डिजिटल युग में भारत का सशक्तीकरण

परिचय
भारत का डिजिटल रूपांतरण जनसंख्या के लिहाज़ से वैश्विक स्तर पर कनेक्टिविटी और प्रौद्योगिकी-सक्षम सार्वजनिक सेवा प्रदायगी के सबसे बड़े विस्तारों में से एक का प्रतीक है। साल 2015 में आरंभ किए गए डिजिटल इंडिया कार्यक्रम में निहित इस रणनीति का केंद्र प्रत्येक नागरिक के लिए डिजिटल अवसंरचना को एक मूलभूत उपयोगिता के रूप में विकसित करना, डिजिटल विभाजन को पाटना, मांग के अनुरूप शासन और सेवाएं उपलब्ध कराना तथा डिजिटल पहुंच के माध्यम से लोगों को सशक्त बनाना रहा है।
एक दशक पहले तक भारत में डिजिटल विभाजन काफ़ी स्पष्ट और गहरा था। हाई-स्पीड इंटरनेट मुख्यतः शहरी क्षेत्रों तक सीमित था, ग्रामीण संपर्क (कनेक्टिविटी) सीमित था, और ऑनलाइन सेवाओं तक पहुंच स्थान, आय और डिजिटल साक्षरता पर निर्भर करती थी। इन वर्षों के दौरान निरंतर सार्वजनिक निवेश के माध्यम से ब्रॉडबैंड नेटवर्क का विस्तार किया गया और व्यापक ऑप्टिकल फाइबर अवसंरचना की ओर रुख़ किया गया, जिससे गांवों और दूरस्थ क्षेत्रों तक कनेक्टिविटी की पहुंच और गुणवत्ता, दोनों में सुधार हुआ।
आज यह विभाजन तेजी से संकरा होता जा रहा है। किफायती डाटा, सहायक डिजिटल पहुंच केंद्रों और परस्पर संचालित सार्वजनिक प्लेटफॉर्मों के माध्यम से नागरिक कल्याणकारी योजनाओं का लाभ लेने, डिजिटल भुगतान करने, ऑनलाइन शिक्षा प्राप्त करने और शासन में भागीदारी करने में सक्षम हो रहे हैं। जो पहल किसी समय में एक कनेक्टिविटी मिशन के रूप में शुरु हुई थी, वह अब एक व्यापक सशक्तीकरण यात्रा में विकसित हो चुकी है—जो हर बीतते वर्ष के साथ अधिक से अधिक भारतीयों को डिजिटल मुख्यधारा से जोड़ रही है।
भारत की डिजिटल अवसंरचना का निर्माण
भारत की डिजिटल रीढ़ उसके उस प्रयास का आधार है जिसके माध्यम से विशाल जनसंख्या के पैमाने पर डिजिटल विभाजन को पाटने का लक्ष्य रखा गया है। यह तीन परस्पर जुड़े स्तंभों के माध्यम से संचालित होती है: सार्वभौमिक संपर्क अवसंरचना, डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर (डीपीआई) और कंप्यूटिंग क्षमता। ये स्तंभ मिलकर सुनिश्चित करते हैं कि पहुंच, सेवाएं और प्रौद्योगिकीय क्षमता एक साथ विकसित हों। यह समेकित दृष्टिकोण कनेक्टिविटी को डिजिटल अर्थव्यवस्था में सार्थक भागीदारी में परिवर्तित करने में सक्षम बनाता है।
सार्वभौमिक डिजिटल संपर्क और किफायती मूल्यों पर उपलब्धता
सार्वभौमिक डिजिटल संपर्क और किफायती मूल्यों पर उपलब्धता (एक्सेस) भारत की डिजिटल क्रांति की आधारशिला है, जो प्रत्येक नागरिक के लिए समावेशी विकास, बेहतर शासन, आर्थिक अवसरों और सामाजिक सशक्तीकरण को आगे बढ़ाती है।
इसके केंद्र में भारतनेट (वर्ष 2011 में लॉन्च) के तहत ऑप्टिकल फाइबर का व्यापक विस्तार है, जो हाई-स्पीड इंटरनेट को ग्रामीण भारत तक पहुंचाता है। वर्ष 2026 की शुरुआत तक 2.15 लाख से अधिक ग्राम पंचायतों को जोड़ा जा चुका है, जबकि देशभर में ऑप्टिकल फाइबर केबल का विस्तार वर्ष 2019 के 19.35 लाख रूट कि.मी. से बढ़कर वर्ष 2025 में 42.36 लाख रूट कि.मी. हो गया है, जिससे एक सुदृढ़ डिजिटल रीढ़ का निर्माण हुआ है जो शहरी-ग्रामीण अंतर को कम करती है और दूरस्थ क्षेत्रों तक विश्वसनीय कनेक्टिविटी उपलब्ध करवाती है।
फाइबर के पूरक के रूप में, भारत का अत्यंत तेज़ 5जी नेटवर्क अब (दिसंबर 2025 तक) 5.18 लाख से अधिक बेस ट्रांसीवर स्टेशनों के माध्यम से देश के 99.9% जिलों को कवर कर रहा है, जिससे हर जगह अति-तेज़ मोबाइल ब्रॉडबैंड उपलब्ध हो रहा है। दूरसंचार अधिनियम 2023 के अंतर्गत अवसंरचना स्वीकृति की प्रक्रिया को तेज करने, स्वदेशी 4जी/5जी प्रौद्योगिकी तथा नेशनल ब्रॉडबैंड मिशन के समर्थन से ये प्रयास कनेक्टिविटी को एक विलासिता से बदलकर एक आवश्यक अधिकार में परिवर्तित कर रहे हैं।
किफायती दरों ने इस परिवर्तन में निर्णायक भूमिका निभाई है: डेटा लागत वर्ष 2014 में ₹269/जीबी से घटकर वर्ष 2025–2026 में लगभग ₹8–10 प्रति जीबी (लगभग $0.10) हो गई है, जिससे भारत दुनिया के सबसे सस्ते डेटा बाजारों में से एक बन गया है। इस तीव्र गिरावट ने तेज वृद्धि को बढ़ावा दिया है—नवंबर 2025 तक ब्रॉडबैंड सदस्यता की संख्या 1 अरब (100 करोड़ से अधिक) को पार कर गई, जो एक दशक पहले के 13.15 करोड़ की तुलना में छह गुना से अधिक की वृद्धि है।
समग्र रूप से, ऐसे सुधार ग्रामीण समुदायों, किसानों, छात्रों, उद्यमियों तथा वंचित वर्गों को भारत की उभरती डिजिटल अर्थव्यवस्था में पूर्ण रूप से भागीदारी करने के लिए सशक्त बना रहे हैं और साथ ही पहुंच (एक्सेस) से संबंधित अंतराल को व्यवस्थित रूप से कम करते हुए ग्रामीण तथा वंचित समुदायों को भारत की डिजिटल अर्थव्यवस्था में एकीकृत कर रहे हैं।
डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर (डीपीआई): समावेशी सेवाओं को सक्षम बनाना
जैसे-जैसे डिजिटल कनेक्टिविटी विशाल जनसंख्या तक पहुंच रही है, डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर (डीपीआई) यह सुनिश्चित करता है कि इंटरनेट उपलब्धता का अर्थ हो एक विश्वसनीय, परस्पर-संचालित और नागरिक-केंद्रित सेवा—जो बुनियादी संपर्क को शासन, वित्त और दैनिक जीवन के लिए वास्तविक सशक्तीकरण में बदल सके। भारत का मूलभूत डीपीआई पारिस्थितिकी तंत्र सार्वभौमिक डिजिटल पहचान, निर्बाध भुगतान और सुरक्षित डॉक्यूमेंट एक्सेस जैसी आधारभूत परतें उपलब्ध कराता है, जिससे सेवाओं को ग्रामीण, निम्न-आय और वंचित समुदायों के लिए समावेशी बनाकर डिजिटल विभाजन को प्रत्यक्ष रूप से कम किया जा रहा है।
आधार के माध्यम से फरवरी 2026 तक 143 करोड़ से अधिक विशिष्ट डिजिटल पहचान संख्याएं जारी की जा चुकी हैं, जिससे लक्षित कल्याण प्रदायगी, प्रत्यक्ष लाभ अंतरण तथा सरकारी और वित्तीय सेवाओं तक सुगम पहुंच संभव हुई है—यहां तक कि उन लोगों के लिए भी, जो पहले औपचारिक पहचान के अभाव में इनसे वंचित रह जाते थे।
जनवरी 2026 के आंकड़ों के अनुसार, यूनिफाइड पेमेंट्स इंटरफेस (यूपीआई) लगभग 21.7 अरब लेनदेन के साथ प्रति माह करीब ₹28.33 लाख करोड़ के लेनदेन का संचालन कर रहा है, जिससे देशभर में किफायती और रियल-टाइम डिजिटल भुगतान संभव हो रहे हैं। मोबाइल फोन से शून्य-लागत अंतरण की सुविधा के जरिए यह शहरी-ग्रामीण तथा आय संबंधी अंतरालों को पाटते हुए वित्तीय समावेशन को बढ़ावा दे रहा है।
डिजिलॉकर के फरवरी 2026 तक 62 करोड़ से अधिक पंजीकृत उपयोगकर्ता हैं, जो स्वास्थ्य, शिक्षा, कृषि और कल्याण जैसे क्षेत्रों में आधिकारिक दस्तावेजों के सुरक्षित एवं कागजरहित भंडारण तथा साझाकरण की सुविधा प्रदान करता है—इससे कागजी कार्यवाही से जुड़ी बाधाएँ समाप्त हो जाती हैं और नागरिक कहीं भी, कभी भी दस्तावेजों की तत्काल एवं विश्वसनीय उपलब्धता के माध्यम से सशक्त होते हैं।
सामूहिक रूप से, डीपीआई के ये स्तंभ मात्र इंटरनेट पहुंच को ठोस सामाजिक और आर्थिक परिणामों में रूपांतरित करते हैं, जिससे निर्बाध सेवा प्रदायगी, गहन वित्तीय समावेशन तथा विश्वसनीय डिजिटल इंटरैक्शन सुनिश्चित होते हैं, जो व्यवस्थित रूप से पहुंच (एक्सेस) संबंधी अंतरालों को कम करते हुए प्रत्येक भारतीय को डिजिटल अर्थव्यवस्था में एकीकृत करते हैं।
हाई-परफॉर्मेंस कंप्यूटिंग (एचपीसी) और क्लाउड अवसंरचना
हाई-परफॉर्मेंस कंप्यूटिंग (एचपीसी) और डेटा सेंटर भारत के डिजिटल परिवर्तन के प्रमुख सक्षम कारक हैं, जो देश को बुनियादी संपर्क से नवाचार-आधारित समावेशन की दिशा में आगे बढ़ा रहे हैं। नेशनल सुपरकंप्यूटिंग मिशन (एनएसएम)—जिसका संयुक्त नेतृत्व इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय और विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग कर रहे हैं—के अंतर्गत देशभर के विभिन्न संस्थानों में 44 पेटाफ्लॉप्स की संयुक्त क्षमता वाले 38 सुपरकंप्यूटर स्थापित किए जा चुके हैं। महानगरीय केंद्रों से आगे उन्नत कंप्यूटिंग अवसंरचना का विस्तार करते हुए एचपीसी विश्वविद्यालयों, स्टार्टअप्स, शोधकर्ताओं और उद्योगों के लिए विश्वस्तरीय संसाधनों तक समान पहुंच सुनिश्चित करता है, जिससे कृत्रिम बुद्धिमत्ता, जलवायु मॉडलिंग, जैव प्रौद्योगिकी और उन्नत विनिर्माण जैसे क्षेत्रों को समर्थन मिल रहा है।
एचपीसी के पूरक के रूप में, भारत का क्लाउड और डेटा सेंटर पारिस्थितिकी तंत्र भी डिजिटल शासन तथा एआई-रेडी अवसंरचना को समर्थन देने के लिए तीव्र गति से विस्तार कर रहा है। मेघराज (जीआई क्लाउड) के माध्यम से 2,170 से अधिक मंत्रालय और विभाग सुरक्षित एवं स्केलेबल सरकारी क्लाउड प्लेटफॉर्मों पर अपनी एप्लीकेशंस संचालित कर रहे हैं। लगभग 1,280 मेगावाट की कुल डेटा सेंटर क्षमता के साथ, इसके वर्ष 2030 तक 4–5 गुना बढ़ने का अनुमान है। भारत अपनी डिजिटल अवसंरचना को वैश्विक मानकों के अनुरूप विकसित कर रहा है, जिससे उच्च-स्तरीय कंप्यूटिंग संसाधन प्रत्यक्ष तौर पर डिजिटल विभाजन को कम करने और उन्नत प्रौद्योगिकियों तक समावेशी पहुंच सुनिश्चित करने में योगदान दे सकें।
भारत द्वारा डिजिटल अवसंरचना, परस्पर-संचालित (इंटरऑपरेबल) प्लेटफॉर्म और हाई-परफॉर्मेंस कंप्यूटिंग में किए गए निवेश ठोस प्रभाव उत्पन्न कर रहे हैं—जिससे सेवा प्रदायगी, वित्तीय समावेशन, अनुसंधान क्षमताओं और नवाचार के अवसरों में वृद्धि हो रही है। मापनीय परिणामों और समान पहुंच पर ध्यान केंद्रित करते हुए देश कनेक्टिविटी को क्षमता में रूपांतरित कर रहा है, जिससे यह सुनिश्चित हो सके कि डिजिटल विकास का लाभ सभी नागरिकों तक पहुंचे, जिनमें ग्रामीण और वंचित समुदाय भी शामिल हों।
भारत के लिए एक समावेशी डिजिटल पारिस्थितिकी तंत्र का निर्माण
भारत का डिजिटल रूपांतरण केवल कनेक्टिविटी के विस्तार तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि प्रत्येक नागरिक डिजिटल अर्थव्यवस्था में सार्थक रूप से भाग ले सके। एक समावेशी डिजिटल पारिस्थितिकी तंत्र के निर्माण के लिए केवल अवसंरचना पर्याप्त नहीं है; इसके लिए स्थानीय सेवा पहुंच केंद्र, व्यापक डिजिटल साक्षरता, किफायती इंटरनेट, उन्नत कौशल विकास तथा नवाचार और उद्यमिता के अवसर भी आवश्यक हैं।
अंतिम छोर तक सेवा प्रदायगी को क्षमता विकास और बाज़ार संपर्क के साथ जोड़ते हुए ये पहलें डिजिटल पहुंच को वास्तविक सामाजिक और आर्थिक सशक्तीकरण में परिवर्तित कर रही हैं, जो ग्रामीण और शहरी भारत, दोनों में प्रभावी रूप से दिखाई दे रहा है।
डिजिटल साक्षरता: कौशल और अवसरों का निर्माण
भारत ने समावेशी शासन और नागरिक सशक्तीकरण के लिए डिजिटल प्रौद्योगिकियों के उपयोग में स्वयं को वैश्विक नेता के रूप में स्थापित किया है। समान विकास के लिए डिजिटल साक्षरता को अनिवार्य मानते हुए, सरकार ने ग्रामीण जनसंख्या पर विशेष ध्यान केंद्रित किया है। राष्ट्रीय डिजिटल साक्षरता मिशन (एनडीएलएम) या डिजिटल साक्षरता अभियान (डीआईएसएचए) (2014–2016) के माध्यम से प्रारंभिक प्रयासों में 52.50 लाख लक्षित व्यक्तियों के मुकाबले 53.67 लाख लाभार्थियों को प्रशिक्षित किया गया, जिनमें लगभग 42% ग्रामीण क्षेत्र के थे। इस सफलता के आधार पर, प्रधानमंत्री ग्रामीण डिजिटल साक्षरता अभियान (पीएमजीडीआईएसएचए), जो 2017 में स्वीकृत हुआ, ने 6 करोड़ ग्रामीण परिवारों (प्रत्येक परिवार में एक व्यक्ति) को डिजिटल रूप से सशक्त बनाने का लक्ष्य रखा। मार्च 2024 तक, इसने 6.39 करोड़ व्यक्तियों को प्रशिक्षित करने की उपलब्धि हासिल की, जिससे यह दुनिया के सबसे बड़े ग्रामीण डिजिटल साक्षरता कार्यक्रमों में से एक बन गया और ऑनलाइन सेवाओं तथा वित्तीय समावेशन तक पहुंच का विस्तार हुआ।
इस आधार को संस्थागत स्तर पर और भी मजबूत किया गया है। साल 2009 में शुरु किए गए सूचना एवं संचार प्रौद्योगिकी के माध्यम से शिक्षा पर राष्ट्रीय मिशन (एनएमईआईसीटी) ने उच्च शिक्षा में अंतराल को पाटते हुए ब्रॉडबैंड कनेक्टिविटी, वर्चुअल लैब्स और डिजिटल संसाधनों का विस्तार किया, जिससे दूरस्थ कैंपस भी गुणवत्ता और पहुंच (एक्सेस) में प्रमुख संस्थानों के बराबर हो गए। राष्ट्रीय शिक्षा नीति (एनईपी) 2020, स्कूल और उच्च शिक्षा में डिजिटल साक्षरता को मुख्यधारा में लाते हुए, मिश्रित शिक्षा (ब्लेंडेड लर्निंग), डिजिटल पुस्तकालय, एआई-सक्षम उपकरण और शिक्षक प्रशिक्षण को एकीकृत करके वास्तव में एक समान और भविष्य के लिए तैयार शिक्षा प्रणाली का निर्माण करके इस प्रगति को और गति प्रदान कर रही है।
एनईपी के तहत राष्ट्रीय प्लेटफ़ॉर्म, जैसे दीक्षा (डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर फॉर नॉलेज शेयरिंग) और स्वयं (स्टडी वेब्स ऑफ एक्टिव-लर्निंग फॉर यंग एस्पायरिंग माइंड्स), बड़े पैमाने पर डिजिटल पाठ्यक्रमों और प्रमाणपत्रों के माध्यम से स्कूल और उच्च शिक्षा में गुणवत्तापूर्ण शिक्षा तक पहुंच को लोकतांत्रिक बना रहे हैं। इस समावेशन को पहुंच से अवसर तक बढ़ाते हुए, इनोवेशन इन साइंस पर्स्यूट फॉर इंस्पायर्ड रिसर्च (इंस्पायर) अवार्ड्स – मिलियन माइंड्स ऑगमेंटिंग नेशनल एस्पिरेशन एंड नॉलेज (मानक) कार्यक्रम कक्षा 6–10 के छात्रों में बुनियादी स्तर पर एसटीईएम नवाचार को पोषित करता है, जिसमें लड़कियों और अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग के छात्रों की मजबूत भागीदारी है। ये पहलें सामूहिक रूप से केवल कनेक्टिविटी से आगे बढ़कर, क्षमता विकास की दिशा में काम कर रही हैं—जिससे डिजिटल शिक्षा समावेशी प्रतिनिधित्व, नवाचार और भविष्य के लिए तैयार कौशल में परिवर्तित होती है।
| समावेशी डिजिटल शिक्षा: स्कूल से उच्च शिक्षा तकस्कूली शिक्षा और शिक्षक प्रशिक्षण के लिए दीक्षा (डीआईकेएसएचए) में 19,698 से अधिक पाठ्यक्रम हैं, जिनमें वर्ष 2025–26 में 18.23 करोड़ नामांकन और 14.57 करोड़ पूर्णताएँ (पाठ्यक्रम पूर्ण होना) दर्ज की गईं। यह बहुभाषी, संवादपूर्ण सामग्री प्रदान करता है, जिसमें एनसीईआरटी की पाठ्यपुस्तकें और एआई-सक्षम संसाधन शामिल हैं।स्वयं उच्च शिक्षा के लिए प्रमुख संस्थानों से 18,500 से अधिक पाठ्यक्रम प्रदान करता है। इसने 6.1 करोड़ से अधिक नामांकन दर्ज किए हैं, 53.7 लाख प्रमाणपत्र प्रदान किए हैं, और इसकी लोकप्रियता लगातार बनी हुई है, जिसमें जनवरी 2026 में लगभग 50 लाख नामांकन शामिल हैं। वर्ष 2008 में शुरु हुआ इंस्पायर-मानक, हर साल एक लाख छात्र-आइडियाज का चयन करता है और जिला, राज्य तथा राष्ट्रीय स्तर पर मेंटरिंग के साथ ₹10,000 के प्रोटोटाइप अनुदान प्रदान करता है। वर्ष 2025–26 में इसने 11.47 लाख आइडियाज जुटाए, जिनमें 52% लड़कियों से और 84% ग्रामीण स्कूलों से थे। अब तक इसने 1,40,316 छात्रों को समर्थन प्रदान किया है, जिसमें अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग के छात्रों की मजबूत भागीदारी रही है। |
इसके अतिरिक्त, भारत का डिजिटल रूपांतरण अधिकार-आधारित और सुलभ भी है। दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम, 2016 सूचना एवं संचार प्रौद्योगिकी की सुलभता अनिवार्य करता है, जबकि यूनिक डिसेबिलिटी आईडी (UDID) योजना ने 1,34,73,833 डिजिटल दिव्यांगता कार्ड जारी किए हैं (8,906,328 पुरुष; 4,565,166 महिलाएँ; 2,338 अन्य), जिनके ज़रिए देशभर में कल्याण लाभों तक पहुंच को सुव्यवस्थित किया गया है। इसके पूरक रूप में, इंडियन साइन लैंग्वेज रिसर्च एंड ट्रेनिंग सेंटर ने दुनिया की सबसे बड़ी इंडियन साइन लैंग्वेज डिजिटल रिपॉजिटरी विकसित की है, जिसमें 3,189 ई-कंटेंट वीडियो शामिल हैं, जिनमें 100 एसटीईएम शब्द और 18 नेशनल बुक ट्रस्ट के शीर्षक आईएसएल प्रारूप में हैं। यह पहल सुलभ शिक्षा का विस्तार करती है और सुनिश्चित करती है कि डिजिटल समावेशन अधिकार-आधारित और डेटा-संचालित बना रहे।
भारत की व्यापक डिजिटल साक्षरता पारिस्थितिकी तंत्र—पीएमजीडीआईएसएचए, दीक्षा और स्वयं से लेकर इंस्पायर-मानक के बुनियादी स्तर पर एसटीईएम सशक्तीकरण और दिव्यांगजनों के लिए अधिकार-आधारित सुलभता तक—ने कनेक्टिविटी को वास्तविक क्षमता, अवसर और समावेशन में बदल दिया है। ग्रामीण क्षेत्रों, लड़कियों, वंचित समुदायों और कम सेवा प्राप्त समूहों को प्राथमिकता देते हुए, ये पहलें प्रभावी रूप से डिजिटल विभाजन को पाट रही हैं और प्रत्येक भारतीय को डिजिटल-प्रथम अर्थव्यवस्था में सफल होने के लिए आवश्यक कौशल, पहुंच और आत्मविश्वास प्रदान कर रही हैं। यह नागरिक-केंद्रित दृष्टिकोण भारत को एक वैश्विक मॉडल के रूप में स्थापित करता है, जहाँ एक ऐसा समान और समावेशी डिजिटल रूपांतरण सुनिश्चित किया गया है, जिसमें कोई भी पीछे न छूटे।
कॉमन सर्विस सेंटर (सीएससी): अंतिम छोर तक डिजिटल पहुंच
डिजिटल इंडिया कार्यक्रम के अंतर्गत, सीएससी सहायक डिजिटल पहुँच केंद्र के रूप में कार्य करते हैं, जो ग्रामीण और दूरस्थ क्षेत्रों में अंतिम छोर तक सार्वजनिक सेवाओं की आपूर्ति करके डिजिटल विभाजन को पाटते हैं। 6.5 लाख से अधिक ग्रामीण स्तर के उद्यमियों द्वारा संचालित, सीएससी उन नागरिकों के लिए महत्वपूर्ण भौतिक–डिजिटल इंटरफेस का काम करते हैं जिनके पास उपकरण, विश्वसनीय कनेक्टिविटी या पर्याप्त डिजिटल साक्षरता नहीं है। इससे आवश्यक ऑनलाइन सेवाओं तक समावेशी पहुंच सुनिश्चित होती है। गाँव स्तर की संस्थाओं—जैसे सहकारी समितियों—में डिजिटल प्लेटफॉर्म को एकीकृत करके सीएससी पहुँच संबंधी बाधाओं को व्यवस्थित रूप से कम करते हैं, वित्तीय समावेशन को बढ़ाते हैं और डिजिटल सशक्त जीवनयापन के अवसर उत्पन्न करते हैं और इस प्रकार कनेक्टिविटी को बुनियादी स्तर पर ठोस सामाजिक और आर्थिक सशक्तीकरण में बदलते हैं।
| ग्रामीण आर्थिक एकीकरण को सक्षम बनाता डिजिटल समावेशनजनवरी 2026 तक, 23 राज्यों और 4 केंद्र शासित प्रदेशों में 1.79 करोड़ किसान और 1,522 मंडियां राष्ट्रीय कृषि बाजार (ई-एनएएम) के अंतर्गत डिजिटल रूप से जुड़े हुए हैं। वर्ष 2024–25 में इसने 2.04 करोड़ मीट्रिक टन से अधिक की लेन-देन मात्रा दर्ज की, जिससे मूल्य निर्धारण और बाज़ार तक पहुंच में सुधार हुआ।दीनदयाल अंत्योदय योजना–राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन (डीएवाई-एनआरएलएम) के तहत 1.49 लाख बैंकिंग कॉरस्पोंडेंट (बीसी सखी) और महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम (एमजीएनआरईजीए) के तहत 99% इलेक्ट्रॉनिक वेतन भुगतान आय का सीधा प्रवाह सुनिश्चित करते हैं।प्रधानमंत्री आवास योजना–ग्रामीण (पीएमएवाई–जी) और राष्ट्रीय सामाजिक सहायता कार्यक्रम (एनएसएपी) जैसे कार्यक्रम पारदर्शी और समयोचित लाभ प्रदायगी के लिए डिजिटल प्लेटफॉर्म का उपयोग करते हैं। |
पीएम–वाणी: भारत के लिए किफ़ायती वाई-फाई
पीएम–वाणी (प्रधानमंत्री वाई-फाई एक्सेस नेटवर्क इंटरफेस) दिसंबर 2020 में लॉन्च किया गया था और इसका उद्देश्य सस्ती और हाई-स्पीड सार्वजनिक इंटरनेट कनेक्टिविटी, विशेष रूप से ग्रामीण और दूरदराज के क्षेत्रों में, प्रदान करना है। यह योजना सार्वजनिक डेटा ऑफिस (पीडीओ) के माध्यम से विकेंद्रीकृत, लाइसेंस-मुक्त सार्वजनिक वाई-फाई मॉडल को प्रोत्साहित करती है, स्थानीय उद्यमिता को बढ़ावा देती है और ब्रॉडबैंड पहुँच का विस्तार करती है। फरवरी 2026 तक, पूरे देश में 4,09,111 वाई-फाई हॉटस्पॉट तैनात किए जा चुके हैं, जिनका समर्थन 207 पीडीओ एग्रीगेटर और 113 ऐप प्रदाता कर रहे हैं। स्थानीय रूप से संचालित वाई-फाई एक्सेस पॉइंट के माध्यम से कम लागत वाले इंटरनेट एक्सेस को सक्षम बनाकर, पीएम–वाणी डिजिटल विभाजन को पाटने और भारत की डिजिटल अर्थव्यवस्था में समावेशी भागीदारी सुनिश्चित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। अंतिम छोर तक पहुंच, साक्षरता कार्यक्रमों और सस्ते इंटरनेट को बाज़ार और सामाजिक योजनाओं से जोड़ने वाले प्लेटफॉर्म के साथ एकीकृत करने से ग्रामीण आजीविका सुदृढ़ होती है, समय पर लाभ प्रदायगी सुनिश्चित होती है और भारत की डिजिटल अर्थव्यवस्था में समावेशी भागीदारी को प्रोत्साहन मिलता है।
भविष्य-उन्मुख भारत के लिए डिजिटल कौशल विकास
भारत सरकार डिजिटल समावेशन को केवल पहुँच तक सीमित रखने के बजाय, उन्नत क्षमता विकास में बदल रही है, जिससे सभी नागरिकों के लिए समान अवसर सुनिश्चित होते हैं। समेकित कौशल विकास, नवाचार और उद्यमिता पहलों के माध्यम से, भारत अपने युवा वर्ग को नवाचार करने, रोजगार सृजित करने और शहरी तथा ग्रामीण भारत में आर्थिक विकास को बढ़ावा देने में सक्षम बना रहा है।

अटल इनोवेशन मिशन (एआईएम) ने 722 जिलों में 10,000 से अधिक अटल टिंकरिंग लैब्स (एटीएल) स्थापित की हैं, जिनसे 1.1 करोड़ छात्र जुड़े हैं, और दिसंबर 2025 तक 50,000 और एटीएल स्थापित करने की योजना बनाई जा चुकी है। छात्रों ने 16 लाख से अधिक नवाचार परियोजनाएँ विकसित की हैं, जिससे उन्हें रोबोटिक्स, एआई तथा आईओटी (इंटरनेट ऑफ़ थिंग्स) में व्यावहारिक अनुभव प्राप्त हुआ है और एक तकनीकी दृष्टि से प्रवीण पीढ़ी के लिए आधार तैयार हुआ है।
फ्यूचरस्किल्स प्राइम, जिसे इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय और नासकॉम द्वारा संचालित किया जा रहा है, में 29 लाख उम्मीदवार पंजीकृत हैं। इनमें 17.9 लाख नामांकन और 7 लाख से अधिक यूनीक बैज होल्डर शामिल हैं, जिनमें 41% महिलाएँ हैं। यह कार्यक्रम, जिसे यूरोपीय आयोग की पैक्ट फॉर स्किल्स रिपोर्ट 2024 में वैश्विक स्तर पर तीसरा स्थान प्राप्त है, सीखने वालों को एआई, क्लाउड कंप्यूटिंग, साइबर सुरक्षा और डेटा एनालिटिक्स में उद्योग-संगत कौशल से युक्त बनाता है।
इंडिया एआई मिशन, ₹10,300 करोड़ के बजट के साथ, 38,000 जीपीयू परिचालित कर चुका है (साथ ही, और 20,000 नियोजित हैं) तथा ₹65/घंटे की रियायती दर पर कम्प्यूटिंग प्रदान करता है। इंडिया एआई कोष में 20 क्षेत्रों में 9,500+ डेटा सेट और 273 एआई मॉडल हैं, जो देशभर के स्टार्टअप, शोधकर्ताओं और नवोन्मेषकों को समर्थन प्रदान करते हैं।
स्टार्टअप इंडिया के तहत, मान्यता प्राप्त स्टार्टअप की संख्या वर्ष 2016 में 400 से बढ़कर वर्ष 2025 में 2 लाख से अधिक हो गई है, जिससे 21 लाख नौकरियाँ उत्पन्न हुई हैं। अब 50% स्टार्टअप्स टियर-II और टियर-III शहरों में संचालित हो रहे हैं, जिससे नवाचार का विकेंद्रीकरण होता है और स्थानीय आर्थिक विकास को बढ़ावा मिलता है। निधि (एनआईडीएचआई) कार्यक्रम और अटल इनक्यूबेशन सेंटर्स (एआईसी) प्रारंभिक चरण के उपक्रमों तथा समावेशी उद्यमिता का समर्थन करते हैं। हालिया विस्तार में 8 नए इंक्ल्यूसिव टीबीआई (आईटीबीआई) और 10 एंटरप्रेन्योर-इन-रेजिडेंस सेंटर्स शामिल हैं, जबकि 72 एआईसी ने 3,500+ स्टार्टअप्स को पोषित किया, 32,000+ नौकरियाँ सृजित कीं और 1,000+ महिला-प्रमुख उद्यमों को समर्थन दिया, जो 6,200+ मेंटर्स ऑफ चेंज द्वारा समर्थित थे।
कुल मिलाकर, ये शक्तिशाली पहलें यह प्रमाणित करती हैं कि भारत में डिजिटल समावेशन केवल उपकरण और डेटा तक सीमित नहीं है—यह क्षमताओं का विकास करने, अवसर सृजित करने और हर गाँव तथा नगर तक विकास पहुँचाने से संबंधित है। कनेक्टिविटी को कौशल विकास, प्लेटफॉर्म और स्टार्टअप समर्थन के साथ जोड़कर, भारत एक अटूट, समावेशी डिजिटल पारिस्थितिकी तंत्र तैयार कर रहा है जो व्यापक प्रगति को गति देता है और देश को समान अवसरों पर आधारित नवाचार में वैश्विक प्रेरक शक्ति के रूप में स्थापित करता है।
निष्कर्ष
भारत के पिछले एक दशक के डिजिटल रूपांतरण ने प्रौद्योगिकी, शासन, शिक्षा और आर्थिक अवसरों तक पहुंच को बुनियादी तौर पर पुन: आकार कर दिया है। सार्वभौमिक संपर्क, सुदृढ़ डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर (डीपीआई) और उन्नत कंप्यूटिंग क्षमता के संयोजन के माध्यम से शहरी, ग्रामीण और दूरस्थ क्षेत्रों के नागरिक अब देश की डिजिटल अर्थव्यवस्था में भागीदारी करने के लिए बेहतर स्थिति में हैं। कॉमन सर्विस सेंटर (सीएससी), पीएमजीडीआईएसएचए, पीएम–वाणी जैसे कार्यक्रमों तथा अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति समुदायों और एसटीईएम में महिलाओं के लिए लक्षित पहलों ने कनेक्टिविटी को ठोस सामाजिक-आर्थिक परिणामों में परिवर्तित किया है, जिससे व्यक्तियों को सशक्त बनाने और स्थानीय नवाचार पारिस्थितिकी तंत्र को मजबूत करने में सहायता मिली है।
समान रूप से महत्वपूर्ण है युवाओं, स्टार्टअप्स और डीप-टेक क्षेत्रों पर दिया गया ध्यान, जो यह सुनिश्चित करता है कि डिजिटल समावेशन केवल पहुंच तक सीमित न रहकर कौशल, उद्यमिता और उच्च मूल्य वाले रोजगार के लिए मार्ग भी तैयार करे। शिक्षा, कौशल विकास, नवाचार और उद्यमिता को विविध भौगोलिक क्षेत्रों में एकीकृत करते हुए भारत न केवल डिजिटल विभाजन को पाट रहा है, बल्कि समावेशी विकास, समान अवसरों और एक सुदृढ़ ज्ञान-आधारित अर्थव्यवस्था को भी बढ़ावा दे रहा है। यह बहु-स्तरीय दृष्टिकोण डिजिटल युग में सतत् सशक्तीकरण की बुनियाद रखता है, जिससे कोई भी नागरिक पीछे न छूटे।सं
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