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विषय: मानव-जनित भूमि क्षरण के कारण कृषि उपज में हानि

2271. डा. मेधा विश्राम कुलकर्णीः

      श्री बाबूभाई जेसंगभाई देसाईः

क्या कृषि एवं किसान कल्याण मंत्री यह बताने की कृपा करेंगे कि:

(क) क्या सरकार ने ऐसी रिपोर्टों की ओर ध्यान दिया है जिनमें यह संकेत दिया गया है कि भारत उन देशों में शामिल है, जहाँ मानव-जनित भूमि क्षरण के कारण कृषि उपज में सर्वाधिक हानि हो रही है, यदि हाँ, तो तत्संबंधी ब्यौरा क्या है;

(ख) महाराष्ट्र सहित देश में भूमि क्षरण से प्रभावित कृषि भूमि का राज्य-वार क्षेत्रफल कितना है;

(ग) क्या भूमि क्षरण के फसल उत्पादकता, कृषक आय और खाद्य सुरक्षा पर पड़ने वाले प्रभाव के संबंध में कोई आकलन किया गया है; और

(घ) उपज में हुई हानि को कम करने तथा कृषि उत्पादकता में सुधार लाने के लिए मृदा स्वास्थ्य पुनर्स्थापन, संधारणीय भूमि प्रबंधन, जल संरक्षण तथा जलवायु अनुकूल कृषि को बढ़ावा देने हेतु केंद्र सरकार द्वारा क्या उपाय किए गए हैं?

उत्तर

कृषि एवं किसान कल्याण राज्य मंत्री (श्री रामनाथ ठाकुर)

(क) से (घ): सरकार ने क्षरण से प्रभावित कृषि भूमि और फसल उत्पादकता पर इसके प्रभाव का कोई आकलन नहीं किया है। हालाँकि, अंतरिक्ष अनुप्रयोग केंद्र (इसरो) द्वारा प्रकाशित भारत के मरुस्थलीकरण और भूमि क्षरण एटलस (2021) के अनुसार, वर्ष 2018-19 तक देश में 6.38 लाख हेक्टेयर मरुस्थलीकृत और भूमि क्षरित क्षेत्र मानव जनित है। महाराष्ट्र सहित राज्यवार विवरण अनुबंध में दिया गया है। कृषि उत्पादकता में सुधार के लिए मिट्टी की उर्वरता बहाल करने, सतत भूमि प्रबंधन, जल संरक्षण और जलवायु अनुकूल कृषि को बढ़ावा देने के लिए सरकार ने विभिन्न उपाय किए हैं, जो निम्नानुसार हैं:

  1. भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) ने सूचित किया है कि, मिट्टी की उर्वरता बहाल करने और सतत भूमि प्रबंधन को बढ़ावा देने के लिए, उन्होंने कंटूर कृषि, अंतरफसल, फसल चक्रण, संरक्षण कृषि, मल्चिंग, हरित खाद मैन्यूरींग, कम जुताई, कृषि वानिकी आदि जैसी स्थान-विशिष्ट प्रौद्योगिकियों को विकसित किया और इनकी सिफारिश की है। लवण प्रभावित मिट्टी के प्रबंधन हेतु, आईसीएआर जिप्सम अनुप्रयोग, बायो-ड्रेनेज, उपसतह जल निकासी, सॉल्ट-टॉलरेन्ट फसल किस्मों और बायो-पुनर्निर्माण उपायों सहित सॉल्ट-टॉलरेन्ट ग्रास की सिफारिश करता है। आईसीएआर ने सामान्य उर्वरक अनुशंसाएं (जीएफआर) और मृदा परीक्षण फसल प्रतिक्रिया (एसटीसीआर) आधारित अनुशंसाएं भी विकसित की हैं, जिन्हें मृदा परीक्षण आधारित संतुलित पोषक तत्वों के प्रयोग को बढ़ावा देने, मृदा उर्वरता में सुधार करने, मृदा जैविक कार्बन बढ़ाने और पोषक तत्वों के उपयोग की दक्षता बढ़ाने के लिए राज्यों के साथ साझा किया गया है। जल संरक्षण के लिए, आईसीएआर बायो-इंजीनियरिंग उपायों, समोच्च और श्रेणीबद्ध बांधों, स्टोन बांधों, समोच्च और क्रमिक ट्रेंचों, बेंच टेरेस, चेक डैम और जल संचयन संरचनाओं जैसे कि खेत तालाब और सामुदायिक तालाबों के माध्यम से एकीकृत वाटरशेड प्रबंधन को बढ़ावा देता है।
  2. इसके अतिरिक्त, सरकार भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) के माध्यम से 651 जिलों में जलवायु अनुकूल कृषि में राष्ट्रीय नवाचार (एनआईसीआरए) परियोजना का कार्यान्वयन कर रही है जो कृषि पर जलवायु परिवर्तन के प्रभाव का अध्ययन करती है और जिला स्तर पर जलवायु परिवर्तन के कारण होने वाले जोखिम और संवेदनशीलता का आकलन करती है। जलवायु परिवर्तन के प्रति अतिसंवेदनशील जिले के रूप में पहचाने गए 310 जिलों में से, 201 को ‘उच्च’ जलवायु-संवेदनशील और 109 को ‘बहुत उच्च’ जलवायु-संवेदनशील के रूप में वर्गीकृत किया गया है। मौसम की असामान्य स्थिति से निपटने और स्थान-विशिष्ट जलवायु अनुकूल फसलों तथा किस्मों और प्रबंधन पद्धतियाँ की सिफारिश करने के लिए इन 651 जिलों के लिए जिला कृषि आकस्मिकता योजनाएं (डीएसीपी) भी तैयार की गई हैं। जलवायु परिवर्तनशीलता के प्रति अनुकूलता को बढ़ाने के लिए, धान गहनता प्रणाली (एसआरआई), एरोबिक राइस, डायरेक्ट-सीडेड राइस और इन-सीटू फसल अवशेष प्रबंधन सहित स्थान-विशिष्ट जलवायु-अनुकूल प्रौद्योगिकियों को किसानों द्वारा अपनाए जाने के लिए प्रदर्शित किया जा रहा है। एनआईसीआरए के तहत, 28 राज्यों/संघ राज्य क्षेत्रों के 151 अतिसंवेदनशील जिलों के 448 जलवायु अनुकूल गांवों में जलवायु अनुकूल प्रौद्योगिकियों का प्रदर्शन किया जा रहा है, जिसे किसानों के अनुकूलन को बढ़ाने और गुणवत्ता वाले बीजों की समय पर उपलब्धता सुनिश्चित करने के लिए ग्राम-स्तरीय बीज बैंकों और सामुदायिक नर्सरी को सहायता दी जा रही है। ग्राम जलवायु जोखिम प्रबंधन समितियों (वीसीआरएमसी) के माध्यम से छोटे और सीमांत किसानों को तकनीकी सहायता प्रदान की जाती है, जबकि कृषि प्रौद्योगिकी प्रबंधन एजेंसी (एटीएमए) के तहत प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं। इसके अलावा, आईसीएआर ने पिछले 10 वर्षों (वर्ष 2014-2024), के दौरान 2900 किस्में जारी की हैं जिनमें से 2661 किस्में एक या अधिक जैविक और/या अजैविक दबाव के प्रति सहनशील हैं।
  3. उपज के नुकसान की भरपाई करने और कृषि उत्पादकता में सुधार के लिए सतत और जलवायु अनुकूल कृषि पद्धतियों को बढ़ावा देने के लिए सरकार विभिन्न कार्यक्रमों को लागू कर रही है। प्रति बूंद अधिक फसल योजना सूक्ष्म सिंचाई प्रौद्योगिकियों अर्थात ड्रिप और स्प्रिंकलर सिंचाई प्रणालियों के माध्यम से खेत स्तर पर जल उपयोग दक्षता को बढ़ावा देने के लिए लागू की गई है। वर्षा सिंचित क्षेत्र विकास योजना को जलवायु परिवर्तन से जुड़े जोखिमों को कम करने और उत्पादकता बढ़ाने के लिए एकीकृत कृषि प्रणाली को बढ़ावा देने हेतु लागू किया गया है। सॉयल हेल्थ एण्ड फर्टिलिटी स्कीम उर्वरकों के विवेकपूर्ण उपयोग के माध्यम से एकीकृत पोषक तत्व प्रबंधन को बढ़ावा देने में राज्यों की सहायता करती है। सरकार परंपरागत कृषि विकास योजना के माध्यम से जैविक खेती और राष्ट्रीय प्राकृतिक खेती मिशन योजना के माध्यम से प्राकृतिक खेती को भी बढ़ावा दे रही है। दलहन आत्मनिर्भरता मिशन, राष्ट्रीय खाद्य तेल मिशन-तिलहन और राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा एवं पोषण मिशन फसल विविधीकरण को बढ़ावा देता है। एकीकृत बागवानी विकास मिशन , कृषि वानिकी और राष्ट्रीय बांस मिशन भी कृषि में जलवायु अनुकूलन को बढ़ावा देते हैं। इसके अलावा, प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना के साथ मौसम सूचकांक आधारित पुनर्गठित मौसम आधारित फसल बीमा योजना फसलों की हानि की स्थिति में एक व्यापक बीमा कवर प्रदान करती है, जिससे किसानों को प्राकृतिक आपदाओं और जलवायु से संबंधित जोखिमों के कारण होने वाले नुकसान की प्रतिपूर्ति करने में सहायता मिलती है।
  4. विकसित भारत – रोजगार गारंटी और आजीविका मिशन – ग्रामीण (वीबी-जी राम-जी) के तहत, प्राकृतिक संसाधन प्रबंधन (एनआरएम) कार्यों के माध्यम से जल संरक्षण गतिविधियों को प्राथमिकता दी जाती है। इन कार्यक्रमों  के तहत 318 अनुमत कार्यों में से 110 कार्य हैं जो जल सुरक्षा और संरक्षण में सुधार करते हैं। इसके अलावा, भूमि संसाधन विभाग (डीओएलआर) का वाटरशेड प्रबंधन (डब्ल्यूएम) प्रभाग देश भर में वर्षा सिंचित और निम्नीकृत भूमि के विकास के लिए प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना (डब्ल्यूडीसी-पीएमकेएसवाई) के वाटरशेड विकास घटक को लागू करता है। अन्य गतिविधियों के साथ-साथ, की गई गतिविधियों में रिज एरिया ट्रीट्मेन्ट , ड्रैनेज लाइन ट्रीट्मेन्ट, मृदा और नमी संरक्षण, वर्षा जल संचयन, नर्सरी निर्माण, चरागाह विकास और संपत्तिहीन व्यक्तियों के लिए आजीविका सहायता शामिल है। इन हस्तक्षेपों के माध्यम से, डब्ल्यूडीसी-पीएमकेएसवाई प्राकृतिक संसाधन प्रबंधन में सुधार करके और जलवायु परिवर्तन के प्रति किसानों के अनुकूलन को बढ़ाकर सतत विकास को बढ़ावा देता है।

जैविक और अजैविक दबाव से उत्पन्न चुनौतियों के बावजूद, कृषि क्षेत्र ने पिछले दशक में फसल उत्पादकता और समग्र कृषि उत्पादन में निरंतर वृद्धि दर्ज की है। खाद्यान्न उत्पादन वर्ष 2014-15 में 252.03 मिलियन टन से बढ़कर वर्ष  2024-25 में 357.73 मिलियन टन हो गया है, जबकि बागवानी उत्पादन वर्ष 2014-15 में 280.98 मिलियन टन से बढ़कर वर्ष 2024-25 में 370.73 मिलियन टन हो गया है, जो देश भर में कृषि उत्पादन के अनुकूलन और निरंतर विकास को दर्शाता है।

अनुबंध

मरुस्थलीकरण और भूमि क्षरण की राज्यवार स्थिति

क्र.संराज्य/संघ राज्य क्षेत्रभूमि क्षरण से प्रभावित कुल क्षेत्र (हेक्टेयर में)
1आंध्र प्रदेश2,378,042
2अरुणाचल प्रदेश200,683
3असम834,530
4बिहार746,586
5छत्तीसगढ2,306,531
6दिल्‍ली91,543
7गोवा194,877
8गुजरात10,248,057
9हरियाणा364,154
10हिमाचल प्रदेश2,400,300
11जम्मू और कश्मीर1,129,503
12झारखंड5,482,260
13कर्नाटक6,959,847
14केरल422,299
15लद्दाख7,111,968
16मध्य प्रदेश3,859,735
17महाराष्ट्र14,306,029
18मणिपुर612,566
19मेघालय557,576
20मिजोरम275,827
21नागालैंड828,943
22उड़ीसा5,359,014
23पंजाब167,989
24राजस्‍थान21,237,669
25सिक्किम84,610
26तमिलनाडु1,599,981
27तेलंगाना3,638,508
28त्रिपुरा447,378
29उत्तर प्रदेश1,549,608
30उत्तराखंड673,894
31पश्चिम बंगाल1,784,345
कुल97,854,851

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