव रंजन सिंह और मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने मध्य प्रदेश मत्स्य निवेश एवं निर्यात दिशा-निर्देश, 2026 तथा अंतर्देशीय राज्य निर्यात क्षमता संबंधी मानक संचालन प्रक्रियाएं जारी कीं। दिशा-निर्देशों का उद्देश्य मत्स्य बीज उत्पादन केंद्रों, मछली बीज एवं आहार, जलाशय मत्स्य पालन, केज कल्चर, जलीय जीव स्वास्थ्य, प्रसंस्करण, शीत भंडारण अवसंरचना, परिवहन एवं प्रचालन तंत्र, मूल्य संवर्धन और बाजार विकास जैसे क्षेत्रों में निवेश प्रोत्साहित करना है। केंद्र सरकार द्वारा मध्य प्रदेश को जलाशय मत्स्य पालन क्लस्टर के रूप में अधिसूचित किया गया है।
कार्यक्रम के दौरान एकीकृत केज कल्चर इकाइयों (मत्स्य पालन की आधुनिक तकनीक है, जिसमें प्राकृतिक जल स्रोतों- नदी, तालाब, झील, जलाशय या समुद्र में चारों तरफ से जाल और तैरते हुए ढांचे का उपयोग करके मछलियों को पाला जाता है) का आभासी माध्यम से उद्घाटन भी किया गया। साथ ही मध्य प्रदेश में जलाशयों और अमृत सरोवरों के एकीकृत विकास के लिए प्रशासनिक स्वीकृति संबंधी दस्तावेज भी सौंपे गए।
केंद्रीय मत्स्य पालन मंत्री श्री राजीव रंजन सिंह ने केंद्रीय बजट 2026-27 की घोषणा के अनुरूप प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना के तहत मध्य प्रदेश में जलाशयों के एकीकृत विकास के लिए मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव को प्रशासनिक स्वीकृति सौंपी। इस पहल में राज्य के 49 जलाशयों के विकास के लिए 8,755.60 लाख रूपए और 5 अमृत सरोवरों के विकास के लिए 69 लाख रूपए की स्वीकृत परियोजना लागत निर्धारित की गई है।

इस पहल का उद्देश्य जलाशयों की मत्स्य उत्पादन क्षमता का अधिकतम उपयोग, मछली उत्पादन एवं उत्पादकता बढ़ाना, आधारभूत संरचना मजबूत बनाना, आजीविका एवं रोजगार के अवसर सृजित करना तथा राज्य के मछुआरों और मत्स्य पालकों की सामाजिक-आर्थिक स्थिति में सुधार लाना है।
केंद्रीय मंत्री श्री राजीव रंजन सिंह और मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने मत्स्य क्षेत्र से संबंधित विभिन्न पहल के लाभार्थियों को प्रमाण-पत्र भी वितरित किए। इनमें मत्स्य पालन के लिए किसान क्रेडिट कार्ड, मत्स्य सहकारी समितियां, मत्स्य क्षेत्र के स्टार्टअप तथा प्रधानमंत्री मत्स्य किसान समृद्धि सह-योजना के प्रदर्शन अनुदान के लाभार्थी शामिल थे।
मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने कहा कि मत्स्य क्षेत्र में निवेश, उद्यमिता, औद्योगिक विकास और निर्यात की अपार संभावनाएं हैं। उन्होंने इस क्षेत्र में निवेशकों, निर्यातकों, उद्यमियों और स्टार्टअप की बढ़ती भागीदारी को उत्साहजनक बताया। उन्होंने जल संसाधन प्रबंधन के महत्व पर जोर देते हुए कहा कि पिछले ढाई वर्षों में राज्य की सिंचाई क्षमता बढ़कर 60 लाख हेक्टेयर हो गई है जिसे राज्य सरकार के कार्यकाल के अंत तक 100 लाख हेक्टेयर तक पहुंचाने का लक्ष्य है। उन्होंने केन-बेतवा तथा पार्वती-कालीसिंध-चंबल नदी जोड़ो परियोजनाओं का उल्लेख करते हुए कहा कि जलाशयों के विकास और पारंपरिक जल निकायों के संरक्षण के प्रयासों से जल उपलब्धता बढ़ेगी और मत्स्य पालन के नए अवसर उत्पन्न होंगे।
डॉ. मोहन यादव ने इस अवसर पर तीन प्रमुख पहल की घोषणा की। इनमें मत्स्य पालन को खाद्य प्रसंस्करण उद्योग से जोड़कर प्रसंस्करण, मूल्य संवर्धन, पैकेजिंग, शीत शृंखला अवसंरचना और वितरण व्यवस्था को बढ़ावा दिया जाएगा। सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यम ढांचे के अंतर्गत मत्स्य उद्यमों को भूमि तथा अन्य सुविधाओं सहित सहायता और प्रोत्साहन दिया जाएगा और मध्य प्रदेश मत्स्य नीति 2026 लागू की जाएगी, जिसके अंतर्गत मत्स्य क्षेत्र के उद्यमों को भूमि आवंटन और आवश्यक सुविधाएं उपलब्ध कराने का प्रावधान होगा। उन्होंने कहा कि इन उपायों से निवेश आकर्षित करने, रोजगार सृजित करने तथा राज्य में मत्स्य पालन एवं जलीय कृषि की क्षमता का पूर्ण उपयोग करने में मदद मिलेगी।
श्री राजीव रंजन सिंह ने कहा कि भारत 130 देशों को मछली का निर्यात करता है, लेकिन देश के अंतर्देशीय राज्यों की कुल मत्स्य निर्यात में हिस्सेदारी केवल 2 प्रतिशत है, जबकि इन राज्यों में मछली उत्पादन में 147 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। उन्होंने वैज्ञानिक पद्धतियों से केज कल्चर और पेन कल्चर (मत्स्य पालन की ऐसी विधि जिसमें मछलियों या अन्य जलीय जीवों को किसी प्राकृतिक जल स्रोत या उथले तटीय क्षेत्र के एक हिस्से को घेरकर पाला जाता है) के माध्यम से जलाशयों तथा बड़े तालाबों के विकास की आवश्यकता पर जोर दिया। उन्होंने उत्पादकता बढ़ाने और मत्स्य पालकों को निवेशकों, प्रसंस्करणकर्ताओं तथा निर्यातकों से जोड़ने का आह्वान किया। श्री राजीव रंजन सिंह ने मध्य प्रदेश की मत्स्य निवेश एवं निर्यात प्रोत्साहन नीति 2026 का स्वागत करते हुए कहा कि निवेश आकर्षित करने, रोजगार उत्पन्न करने और आय बढ़ाने के लिए मत्स्य पालन को एक उद्योग के रूप में मान्यता देकर उसका व्यवस्थित विकास आवश्यक है। उन्होंने अंतरराष्ट्रीय बाजारों की मांग पूरी करने के लिए गुणवत्तापूर्ण मछली उत्पादन, प्रभावी प्रचालन तंत्र, मूल्य संवर्धन, पकाने के लिए तैयार मत्स्य उत्पादों और भरोसेमंद आपूर्ति शृंखला के महत्व को रेखांकित किया। उन्होंने कहा कि निर्यात प्रतिस्पर्धा बढ़ाने के लिए उत्पादों की पहचान और उनकी आपूर्ति शृंखला का पता लगाने की व्यवस्था अत्यंत महत्वपूर्ण है। इस संदर्भ में उन्होंने राष्ट्रीय जलीय कृषि ट्रेसेबिलिटी फ्रेमवर्क 2025 तथा राष्ट्रीय मत्स्य डिजिटल प्लेटफॉर्म का उल्लेख किया जो जलीय कृषि की संपूर्ण मूल्य शृंखला में डिजिटल दस्तावेजीकरण को बढ़ावा देते हैं। उन्होंने यह भी बताया कि समुद्री उत्पाद निर्यात विकास प्राधिकरण अंतर्देशीय राज्यों के निर्यातकों को बाजार संबंधी जानकारी उपलब्ध कराने में सहयोग करेगा।
श्री राजीव रंजन सिंह ने निर्यात को बढ़ावा देने के लिए पांच प्रमुख प्राथमिकताओं का उल्लेख किया। इनमें मीठे पानी की मछली प्रजातियों और लक्षित बाजारों की पहचान करना, मछली संग्रह केंद्रों और बड़े पैमाने पर प्रसंस्करण केंद्रों का विकास करना, मत्स्य पालकों, सहकारी समितियों, निवेशकों और निर्यातकों के बीच साझेदारी मजबूत करना, आरंभ से ही गुणवत्ता प्रमाणन और पता लगाना सुनिश्चित करना, अंतरराष्ट्रीय खरीदारों के साथ निरंतर संपर्क बनाए रखना और स्पष्ट निर्यात लक्ष्य निर्धारित करना शामिल हैं। उन्होंने सम्मेलन में जारी मानक संचालन प्रक्रिया का पालन करने का आग्रह किया। इसमें मत्स्य बीज के संचयन और मछली उत्पादन से लेकर निर्यात संबंधी आवश्यकताओं तक पूरी मूल्य शृंखला के लिए दिशा-निर्देश दिए गए हैं। केंद्रीय मत्स्य पालन मंत्री ने राज्य सरकार और उद्योग जगत के हितधारकों से समन्वित प्रयास का आह्वान किया, ताकि मध्य प्रदेश को भारत के अंतर्देशीय मत्स्य निर्यात में अग्रणी योगदानकर्ता बनाया जा सके।
केंद्रीय राज्य मंत्री प्रो. एस. पी. सिंह बघेल ने मध्य प्रदेश में अंतर्देशीय मत्स्य पालन की व्यापक संभावनाओं को रेखांकित किया। उन्होंने कहा कि राज्य में नदियों का व्यापक नेटवर्क, विशाल जलाशय और अनुकूल जल गुणवत्ता मत्स्य क्षेत्र के विकास के लिए महत्वपूर्ण अवसर हैं। उन्होंने इंदिरा सागर जलाशय में बड़े पैमाने पर केज कल्चर की संभावनाओं का उल्लेख किया और कहा कि वहां एक लाख केज विकसित करना देश के लिए एक अनूठा उदाहरण बन सकता है। प्रो. एस. पी. सिंह बघेल कहा कि वर्ष 2019 में स्वतंत्र मत्स्य विभाग की स्थापना से इस क्षेत्र के विकास को गति मिली है और इसके लिए दीर्घकालिक दृष्टिकोण मजबूत हुआ है। उन्होंने बताया कि अंतर्देशीय मत्स्य पालन का देश के कुल मछली उत्पादन में लगभग 75 प्रतिशत योगदान है और इस क्षेत्र में निवेश, निर्यात तथा आजीविका सृजन की व्यापक संभावनाएं हैं। उन्होंने कहा कि मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, राजस्थान, बिहार और छत्तीसगढ़ जैसे अंतर्देशीय राज्य मत्स्य क्षेत्र के विकास के अगले चरण में महत्वपूर्ण हैं।
मध्य प्रदेश के मछुआरे कल्याण एवं मत्स्य विकास विभाग मंत्री श्री नारायण सिंह पंवार ने कहा कि राज्य सरकार मत्स्य पालन को पारंपरिक आजीविका गतिविधि से आगे बढ़ाकर आधुनिक तकनीक, निवेश, उद्यमिता, रोजगार और बेहतर आय आधारित विकासोन्मुख क्षेत्र बनाने के लिए प्रयासरत है। उन्होंने कहा कि इसी दिशा में एकीकृत मत्स्य उद्योग नीति 2026 शुरू की गई है जिसका उद्देश्य जल संसाधनों के बेहतर उपयोग और उपयुक्त जिलों में आधुनिक केज कल्चर को बड़े पैमाने पर बढ़ावा देकर मछली उत्पादन में वृद्धि करना है। उन्होंने कहा कि निवेश और तकनीक का लाभ स्थानीय समुदायों तक पहुंचना चाहिए। इससे उत्पादन बढ़ने से मत्स्य पालकों की आय में वृद्धि होगी और मछुआरा परिवारों के लिए रोजगार के नए अवसर उत्पन्न होंगे। उन्होंने कहा कि केंद्र सरकार के सहयोग से सरदार सरोवर, इंदिरा सागर और विंध्यवासिनी क्लस्टरों का विकास किया जा रहा है तथा सफल मॉडलों को अन्य जिलों में भी लागू करने तथा उत्पादन से बाजार तक एकीकृत व्यवस्था विकसित करने के प्रयास किए जा रहे हैं। श्री पंवार ने कहा कि विभाग निवेशकों, मत्स्य पालकों और मछुआरा समुदायों के बीच समन्वय स्थापित करने में सहायक और साझेदार की भूमिका निभाएगा, ताकि जमीनी स्तर पर व्यवहार्य निवेश को बढ़ावा मिल सके।
श्री नारायण सिंह पंवार ने निवेशकों और उद्यमियों को मध्य प्रदेश की अंतर्देशीय जलजनित अर्थव्यवस्था में भागीदारी के लिए आमंत्रित करते हुए राज्य सरकार की प्रतिबद्धता दोहराई। उन्होंने कहा कि सरकार का लक्ष्य उत्पादन बढ़ाना, निवेश आकर्षित करना, रोजगार सृजन और मछुआरों के परिवारों की समृद्धि सुनिश्चित करना है।
केंद्रीय मत्स्य विभाग सचिव डॉ. अभिलक्ष लिखी ने अपने संबोधन में अंतर्देशीय मत्स्य पालन की अप्रयुक्त निर्यात क्षमता का उल्लेख किया। उन्होंने बताया कि पंगासियस और तिलापिया जैसी मीठे जल की मछली प्रजातियों की अभी समुद्री खाद्य निर्यात में हिस्सेदारी केवल 2 प्रतिशत है। इसे अगले पांच वर्षों में बढ़ाकर 10 प्रतिशत करने का लक्ष्य है। उन्होंने कहा कि मध्य प्रदेश जैसे राज्य जलाशयों, तालाबों, झीलों और नदियों का उपयोग कर इस लक्ष्य की प्राप्ति में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। इसके लिए आधारभूत संरचना, शीत भंडारण केंद्रों, गुणवत्ता प्रमाणन और निर्यात बाजारों तक पहुंच आवश्यक है।
डॉ. लिखी ने केंद्र सरकार द्वारा समुद्री उत्पाद निर्यात विकास प्राधिकरण के सहयोग से तैयार कार्गो हैंडलिंग संबंधी मानक संचालन प्रक्रिया का भी उल्लेख किया। इसका उद्देश्य अंतर्देशीय क्षेत्रों से मछली के निर्यात को सुगम बनाना है। उन्होंने मध्य प्रदेश मत्स्य निवेश एवं व्यवसाय प्रोत्साहन नीति 2026 को भी एक महत्वपूर्ण पहल बताया। डॉ. लिखी ने कहा कि अगले पांच वर्षों में प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना के अंतर्गत राज्य सरकारों के सहयोग से क्लस्टर आधारित दृष्टिकोण अपनाया जाएगा। इसके इसके द्वारा अंतर्देशीय मछली एवं समुद्री खाद्य उत्पादों के लिए प्रशिक्षण, मूल्य संवर्धन, पैकेजिंग, ब्रांडिंग और निर्यात प्रचालन तंत्र को बढ़ावा दिया जाएगा।
मध्य प्रदेश के मुख्य सचिव श्री अशोक बर्णवाल ने बताया कि राज्य सरकार की योजना भारत और विश्व स्तर पर मछली पालन और जलीय कृषि के उत्पादन में तेजी से वृद्धि से जुड़ी नीली क्रांति – ब्लू रिवोल्यूशन के अंतर्गत आधुनिक मत्स्य पालन तकनीकों को अपनाकर अगले दो से तीन वर्षों में मछली उत्पादन को 4.5 लाख टन से बढ़ाकर 10 से 11 लाख टन तक पहुंचाना है।
उन्होंने कहा कि इस विस्तार से मत्स्य क्षेत्र में प्रतिवर्ष लगभग 5 हजार करोड़ रूपए की अतिरिक्त आय सृजित होने का अनुमान है, जिससे कम-से-कम 50 हजार लोगों को लाभ मिलेगा। उन्होंने मत्स्य पालन को पूरक आजीविका गतिविधि से व्यापक बनाकर निवेश और पूर्णकालिक रोजगार के प्रमुख क्षेत्र के रूप में विकसित करने की आवश्यकता पर जोर दिया। उन्होंने निवेशकों और उद्योग जगत के हितधारकों को मध्य प्रदेश के साथ साझेदारी कर मत्स्य निर्यात, प्रसंस्करण तथा उत्पादन प्रक्रिया पूर्व सामग्री के विकास में योगदान देने के लिए आमंत्रित किया।


सम्मेलन में मत्स्य क्षेत्र को उत्पादन केंद्रित दृष्टिकोण तक सीमित न रखकर ऐसी एकीकृत मूल्य शृंखला विकसित करने पर जोर दिया गया जो उत्पादन को प्रसंस्करण, मूल्य संवर्धन, ब्रांडिंग और बाजारों से जोड़े। कहा गया कि बेहतर शीत भंडारण नेटवर्क, गुणवत्ता मानकों, प्रमाणन और प्रभावी प्रचालन तंत्रों द्वारा अंतर्देशीय मत्स्य उत्पादों को व्यापक तौर पर घरेलू एवं अंतरराष्ट्रीय बाजारों तक पहुंचाया जा सकता है।
सम्मेलन में हुई चर्चाओं और घोषित पहल से केंद्र एवं राज्य सरकारों, निवेशकों, निर्यातकों, वित्तीय संस्थानों, अनुसंधान संगठनों, मत्स्य सहकारी समितियों तथा उद्यमियों के बीच सहयोग मजबूत होने की अपेक्षा है। इससे मध्य प्रदेश की अंतर्देशीय मत्स्य क्षमता को निवेश के अवसरों में बदलने, मूल्य शृंखला सुदृढ़ बनाने और मछुआरों एवं मत्स्य पालकों की आजीविका में सुधार लाने में मदद मिलेगी।
पृष्ठभूमि विवरण
मध्य प्रदेश में 4.50 लाख हेक्टेयर अंतर्देशीय जल क्षेत्र उपलब्ध है, जिसमें 3.75 लाख हेक्टेयर जलाशय क्षेत्र है। यह अंतर्देशीय मत्स्य पालन और जलीय कृषि के लिए एक व्यापक उत्पादन आधार है। राज्य में उत्पादित होने वाली प्रमुख मछली प्रजातियों में रोहू, कतला, मृगल, तिलापिया, पंगासियस, कॉमन कार्प और ग्रास कार्प शामिल हैं।
प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना के अंतर्गत केंद्रीय मत्स्य विभाग ने मध्य प्रदेश के लिए कुल 910.81 करोड़ रूपए की परियोजनाओं को स्वीकृति दी है जिसमें केंद्र सरकार की 305.50 करोड़ रूपए की हिस्सेदारी है। स्वीकृत केंद्रीय हिस्से में से अब तक 301.27 करोड़ रूपए जारी किए जा चुके हैं, जो स्वीकृत केंद्रीय हिस्से का लगभग 98.61 प्रतिशत है। इससे मध्य प्रदेश में मछली उत्पादन वर्ष 2019-20 के दो लाख मीट्रिक टन से बढ़कर वर्ष 2024-25 में 4.45 लाख मीट्रिक टन हो गया, जो लगभग 123 प्रतिशत की वृद्धि है।
प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना के अंतर्गत उत्पादन बढ़ाने के लिए स्वीकृत प्रमुख पहलों में 78 मत्स्य बीज उत्पादन केंद्र (हैचरी), 1,157 आरएएस (RAS) एवं बायोफ्लॉक इकाइयां, तालाब क्षेत्र में 5,700 हेक्टेयर से अधिक की वृद्धि, एक एकीकृत एक्वापार्क की स्थापना शामिल हैं।
केंद्रीय बजट 2026-27 की घोषणा के अनुरूप मध्य प्रदेश में 88.25 करोड़ रूपए के निवेश के साथ 49 जलाशयों और 5 अमृत सरोवरों के एकीकृत विकास को स्वीकृति दी गई है। मध्य प्रदेश ने हलाली जलाशय में 316 केज स्थापित किए हैं। इस जलाशय को जलाशय मत्स्य पालन क्लस्टर के रूप में अधिसूचित किया गया है। कार्यक्रम के दौरान जिन एकीकृत केज कल्चर इकाइयों का उद्घाटन किया गया, वे मछली उत्पादन और विपणन को योजनाबद्ध तरीके से बढ़ावा देने में सहायता करेंगी।
मत्स्य पालन एवं जलीय कृषि अवसंरचना विकास निधि के अंतर्गत मध्य प्रदेश में पांच परियोजनाओं को स्वीकृति दी गई है। इनमें 5.00 करोड़ रूपए की लागत से मत्स्य प्रशिक्षण केंद्र, करोड़ रूपए की लागत से शीत भंडारण केंद्र, 0.44 करोड़ रूपए की लागत से दो नवाचार आधारित परियोजनाएं, 0.27 करोड़ रूपए की लागत से रोग निदान प्रयोगशाला स्थापित करना शामिल हैं।
इन पांच परियोजनाओं में से अब तक केवल मत्स्य प्रशिक्षण केंद्र से संबंधित परियोजना का कार्य प्रगति पर है, जबकि शेष चार परियोजनाओं का कार्य अभी आरंभ होना बाकी है।
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