पृथ्वी विज्ञान राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) डॉ. जितेंद्र सिंह ने आज राज्यसभा में लिखित उत्तर में बताया कि पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय के अधीन भारतीय मौसम विज्ञान विभाग ने युग्मित गतिशील जलवायु मॉडलों पर आधारित आधुनिक मल्टी-मॉडल एन्सेम्बल पूर्वानुमान पद्धति अपनाकर अपनी दीर्घकालिक पूर्वानुमान (एलआरएफ) प्रणाली को क्रमिक रूप से उन्नत बनाया है। मल्टी-मॉडल एन्सेम्बल प्रणाली कई जलवायु मॉडलों के पूर्वानुमान संयोजित करती है, जिससे व्यक्तिगत मॉडलों से जुड़ी अनिश्चितताएं कम हुई हैं और मौसम पूर्वानुमानों की विश्वसनीयता और सटीकता में सुधार हुआ है। इस पूर्वानुमान प्रणाली को अपनाने से मानसून पूर्वानुमानों की विश्वसनीयता में उल्लेखनीय सुधार आया है। 2021-2025 की अवधि में, प्रथम चरण के पूर्वानुमान की औसत त्रुटि दीर्घकालिक औसत का 3.1 प्रतिशत थी, जबकि द्वितीय चरण के पूर्वानुमान की औसत त्रुटि कम होकर दीर्घावधि औसत का 2.2 प्रतिशत रह गई। तुलनात्मक रूप से, 2016-2020 के दौरान औसत त्रुटि दीर्घकालिक औसत का 7.8 प्रतिशत थी। इस प्रकार, औसत निरपेक्ष त्रुटि दीर्घावधि औसत के 7.8 प्रतिशत से घटकर 2.2 प्रतिशत हो गई है, जो मल्टी-मॉडल एन्सेम्बल पूर्वानुमान प्रणाली को अपनाने और उसके परिचालन में सुधार के बाद मौसमी पूर्वानुमान प्रणाली की विश्वसनीयता और दक्षता में उल्लेखनीय वृद्धि को दर्शाती है। मल्टी-मॉडल एन्सेम्बल प्रणाली ने अल नीनो-दक्षिणी दोलन (प्राकृतिक जलवायु चक्र जो प्रशांत महासागर के पानी के तापमान और हवा के दबाव में होने वाले बदलाव को दिखाता है) और हिंद महासागर द्विध्रुव (हिंद महासागर के पश्चिमी और पूर्वी हिस्सों के बीच समुद्र की सतह के तापमान में होने वाला एक प्राकृतिक और अनियमित अंतर) जैसे बड़े पैमाने के जलवायु कारकों के बेहतर प्रतिनिधित्व द्वारा पूर्वानुमानों की स्थिरता को भी बढ़ाया है, जिससे मौसमी संबंधी मानसून पूर्वानुमान अधिक विश्वसनीय हो गए हैं।
वसंत ऋतु की पूर्वानुमान क्षमता में बाधा एक सुस्थापित वैज्ञानिक चुनौती है जिसमें फरवरी से मई के बीच अल-निनो या ला-निना जैसी समुद्री-वायुमंडलीय घटनाओं के सटीक आकलन की सटीकता काफी गिर जाती है और इस संक्रमण काल में मौसम मॉडल की क्षमता कमजोर हो जाती है। यह भारतीय ग्रीष्मकालीन मानसून को काफी हद तक प्रभावित करता है। मौसम विभाग महासागरीय और वायुमंडलीय मापदंडों की निरंतर निगरानी और मानसून मिशन युग्मित पूर्वानुमान प्रणाली तथा अन्य प्रमुख अंतरराष्ट्रीय जलवायु केंद्रों से प्राप्त पूर्वानुमानों के उपयोग से इस चुनौती का समाधान करता है। इन जानकारियों का उपयोग दीर्घकालिक मानसून पूर्वानुमानों की सटीकता और विश्वसनीयता में सुधार के लिए किया जाता है।
वसंत ऋतु की पूर्वानुमान क्षमता में बाधा- स्प्रिंग प्रेडिक्टेबिलिटी बैरियर से जुड़ी पूर्वानुमान संबंधी अनिश्चितताओं को प्रभावी ढंग से दूर करने के लिए, मौसम विभाग दक्षिण-पश्चिम मानसून ऋतु (जून-सितंबर) के लिए दो-चरणीय पूर्वानुमान रणनीति का पालन करता है। पहले चरण का पूर्वानुमान अप्रैल में जारी किया जाता है, जिसके बाद मई में दूसरे चरण का नवीनतम पूर्वानुमान जारी किया जाता है। इसके बाद, जून, जुलाई, अगस्त और सितंबर के लिए मासिक पूर्वानुमान जारी किए जाते हैं, साथ ही मौसमी वर्षा पूर्वानुमान भी अद्यतन किए जाते हैं। इसके अलावा मानसून ऋतु के दूसरे भाग (अगस्त-सितंबर) के लिए अद्यतन पूर्वानुमान जुलाई के अंत में जारी किया जाता है, जिसमें नवीनतम समुद्री और वायुमंडलीय स्थितियों और मॉडल मार्गदर्शन भी शामिल होते हैं। यह अनुक्रमिक पूर्वानुमान रणनीति मौसम विभाग को मानसून ऋतु के आने और विकसित होने के साथ-साथ पूर्वानुमान की सटीकता में लगातार सुधार में सक्षम बनाती है।
सरकार ने देश में, विशेष रूप से पहाड़ी और तटीय क्षेत्रों में, मानसून के दीर्घकालिक पूर्वानुमान और मौसम संबंधी चरम घटनाओं का पूर्वानुमान और बेहतर बनाने के लिए कई उपाय किए हैं। जो निम्नलिखित हैं:
- परिचालन संबंधी दीर्घकालिक पूर्वानुमान के लिए उन्नत मल्टी-मॉडल एन्सेम्बल और युग्मित गतिशील जलवायु मॉडल अपनाना।
- बेहतर मॉडल भौतिकी, उच्च स्थानिक संकल्प, उन्नत डेटा आत्मसात्करण तकनीकों और उन्नत कम्प्यूटेशनल क्षमताओं द्वारा समर्थित संख्यात्मक मौसम पूर्वानुमान मॉडलों का निरंतर उन्नयन, एमओईएस के भीतर नए उच्च-प्रदर्शन कंप्यूटिंग सिस्टमों का संवर्धन, और कृत्रिम बुद्धिमत्ता/मशीन लर्निंग-आधारित पूर्वानुमान उपकरण।
- अतिरिक्त डॉप्लर मौसम रडार, स्वचालित मौसम स्टेशन, स्वचालित वर्षामापी, ऊपरी वायु अवलोकन प्रणाली, पवन प्रोफाइलर और अन्य अवलोकन प्लेटफार्मों की स्थापना द्वारा राष्ट्रीय मौसम विज्ञान अवलोकन नेटवर्क सुद़ृढ़ बनाना।
- स्वदेशी मौसम विज्ञान उपग्रहों द्वारा उपग्रह-आधारित प्रेक्षणों का विस्तार और मौसम पूर्वानुमान की सटीकता में सुधार के लिए उपग्रह, मौसम रडार और मौके पर किए गए प्रेक्षणों के डेटा को संख्यात्मक मॉडलों में एकीकृत करना।
- भारी वर्षा, आंधी-तूफान, वज्रपात, लू, शीत लहर, चक्रवात और घने कोहरे सहित चरम मौसम संबंधी घटनाओं के लिए प्रभाव-आधारित पूर्वानुमान और बहु-खतरा प्रारंभिक चेतावनी प्रणाली का विकास।
- केंद्र और राज्य सरकारों की एजेंसियों के तालमेल से मोबाइल एप्लिकेशन, एपीआई, वेब पोर्टल, एसएमएस, टेलीविजन, रेडियो और सोशल मीडिया सहित विभिन्न संचार प्लेटफार्मों द्वारा मौसम पूर्वानुमान और चेतावनियों का प्रसार।
- मौसम मिशन कार्यक्रम के अंतर्गत अवलोकन प्रणालियों के आधुनिकीकरण और उन्नत पृथ्वी प्रणाली मॉडलिंग द्वारा क्षमतावर्धन।
ये सभी उपाय देशभर में कार्यान्वित होने से सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेश लाभान्वित हो रहे हैं।
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