राज्य सभा के संसद सदस्य प्रो. राम गोपाल यादव की अध्यक्षता में विभाग संबंधित स्वास्थ्य और परिवार कल्याण संबंधी संसदीय स्थायी समिति ने आज अर्थात् 7 अगस्त, 2026 को संसद की दोनों सभाओं के समक्ष स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय से संबंधित निम्नलिखित प्रतिवेदन प्रस्तुत किए:
- “उत्तर–पूर्व भारत में वैक्टर जनित रोगों का अध्ययन” विषय के संबंध में 175वां प्रतिवेदन;
- “सार्वजनिक और निजी क्षेत्रों में स्वास्थ्य सुविधाओं की किफायती और सुलभ उपलब्धता” विषय के संबंध में 176वां प्रतिवेदन; और
- “भारत में गुर्दे संबंधी चिरकालिक रोग की व्यापकता – रोकथाम, निदान, उपचार और प्रबंधन” विषय के संबंध में 177वां प्रतिवेदन।
2. 175वां प्रतिवेदन 7 अगस्त, 2026 को राज्य सभा में प्रस्तुत किया गया और लोक सभा के पटल पर रखा गया। समिति ने प्रतिवेदन में कुल 29 सिफारिशें की हैं, जिनमें अन्य बातों के साथ-साथ रोग की निगरानी को सुदृढ़ करने, सार्वजनिक स्वास्थ्य अवसंरचना में सुधार करने, अनुसंधान और नवाचार को बढ़ावा देने, ‘एक स्वास्थ्य’ दृष्टिकोण को बढ़ावा देने और देश में, विशेष रूप से उत्तर-पूर्वी क्षेत्र में, वेक्टर जनित रोगों की प्रभावी रोकथाम, नियंत्रण और अंततः उन्मूलन सुनिश्चित करने के उद्देश्य से कई सिफारिशें शामिल हैं।
3. 176वां प्रतिवेदन 7 अगस्त, 2026 को राज्य सभा में प्रस्तुत किया गया और लोक सभा के पटल पर रखा गया। समिति ने प्रतिवेदन में कुल 368 सिफारिशें की हैं। प्रमुख सिफारिशों में सभी निजी अस्पतालों में आवश्यक उपचारों, निदान और नियमित प्रक्रियाओं की लागत को मानकीकृत और सीमित करने के लिए एक तंत्र का तत्काल गठन, सभी जिला अस्पतालों, सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों और सरकारी योजनाओं के तहत सूचीबद्ध बड़े निजी अस्पतालों के परिसर में जन औषधि केंद्र स्थापित करना, सरकार और निजी क्षेत्र के सहयोगात्मक प्रयास से एक सुव्यवस्थित, स्वैच्छिक और अंशदायी बीमा मॉडल की शुरुआत करना और स्वास्थ्य सेवा क्षेत्र पर लागू जीएसटी ढांचे की व्यापक समीक्षा करना शामिल है। समिति ने आगे दिल्ली के उत्तरी बाहरी इलाके में एक अतिरिक्त, स्वतंत्र रूप से प्रशासित एम्स सुविधा या एक पूर्ण सुसज्जित सैटेलाइट केंद्र स्थापित करने की सिफारिश की, ताकि तृतीयक स्वास्थ्य सेवा के बोझ को कार्यनीतिक रूप से विकेंद्रीकृत किया जा सके और व्यापक क्षेत्र के लिए समान और समय पर चिकित्सा पहुंच सुनिश्चित की जा सके।
4. 177वां प्रतिवेदन 7 अगस्त, 2026 को राज्य सभा में प्रस्तुत किया गया और लोक सभा के पटल पर रखा गया। समिति ने प्रतिवेदन में कुल 66 सिफारिशें कीं। प्रमुख सिफारिशों में सफल एचआईवी/एड्स कार्यक्रम की तर्ज पर एक समर्पित राष्ट्रीय क्रॉनिक किडनी डिजीज (सीकेडी) कार्यक्रम, व्यवस्थित रोग निगरानी और प्रबंधन के लिए एक राष्ट्रीय सीकेडी रजिस्ट्री की स्थापना, उच्च जोखिम वाले व्यक्तियों की जाँच को संस्थागत बनाना, जिसमें 20 वर्ष और उससे अधिक आयु के सभी व्यक्तियों के लिए अनिवार्य द्विवार्षिक किडनी जाँच शामिल है, राष्ट्रव्यापी सीकेडी जागरूकता अभियान, आयुष मंत्रालय के सहयोग से समुदाय-आधारित निवारक हस्तक्षेप और क्रॉनिक किडनी डिजीज ऑफ अननोन एटियलॉजी (सीकेडीयू) पर अनुसंधान को सुदृढ़ करना शामिल है। समिति ने डायलिसिस और किडनी प्रत्यारोपण सेवाओं के विस्तार, घर-पर ही पेरिटोनियल डायलिसिस को बढ़ावा देने, डिजिटल स्वास्थ्य प्रौद्योगिकियों को अपनाने, सीकेडी रोगियों के लिए अनिवार्य स्वास्थ्य बीमा कवरेज, विशेष किडनी देखभाल तक पहुंच में क्षेत्रीय असमानताओं को कम करने और एबी-पीएमजेएवाई के तहत सीकेडी रोगियों के लिए प्रत्यारोपण के बाद की देखभाल को मौजूदा 15 दिनों से बढ़ाकर एक वर्ष करने की भी सिफारिश की है।
5. तीनों प्रतिवेदनों पर विस्तृत सिफारिशें/समुक्तियाँ – एक नजर में नीचे दी गई हैं।
6. समिति द्वारा 6 अगस्त, 2026 को 175वें, 176वें और 177वें प्रतिवेदनों पर विचार किया गया और उन्हें स्वीकार किया।
7. प्रतिवेदन https://sansad.in/rs/committees/14?departmentally-related-standing-committees पर भी उपलब्ध हैं।
समिति की सिफारिशें/समुक्तियां – एक नजर में
(175वां प्रतिवेदन)
भारत में वेक्टर जनित रोग: परिभाषा, वितरण और प्रबंधन
1. समिति ने इस बात को ध्यान में रखा है कि भारत में वेक्टर जनित रोगों (वीबीडी) का बोझ लगातार बना हुआ है, जिनमें डेंगू से हाल के वर्षों में सैकड़ों मौतें हुई हैं, साथ ही मलेरिया, चिकनगुनिया और अन्य वीबीडी का प्रकोप विभिन्न कारकों से प्रभावित होता है। समिति समझती है कि वबीडी के कई निर्धारक हैं जिनमें पर्यावरणीय, सामाजिक–आर्थिक और अवसंरचनात्मक कारक शामिल हैं। इसलिए, वीबीडी के प्रसार को नियंत्रित और प्रबंधित करने के लिए रासायनिक, जैविक और पर्यावरणीय नियंत्रणों को मिलाकर एक एकीकृत दृष्टिकोण की आवश्यकता है। समिति का मानना है कि सरकार ने वीबीडी को नियंत्रित करने के लिए कई महत्वपूर्ण उपाय किए हैं, फिर भी इस क्षेत्र में नवाचार और सुधार की गुंजाइश हमेशा बनी रहती है। सरकार द्वारा प्रजनन स्थलों को नष्ट करने, नियमित सामुदायिक सफाई अभियान चलाने, फॉगिंग के माध्यम से वयस्कनाशक जैसे रासायनिक वेक्टर नियंत्रण का उपयोग करने आदि के उपाय सीमित प्रभाव डालते प्रतीत होते हैं। लेकिन लार्वाभक्षी मछलियों जैसे प्राकृतिक शिकारियों को बढ़ावा देने और बाँझ कीट तकनीकों जैसे जैविक नियंत्रण उपाय प्रभावी हैं और दीर्घकालिक सफलता का वादा करते हैं। समिति महसूस करती है कि यदि विभिन्न संबंधित मंत्रालयों/संगठनों को शामिल करते हुए एक सामान्य और समन्वित कार्य दृष्टिकोण अपनाया जाए और उसका पालन किया जाए, तो इन सभी प्रयासों से अधिक लाभ प्राप्त होगा। ऐसी समन्वित नीति/कार्यक्रम में निम्नलिखित बातों को भी ध्यान में रखा जाना चाहिए।प्रभावित राज्यों/जिलों में घटनाओं के विभिन्न स्तर अधूरी नीतियों और उनके कार्यान्वयन से केवल वेक्टर जनित रोगों (वीबीडी) फिर से उभरने लगेंगे, जिसके परिणामस्वरूप आर्थिक और स्वास्थ्य लागत में वृद्धि होगी। तदनुसार, समिति सिफारिश करती है कि सरकार को देश से प्रत्येक वेक्टर जनित रोग के चरणबद्ध उन्मूलन और पूर्ण उन्मूलन के लिए एक स्पष्ट समय-सीमा के साथ वेक्टर जनित रोगों के नियंत्रण और प्रबंधन के लिए मौजूदा ढांचे/रोडमैप को मजबूत करना चाहिए।
(पैरा 2.20)
2. समिति भारत में विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) द्वारा 1980 के दशक में विकसित एकीकृत वेक्टर प्रबंधन (आईवीएम) की अवधारणा के माध्यम से राष्ट्रीय वेक्टर जनित रोग नियंत्रण (एनवीबीडीसी) के प्रयासों को स्वीकार करती है, लेकिन ऐसा महसूस करती है कि सरकार को भारत में आईवीएम को नया रूप देना चाहिए। इस संबंध में, समिति सिफारिश करती है कि सरकार को भारत में आईवीएम को अधिक प्रभावी और उत्पादक तरीके से पुनर्व्यवस्थित करना चाहिए, जिसमें अंतःविषयक अनुसंधान नेटवर्क, मौजूदा दिशा–निर्देशों/नीतियों की नियमित समीक्षा और अद्यतन, नवीन क्षमता निर्माण कार्यक्रम, विस्तारित बुनियादी ढांचा, सर्वोत्तम परिपाटियों को साझा करने के लिए डिजिटल प्लेटफॉर्म, जागरूकता अभियान मंच के रूप में प्रामाणिक सोशल मीडिया का उपयोग और सामुदायिक भागीदारी को बढ़ावा देने, बच्चों, गर्भवती महिलाओं, बाहरी कामगारों और स्थानिक क्षेत्रों की यात्रा करने वाले यात्रियों जैसे उच्च जोखिम वाले समूहों पर अधिक ध्यान केंद्रित करने, इत्यादि जैसे पहलू शामिल हों।
(पैरा 2.21)
3. संक्रामक रोगों (वीबीडी) की रोकथाम और प्रबंधन के लिए टीकाकरण के संबंध में, समिति समझती है कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर, येलो फीवर, जापानी एन्सेफलाइटिस, टिक–जनित एन्सेफलाइटिस (टीबीई), चिकनगुनिया, डेंगू और मलेरिया के लिए टीकाकरण उपलब्ध है। जबकि भारत में, केवल जापानी एन्सेफलाइटिस के लिए टीकाकरण उपलब्ध है, जो सार्वभौमिक टीकाकरण कार्यक्रम के तहत निःशुल्क है। इन कमियों को दूर करने के लिए, समिति पुरजोर सिफारिश करती है कि भारत को विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) और अन्य प्रमुख संगठनों के साथ अंतरराष्ट्रीय सहयोग करना चाहिए और टीके का विकास करने के लिए वैश्विक विशेषज्ञता का लाभ उठाना चाहिए। इसके अलावा, सरकार को नैदानिक परीक्षण नेटवर्क की स्थापना के माध्यम से डेंगू और चिकनगुनिया के लिए स्वदेशी टीका विकासित करने के काम में तेजी लाने के प्रयासों को भी बढ़ावा देना चाहिए और जापानी एन्सेफलाइटिस (जीई) के टीकाकरण कवरेज का विस्तार करना चाहिए। समिति यह भी सिफारिश करती है कि मंत्रालय को टीके के तेजी से विकास के लिए एमआरएनए और वायरल वेक्टर प्रौद्योगिकियों, टीके की उपलब्धता और प्रभावकारिता बढ़ाने के लिए माइक्रो नीडल्स, नेज़ल स्प्रे, संवेदनशील और दुर्गम क्षेत्रों के लिए कोल्ड–चेन टीकाकरण आदि जैसे नए विचारों की और अधिक खोज करनी चाहिए, ताकि वीबीडी के टीकाकरण को सुदृढ़ बनाया जा सके।
(पैरा 2.22)
4. समिति को डेंगू के तीसरे और चौथे चरण, डेंगू हेमरेजिक फीवर और डेंगू शॉक सिंड्रोम जैसे संक्रामक रोगों की जटिल अवस्थाओं के उपचार के लिए परिभाषित प्रोटोकॉल के अभाव से भी अवगत कराया गया है। समिति भविष्य में नए संक्रामक रोगों के उभरने की आशंका को देखते हुए प्रभावी अनुसंधान की आवश्यकता को भी स्वीकार करती है। इस संबंध में, समिति सिफारिश करती है कि मंत्रालय को रोग–वार, विशेष रूप से संक्रामक रोगों की जटिल अवस्थाओं के लिए मानक उपचार प्रोटोकॉल विकसित करने को प्राथमिकता देनी चाहिए। समिति यह भी सिफारिश करती है कि भविष्य की तैयारियों के अंतर्गत वेक्टरों द्वारा प्रसारित नए रोगों और उनसे संबंधित जटिलताओं की पहचान करने के लिए आईसीएमआर के मार्गदर्शन में अनुसंधान किया जाए।
(पैरा 2.23)
उत्तर–पूर्वी भारत में वीबीडी के रुझान
5. समिति महसूस करती है कि उत्तर-पूर्वी राज्यों और पूरे देश को जनजातीय, ग्रामीण और शहरी आबादी में वेक्टर जनित रोगों की घटनाओं/दर को दर्शाने वाले विशिष्ट आंकड़े बनाए रखने चाहिए, जिससे इन क्षेत्रों में प्रभावी और टिकाऊ स्थानीय जन स्वास्थ्य नीति तैयार करने में मदद मिलेगी। भारत में वेक्टर जनित रोगों का प्रसार विभिन्न प्रकार के वेक्टरों, पारिस्थितिकी, सामाजिक–आर्थिक स्थितियों और स्वास्थ्य सेवा तक पहुंच आदि के कारण अत्यधिक विविध है। भारत के विविध भू-भाग में, समग्र आंकड़े जमीनी हकीकत को पूरी तरह से नहीं दर्शा सकते हैं और इससे एक ही तरीका सबके लिए उपयुक्त होने की धारणा विकसित हो सकती है। विशिष्ट आंकड़े अनुकूलित नियंत्रण और प्रबंधन कार्यनीतियों को तैयार करने, संसाधनों के कुशल आवंटन और प्राथमिकता निर्धारण में सहायक होंगे। यह शोध विषयों को प्राथमिकता देने, क्षमता निर्माण और नीति परिष्करण के लिए सहायक सामग्री के रूप में कार्य करेगा। यह डेटा धन के उचित आवंटन में भी सहायक होगा और ग्रामीण क्षेत्रों में आयुष्मान भारत स्वास्थ्य तथा प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों/कल्याण केंद्रों, शहरी स्वास्थ्य मिशनों और जनजातीय–वन क्षेत्रों में एक स्वास्थ्य दृष्टिकोण जैसे व्यापक कार्यक्रमों के साथ वेक्टर जनित रोगों के नियंत्रण को एकीकृत करने में मदद करेगा। तदनुसार, समिति जनजातीय, ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में वेक्टर जनित रोगों के प्रसार पर राष्ट्रीय और राज्य स्तर पर विशिष्ट आंकड़ों के रखरखाव और साझाकरण की सिफारिश करती है।
(पैरा 3.8)
उत्तर-पूर्वी क्षेत्र में वेक्टर जनित बीमारियों (वीबीडी) के प्रकोप में वृद्धि के प्रमुख निर्धारक
6. समिति समझती है कि उत्तर-पूर्वी क्षेत्र की अनूठी भू–जलवायु, पारिस्थितिक और सामाजिक–सांस्कृतिक परिस्थितियाँ कई क्षेत्रों में असाधारण रूप से उच्च संवेदनशीलता और बारहमासी संचरण को जन्म देती हैं, जो कि वेक्टर जनित रोगों (वीबीडी) के असमान ऐतिहासिक बोझ का कारण है। समिति पाती है कि इस क्षेत्र में वीबीडी के प्रसार के प्रमुख निर्धारकों में गर्म–आर्द्र परिस्थितियाँ, प्रचुर जल निकाय, वनों की कटाई और झूम खेती जैसी पर्यावरणीय और जलवायु परिस्थितियाँ और अनियोजित शहरीकरण शामिल हैं। वेक्टर जीव विज्ञान और पारिस्थितिक बदलाव जैसे कि कई प्रभावी एनोफेलेस प्रजातियाँ, कई कीटनाशकों के प्रति प्रतिरोधक क्षमता, काटने की उच्च दर, सूअर/पक्षियों का प्रसारक के रूप में कार्य करना भी निर्धारकों के रूप में कार्य करते हैं। इसके अलावा, सामाजिक–आर्थिक, जनसांख्यिकीय और पहुंच संबंधी निर्धारक भी हैं जैसे कि विविध स्वदेशी/आदिवासी आबादी, सीमा पार और आंतरिक प्रवासन जो परजीवी/वेक्टर की आवाजाही को सुगम बनाते हैं, स्वास्थ्य सेवाओं तक सीमित पहुंच, लक्षणहीन स्रोत आदि। व्यवहारिक और वृत्तिक कारकों में बाहरी आजीविका, प्रजनन स्थलों से निकटता और खराब अपशिष्ट प्रबंधन शामिल हैं। स्वास्थ्य प्रणाली और कार्यक्रम संबंधी कारकों में वित्त पोषण और मानव संसाधन की कमी, टीकाकरण कवरेज में कमी या निदान संबंधी चुनौतियाँ, खंडित निगरानी शामिल हैं। इन कारकों को ध्यान में रखते हुए, समिति का मानना है कि सरकार को उत्तर-पूर्वी क्षेत्र में वीबीडी के सुनिश्चित नियंत्रण और प्रबंधन के लिए एक क्षेत्र–विशिष्ट, एकीकृत, बहु–क्षेत्रीय कार्यनीति लागू करनी चाहिए। स्थानीय निर्धारकों की पारिस्थितिक–महामारी विज्ञान संबंधी समझ को ध्यान में रखते हुए, इस तरह के दृष्टिकोण का पालन और कार्यान्वयन किया जाना चाहिए, जिसमें लंबे समय तक चलने वाले कीटनाशक जालों/एलएलआईएन और आर्टेमिसिनिन–आधारित संयोजन उपचार (एसीटी) जैसे सिद्ध उपकरणों के सार्वभौमिक कवरेज को प्राथमिकता दी जाए, और लक्षणहीन कारकों का पता लगाने और जीआईएस हॉटस्पॉट मानचित्रण को शामिल करके निगरानी को सुदृढ़ किया जाए।
(पैरा 4.5)
7. समिति तदनुसार, जनजातीय संवेदनशीलता के अनुरूप नियमित सामुदायिक सहभागिता, सीमा पार और अंतर–राज्यीय समन्वय में सुधार, समर्पित निधि के साथ–साथ राष्ट्रीय वेक्टर जनित रोग नियंत्रण, राज्य सरकारों, चिकित्सा संस्थाओं, आईसीएमआर और स्वास्थ्य अनुसंधान विभाग (डीएचआर) के बीच अंतर–विषयक अनुसंधान सहयोग और बेहतर समन्वय की सिफारिश करती है ताकि अपनाई गई कार्यनीति का प्रभावी कार्यान्वयन हो सके। इसके अलावा, वीबीडी, उनके संचरण और निवारक उपायों के बारे में बेहतर जन जागरूकता अभियान साथ ही शिक्षा अभियान उच्च जोखिम वाली आबादी को लक्षित करने चाहिए, जिसमें वेक्टर के संपर्क को कम करने के लिए व्यवहारिक परिवर्तनों पर ध्यान केंद्रित करना महत्वपूर्ण है। समिति का मानना है कि उत्तर-पूर्वी क्षेत्र की विविधता के कारण एक सामान्य राष्ट्रीय मॉडल अपर्याप्त है, इसलिए भारत के उत्तर-पूर्वी क्षेत्र में वीबीडी के प्रभावी और परिणामोन्मुखी नियंत्रण और प्रबंधन के लिए एक क्षेत्र–विशिष्ट, एकीकृत, बहु–क्षेत्रीय वीबीडी कार्यनीति की सिफारिश करती है।
(पैरा 4.6)
उत्तर-पूर्वी क्षेत्र में केंद्र/राज्य सरकारों द्वारा वेक्टर जनित रोगों को नियंत्रित करने के लिए किए गए उपाय
8. समिति समझती है कि कीटनाशक प्रतिरोध, वेक्टर प्रबंधन से संबंधित प्रमुख चुनौतियों में से एक है। वेक्टर मच्छर प्रजातियों के कीटनाशक प्रतिरोध की राष्ट्रीय वेक्टर जनित रोग नियंत्रण द्वारा नियमित रूप से निगरानी की जाती है और तदनुसार कीटनाशक के उपयोग में बदलाव के लिए राज्यों को तकनीकी दिशानिर्देश जारी किए जाते हैं। आईसीएमआर द्वारा किए गए विभिन्न अध्ययनों में मलेरिया फैलाने वाले मच्छरों में डीडीटी प्रतिरोध की रिपोर्ट के बाद, डीडीटी का उपयोग बंद कर दिया गया है और अब सिंथेटिक पाइरेथ्रोइड्स और मैलाथियन का प्रयोग किया जा रहा है। समिति का मानना है कि कीटनाशकों के आंतरिक छिड़काव (आईआरएस) में बदलाव, अगली पीढ़ी के दीर्घकालिक कीटनाशक जालों (एलएलआईएन) (पीबीओ/द्वि–सक्रिय) का उपयोग, नियमित कीटनाशक संवेदनशीलता परीक्षण और पर्यावरण प्रबंधन एवं लार्वा नियंत्रण सहित कई उपायों को मिलाकर एकीकृत वेक्टर प्रबंधन (आईवीएम) को अपनाना कीटनाशक प्रतिरोध से निपटने के लिए अधिक प्रभावी उपाय हो सकते हैं। अतः, समिति दृढ़तापूर्वक सिफारिश करती है कि उक्त उपायों/कार्यनीतियों को आईवीएम दिशानिर्देशों का भाग बनाया जाए और विभिन्न मंचों के माध्यम से उत्तर-पूर्वी क्षेत्र की आबादी के बीच इनका व्यापक प्रचार–प्रसार किया जाए।
(पैरा 5.3)
9. समिति वीबीडी के लिए राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन के तहत प्रदान की जाने वाली निःशुल्क निदान और उपचार सेवाओं को स्वीकारते हुए, देश की जनसंख्या की विविधता और विस्तार, विशेष रूप से उत्तर-पूर्वी क्षेत्रों में, पर गहन विचार करने की आवश्यकता महसूस करती है। समिति ने पाया है कि उत्तर-पूर्वी क्षेत्रों में प्रयोगशाला और निदान संबंधी अवसंरचना के वितरण में अभी भी काफी अंतर है। समिति की राय में, सीमित प्रयोगशाला क्षमता और प्रसंस्करण समय वीबीडी मामलों की पुष्टि में देरी का कारण बनते हैं। तदनुसार, समिति उत्तर-पूर्वी राज्यों में पर्याप्त वीआरडीएल नेटवर्क के निर्माण/विस्तार की सिफारिश करती है। निदान परीक्षणों के संबंध में, समिति चाहती है कि मंत्रालय कम संसाधन वाले क्षेत्रों में उपयोग के लिए मल्टीप्लेक्स डायग्नोस्टिक प्लेटफॉर्म और प्वाइंट–ऑफ–केयर डायग्नोस्टिक परीक्षणों की संभावनाओं का पता लगाएं, जो त्वरित हो, किफायती हों और एक साथ कई वीबीडी का पता लगा सकें।
(पैरा 5.6)
10. मानव संसाधन की कमी, आपूर्ति प्रबंधन और समय पर रोग निगरानी, वीबीडी से संबंधित ये सभी चुनौतियाँ उत्तर-पूर्वी क्षेत्र के दूरस्थ क्षेत्रों को पेश आ रही हैं। समिति चाहती है कि रोग निगरानी प्रणाली को वास्तविक समय और तकनीक आधारित निगरानी के जरिए मजबूत किया जाए ताकि संक्रामक रोगों का समय रहते पता लगाया जा सके और उनका सही समय पर इलाज किया जा सके। समिति के संज्ञान में यह भी लाया गया है कि राष्ट्रीय वेक्टर जनित रोग नियंत्रण (एनवीबीडीसी) और राज्य स्वास्थ्य विभागों में संस्वीकृत पद या तो रिक्त हैं या गैर–विशेषज्ञों द्वारा भरे गए हैं। एनवीबीडीसी और राज्य स्वास्थ्य विभागों में कुशल और प्रशिक्षित मानव संसाधनों की कमी, वीबीडी नियंत्रण कार्यक्रमों के कार्यान्वयन में एक बड़ी बाधा साबित होती है, क्योंकि कुशल कीटविज्ञान विशेषज्ञों की अनुपस्थिति कीट विज्ञान संबंधी निगरानी, कीटनाशक प्रतिरोध निगरानी और डेटा–आधारित निर्णय लेने को प्रभावित करती है, जिससे साक्ष्य–आधारित वेक्टर नियंत्रण सीमित हो जाता है और प्रतिक्रियात्मक कार्यों में देरी होती है। तदनुसार, समिति सभी एनवीबीडीसी जिलों में योग्य कीटविज्ञान विशेषज्ञों की त्वरित भर्ती और नियुक्ति तथा हितधारकों के लिए प्रमुख संस्थानों के माध्यम से नियमित प्रमाण पत्र–आधारित क्षमता निर्माण कार्यक्रमों के आयोजन की सिफारिश करती है। क्षमता निर्माण और तकनीकी प्रमाणन के लिए उत्तर-पूर्वी क्षेत्रीय कीट विज्ञान प्रशिक्षण केंद्र की स्थापना की आवश्यकता को भी समिति के संज्ञान में लाया गया है, तदनुसार, समिति सिफारिश करती है कि मंत्रालय को उत्तर पूर्वी क्षेत्र में ऐसे प्रशिक्षण केंद्र की स्थापना की व्यवहार्यता पर सक्रिय रूप से विचार करना चाहिए।
(पैरा 5.7)
11. समिति यह स्वीकार करती है कि धान की खेती जैसी कृषि पद्धतियाँ और सुअर पालन मलेरिया और जेई संक्रमण के प्रसार के लिए अनुकूल परिस्थितियाँ उत्पन्न करती हैं। अधिकतर समय ऐसी कृषि पद्धतियों/पशुपालन में लगे लोग जलभराव, सुअर के गोबर के निपटान आदि से संबंधित स्वच्छता प्रोटोकॉल को नज़रअंदाज़ कर देते हैं। यह जागरूकता की कमी के कारण है जो उनके व्यवहार में परिलक्षित होता है। मंत्रालय ने प्रस्तुत किया है कि राष्ट्रीय वेक्टर जनित रोग नियंत्रण नियमित रूप से तकनीकी मार्गदर्शन और परामर्श प्रदान करती है, विशेष रूप से मानसून से पहले और बाद के मौसमों में, ताकि कृषि पद्धतियों/पशुपालन में इनका पालन किया जा सके। फिर भी, समिति यह सिफारिश करती है कि मंत्रालय को इंटरनेशनल वन हेल्थ सर्वोत्तम प्रथाओं के अनुसार पशु और मानव निगरानी, सुअर पालन विनियमन और ज़ोनिंग को बढ़ावा देना चाहिए। इसके अतिरिक्त, समिति मंत्रालय को ग्राम स्वास्थ्य समितियों के मार्गदर्शन में नियमित सामुदायिक जागरूकता अभियान चलाने की सिफारिश करती है, जिससे विद्यालयों और कार्यस्थलों को लक्षित करके व्यवहार में स्थायी परिवर्तन लाया जा सके।
(पैरा 5.9)
12. विभिन्न जनजातियों और उनके विश्वासों/आपसी संबंधों, जल स्रोतों के उपयोग आदि जैसी बहुआयामी सामाजिक–आर्थिक चुनौतियों को ध्यान में रखते हुए, समिति का मानना है कि राष्ट्रीय स्वास्थ्य प्रणाली और सार्वभौमिक टीकाकरण कार्यक्रमों में जनजातियों का विश्वास बढ़ाने के लिए घर–घर जाकर निगरानी और जागरूकता अभियान चलाने के लिए समन्वित प्रयास किए जाने चाहिए। ऐसे प्रयास मान्यता प्राप्त सामाजिक स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं (आशा) और सामुदायिक स्वास्थ्य अधिकारियों की सहायता से किए जाने चाहिए। समिति के अनुसार, सामाजिक कार्यों के लिए इस तरह का दृष्टिकोण और कार्यनीति निरंतर प्रयासों से ही फलदायी होगी। इसलिए, समिति सिफारिश करती है कि जमीनी स्तर पर काम करने वाले कार्यकर्ताओं की प्रतिबद्धता को प्रोत्साहित करने के लिए मंत्रालय को आशा कार्यकर्ताओं और सामुदायिक स्वास्थ्य अधिकारियों के वेतन की समय–समय पर समीक्षा और संशोधन करना चाहिए ताकि उनके द्वारा किये गए प्रयासों को प्रोत्साहन मिले। इस संबंध में समिति ने पाया है कि आदिवासी, पहाड़ी और रेगिस्तानी क्षेत्रों में आशा कार्यकर्ताओं की के राष्ट्रीय मानदंड (प्रति 1,000 जनसंख्या पर 1 आशा कार्यकर्ता) को शिथिल कर प्रति बस्ती एक आशा कार्यकर्ता कर दिया गया है। समिति चाहती है कि मंत्रालय उत्तर-पूर्वी क्षेत्र में नियुक्ति के इस मानदंड का सख्ती से पालन किया जाए। समिति सरकार से यह भी पुरजोर सिफारिश करती है कि वह आदिवासी और वन बस्तियों, चाय बागानों, औद्योगिक क्षेत्रों जैसे उच्च जोखिम वाले क्षेत्रों में लक्षित वेक्टर नियंत्रण उपाय जैसे बुखार का पता लगाने वाले शिविर, स्कूल–आधारित जागरूकता अभियान और नागरिक रिपोर्टिंग प्रणाली स्थापित करे।
(पैरा 5.12)
13. वीबीडी के सीमा पार संचरण के संबंध में, समिति का दृढ़ मत है कि उत्तर-पूर्वी क्षेत्र की भौगोलिक स्थिति, अंतरराष्ट्रीय सीमाओं के पार आवागमन और दूर-दूर स्थित बस्तियाँ वीबीडी के आयात को और बढ़ा देती हैं। समिति यह सुझाव देती है कि सीमा-पार वेक्टर रोग समन्वय मैकेनिज़्म के लिए पड़ोसी देशों (बांग्लादेश, भूटान और म्यांमार) के साथ निगरानी और सूचना साझा करने के लिए एक क्षेत्रीय समन्वय प्लेटफ़ॉर्म स्थापित किया जाए। सीमा जिलों में संक्रमण रिपोर्टिंग और वेक्टर-नियंत्रण रणनीतियों को सामंजस्यपूर्ण बनाएं। सीमा-पार वेक्टर जनित रोगों के संक्रमण के खिलाफ तैयारी को मजबूत करने की जरूरत है। इस समस्या के समाधान हेतु, समिति लार्वा आवासों और दुर्गम क्षेत्रों के मानचित्रण के लिए रिमोट सेंसिंग तकनीक के उपयोग के साथ–साथ नमो ड्रोन दीदी योजना, जो महिला स्वयं सहायता समूहों (एसएचजी) को भारी सब्सिडी वाले कृषि ड्रोन प्रदान करती है, के तहत ड्रोन की कैलिब्रेटेड सहायता से मोबाइल निगरानी की सिफारिश करती है। समिति मंत्रालय को ग्रेटर मेकांग उपक्षेत्र पहल जैसे वैश्विक मलेरिया उन्मूलन ढाँचों से पर्याप्त सबक लेने, सीमा पार जिला–दर–जिला डेटा साझाकरण को बढ़ाने और म्यांमार और बांग्लादेश सीमाओं के साथ सहयोगात्मक निगरानी करने की भी सिफारिश करती है ताकि वीबीडी के प्रसार को कम किया जा सके। इसके अतिरिक्त, समिति मंत्रालय को पड़ोसी देशों की स्वास्थ्य एजेंसियों के साथ मिलकर काम करने के लिए संयुक्त उपाय करने की सिफारिश करती है ताकि उत्तर-पूर्वी क्षेत्र में वीबीडी के प्रसार के विरूद्ध सहभागिता समूह के तहत संयुक्त कार्रवाई की संभावनाओं तलाशी जा सकें।
(पैरा 5.13)
14. समिति समुक्ति करती है कि हालांकि मजबूत एकीकृत वेक्टर प्रबंधन (आईवीएम) वीबीडी के लिए आधारशिला बना हुआ है, वीबीडी के आईवीएम को विभिन्न क्षेत्रों/राज्यों और विभिन्न स्तरों की घटनाओं, विशेष रूप से उत्तर-पूर्वी क्षेत्र (उत्तर-पूर्वी क्षेत्र) पर जोर देते हुए, को शामिल करते हुए व्यापक और संपूर्ण होना चाहिए। समिति के अनुसार, शहरी विस्तार, अनियोजित निर्माण, कचरे का संचय, दूरदराज के क्षेत्रों में स्वास्थ्य सुविधाओं की अनुपलब्धता, जागरूकता की कमी आदि उत्तर-पूर्वी क्षेत्र में वेक्टर जनित रोगों (वीबीडी) में वृद्धि के कारक हैं। इस संबंध में, समिति सिफारिश करती है कि उत्तर-पूर्वी क्षेत्र में एकीकृत वेक्टर प्रबंधन (आईवीएम) को विशेष रूप से तैयार किया जाना चाहिए और जलवायु–सूचित योजना के साथ–साथ अवसंरचना संबंधी सुधार जैसे बेहतर जल निकासी, स्थानीय निकायों द्वारा निर्माण स्थल और अपशिष्ट प्रबंधन से संबंधित नगरपालिका उपनियमों का का सख्त प्रवर्तन, आशा कार्यकर्ताओं, स्कूलों और डिजिटल प्लेटफार्मों के माध्यम से, विशेष रूप से स्थानीय भाषाओं में, साल भर चलने वाले मल्टीमीडिया जागरूकता कार्यक्रमों का शुभारंभ जैसे पहलुओं पर उचित बल दिया जाना चाहिए।
(पैरा 5.15)
15. इसके अलावा, समिति सिफारिश करती है कि दूरस्थ/आदिवासी गांवों के लिए मोबाइल स्वास्थ्य इकाइयों की पर्याप्त संख्या स्थापित की जाए और मानसून पूर्व मौसमी शिविरों लगाए जाए साथ ही उनका आवधिक मूल्यांकन किया जाए, मच्छरों के पनपने की जगहों की रिपोर्टिंग और वेक्टर घनत्व की निगरानी के लिए सिटिजन साइंस ऐप्स का उपयोग किया जाए, स्वास्थ्य कर्मियों/फील्ड एवं प्रयोगशाला कर्मचारियों के लिए नियमित पुनरावलोकन पाठ्यक्रम आयोजित हों, जिला प्रयोगशालाओं को सुदृढ़ बनाया जाए, कैडर आधारित कीट विज्ञान प्रणाली को संस्थागत रूप दिया जाए और उत्तर-पूर्वी क्षेत्र में त्वरित प्रतिक्रिया टीमों को आईवीएम का हिस्सा बनाया जाए। समिति चाहती है कि मंत्रालय एक विशिष्ट पोर्टल विकसित करे, जिसमें उत्तर-पूर्वी क्षेत्र की दिन–प्रतिदिन की गतिविधियों को दर्ज किया जाए और वीबीडी प्रबंधन, घटनाओं की रिपोर्टिंग आदि से संबंधित वास्तविक समय के साथ डेटा उपलब्ध कराया जाए, जो नागरिकों सहित सभी के लिए सुलभ हो।
(पैरा 5.16)
16. समिति ने पाया है कि उत्तर-पूर्वी विशेष अवसंरचना विकास योजना (एनईएसआईडीएस) मुख्य रूप से उत्तर-पूर्वी क्षेत्र में अवसंरचना और सामाजिक–आर्थिक विकास को समर्थन और गति प्रदान करती है। समिति का मानना है कि एनईएसआईडीएस को स्वास्थ्य संबंधी विकास परियोजनाओं के साथ–साथ उन परियोजनाओं पर भी ध्यान केंद्रित करना चाहिए जो वीबीडी हॉटस्पॉट में अवसंरचना संबंधी कमियों को दूर करने में सहायक हों। उत्तर-पूर्वी क्षेत्र में वीबीडी के नियंत्रण और प्रबंधन में एनईएसआईडीएस के दायरे का विस्तार करने से निदान सुविधाओं में सुधार और जलवायु–अनुकूल जल प्रबंधन आदि जैसी अवसंरचना संबंधी कमियों को दूर किया जा सकेगा। तदनुसार, समिति एनईएसआईडीएस के तहत एक समर्पित वीबीडी विंडो बनाने की सिफारिश करती है, जो उत्तर-पूर्वी क्षेत्र के उच्च–भार वाले क्षेत्रों में वेक्टर–प्रूफ आवास और निदान सुविधाओं जैसी एकीकृत विकास और अवसंरचना के लिए धन आवंटित करे। समिति का यह सुविचारित मत है कि जब तक उत्तर-पूर्वी क्षेत्र पर वीबीडी की घातक पकड़ को प्रभावी और निर्णायक रूप से समाधान नहीं किया जाता, तब तक इस क्षेत्र का समग्र आर्थिक और अवसंरचनात्मक विकास संभव नहीं है।
(पैरा 5.19)
17. उत्तर-पूर्वी क्षेत्र के विभिन्न राज्यों की प्रस्तुत की गई जानकारी को ध्यान में रखते हुए समिति का निष्कर्ष है कि इस क्षेत्र में वेक्टर जनित रोगों (वीबीडी) का निरंतर बने रहना पर्यावरणीय, सामाजिक–आर्थिक और अवसंरचनात्मक सहित कई सामान्य कारकों के मिश्रण से उत्पन्न होता है। इसके अलावा, कुछ अध्ययनों से राज्यवार कारक भी संकेतित होते हैं, जैसे असम और अरुणाचल प्रदेश में ऊंचाई और भूमि उपयोग से जुड़े मलेरिया हॉटस्पॉट, जलवायु परिवर्तन – जैसे मणिपुर के पहाड़ी क्षेत्रों में अधिकतम और न्यूनतम तापमान में वृद्धि, मिजोरम में झूम खेती, नागालैंड और त्रिपुरा जैसे राज्यों में कई बोलियों के कारण भाषा संबंधी बाधाएं, सिक्किम में जनसंख्या का आवागमन आदि, जो समस्या को और बढ़ा देते हैं। तदनुसार, समिति का मानना है कि उत्तर-पूर्वी क्षेत्र की अनूठी स्थलाकृति, जलवायु परिस्थितियों और सामाजिक–जनसांख्यिकीय विशेषताओं तथा राज्य की विशिष्टताओं को ध्यान में रखते हुए, वेक्टर जनित रोगों के नियंत्रण और उन्मूलन प्रयासों को मजबूत करने के लिए सूक्ष्म स्तर की उप–योजनाओं सहित क्षेत्र–विशिष्ट कार्य योजनाएं तैयार करने की आवश्यकता है।
(पैरा 5.44)
18. राज्य-विशिष्ट आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए, समिति सिफारिश करती है कि मंत्रालय यह सुनिश्चित करे कि राज्य के ‘राष्ट्रीय वेक्टर जनित रोग नियंत्रण कार्यक्रम’ की क्षेत्रीय समीक्षा बैठकें (आरआरएम) प्रत्येक तीन माह में आयोजित की जाएं, जिससे वेक्टर जनित रोगों (वीबीडी) पर नज़र रखने, निगरानी और मूल्यांकन जैसे पहलुओं पर प्रगति की निगरानी करना और पशु चिकित्सा, मत्स्य पालन और नगर निकायों जैसे विभागों के साथ अंतरक्षेत्रीय समन्वय को सुचारू रूप से संचालन किया जाए, ताकि उत्तर-पूर्वी क्षेत्र में वीबीडी के प्रकोप को नियंत्रित किया जा सके, विशेष रूप से उन समयों में जब इन रोगों का प्रसार अपने चरम पर होता है। इसके अलावा, आरआरएम को निर्धारित मानकों की तुलना में पिछली तिमाही में हुई प्रगति का ठोस मूल्यांकन करना चाहिए और तदनुसार, अगली तिमाही के लक्ष्यों की समीक्षा और निर्धारण करना चाहिए। लक्ष्यों को प्राप्त करने की जिम्मेदारियों को भी स्पष्ट रूप से परिभाषित किया जाना चाहिए ताकि उपलब्धियों और कमियों का वस्तुनिष्ठ रूप से आकलन किया जा सके और आवश्यक सुधार किए जा सकें।
(पैरा 5.45)
19. समिति मंत्रालय से इसके उपयोग की पुष्टि करने का भी आग्रह करती है कि उपचार अनुपालन सुनिश्चित करने के लिए बहुउद्देशीय स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं (एमपीडब्ल्यू) और आशा कार्यकर्ताओं द्वारा ‘दैनिक उपचार निगरानी प्रपत्रों’ का उपयोग किया जाता है। इसके अलावा, समिति सिफारिश करती है कि अनुसंधान उद्देश्यों के लिए सुगम पहुंच और विश्लेषण हेतु दैनिक उपचार निगरानी प्रपत्रों के माध्यम से एकत्रित डेटा को डिजिटाइज़ किया जाना चाहिए। पूर्ण उपचार प्रमाणित करने के लिए, समिति चाहती है कि मंत्रालय सार्वजनिक–निजी भागीदारी (पीपीपी) दृष्टिकोण को भी मजबूत करे, जिसके तहत सभी निदानित मलेरिया रोगियों की निगरानी करते हुए निजी अस्पतालों और प्रयोगशालाओं को मलेरिया–रोधी दवाएं उपलब्ध कराई जाएं।
(पैरा 5.46)
20. समिति समझती है कि कीट विज्ञान के क्षेत्र में, अपर्याप्त मच्छर नमूनों के कारण मंत्रालय 2019 और 2024 के बीच व्यापक वेक्टर प्रतिरोध अध्ययन नहीं कर सका, क्योंकि 2023 में एनोफेलेस फिलिपिनेंसिस पर किए गए संवेदनशीलता परीक्षणों में डीडीटी और मैलाथियन दोनों के प्रति 100% मृत्यु दर देखी गई। इस संबंध में, समिति का मत है कि मंत्रालय को अपर्याप्त मच्छर नमूनों जैसे कारणों से ऐसे अध्ययनों को स्थगित नहीं करना चाहिए और ऐसे अध्ययनों को करने के लिए प्रयोगशालाओं या भंडारों में पहले से संग्रहीत नमूनों का उपयोग करके संग्रहीत नमूना आनुवंशिक स्क्रीनिंग, पूल–सीक्वेंसिंग आदि जैसी तकनीकों पर विचार करना चाहिए। इसके अलावा, समिति यह भी चाहती है कि मंत्रालय स्थापित डब्ल्यूएचओ प्रोटोकॉल के अनुसार नमूना प्रयोजन के लिए वैक्टर के नियंत्रित पालन की व्यवहार्यता का पता लगाए। तदनुसार, समिति सिफारिश करती है कि मंत्रालय को वेक्टर प्रतिरोध अध्ययन करने के लिए नई तकनीकों और उपायों को अपनाना चाहिए जो संक्रामक रोगों के खिलाफ भविष्य की तैयारी सहायक होंगे।
(पैरा 5.47)
21. इसके अलावा, समिति को संबंधित क्षेत्र के विशेषज्ञों से यह जानकारी मिली है कि वेक्टर जनित रोगों को नियंत्रित करने/कम करने के लिए सूक्ष्म और व्यापक स्तर पर कुछ राज्य–विशिष्ट कदम/प्रबंधन अपनाए जा सकते हैं, जैसे मिजोरम और त्रिपुरा में सार्वभौमिक एलएलआईएन कवरेज, म्यांमार और बांग्लादेश की सीमाओं पर सीमा पार स्क्रीनिंग और निगरानी को मजबूत करना, गुवाहाटी, अगरतला, कोहिमा और आइजोल के लिए शहर–विशिष्ट कार्य योजनाओं का विकास करना जिसमें साप्ताहिक कंटेनर निगरानी, निर्माण स्थलों पर अनुपालन प्रवर्तन और उच्च जोखिम वाले वार्डों में दीर्घकालिक लार्वानाशकों का उपयोग, असम और आसपास के जिलों में व्यापक जेई टीकाकरण कवरेज, जहां भी संभव हो, मानव आवासों से सुअर–बाड़ों की कम से कम 500 मीटर की दूरी सुनिश्चित करना और बस्तियों के पास रात्रि विश्राम करने वाले पक्षियों के आवासों का प्रबंधन करना, लंबित एमडीए/आईडीए कार्यों को पूरा करना, कवरेज अंतराल को दूर करना और असम के स्थानिक जिलों में पात्रता के अनुसार लिम्फैटिक फाइलेरियासिस के लिए प्री–टीएएस/टीएएस का संचालन करना आदि। तदनुसार, समिति पुरज़ोर सिफारिश करती है कि मंत्रालय को उत्तर-पूर्वी क्षेत्र में वीबीडी की चुनौतियों का समाधान करने के लिए संबंधित क्षेत्र के विशेषज्ञों द्वारा सुझाए गए इन उपायों पर कार्रवाई करनी चाहिए।
(पैरा 5.48)
वेक्टर जनित रोगों के संबंध में भारत में और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर किए गए शोध
22. समिति का मानना है कि ज़ूनोटिक वेक्टर जनित रोग अनुसंधान एवं प्रशिक्षण केंद्र (ज़ेडवीबीडीसी) का उद्देश्य उत्तर-पूर्वी क्षेत्र में प्रमुख ज़ूनोटिक और वेक्टर जनित रोगों की समझ को बेहतर बनाने और एकीकृत अनुसंधान को बढ़ावा देने के लिए जन स्वास्थ्य, नैदानिक चिकित्सा, पशु चिकित्सा विज्ञान, प्रयोगशाला विधियों और सामाजिक विज्ञान के विशेषज्ञों को एक साथ लाना है। ऐसे संस्थान के उद्देश्य की प्रासंगिकता को ध्यान में रखते हुए, समिति पुरज़ोर सिफारिश करती है कि सरकार सहयोगी अनुदानों या मूल अनुदान के विस्तार के माध्यम से संस्थान को वित्तीय सहायता जारी रखे और यहां तक कि बढ़ी हुई वित्तीय सहायता के माध्यम से केंद्र के कामकाज को बढ़ाने पर भी विचार करे। समिति का मानना है कि मंत्रालय को अनुदान प्रावधान के आगे विस्तार से पहले दिए गए अनुदानों के प्रभावी उपयोग की वार्षिक समीक्षा/लेखापरीक्षा अवश्य करनी चाहिए। समिति का दृढ़ मत है कि बजट की कमी से नवाचार और वैज्ञानिक अनुसंधान एवं विकास सीमित नहीं होना चाहिए, और इसलिए ऐसे परियोजनाओं के वित्तपोषण में निजी क्षेत्र की भागीदारी का पता लगाया जाना चाहिए। समिति सिफारिश करती है कि मंत्रालय को अनुसंधान एवं विकास में पीपीपी निवेश को उच्च प्राथमिकता पर देखना चाहिए। वित्तीय पहलू के अलावा, समिति यह सिफारिश करती है कि ज़ेडवीबीडीसी को वेक्टर और रोगजनकों की जीनोमिक निगरानी पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए, क्योंकि कीटनाशक प्रतिरोध और नए स्ट्रेन के उभरने के लिए वेक्टर आनुवंशिकी और वायरस विकास पर वास्तविक समय के डेटा की आवश्यकता होती है। इसके अलावा, समिति आईसीएमआर, आईसीएआर आदि जैसे विभिन्न केंद्रीय संस्थानों और ज़ेडवीबीडीसी, पशु चिकित्सा विभाग आदि जैसी राज्य मशीनरी के माध्यम से जुड़े ‘वीबीडी हेतु राष्ट्रीय वन हेल्थ प्लेटफॉर्म’ विकसित करने की सिफारिश करती है। इससे विभिन्न स्थानों पर अलग-अलग एजेंसियों द्वारा किए जा रहे वेक्टर नियंत्रण उपायों से संबंधित डेटा और अन्य वास्तविक समय की जानकारी साझा करना संभव होगा।
(पैरा 6.8)
23. इस विषय पर अपनी जांच के दौरान समिति ने पाया कि उत्तर-पूर्वी क्षेत्र में वेक्टर जनित रोगों (वीबीडी) के नियंत्रण और प्रबंधन में डेटा संग्रह और निगरानी एक प्रमुख चुनौती है। समिति एकीकृत स्वास्थ्य सूचना मंच (आईएचआईपी) के शुभारंभ के माध्यम से सरकार द्वारा किए गए कार्यों की सराहना करती है, जो वास्तविक समय में मामलों पर आधारित निगरानी, वेक्टर सूचकांकों की मैपिंग और “बुखार और वेक्टर घनत्व” के रुझानों पर साप्ताहिक विश्लेषण को सक्षम बनाता है। इस संबंध में, समिति उत्तर-पूर्वी क्षेत्र में दिन–प्रतिदिन की गतिविधियों को कवर करने वाले या प्रत्येक मानसून के मौसम से पहले और बाद में वीबीडी प्रबंधन से संबंधित वास्तविक समय के आंकड़ों के आधार पर उत्तर-पूर्वी क्षेत्र में साक्ष्य–आधारित योजना को सुविधाजनक बनाने के लिए एक उत्तर-पूर्वी वेक्टर निगरानी बुलेटिन प्रकाशित करने हेतु एक विशेष पोर्टल की सिफारिश करती है। समिति का मानना है कि सरकार को आईएचआईपी के माध्यम से निदान पैनलों और इलेक्ट्रॉनिक रिपोर्टिंग को उन्नत करना चाहिए। अप्रभावी प्रतिक्रिया तंत्र एक अन्य कारक है जो नियमित रिपोर्टिंग में बाधा डालता है, जिससे अनजाने हॉटस्पॉट बनते हैं। तदनुसार, समिति उपयोगकर्ता के अनुकूल मोबाइल ऐप और हेल्पलाइन की सिफारिश करती है, जिन्हें स्थानीय भाषाओं में संप्रेषित किया जाना चाहिए, जिसमें पावती और अनुवर्ती प्रोटोकॉल शामिल हों, एसएमएस अपडेट के साथ दो–तरफा संचार प्रणाली सुनिश्चित की जाए और प्रत्येक समाधान का दस्तावेजीकरण किया जाए, आदि।
(पैरा 6.10)
24. समिति का दृढ़ मत है कि डेटा का विश्लेषण उसके संग्रहण जितना ही महत्वपूर्ण है, इसलिए स्वास्थ्य कर्मियों को समय पर संसाधन आवंटन और प्रकोप से निपटने के लिए डेटा विश्लेषण का नियमित प्रशिक्षण दिया जाना चाहिए। मानव संसाधनों के साथ–साथ, कृत्रिम बुद्धिमत्ता का उपयोग बड़े डेटा विश्लेषण, जलवायु और महामारी विज्ञान के रुझानों और प्रकोप के पैटर्न की भविष्यवाणी के लिए भी किया जा सकता है। इसलिए, समिति मंत्रालय को हॉटस्पॉट भविष्यवाणी और इसी तरह की गतिविधियों के लिए आईएचआईपी के साथ एकीकृत एआई–संचालित प्रारंभिक चेतावनी प्रणालियों का सहारा लेने की सिफारिश करती है। नागरिक ऐप्स आदि के माध्यम से वेक्टर छवि पहचान के लिए मशीन लर्निंग का उपयोग भी विचारणीय है। इस प्रकार एकत्रित/विश्लेषणित डेटा अनुसंधान संस्थानों के निष्कर्षों का आधार होना चाहिए और ये निष्कर्ष भविष्य की स्वास्थ्य नीतियों को आकार देने चाहिए। देश के स्वास्थ्य खतरों से निपटने में सरकार का लक्ष्य अनुसंधान–से–नीति एकीकरण होना चाहिए। इसके अलावा, सरकार एक राष्ट्रीय वीबीडी अनुसंधान मिशन बनाने, सीएसआर योगदान को प्रोत्साहित करने और मिशन के तहत परियोजनाओं के लिए अंतर्राष्ट्रीय सहयोग की संभावना तलाश सकती है ताकि इस क्षेत्र में एक स्थायी पारिस्थितिकी तंत्र स्थापित किया जा सके।
(पैरा 6.11)
वेक्टर जनित रोगों के प्रबंधन के प्रति वैश्विक परिप्रेक्ष्य/प्रतिक्रिया
25. समिति समुक्ति करती है कि विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) की वैश्विक वेक्टर नियंत्रण प्रतिक्रिया (जीवीसीआर 2017-2030) क्षमता में वृद्धि, बेहतर निगरानी में सुधार, बेहतर समन्वय और विभिन्न क्षेत्रों एवं रोगों में एकीकृत कार्रवाई, निगरानी और शीघ्र पहचान आदि के माध्यम से विश्व स्तर पर वेक्टर नियंत्रण को मजबूत करने के लिए एक नई रणनीति प्रदान करती है। समिति समझती है कि भारत की वेक्टर जनित रोग नियंत्रण रणनीतियाँ काफी हद तक डब्ल्यूएचओ की वैश्विक वेक्टर नियंत्रण प्रतिक्रिया के अनुरूप हैं। तदनुसार, निर्धारित उद्देश्यों की प्राप्ति तक सरकार को एकीकृत वेक्टर प्रबंधन (आईवीएम), अगली पीढ़ी के उपकरणों के उपयोग, जूनोटिक रोग प्रबंधन, सीमा पार समन्वय, समुदाय–आधारित शहरी स्वच्छता मॉडल, रोगाणुरोधी प्रतिरोध (एएमआर) निगरानी आदि पर विशेष जोर देने की आवश्यकता है। अतः, सरकार को वैश्विक स्तर पर अपनाई जा रही अच्छी प्रथाओं को भारत के ढांचे में शामिल करने का प्रयास करना चाहिए, ताकि उत्तर-पूर्वी राज्यों में इन उपायों का पूर्ण पैमाने पर कार्यान्वयन भौगोलिक स्थिति, अंतरराष्ट्रीय सीमाओं, जनजातीय आबादी और जलवायु परिवर्तनशीलता से उत्पन्न चुनौतियों का सामना करने के लिए उपयुक्त हो। अतः समिति मंत्रालय को डब्ल्यूएचओ की रणनीति से प्रेरणा लेकर भारत के वीबीडी संबंधी दिशानिर्देशों और नीतियों की समीक्षा और मूल्यांकन करने और उत्तर-पूर्वी क्षेत्र और पूरे देश में वीबीडी से निपटने के लिए उन्हें लागू करने की सिफारिश करती है।
(पैरा 7.7)
26. समिति महसूस करती है कि मलेरिया उन्मूलन के 2030 लक्ष्यों के लिए जवाबदेही और दिशा–निर्देशों में सुधार आवश्यक है। सरकार का लक्ष्य 2027 तक स्थानीय मलेरिया के मामलों को शून्य करना और चरणबद्ध जिला–स्तरीय उन्मूलन के माध्यम से 2030 तक मलेरिया–मुक्त स्थिति को बनाए रखना होना चाहिए। इसलिए, समिति वार्षिक लेखापरीक्षित प्रतिवेदनों, स्थानीय वेक्टर व्यवहार और प्रतिरोध पैटर्न के अनुकूलन और प्रदर्शन मैट्रिक्स से वित्त पोषण को जोड़ने के साथ एक सतत और सामुदायिक सहभागितापूर्ण दृष्टिकोण की सिफारिश करती है। समिति का दृढ़ विश्वास है कि किसी भी संक्रामक रोग (वीबीडी) के उन्मूलन के लिए, बहुआयामी दृष्टिकोण किसी एक विधि की तुलना में कहीं अधिक प्रभावी है। राजनीतिक प्रतिबद्धता, पर्याप्त वित्त पोषण, जलवायु परिवर्तन/शहरीकरण के प्रभावों का समाधान और स्थानीय महामारी विज्ञान पर आधारित अनुकूलन रणनीतियाँ भारत और विश्व स्तर पर वीबीडी के उन्मूलन में सफलता के लिए महत्वपूर्ण हैं।
(पैरा 7.8)
वीबीडी पर विशेषज्ञों की राय/सुझाव
27. समिति का उद्देश्य उत्तर-पूर्वी क्षेत्र में व्यापक पर्यावरणीय नियंत्रण, संशोधित उपायों, उचित प्रबंधन और पर्याप्त सामुदायिक लामबंदी के माध्यम से वेक्टर-जनित रोगों से निपटने के तरीके खोजना है। समिति एनईआर राज्यों के लिए विशिष्ट वीबीडी के विभिन्न पहलुओं को नोट करती है, जैसे कि सामाजिक-आर्थिक चुनौतियाँ, समन्वय तंत्र, सामुदायिक जारूकता और प्रशिक्षण के लिए अपनाए गए उपाय, प्रसार, टीकाकरण और उपचार विधियों पर डेटा साझा करना आदि। समिति के समक्ष जांच के हिस्से के रूप में, गहन मलेरिया उन्मूलन परियोजना –3 (आईएमईपी–3) की प्रभावशीलता, भारत में वेक्टर-जनित रोगों के लिए डब्ल्यूएचओ दिशानिर्देशों का कार्यान्वयन, वीबीडी पर आईसीएमआर–एनआईएमआर द्वारा किए गए विभिन्न शोधों के परिणाम, राज्य स्तर पर स्थानीय निकायों/हितधारकों जैसे नगरपालिका, निगम आदि की भूमिका और भागीदारी, साथ ही देश में अब तक अपनाए गए वेक्टर नियंत्रण उपायों के प्रभावी कार्यान्वयन में सर्वोत्तम प्रथाओं को प्रस्तुत किया गया। समिति ने इन सभी पहलुओं की जांच की और विषय विशेषज्ञों के सुझावों पर भी विचार करने के बाद अपनी सिफारिशें दी हैं। इसके अतिरिक्त, समिति मंत्रालय को सिफारिश करती है कि वह उत्तर-पूर्वी क्षेत्र में वेक्टर जनित रोगों से निपटने के लिए विषय विशेषज्ञों द्वारा समिति के समक्ष रखे गए अतिरिक्त सुझावों पर विचार करे और उन्हें उचित रूप से लागू करे। ऐसे कुछ सुझाव इस प्रकार हैं –पी. फाल्सीपेरम के लिए आर्टेमिसिनिन–आधारित संयोजन चिकित्सा (एसीटी), संवेदनशील पी. विवैक्स के लिए क्लोरोक्वीन और पुनरावृत्ति को रोकने के लिए प्राइमाक्वीन के साथ उपचार से पहले सार्वभौमिक परीक्षण, उच्च संचरण वाले क्षेत्रों में क्यूडेन्गा वैक्सीन की तैनाती, एक क्षेत्रीय कीट विज्ञान प्रशिक्षण केंद्र की स्थापना, वेक्टर प्रबंधन और उपचार में संस्थागत क्षमता निर्माण, अंतर–क्षेत्रीय समन्वय के लिए प्रभावी मंच, वीबीडी से निपटने के लिए वन हेल्थ दृष्टिकोण, समय पर प्रकोप प्रतिक्रिया और प्रभावी रोग नियंत्रण को सक्षम करने के लिए जलवायु–आधारित जोखिम मॉडलिंग और डिजिटल रिपोर्टिंग सिस्टम, ओडिशा के दमन और छत्तीसगढ़ के मलेरिया मुक्त बस्तर अभियान जैसे मॉडलों के पहलुओं का अनुकरण और स्थलाकृतिक चुनौतियों पर काबू पाने के लिए मानचित्रण, आपूर्ति/सेवाओं की डिलीवरी के लिए ड्रोन का व्यापक उपयोग।
(पैरा 8.11)
28. उच्च-संक्रमण वाले क्षेत्रों में ओडेन्गा वैक्सीन की तैनाती
समिति को यह जानकारी दी गई है कि डेंगू के लिए पहला रोकथाम टीका सीडीएससीओ और डीसीजीआई द्वारा आधिकारिक रूप से मंजूरी दे दी गई है, जिसे 04 से 60 साल उम्र के लोगों को दिया जा सकता है और यह दो खुराकों में तीन महीने के अंतराल पर लगाया जाएगा क्योंकि ओडेन्गा डेंगू के सभी चार प्रकारों के लिए प्रभावी है। चूँकि ओडेन्गा टीका साल 2027 के मध्य में बाजार में व्यावसायिक रूप से उपलब्ध होगा, इसलिए समिति ने सुझाव दिया है कि ओडेन्गा टीके को समान्य टीकाकरण कार्यक्रम में तेजी से शामिल किया जाए।
(पैरा 8.12)
29. जलवायु आधारित वेक्टर रोग प्रारंभिक चेतावनी प्रणाली
समिति सरकार से सिफारिश करती है कि वह आईएमडी मौसम पूर्वानुमान, उपग्रह/जीआईएस मैपिंग और कीट निगरानी को एकीकृत करके रोग हॉटस्पॉट की भविष्यवाणी करे और महामारी होने से पहले जिला स्तर पर जल्दी चेतावनी जारी करे। समिति आगे रणनीतिक कदम उठाने पर जोर देती है ताकि सक्रिय कीट नियंत्रण और बेहतर संसाधन तैनाती संभव हो सके।
(पैरा 8.13)
*********
सिफारिशें/समुक्तियां – एक नजर में
(176वां प्रतिवेदन)
भारतीय स्वास्थ्य सेवा प्रणाली का विहंगावलोकन
1. समिति का यह मत है कि प्राथमिक स्वास्थ्य देखभाल के लिए वर्तमान 51% आवंटन एक महत्वपूर्ण निवारक आधार स्थापित करता है, जबकि माध्यमिक (28%) और तृतीयक (11%) देखभाल पर असमान रूप से कम खर्च नागरिकों को महंगी निजी सुविधाओं की ओर धकेल देता है, जिसके परिणामस्वरूप जेब से भारी खर्च करना पड़ता है। अतः समिति सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों (सीएचसी), जिला अस्पतालों और राज्य द्वारा संचालित मेडिकल कॉलेजों में सार्वजनिक क्षेत्र के पूंजी निवेश के व्यवस्थित विस्तार की सिफारिश करती है। समिति समझती है कि इस प्रकार के विस्तार का मुख्य उद्देश्य क्षेत्रीय माध्यमिक स्वास्थ्य देखभाल सुविधाओं को उन्नत बनाना होना चाहिए ताकि विश्वसनीय, चौबीसों घंटे आपातकालीन, प्रसूति और बाल चिकित्सा देखभाल प्रदान की जा सके, जिससे शीर्ष संस्थानों पर रेफरल का बोझ कम हो सके। समिति सीएचसी अवसंचना और सुविधाओं को सुदृढ़ करने की सिफारिश करती है ताकि पोस्ट ग्रेजुएट डॉक्टर वहां पर उपयुक्त स्थितियों में काम कर सकें। ऐसे डॉक्टर सीएचसी स्तर पर काम करें उसके लिए उचित आवास और वेतन प्रोत्साहन जैसी सुविधाएं प्रदान की जानी चाहिए। समिति यह समझती है कि सरकारी अस्पतालों में मरीजों की भीड़ अधिक है और सुविधाओं का अभाव है, जिसके कारण लोग निजी अस्पतालों की ओर रुख कर रहे हैं। वहाँ स्वास्थ्य सेवाओं पर आने वाला भारी खर्च एक वास्तविक चिंता का विषय है। इसलिए, निवारक और सामुदायिक स्वास्थ्य सेवा को उचित प्रोत्साहन देकर सार्वजनिक स्वास्थ्य क्षेत्र में सुधार की अपार संभावनाएं हैं।
(पैरा 1.3.4)
2. समिति का मानना है कि शासन और पर्यवेक्षण पर सरकारी व्यय वर्तमान में 8% है, जो कि पहले से दोगुना है।सरकारी और निजी दोनों क्षेत्रों का संयुक्त व्यय 4% है। हालांकि एक व्यापक प्रशासनिक तंत्र आवश्यक है, समिति का मानना है कि इस तरह की उच्च लागत प्रणालीगत अक्षमताओं और परिचालन दोहराव का संकेत देती है। इसलिए, समिति आयुष्मान भारत डिजिटल मिशन जैसे डिजिटल स्वास्थ्य अवसंरचना का उपयोग करते हुए तत्काल प्रशासनिक युक्तिकरण कार्यक्रम की सिफारिश करती है। नियमित निगरानी को स्वचालित करके और योजना कार्यान्वयन को सुव्यवस्थित करके, सरकार इन प्रशासनिक निधियों को चिकित्सा उपकरण, निदान और विशेषज्ञ मानव संसाधनों की खरीद में सीधे निर्देशित कर सकती है और सीएचसी स्तर पर सभी रिक्त पदों को अत्यंत प्राथमिकता आधार पर भरा जाना चाहिए।
(पैरा 1.3.5)
3. समिति का मत है कि विशेष उपचार प्रदान करने में निजी क्षेत्र की महत्वपूर्ण भूमिका को देखते हुए, रोगियों को वित्तीय असुरक्षा से बचाने के लिए एक संतुलित नियामक ढांचा अनिवार्य है। अतः समिति मानकीकृत, रियायती मूल्य निर्धारण मॉडल लागू करने और सार्वजनिक–निजी भागीदारी (पीपीपी) ढांचे के अंतर्गत उच्च स्तरीय तृतीयक प्रक्रियाओं के लिए सार्वजनिक बीमा कवरेज विस्तार करने की सिफारिश करती है। समिति का मानना है कि डिजिटल रेफरल सिस्टम, परिणाम–आधारित निगरानी और सुदृढ़ सार्वजनिक–निजी भागीदारी (पीपीपी) ढांचे को लागू करने से उन्नत उपचारात्मक देखभाल में असमानता को दूर किया जा सकेगा, पारदर्शिता और पहुंच में सुधार होगा, साथ ही जेब से होने वाले खर्च को तर्कसंगत बनाने के लिए लागतों को सख्ती से विनियमित किया जा सकेगा।
(पैरा 1.3.6)
4. समिति का मानना है कि हालांकि निजी क्षेत्र में 60% से अधिक इनपेशेंट और 70% आउटपेशेंट देखभाल उपलब्ध है, फिर भी यह क्षेत्र अत्यधिक विषम है, जिसमें छोटे क्लीनिकों, नर्सिंग होमों और निदान केंद्रों का एक विशाल नेटवर्क बिना किसी नियमन के संचालित हो रहा है। समिति का मत है कि क्लीनिकों, नर्सिंग होम और निदान केंद्रों की अनियंत्रित वृद्धि और विभिन्न राज्यों में नैदानिक स्थापन (पंजीकरण और विनियमन) अधिनियम, 2010 के असमान कार्यान्वयन से निजी क्षेत्र में देखभाल की गुणवत्ता और लागत दोनों में भारी असमानताएँ उत्पन्न होती हैं, जिससे मरीज़ मनमानी कीमतों और निम्न–स्तरीय परिपाटियों के शिकार हो जाते हैं। इसलिए, समिति सिफारिश करती है कि मंत्रालय राज्य सरकारों के साथ सक्रिय रूप से समन्वय करे ताकि नैदानिक स्थापन अधिनियम को राष्ट्रव्यापी स्तर पर समान रूप से अपनाया जाए और सख्ती से लागू किया जाए। इसके अलावा, समिति का मानना है कि केवल स्वैच्छिक एनएबीएच मान्यता पर निर्भर रहना अपर्याप्त है; इसलिए, मानकीकृत उपचार प्रोटोकॉल सुनिश्चित करने और रोगियों को आर्थिक शोषण से बचाने के लिए, सभी निजी क्लिनिकल प्रतिष्ठानों के लिए एक अनिवार्य, गुणवत्ता आश्वासन और मूल्य पारदर्शिता ढांचा राष्ट्रव्यापी स्तर पर लागू किया जाना चाहिए। इसके अलावा, एनएबीएच प्रणाली छोटे स्वास्थ्य प्रतिष्ठानों के लिए उपयोगकर्ता हितैषी तथा पारदर्शी बनाया जाना चाहिए क्योंकि एनएबीएच अनुपालन अपने आप में छोटे शहरों में इन स्वास्थ्य देखभाल प्रदाताओं के लिए कुल लागत को बढ़ाता है।
(पैरा 1.3.11)
5. समिति ने कॉरपोरेट अस्पताल श्रृंखलाओं के मजबूत वित्तीय प्रदर्शन पर ध्यान दिया है, जो उच्च मूल्य वाले उपचारों और बढ़ते चिकित्सा पर्यटन बाजार के कारण प्रति कब्जे वाले बिस्तर के औसत राजस्व (एआरपीओबी) में वृद्धि से स्पष्ट है। समिति का मानना है कि भारत का एक प्रमुख और किफायती वैश्विक चिकित्सा केंद्र के रूप में उभरना सराहनीय है, लेकिन सरकार द्वारा 100% प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) जैसे प्रोत्साहनों से समर्थित उन्नत चिकित्सा अवसंरचना को घरेलू आबादी को समान रूप से सेवाएं प्रदान करनी चाहिए। दूसरी ओर, समिति का यह मत है कि भारत में निजी स्वास्थ्य बीमा की पहुंच वैश्विक औसत से काफी कम है, जिसके कारण घरेलू मरीजों को इन सेवाओं के लिए अपनी जेब से भारी खर्च करना पड़ता है। इसलिए, समिति एक संरचित अंतर–सब्सिडीकरण नीति बनाने की सिफारिश करती है। उक्त ढांचे के के तहत, सरकारी रियायतों का लाभ उठाने वाले बड़े कॉर्पोरेट अस्पतालों को अंतरराष्ट्रीय और उच्च आय वाले मरीजों से प्राप्त राजस्व का एक हिस्सा आर्थिक रूप से कमजोर घरेलू मरीजों को अंतर–सब्सिडीकृत उन्नत तृतीयक देखभाल प्रदान करने के लिए उपयोग करना अनिवार्य होना चाहिए, जैसाकि कई देशों में होता है। इसके अतिरिक्त, इन संस्थानों को मानकीकृत और विनियमित पैकेज दरों पर राष्ट्रीय स्वास्थ्य बीमा योजनाओं के तहत सूचीबद्ध होने के लिए बिस्तरों का एक निश्चित कोटा आवंटित करना अनिवार्य होना चाहिए।
(पैरा 1.3.12)
6. समिति का मत है कि वर्तमान निजी स्वास्थ्य सेवा व्यवस्था शहरी तृतीयक बाजारों में असमान रूप से केंद्रित है, जिससे ग्रामीण, अर्ध–शहरी, पहाड़ी और आदिवासी क्षेत्रों में विशेष देखभाल की बढ़ती मांग के बावजूद द्वितीय, तृतीयक और ग्रामीण क्षेत्रों में एक महत्वपूर्ण कमी रह जाती है। समिति का मानना है कि केवल बाजार की ताकतों से यह भौगोलिक अंतर कम नहीं होगा, और रोबोटिक सर्जरी, एआई–डायग्नोस्टिक्स और टेलीमेडिसिन जैसी उन्नत प्रौद्योगिकियां वर्तमान में महानगरों की कॉर्पोरेट श्रृंखलाओं तक ही सीमित हैं। समिति इस बात पर चिंता व्यक्त करती है कि इन क्षेत्रों के छोटे अस्पतालों में आधुनिक बुनियादी ढांचे, उन्नत चिकित्सा उपकरणों और उभरती प्रौद्योगिकियों की गंभीर कमी है। समिति का मानना है कि इस प्रकार की छोटी ग्रामीण सुविधाएं विकेंद्रीकृत स्वास्थ्य सेवा वितरण के लिए महत्वपूर्ण हैं, लेकिन गुणवत्ता और सामर्थ्य के बीच संतुलन बनाए रखने के लिए इन्हें तत्काल व्यवस्थित समर्थन की आवश्यकता है। इसलिए, समिति सिफारिश करती है कि सरकार अपनी स्वास्थ्य सेवा प्रोत्साहन रूपरेखा को पुनर्गठित करे, और कर लाभ, भूमि सब्सिडी तथा एफडीआई सुविधाओं को वंचित भौगोलिक क्षेत्रों में निजी क्षेत्र के निवेश के लिए पूरी तरह से सशर्त बनाए। गैर–शहरी क्षेत्रों में सार्वजनिक–निजी भागीदारी (पीपीपी) को भारी प्रोत्साहन देकर, सरकार यह सुनिश्चित कर सकती है कि कॉर्पोरेट निजी क्षेत्र की विशेषता वाले बुनियादी ढांचे, तकनीकी प्रगति और उच्च गुणवत्ता वाली देखभाल व्यापक ग्रामीण और अर्ध–शहरी आबादी के लिए सुलभ और सस्ती हो।
(पैरा 1.3.13)
7. समिति आगे यह भी सिफारिश करती है कि सरकार अपने स्वास्थ्य सेवा प्रोत्साहन ढांचे का पुनर्गठन करे ताकि छोटे स्वास्थ्य सेवा प्रदाताओं को स्पष्ट रूप से सुरक्षा और उन्नत सुविधाएं प्रदान की जा सकें। गैर–शहरी क्षेत्रों में विस्तार करने के लिए कॉरपोरेट सार्वजनिक–निजी भागीदारी (पीपीपी) को प्रोत्साहित करने के साथ–साथ, सरकार को विशेष रूप से छोटे और मध्यम आकार के ग्रामीण और अर्ध–शहरी अस्पतालों के लिए लक्षित वित्तीय सहायता, प्रौद्योगिकी उन्नयन अनुदान और रियायती उपकरण खरीद कार्यक्रम शुरू करने चाहिए। इस तरह की तकनीकी प्रतिस्पर्धा सुनिश्चित करने से उच्च गुणवत्ता वाली, आधुनिक देखभाल केवल कॉरपोरेट शहरी केंद्रों तक ही सीमित नहीं रहेगी, बल्कि ग्रामीण, अर्ध–शहरी, पहाड़ी और आदिवासी क्षेत्रों में भी सुलभ और सस्ती होगी।
(पैरा 1.3.14)
तुलनात्मक विश्लेषण: सार्वजनिक और निजी स्वास्थ्य सेवा क्षेत्रों की शक्तियाँ और कमजोरियां
8. राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय के नवीनतम सर्वेक्षण (राष्ट्रीय प्रतिदर्श सर्वेक्षण का 80वां चरण, जनवरी–दिसंबर 2025) यह रिपोर्ट भारत में स्वास्थ्य सेवाओं की बढ़ती वहनीयता के संकट को उजागर करती है। समिति ने गंभीर चिंता व्यक्त करते हुए कहा है कि निजी अस्पतालों में इलाज अक्सर सरकारी अस्पतालों की तुलना में पांच से दस गुना अधिक महंगा होता है, और प्रसव एवं कैंसर, हृदय रोग और गुर्दे के खराब होने जैसी गंभीर बीमारियों में यह अंतर सबसे अधिक स्पष्ट है। भारत में किसी बीमारी के लिए अस्पताल में भर्ती होने का औसत खर्च लगभग 37,858 रुपये है, जबकि जेब से होने वाला खर्च लगभग 34,064 रुपये है। सरकारी अस्पतालों में भर्ती होने का औसत खर्च 6,631 रुपये है, जबकि निजी अस्पतालों में यह 50,508 रुपये है। कैंसर, हृदय रोग और गुर्दे के खराब होने जैसी गंभीर बीमारियों के मामले में यह अंतर और भी बढ़ जाता है।
(पैरा 1.4.6)
9. समिति इस बात पर प्रकाश डालना चाहेगी कि कि राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय द्वारा जनवरी–दिसंबर 2025 में किए गए घरेलू सामाजिक उपभोग: स्वास्थ्य पर राष्ट्रीय प्रतिदर्श सर्वेक्षण के 80वें दौर के अनुसार, राज्यवार आंकड़ों से पता चलता है कि स्वास्थ्य देखभाल की लागत पूरे भारत में एक समान नहीं है, बल्कि इसमें काफी भिन्नता है। उपचार की लागत दक्षिण भारत और कुछ अधिक विकसित राज्यों में अधिक है। तेलंगाना में अस्पताल में भर्ती होने की कुल लागत लगभग 55,000 रुपये तक पहुंच जाती है, जबकि तमिलनाडु में यह लगभग 52,000 रुपये है। केरल और कर्नाटक में यह लागत 40,000 रुपये से 45,000 रुपये के बीच है। पश्चिमी बंगाल और महाराष्ट्र जैसे राज्यों में भी व्यय अधिक है, जहां कुल खर्च 40,000 रुपये या उससे अधिक दर्ज किया गया है। उत्तर प्रदेश और हरियाणा में भी यह स्तर लगभग 45,000 रुपये तक पहुंचता है। इसके विपरीत, उत्तर–पूर्व और कुछ कम विकसित राज्यों में खर्च अपेक्षाकृत कम है। ओडिशा में यह लगभग 22,000 रुपये है, जबकि मिजोरम और मेघालय में लगभग 25,000 रुपये है। लद्दाख जैसे क्षेत्रों में खर्च मात्र 8,000 रुपये दर्ज किया गया है। हालांकि, कम खर्च का मतलब यह नहीं है कि स्थितियां बेहतर हैं। यह स्वास्थ्य सेवाओं तक सीमित पहुंच, सेवाओं के कम उपयोग या लोगों के सस्ते विकल्पों तक सीमित होने का संकेत भी दे सकता है। राज्यवार आंकड़ों से यह भी पता चलता है कि जहां सरकारी स्वास्थ्य सेवाएं मजबूत हैं, वहां इलाज पर सार्वजनिक खर्च कम रहता है। लेकिन जहां निजी क्षेत्र का विस्तार हुआ है, वहां खर्च तेजी से बढ़ता है। उदाहरण के लिए, दक्षिण भारतीय राज्यों में निजी अस्पतालों की भूमिका अधिक है और खर्च भी अधिक है। इसके विपरीत, उत्तर–पूर्वी राज्यों में सरकारी सेवाओं पर अधिक निर्भरता है, जिसके परिणामस्वरूप खर्च अपेक्षाकृत कम होता है।
(पैरा 1.4.8)
10. समिति का यह मत है कि यद्यपि सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवा प्रणाली ग्रामीण और निम्न आय वर्ग की आबादी के लिए महत्वपूर्ण आधार बनी हुई है, लेकिन बुनियादी ढांचे की गंभीर कमियों, कर्मचारियों की कमी और अत्यधिक भीड़भाड़ के कारण वास्तव में जनता का भरोसा इसमें कम हो रहा है और मरीज़ महंगे निजी उपचार की ओर धकेल दिए जा रहे हैं। समिति ने चिंता व्यक्त करते हुए कहा है कि सरकारी अस्पतालों में मरीज़ों की अत्यधिक संख्या परामर्श के समय और सेवा दक्षता को सीधे तौर पर प्रभावित करती है। फिर भी, समिति का मानना है कि सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवा की कथित और वास्तविक गुणवत्ता में सुधार करना ही जेब से होने वाले खर्च के राष्ट्रीय बोझ को कम करने का सबसे टिकाऊ तरीका है। इसलिए, समिति सार्वजनिक सुविधाओं, विशेष रूप से उच्च मांग वाले महानगरीय केंद्रों में, बिस्तर क्षमता बढ़ाने और विशेष चिकित्सा कर्मियों की भर्ती पर केंद्रित त्वरित क्षमता निर्माण पहल की सिफारिश करती है। इसके अलावा, मंत्रालय को भारतीय सार्वजनिक स्वास्थ्य मानकों (आईपीएचएस) को सख्ती से लागू करना चाहिए ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि सरकारी अस्पतालों में आवश्यक दवाओं, निदान और आधुनिक सुविधाओं की उपलब्धता निजी क्षेत्र को वर्तमान में उपलब्ध सेवा और रोगी संतुष्टि के स्तर के अनुरूप हो।
(पैरा 1.4.17)
11. समिति सार्वजनिक और निजी स्वास्थ्य सेवा के बीच बढ़ती लागत असमानता पर चिंता व्यक्त करते हुए समुक्ति करती है कि जहां हाल ही में हुए 80वें एनएसओ सर्वेक्षण (2025) से पता चलता है कि निजी अस्पतालों में भर्ती होने की औसत लागत 50,508 रुपये है, जबकि सार्वजनिक सुविधाओं में यह 6,631 रुपये है। इस भारी असमानता ने स्वास्थ्य सेवाओं की बढ़ती लागत को और भी गंभीर बना दिया है। समिति का मानना है कि निजी स्वास्थ्य सेवाओं के अंधाधुंध व्यवसायीकरण, जिसमें अत्यधिक बिलिंग, अनावश्यक निदान और प्रसव जैसी सामान्य प्रक्रियाओं की बढ़ती लागत (निजी अस्पतालों में जेब से होने वाला औसत चिकित्सा व्यय 37,630 रुपये, जबकि सरकारी अस्पतालों में 2,299 रुपये) जैसी शिकायतें शामिल हैं, जो कमजोर परिवारों को भारी कर्ज और संपत्ति बेचने की मजबूरी की ओर धकेल रहा है। इसलिए, समिति सभी निजी अस्पतालों में आवश्यक उपचारों, निदान और सामान्य प्रक्रियाओं की लागत को मानकीकृत और सीमित करने के लिए एक तंत्र के तत्काल गठन हेतु मौजूदा नियामक निकायों की सिफारिश करती है। इसके अतिरिक्त, सरकार को मरीज के अस्पताल में भर्ती होने से पहले पूर्ण मूल्य पारदर्शिता अनिवार्य करनी चाहिए और निजी क्षेत्र में अत्यधिक बिलिंग की जांच करने और बीमा दावों के विवादों को हल करने के लिए विशेष रूप से डिज़ाइन किए गए एक एकीकृत, त्वरित शिकायत निवारण लोकपाल की स्थापना करनी चाहिए।
(पैरा 1.4.18)
12. समिति का दृढ़ मत है कि भौगोलिक असमानताएँ स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुँच को बुरी तरह प्रभावित करती हैं। निजी तृतीयक स्वास्थ्य सेवाएँ शहरी केंद्रों और दक्षिणी राज्यों में केंद्रित हैं, जिससे अस्पताल में भर्ती होने का खर्च 50,000 रुपये से अधिक हो जाता है, जबकि उत्तर-पूर्व जैसे क्षेत्रों में उन्नत स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुँच बहुत सीमित है। यद्यपि अस्पताल में भर्ती होने की दर (ओओपीई) घटकर 43.4% हो गई है (एनएचए के 2022-23 के अनुमानों के अनुसार), फिर भी समिति का मानना है कि वर्तमान बीमा कवरेज अपर्याप्त है, क्योंकि यह बहिरंग खर्चों (जो निजी केंद्रों में पाँच गुना अधिक हैं) और परिवहन एवं वेतन हानि जैसे अप्रत्यक्ष खर्चों को काफी हद तक अनदेखा करता है। इसलिए, समिति स्वास्थ्य अवसंरचना निधि के लक्षित भौगोलिक पुनर्वितरण की सिफारिश करती है ताकि अल्प सेवा प्राप्त ग्रामीण क्षेत्रों और उत्तर-पूर्व के क्षेत्रों में उन्नत सार्वजनिक तृतीयक केंद्र स्थापित किए जा सकें और निजी क्षेत्र पर क्षेत्रीय निर्भरता को कम किया जा सके। साथ ही, सरकार को मौजूदा राष्ट्रीय स्वास्थ्य बीमा योजनाओं का दायरा बढ़ाकर बहिरंग उपचार और निदान के लिए व्यापक कवरेज प्रदान करना चाहिए, जिससे हाशिए पर रहने वाले समुदायों, बुजुर्गों और महिलाओं को निजी स्वास्थ्य देखभाल खर्चों के कारण होने वाली भयानक वित्तीय दरिद्रता से बचाया जा सके।
(पैरा 1.4.19)
स्वास्थ्य सेवा वितरण और वित्तीय सुरक्षा में प्रमुख सरकारी योजनाओं की भूमिका
13. समिति का मत है कि जबकि आयुष्मान भारत प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना (पीएमजेएवाई) 5 करोड़ से अधिक जरूरतमंद नागरिकों को महत्वपूर्ण वित्तीय सुरक्षा प्रदान करती है, लेकिन इसकी सफलता काफी हद तक मजबूत चिकित्सा अवसंरचना की उपलब्धता पर निर्भर करती है। वर्तमान में, सार्वजनिक तृतीयक स्वास्थ्य देखभाल सुविधाओं में व्याप्त कमियों के कारण पीएमजेएवाई निधि का एक बड़ा हिस्सा निजी क्षेत्र द्वारा उपयोग किया जा रहा है। समिति का मानना है कि दीर्घकालिक प्रणालीगत लचीलापन बनाने और निजी सुविधाओं पर निर्भरता कम करने के लिए, सार्वजनिक क्षेत्र की अवशोषण क्षमता में व्यापक सुधार करना आवश्यक है ताकि सार्वजनिक क्षेत्र के अस्पताल तृतीयक स्वास्थ्य देखभाल प्रदाताओं के रूप में कार्य कर सकें। इसलिए, समिति प्रधानमंत्री आयुष्मान भारत स्वास्थ्य अवसंरचना मिशन (पीएम–अभिम) के आक्रामक और त्वरित कार्यान्वयन की सिफारिश करती है। सरकार को जिला स्तर पर गहन चिकित्सा अस्पताल ब्लॉकों और एकीकृत सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रयोगशालाओं की स्थापना को तत्काल प्राथमिकता देनी चाहिए। पीएम–अभिम के अवसंरचना उन्नयन को पीएमजेएवाई के वित्तीय कवरेज के साथ समन्वित करके, सरकार यह सुनिश्चित कर सकती है कि सार्वजनिक अस्पताल बीमित रोगियों का एक बड़ा हिस्सा प्राप्त करें, जिससे सार्वजनिक धन सार्वजनिक स्वास्थ्य देखभाल प्रणाली के भीतर ही रहे और उच्च गुणवत्ता वाली, कैशलेस तृतीयक स्वास्थ्य देखभाल की गारंटी मिल सके।
(पैरा 1.5.12)
14. समिति निजी प्रदाताओं द्वारा सामना किए जाने वाले अनुपालन के गंभीर बोझ को भी स्वीकार करती है। चिकित्सा आपूर्ति, दवाओं और अत्याधुनिक उपकरणों के लिए बढ़ती परिचालन लागत, साथ ही साथ आयुष्मान भारत और सीजीएचएस जैसी योजनाओं के तहत सरकार द्वारा निर्धारित तर्कसंगत मूल्य सीमाएं लगातार लाभ मार्जिन को कम कर रही हैं और वित्तीय स्थिरता को खतरे में डाल रही हैं। समिति का मानना है कि अस्पतालों पर एक अव्यवहारिक वित्तीय मॉडल थोपना अंततः रोगी देखभाल से समझौता करता है। इसलिए, समिति सिफारिश करती है कि मंत्रालय को नैदानिक स्थापन अधिनियम को समान रूप से लागू करने और एक स्तरीय गुणवत्ता आश्वासन ढांचा लागू करने के साथ–साथ एक गतिशील, परामर्श आधारित मूल्य निर्धारण तंत्र भी स्थापित करना चाहिए। सरकारी योजनाओं के तहत पैकेज दरों को वास्तविक, बढ़ती परिचालन लागतों को प्रतिबिंबित करने के लिए समय–समय पर तर्कसंगत बनाया जाना चाहिए, जिससे यह सुनिश्चित हो सके कि निजी सुविधाएं प्रणालीगत राजस्व अस्थिरता का सामना किए बिना उच्च गुणवत्ता वाली देखभाल बनाए रख सकें।
(पैरा 1.5.13)
15. समिति समुक्ति करती है कि डिजिटल पहल, विशेष रूप से आयुष्मान भारत डिजिटल मिशन (एबीडीएम) और ई–संजीवनी तथा सेहत जैसे टेलीकंसल्टेशन प्लेटफॉर्म भौगोलिक स्वास्थ्य सेवाओं में मौजूद असमानता को पाटने में क्रांतिकारी बदलाव ला रहे हैं। हालांकि, समिति का मानना है कि इन डिजिटल उपकरणों को स्वैच्छिक या खंडित रूप से अपनाने से निदान संबंधी दोहराव को कम करने और रोगी रेफरल को सुव्यवस्थित करने की इनकी क्षमता सीमित हो जाती है। समिति का मानना है कि विशेषज्ञ देखभाल चाहने वाले ग्रामीण लोगों पर वित्तीय और यात्रा संबंधी बोझ को कम करने के लिए एक निर्बाध डिजिटल प्रणाली आवश्यक है। इसलिए, समिति पीएमजेएवाई के तहत सूचीबद्ध सभी सार्वजनिक स्वास्थ्य केंद्रों और निजी अस्पतालों के लिए एबीडीएम का अनुपालन अनिवार्य करने की सिफारिश करती है। इसके अलावा, आयुष्मान भारत स्वास्थ्य एवं कल्याण केंद्रों की क्षमता को निर्बाध उच्च गति की डिजिटल कनेक्टिविटी के साथ व्यवस्थित रूप से बढ़ाया जाना चाहिए ताकि प्रत्येक ग्रामीण नागरिक को डॉक्टर से रोगी के टेलीकंसल्टेशन की निर्बाध और विश्वसनीय सुविधा मिल सके, जिससे उच्च स्तरीय शहरी अस्पतालों पर रेफरल का बोझ प्रभावी रूप से कम हो सके।
(पैरा 1.5.14)
16. समिति ने गहरी चिंता व्यक्त करते हुए इस बात पर ध्यान दिया कि निःशुल्क उपचार के हकदार होने के बावजूद, बहिरंग चिकित्सा व्यय और दवाओं की लागत परिवारों के लिए जेब से होने वाले भारी खर्च का कारण बनी हुई है। समिति का यह मत है कि यद्यपि प्रधानमंत्री भारतीय जनऔषधि परियोजना (पीएमबीजेपी) जैसी योजनाओं ने सस्ती जेनेरिक दवाएं सफलतापूर्वक उपलब्ध कराई हैं, फिर भी समग्र जनसंख्या की आवश्यकता की तुलना में उनकी भौतिक उपस्थिति अपर्याप्त है। समिति का मानना है कि इस विशिष्ट सीमा को दूर करना आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों के रोगियों को वित्तीय संकट से बचाने का सबसे सीधा तरीका है। इसलिए, समिति सरकार को सभी जिला अस्पतालों, सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों और सरकारी योजनाओं के अंतर्गत सूचीबद्ध बड़े निजी अस्पतालों के परिसर में जन औषधि केंद्र स्थापित करने की सिफारिश करती है ताकि सस्ती कीमतों पर दवाओं की सुलभता और उपलब्धता सुनिश्चित हो सके। साथ ही, मंत्रालय को राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन (एनएचएम) के माध्यम से कठोर, प्रौद्योगिकी–आधारित ऑडिट लागू करने चाहिए ताकि जेएसएसके के तहत गर्भवती महिलाओं और नवजात शिशुओं के लिए जेब से होने वाले खर्च को शून्य किया जा सके, और उन चिकित्सा केंद्रों को स्पष्ट रूप से दंडित किया जा सके जो दवाओं, निदान और परिवहन के लिए पूर्ण मुफ्त सुविधाएं प्रदान करने में विफल रहते हैं।
(पैरा 1.5.15)
किफायत और सुलभता का आकलन
किफायत और सुलभता की परिभाषा और संकेतक
17. समिति का मत है कि किफायत और सुलभता आपस में गहराई से जुड़े हुए हैं। यदि स्वास्थ्य सेवाएँ अनुपलब्ध या दुर्गम बनी रहती हैं, तो सस्ती स्वास्थ्य सेवाओं का मूल्य सीमित रह जाता है, ठीक उसी प्रकार सुलभ बुनियादी ढाँचा भी समानता की कसौटी पर खरा नहीं उतरता यदि वह परिवारों पर भारी वित्तीय बोझ डालता है। अतः समिति सिफारिश करती है कि सरकार प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना (पीएम–जेएवाई) जैसे वित्तीय सुरक्षा ढाँचों के विस्तार को पीएम आयुष्मान भारत स्वास्थ्य अवसंरचना मिशन (पीएम–अभिम) के अंतर्गत लक्षित अवसंरचना निवेशों के साथ समन्वित करे। तत्काल वित्तीय आवंटन को सभी कार्यरत आयुष्मान आरोग्य मंदिरों में निःशुल्क आवश्यक दवाओं, निदान सेवाओं और आपातकालीन परिवहन की निर्बाध आपूर्ति सुनिश्चित करके जेब से होने वाले व्यय (ओओपीई) को समाप्त करने की दिशा में निर्देशित किया जाना चाहिए।
(पैरा 2.1.6)
18. समिति का मानना है कि स्वास्थ्य केंद्रों का केवल भौतिक रूप से उपलब्ध होना वास्तविक सुलभता के बराबर नहीं है, यदि ऐसे केंद्रों में कर्मचारियों की कमी, विशेषज्ञों का अभाव या घटिया उपकरण हों। अतः समिति स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय को वेब–आधारित भारतीय जन स्वास्थ्य मानक (आईपीएचएस) डैशबोर्ड शुरू करने की सिफारिश करती है, अर्थात् निष्क्रिय स्व–मूल्यांकन तंत्र से सक्रिय, वास्तविक समय सुधार उपकरण में बदलना। पहचाने गए बुनियादी ढांचे और मानव संसाधन संबंधी कमियों को दूर करने के लिए वैधानिक, समयबद्ध हस्तक्षेप अनिवार्य किए जाने चाहिए, विशेष रूप से डॉक्टर–जनसंख्या अनुपात और अस्पताल बिस्तर घनत्व को अनुकूलित करना, और आईपीएचएस तथा राष्ट्रीय गुणवत्ता आश्वासन मानकों (एनक्यूएएस) दोनों का पूर्ण अनुपालन सुनिश्चित करना।
(पैरा 2.1.7)
19. समिति का मानना है कि डिजिटल स्वास्थ्य नवाचार, विशेष रूप से टेलीमेडिसिन प्लेटफॉर्म और आयुष्मान भारत डिजिटल मिशन (एबीडीएम), भौगोलिक बाधाओं/अंतर का सामना कर रही आबादी के लिए महत्वपूर्ण समानता लाने का काम करते हैं। इसलिए, समिति सार्वजनिक और निजी क्षेत्रों में डिजिटल स्वास्थ्य अंतरसंचालनीयता को तेजी से बढ़ाने की सिफारिश करती है। इस विस्तार को सभी ग्रामीण स्वास्थ्य केंद्रों पर उन्नत ब्रॉडबैंड कनेक्टिविटी और डिजिटल बुनियादी ढांचे द्वारा प्रभावी ढंग से समर्थन दिया जाना चाहिए ताकि ई–संजीवनी जैसे प्लेटफॉर्म की कार्यात्मक पहुंच को अधिकतम किया जा सके। इससे देखभाल की निर्बाध निरंतरता और विशेषज्ञ परामर्श तक तत्काल पहुंच सुनिश्चित होगी, जिससे शारीरिक यात्रा के समय की पारंपरिक बाधा को प्रभावी ढंग से दूर किया जा सकेगा।
(पैरा 2.1.8)
जेब से होने वाला खर्च और वित्तीय सुरक्षा
20. समिति का यह मत है कि पिछले दशक में जेब से होने वाले खर्च (ओओपीई) में हालिया कमी के बावजूद, सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) का 1.43 प्रतिशत का वर्तमान सरकारी स्वास्थ्य व्यय (जीएचई) सार्वभौमिक वित्तीय सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए अपर्याप्त बना हुआ है। समिति का मानना है कि राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति, 2017 में परिकल्पित जीडीपी के 2.5 प्रतिशत के लक्ष्य से नीचे बने रहना, स्वास्थ्य संबंधी भारी खर्चों और चिकित्सा सुविधाओं की कमी को कम करने में गंभीर रूप से बाधक है। इसलिए, समिति सिफारिश करती है कि सरकार को स्वास्थ्य के लिए अपने बजटीय आवंटन में तेजी से वृद्धि करनी चाहिए और जीडीपी के 2.5 प्रतिशत के लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए एक बाध्यकारी, समयबद्ध कार्यसूची तैयार करनी चाहिए। इस बढ़ी हुई धनराशि को सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवा अवसंरचना को मजबूत करने के लिए रणनीतिक रूप से निर्देशित किया जाना चाहिए ताकि जनता की महंगी निजी स्वास्थ्य सेवाओं पर अत्यधिक निर्भरता को धीरे–धीरे कम किया जा सके।
(पैरा 2.2.9)
21. समिति का मानना है कि निजी क्षेत्र पर अत्यधिक निर्भरता, जो वर्तमान में लगभग 60 प्रतिशत अस्पताल में भर्ती होने और 70 प्रतिशत बाह्य रोगी सेवाएं प्रदान करता है, एक ऐसा वातावरण बनाती है जहां निदान, उपभोग्य सामग्रियों, दवाओं और गहन देखभाल की अनियंत्रित लागतें लगातार कमजोर परिवारों को कर्ज में धकेलती हैं। समिति आगे यह भी नोट करती है कि बाह्य रोगी उपचार, जिसमें मुख्य रूप से परामर्श और दवा की लागत शामिल होती है, मौजूदा बीमा ढांचे द्वारा सबसे कम संरक्षित क्षेत्र बना हुआ है, जो अत्यधिक रूप से अस्पताल में भर्ती होने पर केंद्रित है। परिणामस्वरूप, समिति का मानना है कि मौजूदा स्वास्थ्य बीमा योजनाएं बाह्य रोगी उपचार के भारी वित्तीय बोझ, विशेष रूप से दवाओं की आवर्ती लागत को पर्याप्त रूप से हल नहीं करती हैं। इसलिए, समिति सिफारिश करती है कि सरकार खुदरा फार्मेसियों सहित निजी स्वास्थ्य सुविधाओं में मूल्य निर्धारण को मानकीकृत और सीमित करने के लिए कड़े नियामक तंत्र स्थापित करे। साथ ही, यह अनिवार्य है कि पीएम–जेएवाई जैसी मौजूदा सार्वजनिक स्वास्थ्य बीमा योजनाओं का दायरा बाह्य रोगी परामर्श, नैदानिक मूल्यांकन, दवा लागत और अस्पताल से छुट्टी के बाद की देखभाल को व्यापक रूप से शामिल करने के लिए बढ़ाया जाए।
(पैरा 2.2.10)
22. समिति का यह विचार है कि एक गहरा विरोधाभास मौजूद है, जहाँ भारत, जिसे अपने मज़बूत जेनेरिक दवा उद्योग के लिए विश्व स्तर पर ‘दुनिया की फार्मेसी‘ के रूप में मान्यता प्राप्त है, फिर भी अपने नागरिकों को दवाओं के लिए भारी वित्तीय बोझ उठाने के लिए छोड़ देता है। समिति ने चिंता के साथ नोट किया कि कुल फार्मास्युटिकल व्यय मौजूदा स्वास्थ्य व्यय का लगभग 30 प्रतिशत है, जिसमें प्रदाता के अनुसार केवल फार्मेसियों का हिस्सा सीएचई का 21 प्रतिशत से अधिक है, जो दवाओं को देश के स्वास्थ्य देखभाल खर्च का सबसे बड़ा पहचाने जाने योग्य घटक बनाता है। समिति का विचार है कि चूंकि इस तरह के दवा संबंधी खर्च का वित्तपोषण बीमा या सरकारी योजनाओं के बजाय सीधे परिवारों द्वारा किया जाता है, इसलिए यह भारत में लगातार उच्च आओपीई के प्रमुख संरचनात्मक कारकों में से एक है। समिति का मानना है कि मरीजों की यह मजबूरी गरीबी का एक प्रमुख कारण है, विशेष रूप से उन परिवारों के लिए जो दीर्घकालिक बीमारियों से जूझ रहे हैं। अतः, समिति सरकार को सिफारिश करती है कि वह सभी स्तरों के सार्वजनिक स्वास्थ्य केंद्रों में मुफ्त आवश्यक दवाओं की निर्बाध आपूर्ति सुनिश्चित करने के लिए पहलों का सक्रिय रूप से विस्तार करे और कड़ाई से निगरानी करे। इसके अतिरिक्त, सरकार को खुले बाजार में जीवन रक्षक दवाओं और बिना पर्चे के मिलने वाली दवाओं पर अधिक कठोर मूल्य नियंत्रण लागू करने पर विचार करना चाहिए ताकि उपभोक्ताओं को शोषणकारी मूल्य निर्धारण से बचाया जा सके, और दवा संबंधी खर्च को प्रत्यक्ष घरेलू लागत के रूप में छोड़ने के बजाय पूर्व–भुगतान और बीमाकृत स्वास्थ्य वित्तपोषण के दायरे में लाने के लिए सक्रिय रूप से काम करना चाहिए।
(पैरा 2.2.11)
23. समिति का मानना है कि गैर–संक्रामक रोगों (एनसीडी) के उपचार की लंबी और बार–बार होने वाली प्रक्रिया निम्न आय वाले परिवारों को लगातार स्वास्थ्य संबंधी भारी खर्च की ओर धकेलती है, जिससे वित्तीय सुरक्षा में व्यापक प्रणालीगत लाभ प्रभावी रूप से निष्प्रभावी हो जाते हैं। समिति का मानना है कि इस प्रकार की दीर्घकालिक देखभाल में स्वाभाविक रूप से दवाओं की अधिक आवश्यकता होती है, जिसके लिए निरंतर और अक्सर जीवन भर दवाइयों से उपचार की आवश्यकता होती है, और चूंकि यह बार-बार होने वाला दवा व्यय, जो कि अस्पताल में भर्ती होने पर मिलने वाले बीमा कवर में आमतौर पर शामिल नहीं होता, एनसीडी से पीड़ित परिवारों में जेब से होने वाला खर्च (ओओपीई) ज़्यादा बना रहने का एक प्रमुख कारण है। मौजूदा सार्वजनिक वित्तपोषण और बीमा योजनाओं में सीमित कवरेज के कारण, इसका सीधा असर परिवारों पर पड़ता है और उन्हें अपनी जेब से भुगतान करना पड़ता है। इसलिए, समिति दीर्घकालिक बीमारियों के प्रबंधन को लक्षित करते हुए विशेष वित्तीय सहायता ढांचे और उन्नत बीमा उप–सीमाओं के निर्माण की सिफारिश करती है, जिसमें आवर्ती दवा लागतों के लिए विशिष्ट प्रावधान शामिल हों। इन सुरक्षा जालों से दीर्घकालिक बीमारियों से पीड़ित रोगियों के लिए आवश्यक निदान, उपचार, आवश्यक दवाएं और चिकित्सा परामर्श तक आजीवन, भारी सब्सिडी वाली पहुंच की गारंटी मिलनी चाहिए।
(पैरा 2.2.12)
24. समिति का मानना है कि सरकारी स्वास्थ्य व्यय (जीएचई) में जो स्पष्ट प्रगति दिखाई दी, जो 2021-22 में जीडीपी के 1.84 प्रतिशत के उच्चतम स्तर पर पहुंच गई थी, वह कोविड राहत और टीकाकरण पर किए गए एकमुश्त खर्च के कारण हुई एक असामान्य स्थिति थी। महामारी के वर्ष के इस आंकड़े पर निर्भर रहने से 2.5 प्रतिशत के लक्ष्य की ओर प्रगति का भ्रामक प्रभाव पड़ा। यह विकृति केवल तब दूर हुई जब 2022-23 के विलंबित अनुमानों ने 1.43 प्रतिशत पर तीव्र वापसी का खुलासा किया, जो महामारी से पहले के आधारभूत स्तर के बेहद करीब थी। समिति का मानना है कि राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति 2017 के तहत परिकल्पित वैधानिक लक्ष्य को आपातकालीन वित्तीय चक्रों से मुक्त रखा जाना चाहिए। अत:, समिति सिफारिश करती है कि स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय, वित्त मंत्रालय के परामर्श से, एक वित्तीय दृष्टिकोण तैयार करे वार्षिक आधार पर लागत–आधारित प्रगति को चित्रित करे। यह केवल एक महत्वाकांक्षी लक्ष्य से आगे बढ़कर, यह विस्तारपूर्वक बताए कि जीएचई वर्तमान स्तर, यानी जीडीपी के 1.43 प्रतिशत से बढ़कर संशोधित लक्ष्य के साथ 2.5 प्रतिशत तक कैसे पहुंचेगा, लेकिन इसके लिए एक बाध्यकारी समयसीमा निर्धारित हो। इस प्रगति को एक वर्षीय आवंटन के बजाय बहुवर्षीय बजटीय प्रतिबद्धताओं द्वारा सुनिश्चित किया जाना चाहिए, क्योंकि एकल आवंटन कटौती के प्रति संवेदनशील होते हैं। प्रगति की रिपोर्ट संसद को वार्षिक आधार पर अवश्य प्रस्तुत की जानी चाहिए।
(पैरा 2.2.13)
25. समिति का मानना है कि व्यापक राजकोषीय ढांचे के भीतर स्वास्थ्य सेवाओं को दी जाने वाली प्राथमिकता महामारी के बाद चिंताजनक रूप से कम हो गई है। आंकड़ों से स्पष्ट है कि कुल सरकारी व्यय (जीजीई) के प्रतिशत के रूप में सरकारी स्वास्थ्य व्यय (जीएचई) 2021-22 में 6.12 प्रतिशत के उच्चतम स्तर से गिरकर 2022-23 में मात्र 4.89 प्रतिशत रह गया, जो कि 2019-20 में महामारी से पहले के 5.02 प्रतिशत के स्तर से भी नीचे है। समिति का मानना है कि सार्वजनिक स्वास्थ्य आपातकाल समाप्त होने के बाद स्वास्थ्य संबंधी आवंटन को बचाए जाने को महत्वपूर्ण न समझना, स्वास्थ्य प्रणाली की संरचनात्मक अखंडता और लचीलेपन को मौलिक रूप से कमजोर करता है। इसलिए, समिति सिफारिश करती है कि सरकार को कुल सरकारी व्यय के एक निश्चित अनुपात के रूप में स्वास्थ्य आवंटन के लिए एक वैधानिक न्यूनतम सीमा निर्धारित करनी चाहिए और उसका पालन करना चाहिए। इस प्रकार के बजटीय प्रावधान और आवंटन यह सुनिश्चित करेंगे कि स्वास्थ्य सेवा राष्ट्रीय और राज्य के बजटों में स्थायी रूप से प्राथमिकता प्राप्त स्थिति बनाए रखे, और गैर–महामारी वाले वर्षों के दौरान सार्वजनिक स्वास्थ्य निवेशों को अन्य क्षेत्रों के पक्ष में कम प्राथमिकता दिए जाने या हाशिए पर जाने से स्पष्ट रूप से सुरक्षित रखे।
(पैरा 2.2.14)
26. समिति का मत है कि महामारी के दौरान वित्तीय सुरक्षा में जो लाभ देखे गए, वे मूलतः गैर–संरचनात्मक थे। 2021-22 में जेब से होने वाले व्यय (ओओपीई) में कुल स्वास्थ्य व्यय (टीएचई) के 39.4 प्रतिशत तक की कमी आपातकालीन स्तर के सार्वजनिक व्यय पर बहुत हद तक निर्भर थी, जिसने निजी खर्चों को कम कर दिया;परिणामस्वरूप, सरकारी खर्च में कमी आने के कारण 2022-23 में ओओपीई वापस 43.4 प्रतिशत पर पहुँच गया। टीएचई के प्रतिशत के रूप में घरेलू स्वास्थ्य व्यय ने 2021-22 में 44.10 से 2022-23 में 49.10 तक समान विपरीत पैटर्न का अनुसरण किया। समिति का मानना है कि वास्तविक वहनीयता के लिए नागरिकों को इन उतार–चढ़ाव भरे चक्रों से बचाना आवश्यक है, जो जेब से होने वाले अस्थिर खर्चों, विशेष रूप से असंगठित निजी क्षेत्र में, के जोखिम को कम करते हैं। इसलिए, समिति बीमा/सामूहिक स्वास्थ्य वित्तपोषण तंत्रों को व्यापक रूप से बढ़ाने और मजबूत करने की सिफारिश करती है। इसमें पीएम–जेएवाई कवरेज का विस्तार करना, राज्य स्वास्थ्य बीमा योजनाओं को मजबूत करना और सार्वजनिक सुविधाओं में प्राथमिक और माध्यमिक देखभाल की उपलब्धता में सुधार करना शामिल है ताकि रोगियों को महंगे निजी क्षेत्र में जाने से रोका जा सके। इसके अतिरिक्त, समिति सरकारी व्यय बढ़ाने और दवाओं, निदान उपकरणों तथा चिकित्सा उपकरणों की कीमतों को सीमित करने के लिए एक वैधानिक लक्ष्य निर्धारित करने की सिफारिश करती है, ताकि कुल स्वास्थ्य व्यय (टीएचई) के प्रतिशत के रूप में जेब से होने वाले खर्च (ओओपीई) को 30 प्रतिशत से कम किया जा सके, और इसे एक विशिष्ट लक्ष्य वर्ष से जोड़ा जा सके।
(पैरा 2.2.15)
27. समिति इस बात को ध्यान में रखती है कि पूंजीगत स्वास्थ्य व्यय ही एकमात्र ऐसा मापदंड है जो निरंतर और स्थिर सुधार को दर्शाता है, और यह टीएचई के 9.5 प्रतिशत से बढ़कर 13.0 प्रतिशत हो गया है, जो अस्पतालों, उपकरणों, अनुसंधान एवं विकास तथा चिकित्सा शिक्षा/प्रशिक्षण में निवेश को दर्शाता है। चिकित्सा शिक्षा, भौतिक अवसंरचना और अनुसंधान एवं विकास में किया गया यह ठोस निवेश दीर्घकालिक स्वास्थ्य सेवा सुलभता का आधार है। हालांकि, समिति का मानना है कि 13 प्रतिशत होने पर भी, कुल स्वास्थ्य व्यय (टीएचई) के प्रतिशत के रूप में पूंजी आवंटन, सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवा (ग्रामीण अस्पताल, नैदानिक क्षमता, तृतीयक देखभाल, चिकित्सा शिक्षा सीटें) में बुनियादी ढांचे की कमी के मुकाबले अभी भी गंभीर रूप से अपर्याप्त है। इसलिए, समिति सिफारिश करती है कि सरकार स्वास्थ्य बजट के भीतर पूंजीगत व्यय परिव्यय को सक्रिय रूप से बढ़ाए। इस बढ़ी हुई धनराशि को अवसंरचना के तीव्र विस्तार, उन्नत चिकित्सा उपकरणों की खरीद और स्वास्थ्य कर्मियों के प्रशिक्षण क्षमता को बढ़ाने के लिए सक्रिय रूप से से आरक्षित किया जाना चाहिए, जिससे वर्तमान व्यय प्राथमिकताओं में उतार–चढ़ाव से अवसंरचना विकास सुरक्षित रहे और दीर्घकालिक सुलभता सुनिश्चित हो सके।
(पैरा 2.2.16)
28. समिति का मानना है कि डेटा में देरी और अपर्याप्त वर्गीकरण के कारण प्रभावी नीति निर्माण मौलिक रूप से बाधित होता है, जैसा कि मई 2026 में 2022-23 के एनएचए अनुमानों के विलंबित प्रकाशन और उद्यम व्यय के लिए 2013-14 के सर्वेक्षण अनुमानों पर निरंतर निर्भरता से स्पष्ट है। समिति का विचार है कि इस तरह के समय अंतराल स्वास्थ्य सेवा की किफायत की वास्तविक स्थिति के बारे में भ्रामक वित्तीय धारणाएं पैदा करते हैं। इसके अलावा, समिति पाती है कि वर्तमान पद्धति (राष्ट्रीय स्वास्थ्य लेखा एवं अभ्यास) निजी क्षेत्र, दंत चिकित्सा और पुनर्वास देखभाल व्यय को पर्याप्त रूप से दर्ज करने में विफल है। अतः समिति सिफारिश करती है कि स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय स्वास्थ्य सेवा डेटा संग्रह को स्वचालित करने के लिए उन्नत डिजिटल प्रणालियों और कृत्रिम बुद्धिमत्ता–सक्षम डेटा संग्रह प्रणालियों में तत्काल निवेश करे। इस प्रकार के तकनीकी सुधार से यह सुनिश्चित होना चाहिए कि एनएचए अनुमान आगामी वित्तीय वर्ष की अंतिम तिमाही तक प्रकाशित हो जाएँ। इसके अलावा, निजी क्षेत्र, दंत चिकित्सा, पुनर्वास देखभाल और स्वायत्त निकायों द्वारा किए गए व्यय को सटीक रूप से दर्ज करने के लिए व्यापक, अद्यतन सर्वेक्षण कराए जाने चाहिए।
(पैरा 2.2.18)
बीमा पैठ और वित्तीय सुरक्षा
29. स्वास्थ्य पर कम सार्वजनिक व्यय ने सार्वजनिक क्षेत्र में स्वास्थ्य सेवाओं की क्षमता और गुणवत्ता को सीमित कर दिया है, जिसके परिणामस्वरूप लगभग दो-तिहाई स्वास्थ्य सेवाओं का उपयोग महंगे निजी क्षेत्र में हो रहा है। फलस्वरूप, परिवार चिकित्सा खर्चों के कारण भारी स्वास्थ्य व्यय और गरीबी के शिकार बने रहते हैं। अतः, समिति इस बात पर बल देती है कि स्वास्थ्य बीमा के माध्यम से पूर्व-भुगतान और जोखिम-पूलिंग तंत्र, परिवारों को स्वास्थ्य संबंधी झटकों से बचाने और जेब से होने वाले खर्च को कम करने के लिए अपरिहार्य साधन हैं।
(पैरा 2.2.25)
30. समिति का विचार है कि “मिसिंग मिडिल”, जिसमें 40 करोड़ से अधिक व्यक्ति या जनसंख्या का 30% हिस्सा शामिल है, एक अनूठी चुनौती पेश करता है, क्योंकि उनके पास मामूली प्रीमियम का भुगतान करने की वित्तीय क्षमता है, लेकिन वे पूरी तरह से सब्सिडी वाली सरकारी योजनाओं और अत्यधिक महंगे निजी उत्पादों, दोनों से वंचित हैं। समिति का मानना है कि केवल मौजूदा ढांचों पर निर्भर रहना इस जनसांख्यिकी के लिए पर्याप्त नहीं होगा, जिसमें मुख्य रूप से अनौपचारिक क्षेत्र और स्वरोजगार वाले श्रमिक शामिल हैं। इसलिए, समिति सरकार और निजी क्षेत्र के सहयोगात्मक प्रयास से एक सुव्यवस्थित, स्वैच्छिक और अंशदायी बीमा मॉडल शुरू करने की सिफारिश करती है। विशेष रूप से, समिति आरोग्य संजीवनी योजना पर आधारित एक संशोधित, उच्च मानकीकृत उत्पाद विकसित करने की सिफारिश करती है, जिसकी संरचनात्मक कीमत प्रति परिवार प्रति वर्ष 4,000 रुपये से 6,000 रुपये के बीच हो। व्यापक उपयोग सुनिश्चित करने के लिए, इस उत्पाद में रोग कवरेज के लिए प्रतीक्षा अवधि को निश्चित रूप से कम किया जाना चाहिए और इसमें स्पष्ट रूप से आउट पेशेन्ट (ओपीडी) लाभ शामिल होने चाहिए।
(पैरा 2.2.26)
31. समिति यह भी समुक्ति करती है कि निजी स्वास्थ्य बीमा की पैठ शहरी और उच्च-आय वाले समूहों तक ही केंद्रित है, जबकि ग्रामीण क्षेत्रों और असंगठित क्षेत्र के श्रमिकों में इसका कवरेज सीमित है। बीमा प्रीमियम में वृद्धि, कुछ सेवाओं को शामिल न किए जाने, प्रतीक्षा अवधि, सह–भुगतान, दावों की अस्वीकृति और बाह्य रोगी देखभाल, निदान और दीर्घकालिक रोगों के प्रबंधन के सीमित कवरेज को लेकर भी चिंता व्यक्त की गई। समिति ने यह भी पाया कि दावों के निपटान में देरी और तृतीय–पक्ष प्रशासकों (टीपीए) के कामकाज में अक्षमताएँ स्वास्थ्य बीमा तंत्र में जनता के विश्वास को प्रतिकूल रूप से प्रभावित करती हैं। समिति इस बात को लेकर चिंतित है कि विभिन्न अस्पतालों में एक ही प्रक्रिया के लिए बीमा दावा शुल्क बहुत अधिक है। समिति स्पष्ट रूप से पारदर्शी, भलीभाँति नियमित किए गए स्वास्थ्य बीमा क्षेत्र की पुरजोर सिफारिश करती है जहाँ दावे निपटान की तारीख खुली पहुँच वाले एक सामान्य पोर्टल पर एकीकृत हो। इससे बीमा दावों के निपटान में पारदर्शिता सुनिश्चित होगी।
(पैरा 2.2.27)
32. समिति का यह मत है कि यद्यपि भारत ने एबी–पीएमजेएवाई जैसी पहलों, सार्वजनिक निवेश में वृद्धि और सस्ती दवाओं के कार्यक्रमों के माध्यम से स्वास्थ्य बीमा कवरेज का विस्तार करने और जेब से होने वाले खर्च को कम करने में महत्वपूर्ण प्रगति की है, फिर भी वित्तीय सुरक्षा में पर्याप्त कमियां बनी हुई हैं। दवाओं, जांच और बाह्य रोगी देखभाल (आउटपेशेंट केयर) पर खर्च का निरंतर बोझ, असंगठित क्षेत्र के श्रमिकों और “मिसिंग मिडिल” में बीमा की अपर्याप्त पहुंच, और दावा प्रबंधन तथा निजी स्वास्थ्य देखभाल की लागत से संबंधित चिंताएं, निरंतर नीतिगत हस्तक्षेप की आवश्यकता को रेखांकित करती हैं। सार्वभौमिक स्वास्थ्य कवरेज प्राप्त करने के लिए सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यय में वृद्धि, प्राथमिक स्वास्थ्य प्रणालियों को मजबूत करने, अस्पताल में भर्ती होने से परे वित्तीय सुरक्षा के विस्तार, बीमा से वंचित आबादी के लिए किफायती बीमा उत्पाद, मुफ्त दवाओं और निदान की व्यापक उपलब्धता, जेनेरिक दवाओं को अधिक अपनाने और परिवारों को अत्यधिक स्वास्थ्य व्यय और गरीबी से प्रभावी ढंग से बचाने के लिए एक मजबूत डिजिटल स्वास्थ्य बीमा पारिस्थितिकी तंत्र की आवश्यकता होगी।
(पैरा 2.2.35)
33. समिति समुक्ति करती है कि नियोक्ता–प्रायोजित बीमा योजनाएँ वर्तमान में सरकारी योजनाओं की तुलना में जेब से होने वाले खर्च (ओओपीई) को कम करने में कहीं अधिक प्रभावी साबित हो रही हैं। समिति का मानना है कि यह प्रभावशीलता व्यापक कवरेज सीमाओं से सीधे तौर पर जुड़ी है, जिनमें नियमित ओपीडी दौरे, निदान और विशिष्ट दवाओं के लिए कतिपय छिपे हुए खर्च और उच्च गुणवत्ता वाले सेवा प्रदाता नेटवर्क तक निर्बाध पहुँच शामिल है। समिति का मत है कि स्वास्थ्य संबंधी अत्यधिक और विकराल खर्चों को रोकने के लिए सरकारी योजनाओं में भी इन संरचनात्मक लाभों को शामिल किया जाना चाहिए। इसलिए, समिति सार्वजनिक बीमा योजनाओं के तहत स्वास्थ्य लाभ पैकेजों (एचबीपी) के साक्ष्य–आधारित विस्तार की सिफारिश करती है, जिसमें औपचारिक तौर पर व्यापक ओपीडी सेवाएं, मनोरोग संबंधी विकार, पुरानी गैर–संक्रामक बीमारियों (एनसीडी) का प्रबंधन और पुनर्वास शामिल हो, ताकि रोगी महंगे निजी देखभाल विकल्पों की ओर उन्मुख न हों।
(पैरा 2.2.36)
34. समिति इस बात पर ज़ोर देती है कि वर्तमान गैर-सरकारी बीमा बाजार उच्च आय वर्ग की ओर अत्यधिक झुका हुआ है, ग्रामीण और अनौपचारिक क्षेत्रों में इसकी पहुंच अस्वीकार्य रूप से कम होने के साथ ही इसका पूरा ध्यान अस्पताल में भर्ती मरीजों की देखभाल पर केंद्रित है। इसके अलावा, धीमी दावा निपटान प्रक्रिया और सेवाओं से चयनात्मक इंकार जैसी व्यापक अक्षमताएं जनता के विश्वास को गंभीर रूप से कमजोर करती हैं। समिति का मानना है कि बीमाकर्ताओं या सूचीबद्ध अस्पतालों द्वारा मनमाने मूल्य निर्धारण और दावा हेरफेर के खिलाफ सख्त नियामक शास्तियां लगाई जाएं। इसलिए, समिति वास्तविक समय में पारदर्शी दावा प्रसंस्करण सुनिश्चित करने के लिए सभी हितधारकों – बीमाकर्ताओं, टीपीए और स्वास्थ्य सेवा प्रदाताओं – को राष्ट्रीय स्वास्थ्य दावा एक्सचेंज (एनएचसीएक्स) में अनिवार्य रूप से एकीकृत करने की सिफारिश करती है। इसके अलावा, समिति सिफारिश करती है कि राष्ट्रीय धोखाधड़ी विरोधी इकाई (एनएएफयू) जानबूझकर की गई देरी के लिए भारी दंड लगाने हेतु एआई–संचालित ट्रिगर्स का लगातार उपयोग करे और यह सुनिश्चित करे कि सभी गैर-सरकारी बीमा उत्पाद सार्वभौमिक स्वास्थ्य कवरेज के व्यापक दृष्टिकोण के अनुरूप हों।
(पैरा 2.2.37)
35. समिति का मत है कि किफायती स्वास्थ्य सेवा की नींव पूर्णतः कार्यशील सार्वजनिक अवसंरचना और दवाइयों की लागत के सख्त नियमन पर टिकी है। समिति का मानना है कि ब्रांडेड दवाओं, फार्मेसी में होने वाली अनियमितताओं और एंटीबायोटिक दवाओं के अनुचित उपयोग के कारण होने वाली अत्यधिक लागत को कम करने के लिए व्यापक और निरंतर हस्तक्षेप की आवश्यकता है। अतः समिति सभी केंद्रीय संस्थानों में राष्ट्रीय आवश्यक औषधि सूची (एनएलईएम) दवाओं की उपलब्धता और निदान संबंधी लागतों का आकलन करने के लिए औषध और टीका वितरण एवं प्रबंधन प्रणाली (डीवीडीएमएस) का उपयोग करते हुए तत्काल राष्ट्रीय लेखा परीक्षा करने की सिफारिश करती है। साथ ही, समिति राज्य स्वास्थ्य एजेंसियों को भारतीय सार्वजनिक स्वास्थ्य मानक (आईपीएचएस) 2022 के वेब–आधारित डैशबोर्ड का उपयोग करने की सिफारिश करती है ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि सभी स्वास्थ्य सुविधाओं में आवश्यक सेवा वितरण मानकों का अनुपालन किए जाने के साथ ही सभी नैदानिक संस्थानों में जेनेरिक दवाओं के प्रिस्क्रिप्शन के अनिवार्य नियम की सख्ती से निगरानी की जाए। समिति सिफारिश करती है कि सरकार को आईपीएचएस मानकों को पूरा करने के लिए बुनियादी ढांचे को उन्नत और मजबूत करने, रखरखाव करने, इन केंद्रों पर दवाओं की उपलब्धता सुनिश्चित करने, जहां आवश्यक हो वहां पीपीपी मोड के माध्यम से निदान सेवाओं को मजबूत करने, सभी के लिए वार्षिक स्वास्थ्य जांच को बढ़ावा देने, आयुष आधारित शाखाओं और आरोग्य मंदिरों को सशक्त बनाने के लिए प्रावधान करना चाहिए।
(पैरा 2.2.38)
36. समिति का मानना है कि आदिवासी और ग्रामीण क्षेत्रों में स्वास्थ्य और कल्याण केन्द्रों (एचडबल्यूसी), सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र (सीएचसी), और जिला अस्पतालों को उन्नत और सस्ते मेडिकल उपकरणों से लैस करने की तुरंत ज़रूरत है, ऐसे में दीर्घकालिक स्वास्थ्य परिणामों के लिए नवीनीकृत निदान प्रणालियों पर निर्भरता अवास्तविक है। समिति सिफारिश करती है कि मंत्रालय “मेक इन इंडिया” पहल के तहत वित्तीय और संरचनात्मक प्रोत्साहनों का पर्याप्त विस्तार करे ताकि देश भर की सभी द्वितीय और तृतीय स्तरीय सार्वजनिक स्वास्थ्य सुविधाओं के लिए सुरक्षित, नवीन और किफायती स्वदेशी चिकित्सा प्रौद्योगिकी की निर्बाध आपूर्ति सुनिश्चित की जा सके।
(पैरा 2.2.39)
37. समिति का मत है कि खुदरा फार्मेसियों में व्याप्त कुप्रथाओं के कारण रोगियों पर लगातार पड़ रहा वित्तीय बोझ और भी बढ़ जाता है। इन कुप्रथाओं में फार्मेसियां अधिकतम खुदरा मूल्य (एमआरपी) पर अत्यधिक लाभ कमाती हैं, फर्जी बिल बनाकर जीएसटी रिफंड का दुरुपयोग करती हैं और बिना प्रिस्क्रिप्शन के भी मनमाने ढंग से छूट देती हैं। इसके अलावा, समिति का मानना है कि लाभ कमाने के इन उद्देश्यों से प्रेरित एंटीबायोटिक दवाओं की अनियंत्रित, बिना प्रिस्क्रिप्शन के बिक्री से रोगाणुरोधी प्रतिरोध (एएमआर) का गंभीर खतरा और भी बढ़ जाता है। इसलिए, समिति खुदरा फार्मेसियों की आपूर्ति श्रृंखलाओं को लक्षित करते हुए सख्त, बहु–क्षेत्रीय ऑडिट करने की सिफारिश करती है ताकि अनुचित व्यापार मार्जिन पर अंकुश लगाया जा सके और फर्जी बिलिंग प्रथाओं के लिए दंडित किया जा सके। साथ ही, समिति केंद्रीय औषधि मानक नियंत्रण संगठन (सीडीएससीओ) से “रेड लाइन” अभियान और मौजूदा एफएसएसएआई और आईसीएमआर दिशानिर्देशों को व्यापक रूप से लागू करने की सिफारिश करती है ताकि वैध प्रिस्क्रिप्शन के बिना एंटीबायोटिक दवाओं की बिक्री पर पूर्णतः प्रतिबंध लगाया जा सके और पूरे देश में दवाओं के तर्कसंगत उपयोग को सुनिश्चित किया जा सके।
(पैरा 2.2.40)
38. समिति का मानना है कि एंटीमाइक्रोबियल प्रतिरोध (एएमआर) के बढ़ते खतरे को केवल क्लिनिकल प्रिस्क्रिप्शन दिशानिर्देशों से ही नहीं रोका जा सकता, क्योंकि पशु चिकित्सा और कृषि क्षेत्रों में एंटीबायोटिक्स का व्यापक दुरुपयोग मानव खाद्य श्रृंखला को भारी रूप से प्रदूषित करता है। इसलिए, समिति सिफारिश करती है कि भारतीय खाद्य सुरक्षा और मानक प्राधिकरण (एफ़एसएसएआई) की अधिसूचनाओं को सख्ती से और समन्वित तरीके से लागू किया जाए, जो मांस, पोल्ट्री और समुद्री भोजन प्रसंस्करण के सभी चरणों में 19 निर्दिष्ट एंटीबायोटिक्स के उपयोग को रोकते हैं। इसके अलावा, समिति सख्त राष्ट्रीय ऑडिट की सिफारिश करती है ताकि औषध और प्रसाधन नियमावली, 1945 के नियम 97 के साथ पूर्ण अनुपालन सुनिश्चित किया जा सके, जो खाद्य उत्पादक पशुओं को दी जाने ली दवाओं के लिए स्पष्ट लेबलिंग की अवधि अनिवार्य करता है। फार्मास्युटिकल सामग्री को नियंत्रित करने के अलावा, समिति का मानना है कि दवाओं की भौतिक अखंडता भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। इसलिए, समिति सिफारिश करती है कि केंद्रीय औषध मानक नियंत्रण संगठन (सीडीएससीओ) प्राथमिक पैकेजिंग के लिए कानूनी मानकों को सख्ती से लागू करे, विशेष रूप से कांच की बोतल कंटेनरों के उपयोग को बढ़ावा देने और नियंत्रित करने के लिए ताकि वितरित दवाओं की रासायनिक स्थिरता और सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके।
(पैरा 2.2.41)
39. समिति का मानना है कि एबी–पीएमजेएवाई निधि के उपयोग में दर्शाया गया 33% का अंतर उन प्रणालीगत बाधाओं को उजागर करता है जो सार्वभौमिक स्वास्थ्य कवरेज प्रदान करने की योजना की क्षमता को सीमित करती हैं। इसके अलावा, समिति का मानना है कि सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यय में कमी के कारण लगभग दो–तिहाई व्यक्ति अनिवार्य रूप से गैर-सरकारी क्षेत्र में उपचार कराने के लिए विवश हो जाते हैं। इसलिए, समिति सरकार से राज्य स्वास्थ्य एजेंसियों को अधिक बजटीय लचीलापन प्रदान करने की सिफारिश करती है, जिससे वे स्थानीय महामारी विज्ञान संबंधी आवश्यकताओं के अनुरूप लाभ पैकेजों को अनुकूलित कर सकें और निधि के वितरण में तेजी ला सकें। साथ ही, समिति एबी–पीएमजेएवाई नेटवर्क में कम से कम 4 लाख गैर-सरकारी अस्पताल बिस्तरों को रणनीतिक रूप से शामिल करने की सिफारिश करती है। यह लक्ष्य कागजी कार्रवाई रहित पैनलिंग को सुव्यवस्थित करके, छोटे अस्पतालों के लिए प्रशासनिक अनुपालन के बोझ को कम करके और अनुमानित मासिक भुगतान चक्र सुनिश्चित करके प्राप्त किया जाना चाहिए, साथ ही नैदानिक प्रतिष्ठान अधिनियम, 2010 के अंतर्गत अनिवार्य न्यूनतम बुनियादी ढांचे और स्टाफिंग मानकों का सख्ती से पालन करना चाहिए।
(पैरा 2.2.42)
40. समिति का मानना है कि आयुष्मान भारत–प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना (एबी–पीएमजेएवाई) ने वित्तीय सुरक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंच में उल्लेखनीय सुधार किया है, लेकिन इसके कुशल संचालन में कई परिचालन और कार्यान्वयन संबंधी चुनौतियां अभी भी बाधा बनी हुई हैं। समिति स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय और राष्ट्रीय स्वास्थ्य प्राधिकरण (एनएचए) से योजना के पैकेज ढांचे और आईटी प्लेटफॉर्म की व्यापक समीक्षा करने की सिफारिश करती है ताकि सभी मुद्दों का समाधान किया जा सके। समिति विशेष रूप से आपातकालीन और बहु–विशेषज्ञता मामलों में एक साथ कई पैकेजों के उपयोग की व्यवस्था करने, शल्य चिकित्सा की आवश्यकता वाले गंभीर रूप से बीमार आईसीयू रोगियों, द्विपक्षीय प्रक्रियाओं और एक साथ कई चिकित्सा और शल्य चिकित्सा स्थितियों वाले रोगियों के लिए उपयुक्त पैकेज कोड शुरू करने की सिफारिश करती है। समिति यह भी सिफारिश करती है कि एमआरआई और सीटी स्कैन जैसी उच्च लागत वाली जांचों के लिए वार्षिक उपयोग सीमा पोर्टल पर पारदर्शी रूप से प्रदर्शित की जाए और प्रतिपूर्ति और सेवा वितरण में एकरूपता सुनिश्चित करने के लिए सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में 2022 के पैकेज संशोधनों के लंबित कार्यान्वयन में तेजी लाई जाए।
(पैरा 2.2.43)
41. समिति जटिल मामलों के लिए फाइल अटैचमेंट क्षमता बढ़ाने, वास्तविक समय ट्रैकिंग और दावा अस्वीकृति के विस्तृत कारणों सहित एक सुदृढ़ क्वेरी प्रबंधन प्रणाली स्थापित करने और अंतर–राज्यीय और राज्य के बाहर के लाभार्थी संबंधी मुद्दों के समाधान के लिए नोडल अधिकारियों को नामित करके एबी–पीएमजेएवाई पोर्टल को सुदृढ़ करने की आवश्यकता को रेखांकित किया है। बकाया भुगतानों के बढ़ते भार और दावा निपटान में देरी के दृष्टिगत, समिति ने सूचीबद्ध अस्पतालों की वित्तीय स्थिरता सुनिश्चित करने के लिए सरकार से दावा प्रसंस्करण और प्रतिपूर्ति के लिए एक समयबद्ध तंत्र स्थापित करने का आग्रह किया है। समिति का मानना है कि पैकेज पात्रता, उपयोग सीमा, दावा स्थिति और क्वेरी समाधान के वास्तविक समय प्रदर्शन द्वारा अधिक पारदर्शिता से प्रशासनिक दक्षता में उल्लेखनीय सुधार होगा, विवाद कम होंगे और योजना का प्रभावी कार्यान्वयन सहित समावेशिता अधिक सुदृढ़ होगी।
(पैरा 2.2.44)
42. समिति का मानना है कि यद्यपि कर्मचारी राज्य बीमा निगम (ईएसआईसी) भारत के सामाजिक सुरक्षा ढांचे का एक महत्वपूर्ण स्तंभ बना हुआ है, फिर भी गिग अर्थव्यवस्था और अनौपचारिक श्रम के तेजी से प्रसार के कारण इसके तत्काल और व्यापक आधुनिकीकरण की आवश्यकता है। समिति का मत है कि प्रणालीगत अक्षमताएं, विशेष रूप से निजी अस्पतालों की अव्यवहारिक पैकेज दरें, विलंबित वित्तीय निपटान और जटिल रेफरल प्रक्रियाएं लाभार्थियों की महत्वपूर्ण तृतीयक स्वास्थ्य देखभाल तक पहुंच को गंभीर रूप से बाधित करती हैं। इन संरचनात्मक कमियों को दूर करने और प्रौद्योगिकी–आधारित, रोगी–केंद्रित पारितंत्र की दिशा में आगे बढ़ने के लिए समिति हितधारकों का विश्वास बहाल करने और जेब से होने वाले खर्च को कम करने के लिए रणनीतिक प्रशासनिक और डिजिटल सुधारों को तत्काल लागू करने की सिफारिश करती है।
(पैरा 2.2.45)
43. इसके अतिरिक्त, समिति ई–श्रम जैसे राष्ट्रीय डेटाबेस के माध्यम से असंगठित और प्लेटफॉर्म श्रमिकों को चरणबद्ध तरीके से शामिल करने के साथ ही लचीली अंशदान संरचनाओं का समर्थन करने की सिफारिश करती है। इसके अलावा, समिति का मानना है कि निगम को स्वचालित और समयबद्ध दावा प्रसंस्करण के लिए एक संपूर्ण डिजिटल संरचना लागू करनी चाहिए, एआई–संचालित धोखाधड़ी पहचान के साथ अंतरसंचालनीय इलेक्ट्रॉनिक स्वास्थ्य रिकॉर्ड स्थापित करने चाहिए और प्रमुख गैर-सरकारी स्वास्थ्य सेवा प्रदाताओं को प्रोत्साहित करने के लिए बाजार के अनुरूप उपचार पैकेज दरों को अनिवार्य करना चाहिए। अधिक प्रशासनिक स्वायत्तता, सुदृढ़ बहुभाषी शिकायत निवारण प्रणाली और प्रदर्शन मापदंडों में पूर्ण पारदर्शिता के माध्यम से ये उपाय निगम को भारत के सार्वभौमिक स्वास्थ्य कवरेज उद्देश्यों के साथ निर्णायक रूप से संरेखित करेंगे।
(पैरा 2.2.46)
सुविधाओं का भौगोलिक वितरण और क्षेत्रीय असमानताएं
44. समिति का मानना है कि सरकार को सबसे पहले आयुष्मान भारत यानी आरोग्य मंदिर के कार्यात्मक शाखा के मानदंडों को परिभाषित करना चाहिए। सरकार को राज्य सेवाओं में एक समान समझ और कार्यान्वयन सुनिश्चित करने के लिए बुनियादी ढांचे, मानव संसाधन, आपूर्ति की उपलब्धता और सेवाओं के स्तर आदि के संदर्भ में तकनीकी विनिर्देश के साथ सामने आना चाहिए। सभी 12 सेवा पैकेजों के कार्यान्वयन को सुनिश्चित करने और सभी आरोग्य मंदिरों में मानसिक स्वास्थ्य, वरिष्ठ, उपशामक, दंत चिकित्सा और नेत्र देखभाल जैसी कम सेवा वाली सेवाओं को मजबूत करने की जरूरत है। सरकार को महत्वपूर्ण रिक्तियों को भरना चाहिए, विशेष रूप से सीएचओ के लिए प्रोत्साहन और कैरियर पथ शुरू करना चाहिए और योग्यता आधार प्रशिक्षण को मजबूत करना चाहिए। स्थानीय आईईसी अभियानों का विस्तार करके और पंचायतों, जन आरोग्य समिति (जेएएस), महिला आरोग्य समिति (एमएएस) कमिटी ने सरकार को यह भी सुझाव दिया है कि वह एबीडीएम के हिसाब से भरोसेमंद आईटी इंफ्रास्ट्रक्चर की उपलब्धता सुनिश्चित करे और लगातार देखभाल और रेफरल के लिए आयुष्मान भारत हेल्थ अकाउंट (आभा) और इलेक्ट्रॉनिक स्वास्थ्य रिकॉर्ड (एचईआर) का इस्तेमाल करे। इसके अलावा, समुदाय-आधारित मूल्यांकन जांचसूची (सीबीएसी) को डिजिटाइज़ करने, आभा और एनसीडी पोर्टल के साथ एकीकृत करने, और प्रभावी स्क्रीनिंग और फॉलो-अप के लिए अग्रिम पंक्ति की कार्यकर्ता क्षमता बनाने और आयुष सेवाओं को एकीकृत करने की ज़रूरत है।
(पैरा 2.3.9)
डिजिटल स्वास्थ्य देखभाल पहल
45. समिति का मानना है कि स्वास्थ्य सेवा अवसंरचना और डिजिटल स्वास्थ्य सेवाओं के व्यापक विस्तार के बावजूद, देश भर में स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंच में क्षेत्रीय असमानताएं बनी हुई हैं। शहरी क्षेत्रों में विशेषज्ञ सेवाओं और उन्नत स्वास्थ्य सुविधाओं का केंद्रीकरण, साथ ही ग्रामीण और दूरस्थ क्षेत्रों में स्वास्थ्य कर्मियों और अवसंरचना की कमी, स्वास्थ्य सेवाओं तक समान पहुंच को बाधित करती है। समिति सीएचसी स्तर पर सर्जन, गायनाकोलॉजिस्ट, पेडियाट्रिशियन, ऑर्थोपेडिशियन जैसे पोस्ट ग्रेजुएट विशेषज्ञों को तैनात पुरजोर सिफ़ारिश करती है। समिति का यह सुविचारित मत है कि सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवा अवसंरचना में निरंतर निवेश, स्वास्थ्य सुविधाओं और मानव संसाधनों का भौगोलिक रूप से संतुलित वितरण, रेफरल और आपातकालीन परिवहन प्रणालियों को सुदृढ़ करना, डिजिटल स्वास्थ्य सेवाओं का विस्तार, कम सेवा वाले क्षेत्रों में निजी क्षेत्र की भागीदारी को प्रोत्साहित करना और कम सेवा वाले क्षेत्रों के लिए लक्षित हस्तक्षेप, देश भर में गुणवत्तापूर्ण स्वास्थ्य सेवाओं तक समान पहुंच सुनिश्चित करने के लिए आवश्यक हैं।
(पैरा 2.3.15)
46. समिति का मत है कि प्रधानमंत्री आयुष्मान भारत स्वास्थ्य अवसंरचना मिशन (पीएम–एबीएचआईएम), जिसके लिए 64,180 करोड़ रुपये का बजट आवंटित किया गया है, के माध्यम से महत्वपूर्ण संरचनात्मक सुधारों की शुरुआत की गई है, लेकिन स्वास्थ्य सेवा अवसंरचना में शहरी–ग्रामीण असमानता को देखते हुए त्वरित हस्तक्षेप की आवश्यकता है। 1.80 लाख आयुष्मान आरोग्य मंदिरों का संचालन, साथ ही लक्षित रूप से स्थापित 3,382 ब्लॉक सार्वजनिक स्वास्थ्य इकाइयां (बीपीएचयू), 730 जिला एकीकृत सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रयोगशालाएं (आईपीएचएल) और 602 गहन चिकित्सा अस्पताल ब्लॉक (सीसीबी) एक सुदृढ़ आधार प्रदान करते हैं। इसके अलावा, समिति ने प्रधान मंत्री स्वास्थ्य सुरक्षा योजना (पीएमएसएसवाई) के तहत उल्लेख्नीय विस्तार को भी नोट किया है, जिसमें 22 नए एम्स की स्थापना और 75 सरकारी मेडिकल कॉलेजों का उन्नयन शामिल है। समिति का मानना है कि मेडिकल कॉलेजों की संख्या में हुई वृद्धि और स्नातक तथा स्नातकोत्तर सीटों में हुई भारी वृद्धि का रणनीतिक रूप से उपयोग करके सीएचसी स्तर पर प्रशिक्षित पोस्ट ग्रेजुएट डॉक्टरों को पदस्थापित करके स्वास्थ्य देखभाल तक पहुंच में सुधार करके क्षेत्रीय मानव संसाधन की कमी को दूर किया जाना चाहिए। इसलिए, समिति सरकार को भौगोलिक रूप से अनुकूलित तैनाती नीति लागू करने की सिफारिश करती है, जिसमें चिकित्सा पेशेवरों की बढ़ी हुई संख्या को कमी वाले राज्यों, आदिवासी क्षेत्रों और आकांक्षी जिलों में अनिवार्य सेवा अवधि से सीधे जोड़ा जाए। इसके अलावा, लक्षित 17,788 भवन रहित उप–केंद्रों में बुनियादी ढांचे की कमियों को दूर करने के लिए तत्काल निर्माण को प्राथमिकता दी जानी चाहिए ताकि भौतिक पहुंच सुनिश्चित हो सके। समिति इन क्षेत्रों में चिकित्सा पेशेवरों के लिए बढ़ी हुई सुविधाओं की सिफारिश करती है।
(पैरा 2.3.16)
47. समिति का मत है कि आयुष्मान भारत डिजिटल मिशन (एबीडीएम) ने स्वास्थ्य सेवाओं की उपलब्धता में मौलिक परिवर्तन किया है। 82.84 करोड़ से अधिक ‘आभा’ आईडी का निर्माण, स्वास्थ्य सुविधा रजिस्ट्री (एचएफआर) में 4.33 लाख स्वास्थ्य सुविधाओं का पंजीकरण और 77 करोड़ स्वास्थ्य रिकॉर्ड का लिंक होना इस बात का प्रमाण है। ई–संजीवनी की अभूतपूर्व सफलता, जिसने 1.36 लाख आयुष्मान आरोग्य मंदिरों में हब–एंड–स्पोक मॉडल के माध्यम से 42.5 करोड़ से अधिक परामर्श सेवाएं प्रदान की हैं, यह साबित करती है कि डिजिटल हस्तक्षेप भौगोलिक दूरियों को प्रभावी ढंग से पाट सकते हैं। टीकाकरण के लिए यू-विन पोर्टल का शुभारंभ और आरोग्यसेतु का एक व्यापक राष्ट्रीय स्वास्थ्य ऐप में परिवर्तन इस प्रणाली को और मजबूत बनाता है। समिति का मानना है कि डिजिटल अपनाने की गति को बनाए रखने के लिए निरंतर प्रोत्साहन और उन्नत तकनीकी एकीकरण आवश्यक है। अतः समिति सिफारिश करती है कि डिजिटल स्वास्थ्य प्रोत्साहन योजना (डीएचआईएस) का व्यापक विस्तार किया जाए ताकि यह डॉक्टरों और अस्पतालों के लिए एक सशक्त “कैशबैक” और वित्तीय पुरस्कार तंत्र के रूप में कार्य कर सके, जिससे अपनाने की लागत कम हो और इलेक्ट्रॉनिक स्वास्थ्य रिकॉर्ड (ईएचआर) के निर्माण को प्रोत्साहन मिले। इसके अतिरिक्त, समिति कृत्रिम बुद्धिमत्ता के उपयोग में तेजी लाने, नैदानिक निर्णय सहायता प्रणाली (सीडीएसएस) का लाभ उठाने और आईआईटी कानपुर और वधवानी संस्थान जैसे संस्थानों के साथ साझेदारी करने की सिफारिश करती है ताकि शहरी और दूरस्थ दोनों क्षेत्रों में निर्बाध रूप से नुस्खे तैयार करने के लिए प्रारंभिक जांच, स्मार्ट निदान और परिवेश श्रवण उपकरणों को सक्षम बनाया जा सके।
(पैरा 2.3.17)
48. समिति का मानना है कि शहरी क्षेत्रों में उन्नत स्वास्थ्य सुविधाओं का केंद्रीकरण विरोधाभासी रूप से शहरी झुग्गी–झोपड़ियों में रहने वाली और कमजोर आबादी के लिए अत्यधिक जेब खर्च और कॉर्पोरेट स्वास्थ्य एकाधिकार का जोखिम उत्पन्न करता है। राष्ट्रीय शहरी स्वास्थ्य मिशन (एनयूएचएम) के तहत किए गए अंत:क्षेप इस असमानता को दूर करने के लिए महत्वपूर्ण हैं। 7,998 शहरी उप–स्वास्थ्य केंद्रों (यूएसएचसी), 5,401 शहरी प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों (यू–पीएचसी), 1,373 पॉलीक्लिनिक और 240 शहरी सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों (यू–सीएचसी) का संचालन शहरी स्वास्थ्य सेवा में समुदाय–आधारित प्रतिबद्धता को दर्शाता है। समिति का मानना है कि प्रवासी और झुग्गी–झोपड़ी में रहने वाली आबादी के लिए वास्तव में वहनीयता सुनिश्चित करने के लिए, प्राथमिक और माध्यमिक देखभाल के लिए गैर-सरकारी सेवा प्रदाताओं पर निर्भरता को कम करने के लिए सार्वजनिक शहरी स्वास्थ्य अवसंरचना का आक्रामक रूप से विस्तार किया जाना चाहिए। अतः समिति सभी महानगरों में 100 बिस्तरों वाले उच्च चिकित्सा स्वास्थ्य केंद्रों (यूरोपीय स्वास्थ्य केंद्रों) की तीव्र वृद्धि की सिफारिश करती है, साथ ही शहरी सार्वजनिक अस्पतालों में भीड़भाड़ को नियंत्रित करने के लिए राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन (एनएचएम) के तहत विशेष निधि उपलब्ध कराने की भी सिफारिश करती है। इसके साथ ही, ऐसे नीतिगत ढांचे भी लागू किए जाने चाहिए जिनके तहत द्वितीय और तृतीयक श्रेणी के शहरों में तृतीयक देखभाल और निदान सुविधाएं स्थापित करने के इच्छुक गैर-सरकारी क्षेत्र की संस्थाओं को कम ब्याज दर पर ऋण और कर प्रोत्साहन प्रदान किए जा सकें, जिससे गैर-सरकारी निवेश को संतृप्त महानगरों से हटाकर कमी वाले क्षेत्रों की ओर निर्देशित किया जा सके।
(पैरा 2.3.18)
49. समिति इस बात पर चिंता व्यक्त करती है कि स्वास्थ्य आपात स्थितियों, संक्रामक रोगों के प्रकोप और आपदाओं के दौरान क्षेत्रीय असमानताएं स्पष्ट रूप से सामने आती हैं। महानगरीय सार्वजनिक स्वास्थ्य निगरानी इकाइयों (एमएसयू) की स्थापना और सभी 36 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में एकीकृत स्वास्थ्य सूचना मंच (आईएचआईपी) का विस्तार, जिससे 70% से अधिक रिपोर्टिंग हासिल हुई है, वास्तविक समय में रोग निगरानी के क्षेत्र में सराहनीय उपलब्धियां हैं। ‘भीष्म’ (भारत स्वास्थ्य पहल सहयोग, हित और मैत्री) क्यूब्स की तैनाती और 15 स्वास्थ्य आपातकालीन संचालन केंद्रों (एचईओसी) की स्थापना से त्वरित प्रतिक्रिया क्षमताओं को उल्लेखनीय बल मिलता है। समिति का मानना है कि सक्रिय जैव सुरक्षा और महामारी की तैयारी केंद्रीकृत होने के बजाय स्थानीय वास्तविकता होनी चाहिए। इसलिए, समिति पांच क्षेत्रीय रोग नियंत्रण केंद्रों और राष्ट्रीय रोग नियंत्रण केंद्र (एनसीडीसी) के उन्नयन, विशेष रूप से रोगाणुरोधी प्रतिरोध (एएमआर), स्वास्थ्य और जलवायु परिवर्तन के लिए विशेषीकृत विभागों के शीघ्र पूर्ण होने और संचालित किए जाने की सिफारिश करती है। सरकार को यह सुनिश्चित करना होगा कि प्रवेश बिंदुओं (पीओई) और क्षेत्रीय प्रयोगशालाओं में स्थापित निगरानी नेटवर्क, स्थानीय स्वास्थ्य हस्तक्षेपों के लिए तत्काल, पूर्वानुमानित डेटा मॉडलिंग प्रदान करने के लिए एबीडीएम बुनियादी ढांचे के साथ पूरी तरह से एकीकृत हों।
(पैरा 2.3.19)
50. समिति का मानना है कि स्वास्थ्य देखभाल लागत का भार कमजोर जनसांख्यिकीय वर्गों पर असमान रूप से पड़ता है। आंकड़े स्पष्ट रूप से दर्शाते हैं कि गरीब परिवारों, बुजुर्गों और कम शिक्षित व्यक्तियों को जेब से अधिक खर्च करना पड़ता है। इसके अलावा, महिलाओं को स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंच में गंभीर बाधाओं का सामना करना पड़ता है और बीमा दावों के निपटान की दर भी कम होती है, जो सार्वभौमिक स्वास्थ्य कवरेज के मूल सिद्धांत के बिल्कुल विपरीत है। उपचार लागत में क्षेत्रीय स्तर पर भारी अंतर इस असमानता को और भी बढ़ा देता है—जहां तमिलनाडु और तेलंगाना जैसे दक्षिणी राज्यों में अस्पताल में भर्ती होने का खर्च (लगभग ₹50,000–₹55,000) ओडिशा (लगभग ₹22,000) की तुलना में दोगुने से भी अधिक है। समिति का मानना है कि डिजिटल स्वास्थ्य अवसंरचना को डेटा इंटरऑपरेबिलिटी से आगे बढ़कर वित्तीय सुरक्षा और नैतिक स्वास्थ्य देखभाल प्रदान करने के लिए एक सक्रिय साधन के रूप में विकसित किया जाना चाहिए। इसलिए, समिति एक समर्पित एआई–सक्षम राष्ट्रीय स्वास्थ्य कोष द्वारा समर्थित एआई–सक्षम राष्ट्रीय डिजिटल स्वास्थ्य पारितंत्र के तत्काल कार्यान्वयन की सिफारिश करती है। इस तरह के ढांचे में बिलिंग अनियमितताओं की निगरानी करने, जेब से किए गए अत्यधिक खर्चों का ऑडिट करने, गैर-सरकारी क्षेत्र में तृतीयक देखभाल की कीमतों को मानकीकृत करने और हाशिए पर पड़े समूहों के लिए त्वरित और न्यायसंगत दावा निपटान सुनिश्चित करने के लिए एआई–संचालित वित्तीय निगरानी उपकरणों को संस्थागत रूप देना आवश्यक है।
(पैरा 2.3.20)
51. समिति सरकार से कम कनेक्टिविटी वाले क्षेत्रों में एबीडीएम आईडी बनवाने के लिए सहायता प्राप्त और ऑफलाइन तरीकों का विस्तार करने की सिफारिश करती है, ताकि एबीडीएम धारकों में महिलाओं की वर्तमान 49.15% हिस्सेदारी की गति को और आगे बढ़ाया जा सके। इसके साथ ही लक्षित क्षमता निर्माण कार्यक्रम, स्थानीय सामुदायिक संपर्क और डिजिटल साक्षरता को बढ़ावा देने के लिए 14477 टोल–फ्री हेल्पलाइन के माध्यम से बहुभाषी सहायता का विस्तार किया जाना चाहिए। समिति का मानना है कि लोगों का विश्वास बढ़ाने और रोगी–केंद्रित देखभाल सुनिश्चित करने के लिए, लिंग निर्धारण संबंधी भय को दूर करने हेतु अल्ट्रासाउंड निदान में एआई और सदस्यता मॉडल जैसे विशिष्ट तकनीकी सुरक्षा उपायों को प्राथमिकता दी जानी चाहिए। ये लक्षित हस्तक्षेप सुनिश्चित करेंगे कि स्वास्थ्य सेवा में तकनीकी प्रगति सीधे तौर पर सबसे कमजोर नागरिकों की वित्तीय और सामाजिक सुरक्षा की रक्षा करे।
(पैरा 2.3.21)
मानव संसाधनों की उपलब्धता: लगातार बनी रहने वाली चुनौती
52. समिति ने हितधारकों के सुझावों और ‘सशक्त‘ पोर्टल के माध्यम से क्षमता निर्माण में मंत्रालय की प्रगति की समीक्षा करने के बाद, स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय को ग्रामीण और आदिवासी क्षेत्रों में स्वास्थ्य मानव संसाधनों को मजबूत करने के लिए एक व्यापक रणनीति तैयार करने की पुरजोर सिफारिश की है। इसमें भर्ती प्रक्रियाओं में तेजी लाना, विशेषज्ञ डॉक्टरों के लिए एकसमान वेतनमान स्थापित करना और आशा एवं परिवार कल्याण कर्मियों (आशा) और राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन (एनएचएम) कर्मियों को समय पर और निर्बाध रूप से पारिश्रमिक का भुगतान सुनिश्चित करना शामिल है। कम संसाधनों वाले क्षेत्रों में गंभीर कमी को तुरंत दूर करने के लिए, समिति का मानना है कि मंत्रालय को लचीली भर्ती व्यवस्थाओं को संस्थागत रूप देना चाहिए, जैसे कि सुपर–स्पेशलिस्टों के लिए अंशकालिक नियुक्तियाँ और तालुका एवं उप–जिला अस्पतालों में सलाहकार नियुक्तियाँ, साथ ही साथ संबद्ध स्वास्थ्य एवं पैरामेडिकल पेशेवरों की भूमिका का विस्तार करना। इसके अतिरिक्त, समिति विस्तारित स्वास्थ्य सेवा पैकेजों में सभी अग्रिम पंक्ति और चिकित्सा कर्मियों के लिए प्रशिक्षण मॉड्यूल पर नज़र रखने, उसका उन्नयन करने और मानकीकृत करने के लिए ‘सशक्त‘ डिजिटल इकोसिस्टम को और अधिक विस्तारित करने की सिफारिश करती है।
(पैरा 2.4.9)
53. समिति का मत है कि चिकित्सा शिक्षा क्षमता बढ़ाने के सराहनीय प्रयासों के बावजूद, जिसका प्रमाण एमबीबीएस सीटों में 151% की वृद्धि, स्नातकोत्तर सीटों में 163% की वृद्धि, 818 मेडिकल कॉलेजों की स्थापना और राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन के तहत 5.23 लाख से अधिक कर्मियों की भर्ती है, सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों में विशेषज्ञों की गंभीर कमी समान स्वास्थ्य सेवा तक पहुंच को मौलिक रूप से बाधित करता है। प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों और प्रमुख संस्थानों का भौतिक ढांचा स्थिर और पर्याप्त रूप से वितरित कार्यबल के बिना अप्रभावी हो जाता है। जबकि लगभग 25,000 आयुष डॉक्टरों की भर्ती और राष्ट्रीय संबद्ध और स्वास्थ्य सेवा आयोग (एनसीएएचपी) अधिनियम, 2021 के तहत 57 संबद्ध व्यवसायों का औपचारिककरण सकारात्मक कदम हैं, इन्हें प्रभावी प्रतिधारण रणनीतियों और सुरक्षित कार्य वातावरण के साथ समन्वित किया जाना चाहिए। अतः समिति सिफारिश करती है कि सरकार सभी राज्यों को तत्काल समर्पित स्वास्थ्य भर्ती बोर्ड स्थापित करने का आदेश दे ताकि आईपीएचएस 2022 मानदंडों के अनुसार रिक्त पदों को भरने की प्रक्रिया में तेजी लाई जा सके। ग्रामीण क्षेत्रों में स्वास्थ्य सेवाओं के लिए डॉक्टरों की कमी को दूर करने और अंतर–राज्यीय असमानताओं को कम करने के लिए संविदा डॉक्टरों को नियमित करना, “आप कोट करें, हम भुगतान करें” योजना का विस्तार करना, विशेषज्ञों के लिए समान वेतनमान लागू करना अनिवार्य है। इसके अलावा, माध्यमिक स्तर पर, विशेष रूप से आकांक्षी और आदिवासी जिलों में, विशेषज्ञों की निरंतर उपस्थिति सुनिश्चित करने के लिए अनिवार्य जिला रेजीडेंसी कार्यक्रम (डीआरपी) की कड़ी निगरानी की जानी चाहिए।
(पैरा 2.4.10)
54. समिति का यह भी मानना है कि स्वास्थ्य सेवा की गुणवत्ता चिकित्सा पेशेवरों और अग्रिम पंक्ति के स्वास्थ्य कर्मियों की शारीरिक सुरक्षा, मानसिक स्वास्थ्य और निरंतर क्षमता निर्माण से अंतर्निहित रूप से जुड़ी हुई है। अनियमित कार्य समय, अपर्याप्त सेवा शर्तें और रेजिडेंट डॉक्टरों के बीच गंभीर मानसिक स्वास्थ्य चुनौतियों जैसे लगातार बने रहने वाले मुद्दों के लिए तत्काल वैधानिक हस्तक्षेप की आवश्यकता है। इसलिए, समिति माननीय सर्वोच्च न्यायालय के निर्देशों के अनुसार राष्ट्रीय कार्य बल द्वारा तैयार की गई अल्पकालिक, मध्यकालिक और दीर्घकालिक कार्य योजनाओं के सख्त और समयबद्ध कार्यान्वयन की सिफारिश करती है। सरकार को सभी रेजिडेंट डॉक्टरों और नर्सिंग स्टाफ के लिए निश्चित कार्य समय और संरचित स्वास्थ्य कार्यक्रमों को सख्ती से लागू करना चाहिए। समिति रेजिडेंट डॉक्टरों के लिए वेतन और भत्तों में उपयुक्त बढ़ोतरी की सिफारिश करती है। अंत में, समिति मार्च 2025 में आशा कार्यकर्ताओं के लिए निर्धारित प्रोत्साहन राशि को बढ़ाकर ₹3,500 और मान्यता पुरस्कारों को ₹50,000 तक करने की सराहना करती है, लेकिन यह सिफारिश करती है कि आशा कार्यकर्ताओं और राष्ट्रीय स्वास्थ्य देखभाल कार्यकर्ताओं के पारिश्रमिक में होने वाली प्रणालीगत देरी को सुगम और समय पर भुगतान तंत्र के माध्यम से समाप्त किया जाए। सार्वजनिक अस्पतालों को व्यापक देखभाल को मजबूत करने के लिए समर्पित बायोमेडिकल इंजीनियरों और फिजियोथेरेपिस्ट की नियुक्ति करना भी अनिवार्य किया जाना चाहिए।
(पैरा 2.4.11)
अवसंरचना विकास और आवश्यक सेवाएं
55. समिति का मत है कि प्रति 1,000 जनसंख्या पर सार्वजनिक क्षेत्र के बिस्तरों की 0.79 की गंभीर कमी और लगातार बनी हुई क्षेत्रीय असमानताओं को दूर करने के लिए सार्वजनिक स्वास्थ्य अवसंरचना का लक्षित और व्यवस्थित सुधार आवश्यक है। बजट आवंटन का प्रभावी उपयोग करने और विश्व स्वास्थ्य संगठन के मानक की ओर अंतर को पाटने के लिए, समिति ग्रामीण सार्वजनिक सुविधाओं के जीर्णोद्धार हेतु एक समर्पित स्वास्थ्य पूंजी व्यय (केपेक्स) कोष स्थापित करने की सिफारिश करती है, जिसमें विशेष रूप से स्थानीय जनसांख्यिकीय आवश्यकताओं और रोग भार के आधार पर प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों और स्वास्थ्य एवं कल्याण केंद्रों को प्राथमिकता दी जाए। इसके अतिरिक्त, समिति का मानना है कि जर्जर उप–जिला अवसंरचना के पुनर्वास के लिए 15वें और 16वें वित्त आयोग के स्वास्थ्य अनुदानों के वितरण में तेजी लाना, प्रस्तावित 200 कैंसर डे केयर केंद्रों को जिला अस्पतालों में तत्काल शुरू करना और सार्वजनिक चिकित्सा संस्थानों को जटिल, उभरती बीमारियों से निपटने के लिए समर्पित वैस्कुलर और ऐंडोवैस्कुलर शल्य चिकित्सा विभाग स्थापित करने का आदेश देना अनिवार्य है।
(पैरा 2.4.18)
56. समिति का मानना है कि सार्वजनिक व्यय को पूरक बनाने और तृतीयक स्तर के सार्वजनिक अस्पतालों पर बढ़ते बोझ को कम करने के लिए, सार्वजनिक पूंजी को निजी क्षमताओं के साथ समन्वित करना आवश्यक है, बशर्ते कि इसमें भारी प्रारंभिक पूंजी की आवश्यकता न हो। इसलिए, समिति एक व्यापक प्रोत्साहन ढांचा तैयार करने की सिफारिश करती है, जिसमें लक्षित कर छूट, आसान ऋण, रियायती भूमि और रियायती बिजली दरें शामिल हों, जो विशेष रूप से द्वितीय, तृतीय और ग्रामीण क्षेत्रों में बहु–विशेषज्ञता सुविधाओं के लिए निजी निवेश को आकर्षित करने के लिए डिज़ाइन की गई हों। साथ ही, समिति का यह भी मत है कि मंत्रालय को परिचालन व्यय (ओपीईएक्स) आधारित सार्वजनिक–निजी भागीदारी (पीपीपी) मॉडल अपनाना चाहिए, छोटे शहरों में उच्च गुणवत्ता वाले पूर्व–स्वामित्व वाले उपकरणों की विनियमित तैनाती को सुगम बनाना चाहिए और मध्यम आय वर्ग की आबादी के लिए शहरी पीपीपी क्लीनिक स्थापित करने चाहिए। इसके अलावा, समिति का मानना है कि कॉर्पोरेट सामाजिक उत्तरदायित्व (सीएसआर) दिशानिर्देशों में तत्काल संशोधन करना आवश्यक है ताकि ग्रामीण और द्वितीय/तृतीय स्तर के कस्बों में स्वास्थ्य सेवा अवसंरचना के लिए कॉर्पोरेट योगदान को प्राथमिकता देना अनिवार्य हो।
(पैरा 2.4.19)
57. समिति का मत है कि उन्नत चिकित्सा प्रौद्योगिकी तक पहुंच अभी भी शहरी कॉर्पोरेट केंद्रों तक ही सीमित है, और इन आवश्यक सेवाओं के विकेंद्रीकरण के लिए तत्काल संरचनात्मक हस्तक्षेप किए जाने चाहिए। इसलिए, समिति सुवाह्य एक्स–रे, फैटह लीवर की जांच करने के लिए लीवर स्कैन और पेंक्रिएटाइटिस आदि जैसी अन्य बीमारियों की जांच की सुविधा से युक्त अल्ट्रासाउंड और ईसीजी मशीनों, जीवन रक्षा के लिए पोर्टेबल वेंटीलेटरों से लैस मोबाइल डायग्नोस्टिक यूनिटों को सीधे ग्रामीण और दूरस्थ आबादी तक पहुंचाने की सिफारिश करती है, साथ ही साथ सार्वजनिक–निजी भागीदारी का लाभ उठाकर सभी सार्वजनिक स्वास्थ्य सुविधाओं में उच्च गुणवत्ता वाली निदान सेवाओं का विस्तार करने की भी सिफारिश करती है। सुचारू संचालन और समय पर चिकित्सा सहायता सुनिश्चित करने के लिए, समिति का मानना है कि मंत्रालय को सभी जिलों में हब–एंड–स्पोक टेलीहेल्थ मॉडल के विस्तार को अनिवार्य करना चाहिए। इसके अतिरिक्त, समिति निदान नमूनों और आवश्यक दवाओं के त्वरित और सुरक्षित परिवहन के लिए डाक विभाग के व्यापक ग्रामीण संभार नेटवर्क का उपयोग करने हेतु उसके साथ रणनीतिक साझेदारी स्थापित करने की सिफारिश करती है।
(पैरा 2.4.20)
58. तत्काल बुनियादी ढांचे और निदान संबंधी सुविधाओं के अलावा, समिति का मानना है कि दीर्घकालिक स्वास्थ्य सेवा की स्थिरता के लिए नीतिगत नवाचार और कड़ी जवाबदेही आवश्यक है। इसलिए, समिति चिकित्सा उपकरणों और विशेष हार्डवेयर के स्वदेशी निर्माण को बढ़ावा देने के लिए अनुसंधान और विकास में रणनीतिक निवेश बढ़ाने की सिफारिश करती है, जिससे आयात पर निर्भरता कम हो और मरीजों के इलाज की कुल लागत में उल्लेखनीय कमी आए। अंत में, संसाधनों के पारदर्शी वितरण को सुनिश्चित करने और देश भर में भौगोलिक असमानताओं को सक्रिय रूप से समाप्त करने के लिए, समिति का मानना है कि सरकार को स्थानिक, सामयिक और वित्तीय पहुंच को व्यवस्थित रूप से मापने के लिए एक मानकीकृत स्वास्थ्य सुविधा पहुंच सूचकांक विकसित करना चाहिए, जिससे यह सुनिश्चित हो सके कि भविष्य के सभी नीतिगत हस्तक्षेप पूरी तरह से न्यायसंगत और आंकड़ों पर आधारित हों।
(पैरा 2.4.21)
कमजोर और वंचित समूहों के लिए पहुंच
59. समिति का मत है कि सामाजिक और भौगोलिक रूप से हाशिए पर स्थित वर्ग, विशेष रूप से अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, विशेष रूप से कमजोर जनजातीय समूह (पीवीटीजी) और प्रवासी श्रमिक, लगातार संरचनात्मक बाधाओं का सामना करते हैं जो समय पर स्वास्थ्य सेवा प्राप्त करने के अपने अधिकार से गंभीर रूप से समझौता करते हैं। सरकार द्वारा जनजातीय और पहाड़ी क्षेत्रों में सार्वजनिक स्वास्थ्य सुविधाओं की स्थापना के लिए जनसंख्या मानदंडों में ढील देने (प्रत्येक 3,000 जनसंख्या पर एक उप–स्वास्थ्य केंद्र, प्रत्येक 20,000 पर एक प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र और प्रत्येक 80,000 पर एक सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र स्थापित करना) और 178 जनजातीय–बहुल जिलों में 30,593 आयुष्मान आरोग्य मंदिरों (एएएम) की स्थापना करना अत्यंत प्रगतिशील नीतिगत सुधार हैं। समिति का मानना है कि ₹79,156 करोड़ के धरती आबा जनजातीय ग्राम उत्कर्ष अभियान और ₹24,104 करोड़ के पीएम जनमन मिशन के तहत किए गए भारी पूंजीगत व्यय से जनजातीय स्वास्थ्य समानता में मौलिक परिवर्तन लाने की क्षमता है, लेकिन उच्च जेब खर्च और स्थानीय स्वास्थ्य संकटों से निपटने के लिए इसे तत्काल और सुदृढ़ अंतिम–मील वितरण तंत्र में परिवर्तित किया जाना आवश्यक है। इसलिए, समिति सिफारिश करती है कि स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय को इन योजनाओं के तहत परिकल्पित 1,694 मोबाइल मेडिकल यूनिट (एमएमयू) की तैनाती और उनकी कड़ी निगरानी में तेजी लानी चाहिए ताकि पहाड़ी क्षेत्रों में 5 किमी से अधिक और मैदानी क्षेत्रों में 10 किमी से अधिक दूरी पर स्थित गांवों को व्यवस्थित रूप से कवर किया जा सके।
(पैरा 2.4.26)
60. समिति की सिफ़ारिश है कि सरकार को उच्च–बोझ वाले जनजातीय क्षेत्रों में समर्पित सार्वजनिक उत्कृष्टता केंद्र स्थापित करने चाहिए ताकि सिकल सेल एनीमिया उन्मूलन मिशन के तहत निर्धारित 7 करोड़ आबादी के लिए जांच, परामर्श और उपचार के लक्ष्यों को पूरा किया जा सके। इसके अलावा, प्रवासी श्रमिक आबादी के स्वास्थ्य की सुरक्षा के लिए, मंत्रालय को यू–विन प्लेटफॉर्म की पोर्टेबल डिजिटल टीकाकरण रिकॉर्ड प्रणाली को अंतर–राज्यीय श्रम रजिस्टरों से जोड़ना चाहिए ताकि प्रवासी परिवारों के बच्चों को स्थानांतरण की परवाह किए बिना निर्बाध और निरंतर टीकाकरण कवरेज प्राप्त हो सके। साथ ही, पीएम–जेएवाई का विस्तार 12 करोड़ परिवारों, आशा कार्यकर्ताओं और 70 वर्ष और उससे अधिक आयु के सभी वरिष्ठ नागरिकों तक करने के लिए जमीनी स्तर पर व्यापक जागरूकता अभियान चलाने चाहिए।
(पैरा 2.4.27)
61. समिति आयुष्मान भारत–प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना (एबी–पीएमजेएवाई) के अंतर्गत पांच वर्ष से कम आयु के सभी बच्चों और 60 वर्ष और उससे अधिक आयु के सभी वरिष्ठ नागरिकों को, उनकी सामाजिक–आर्थिक स्थिति या भौगोलिक स्थिति की परवाह किए बिना, शामिल करने की सिफारिश करती है। समिति इस सार्वभौमिकरण को सार्वभौमिक स्वास्थ्य कवरेज (यूएचसी) को बढ़ावा देने और बचपन और वृद्धावस्था संबंधी बीमारियों से जुड़े असमान वित्तीय बोझ को कम करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम मानती है। इसे प्रभावी ढंग से लागू करने के लिए, समिति आगे सिफारिश करती है कि मंत्रालय पर्याप्त वित्तीय प्रावधान सुनिश्चित करे, सुगम नामांकन तंत्र स्थापित करे और प्रत्येक पात्र लाभार्थी को समान, समय पर और किफायती स्वास्थ्य सेवाएं सुनिश्चित करने के लिए मौजूदा बाल एवं वृद्धावस्था स्वास्थ्य कार्यक्रमों के साथ मजबूत तालमेल स्थापित करे।
(पैरा 2.4.28)
गुणवत्ता आश्वासन और नियामक निरीक्षण
62. समिति का मत है कि यद्यपि 1.8 लाख आयुष्मान आरोग्य मंदिरों (एएएम) का विस्तार और 18,000 केंद्रों के माध्यम से ई–संजीवनी प्लेटफॉर्म पर 42.5 करोड़ से अधिक परामर्श प्रदान किए जाने से प्राथमिक स्वास्थ्य देखभाल में महत्वपूर्ण परिवर्तन आया है और रोगी के जेब से होने वाला व्यय (ओओपीई) 64.2% से घटकर 43.4% हो गया है, फिर भी नीति निर्माण और जमीनी स्तर पर कार्यान्वयन के बीच एक लगातार और चिंताजनक अंतर बना हुआ है। उप–केंद्रों और ग्रामीण प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों में अनिवार्य आवश्यक दवाओं (172 दवाएं) और निदान क्षमताओं (63 परीक्षण) की बार–बार कमी की रिपोर्टें वंचित आबादी को महंगे निजी देखभाल का रुख करने को मजबूर कर रही हैं, जिससे राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन की मुफ्त पहलों का प्रभाव कम हो रहा है। समिति का मानना है कि संरचनात्मक संस्थानीकरण और आपूर्ति श्रृंखला की मजबूती सर्वोपरि हैं। अतः समिति सिफारिश करती है कि सरकार दूरस्थ क्षेत्रों में दवाओं और नैदानिक अभिकर्मकों की निर्बाध, वास्तविक समय पर आपूर्ति सुनिश्चित करने के लिए डाक विभाग के व्यापक संभार-तंत्र संबंधी नेटवर्क को एकीकृत करके हब–एंड–स्पोक टेली–हेल्थ नेटवर्क को तत्काल मजबूत करे। मंत्रालय को उच्च मांग वाले क्षेत्रों में प्रति जिला पांच यूनिट की वर्तमान सीमा तक सीमित न रहकर मोबाइल मेडिकल यूनिट (एमएमयू) की संख्या बढ़ानी चाहिए और उन्हें व्यापक ग्रामीण कवरेज के लिए पोर्टेबल एक्स–रे, अल्ट्रासाउंड और ईसीजी मशीनों से सुसज्जित करना चाहिए। इसके अतिरिक्त, समिति सार्वजनिक सुविधाओं पर भौतिक, परिचालन और संरचनात्मक बाधाओं का निरंतर ऑडिट और खाका तैयार करने के लिए एक मानकीकृत स्वास्थ्य सुविधा पहुंच सूचकांक के विकास और कार्यान्वयन की सिफारिश करती है, जिससे पूर्ण जवाबदेही, राष्ट्रीय गुणवत्ता आश्वासन मानकों (एनक्यूएएस) का अनुपालन और जमीनी स्तर पर अनिवार्य आवश्यक दवाओं और नैदानिक अभिकर्मकों की कमी न होना सुनिश्चित हो सके।
(पैरा 2.4.36)
63. समिति का यह सुविचारित मत है कि सामाजिक–आर्थिक कमजोरियाँ निम्न–आय वर्ग के परिवारों, महिलाओं, बुजुर्गों और दिव्यांगजनों के स्वास्थ्य परिणामों को विशेष रूप से प्रभावित करती हैं। यद्यपि प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना (पीएम–जेएवाई) कार्ड उपयोगकर्ताओं में महिलाओं की संख्या 49 प्रतिशत है, और जननी शिशु सुरक्षा कार्यक्रम (जेएसएसके) और लक्ष्य जैसी लक्षित योजनाओं ने मातृ स्वास्थ्य देखभाल प्रदायगी संबंधी दायित्वों को काफी हद तक कम कर दिया है, फिर भी स्वास्थ्य सेवाएं लेने में देर करने की प्रवृत्ति और लम्बे समय तक बनी रहने वाली गैर–संचारी बीमारियों (एनसीडी) पर जेब से होने वाला बढ़ता खर्च गंभीर चिंता का विषय बना हुआ है। समिति का मानना है कि 70 वर्ष और उससे अधिक आयु के सभी नागरिकों के लिए सार्वभौमिक पीएम–जेएवाई कवरेज का विस्तार, जिसके तहत 5 लाख रुपये तक का कवर प्रदान करने वाले 86 लाख से अधिक कार्ड जारी किए गए हैं, को केवल एक वित्तीय तंत्र बनने से बचाने के लिए संरचित भौतिक और नैदानिक संस्थानीकरण की आवश्यकता है। इसलिए, समिति सिफारिश करती है कि सरकार वृद्ध आबादी की दीर्घकालिक पुरानी लंबे समय तक चलने वाली आवश्यकताओं का प्रबंधन करने के लिए सभी कार्यरत एएएम में विकेंद्रीकृत उपशामक और वृद्धावस्था देखभाल अवसंरचना का विस्तार करे। मंत्रालय को देश के प्रत्येक जिले में समयबद्ध तरीके से शारीरिक चिकित्सा एवं पुनर्वास (पीएमआर) केंद्र की स्थापना अनिवार्य करनी चाहिए ताकि दिव्यांग व्यक्तियों को विशेष और सम्मानजनक देखभाल सुनिश्चित की जा सके। नीतिगत उद्देश्य और जमीनी स्तर पर क्रियान्वयन के बीच के अंतर को पाटने के लिए, समिति यह भी सिफारिश करती है कि रैंप और दिव्यांग–अनुकूल शौचालयों जैसी शारीरिक पहुंच सुविधाओं के संबंध में राष्ट्रीय गुणवत्ता आश्वासन मानक (एनक्यूएएस) और भारतीय सार्वजनिक स्वास्थ्य मानकों (आईपीएचएस) के अनुपालन की अनिवार्य वार्षिक स्वतंत्र ऑडिट करायी जाए। अंत में, सरकार को राष्ट्रीय डायलिसिस कार्यक्रम और सामुदायिक स्तर पर निःशुल्क गैर–संचारी रोगों की जांच सहित विकेंद्रीकृत हकदारियों के बारे में सामुदायिक जागरूकता बढ़ाने के लिए एक अति–स्थानीयकृत, बहुभाषी सूचना–शिक्षा–संचार (आईईसी) अभियान शुरू करना चाहिए।
(पैरा 2.4.37)
64. समिति का विचार है कि स्वास्थ्य देखभाल सेवाओं की कीमतों में पारदर्शिता की कमी, सिज़ेरियन डिलीवरी की बढ़ती दरें और निजी अस्पतालों में ज़रूरत से ज़्यादा नैदानिक परीक्षण, मरीज़ों की जेब से होने वाले भारी खर्च को लगातार बढ़ा रहे हैं और आर्थिक रूप से कमज़ोर मरीज़ों का गंभीर शोषण कर रहे हैं। हालांकि निजी चिकित्सा संस्थानों और समविश्वविद्यालयों में 50% सीटों के लिए शुल्क को विनियमित करने हेतु राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग (एनएमसी) के दिशानिर्देशों का मंत्रालय द्वारा कार्यान्वयन सस्ती चिकित्सा शिक्षा की दिशा में एक सराहनीय कदम है, लेकिन निजी क्षेत्र में नैदानिक उपचारों और प्रक्रियाओं की वास्तविक लागतों की निगरानी अपर्याप्त रूप से की जा रही है। समिति का मानना है कि मरीज़ों को व्यावसायीकरण के शोषण से बचाने के लिए पूर्ण पारदर्शिता और कड़ी जवाबदेही लागू की जानी चाहिए। इसलिए, समिति सिफारिश करती है कि सरकार सभी निजी स्वास्थ्य देखभाल प्रदाताओं में सामान्य चिकित्सा प्रक्रियाओं और नैदानिक परीक्षणों की दरों को मानकीकृत करने के लिए एक व्यापक, कानूनी रूप से बाध्यकारी नियामक ढांचा तैयार करे और उसे लागू करे। मंत्रालय को निजी नैदानिक संस्थानों के लिए अनिवार्य अनुपालन ऑडिट शुरू करना चाहिए ताकि मानक चिकित्सा पद्धतियों से विचलन, जैसे अनावश्यक शल्य चिकित्सा हस्तक्षेप, की निगरानी की जा सके और अत्यधिक शुल्क वसूली को रोकने के लिए डीएनबी और रेजीडेंसी प्रशिक्षण प्रदान करने वाले निजी अस्पतालों का कड़ाई से ऑडिट किया जा सके। साथ ही, सरकार को निजी अस्पतालों में जेनेरिक दवाओं की अनिवार्य उपलब्धता और चिकित्सकों द्वारा उन्हें नुस्खे में लिखे जाने को लागू करना होगा।
(पैरा 2.4.38)
65. समिति का मानना है कि सार्वजनिक क्षेत्र में मौजूदा संस्थागत ढांचा उच्च प्रशिक्षित चिकित्सा विशेषज्ञों पर अनावश्यक रूप से नियमित प्रशासनिक और संभार-तंत्र संबंधी कार्यों का बोझ डालता है, जिसके परिणामस्वरूप मरीजों को लंबे समय तक इंतजार करना पड़ता है और नैदानिक देखभाल की गुणवत्ता कम हो जाती है। समिति का मानना है कि वृहद आर्थिक व्यय और जमीनी स्तर पर स्वास्थ्य देखभाल प्रदायगी के बीच के अंतर को पाटने के लिए नैदानिक और प्रशासनिक कार्यों का संरचनात्मक पृथक्करण आवश्यक है। इसलिए, समिति सिफारिश करती है कि सरकार राज्यों को सभी सार्वजनिक द्वितीयक और तृतीयक संस्थानों में समर्पित, विशेषीकृत अस्पताल प्रशासकों का एक कैडर स्थापित करने की सलाह और इस हेतु सहायता प्रदान करे, जिससे चिकित्सकों को पूरी तरह से रोगी देखभाल पर ध्यान केंद्रित करने की स्वतंत्रता मिल सके।
(पैरा 2.4.39)
66. समिति का मत है कि सुपर–स्पेशियलिटी उपचार में क्षेत्रीय असंतुलन को व्यवस्थित रूप से समाप्त करने के लिए, मंत्रालय को एक बहुस्तरीय रणनीति लागू करनी चाहिए जिसमें विशेषज्ञ संसाधनों को साझा करने के लिए 5-6 मेडिकल कॉलेजों के समूह बनाना और मौजूदा राज्य चिकित्सा संस्थानों को एम्स दिल्ली के समकक्ष कार्य करने के लिए उन्नत करना शामिल है। अंत में, अगस्त 2024 में शुरू किए गए राष्ट्रीय चिकित्सा रजिस्टर (एनएमआर) पोर्टल का एनसीएएचपी के नामांकन पोर्टलों के साथ सह–उपयोग किया जाना चाहिए ताकि देश के चिकित्सा और संबद्ध स्वास्थ्य कार्यबल की योग्यताओं और तबादलों की वास्तविक समय पर, पारदर्शी निगरानी की जा सके, जिससे यह सुनिश्चित हो सके कि सार्वजनिक और निजी दोनों क्षेत्रों में वैधानिक मानकों को समान रूप से बनाए रखा जाए। सरकार को यह सुनिश्चित करना होगा कि इस साल 200 और ‘डे केयर कैंसर सेंटर‘ शुरू करने के लिए यूनियन बजट 2025-26 के निर्देशों को तय समय में और सख्ती से लागू किया जाए। सरकार को इस वर्ष 200 अतिरिक्त डे केयर कैंसर केंद्रों को चालू करने संबंधी केंद्रीय बजट 2025-26 के जनादेश का समयबद्ध और कड़ाई से पालन सुनिश्चित करना होगा और यह सुनिश्चित करने के लिए कड़ी निगरानी रखनी होगी कि निर्धारित तीन साल की समय सीमा के भीतर देश भर के प्रत्येक जिला अस्पताल में पूर्ण रूप से कार्यरत ऑन्कोलॉजी डे–केयर सुविधाएं उपलब्ध हों।
(पैरा 2.4.40)
67. समिति का विचार है कि हाल ही में मंत्रिमंडल द्वारा 10,000 से अधिक नई मेडिकल और स्नातकोत्तर सीटों (पांच वर्षों में 75,000 तक बढ़ाई जाने वाली ) को जोड़ने की मंजूरी, डॉक्टर–जनसंख्या अनुपात को सुधारने की दिशा में एक सही कदम है। अनिवार्य परिवार दत्तक ग्रहण कार्यक्रम, जिला रेजीडेंसी कार्यक्रम (डीआरपी) और योग्यता–आधारित चिकित्सा शिक्षा जैसे नवोन्मेष एक दूरदर्शी शैक्षणिक दृष्टिकोण को दर्शाते हैं। समिति का मानना है कि जबकि प्राथमिक चिकित्सा देखभाल का विस्तार हो रहा है, सुपर–स्पेशियलिटी देखभाल भौगोलिक रूप से कुछ क्षेत्रों तक ही सीमित है, जिसके लिए और अधिक विकेंद्रीकरण की आवश्यकता है। इसलिए, समिति सिफारिश करती है कि 22 स्वीकृत एम्स के साथ–साथ, सरकार को भौगोलिक समूहों की पहचान करनी चाहिए ताकि मौजूदा राज्य मेडिकल कॉलेजों को प्रमुख संस्थानों के समकक्ष विकसित किया जा सके। इसके अलावा, शैक्षणिक पाठ्यक्रम का तत्काल आधुनिकीकरण किया जाना चाहिए। स्नातक और स्नातकोत्तर पाठ्यक्रम को तुरंत अद्यतन किया जाना चाहिए ताकि श्वसन चिकित्सा पर सुदृढ़ और अनिवार्य मॉड्यूल शामिल किए जा सकें, और एंडोवास्कुलर/ वैस्कुलर सर्जरी के लिए समर्पित विभाग स्थापित किए जाने चाहिए। अंत में, समिति आयात पर निर्भरता कम करने के लिए विशेष चिकित्सा उपकरणों और वैस्कुलर हार्डवेयर के स्वदेशीकरण के उद्देश्य से अनुसंधान एवं विकास निधि बढ़ाने की सिफारिश करती है। हालांकि, समिति इस बात से चिंतित है कि बिना पर्याप्त क्लिनिकल एक्सपोजर और उचित प्रशिक्षण के पीजी मेडिकल सीटों का तेजी से विस्तार स्वास्थ्य देखभाल के मानकों की गुणवत्ता को गंभीर रूप से कमजोर कर रहा है। समिति सिफारिश करती है कि अंडर ग्रेजुएट और पोस्ट ग्रेजुएट सीटों का विस्तार केवल तब किया जाना चाहिए जब यह सुनिश्चित हो कि शिक्षा की गुणवत्ता, पर्याप्त प्रशिक्षण और क्लिनिकल अनुभव प्रदान किया गया है।
(पैरा 2.4.41)
68. समिति का यह सुविचारित मत है कि सार्वजनिक स्वास्थ्य देखभाल अवसंरचना को मजबूत करना, वित्तीय सुरक्षा तंत्र में सुधार करना, सस्ती दवाओं और निदान की उपलब्धता सुनिश्चित करना, निजी स्वास्थ्य देखभाल सेवाओं की नियामक निगरानी बढ़ाना, मानव संसाधन क्षमता का विस्तार करना और कमजोर समूहों के लिए लक्षित हस्तक्षेप सुनिश्चित करना सभी नागरिकों के लिए सस्ती, सुलभ और न्यायसंगत स्वास्थ्य सेवा प्राप्त करने के लिए आवश्यक है।
(पैरा 2.4.42)
नवीन और लागत प्रभावी उपचार प्रक्रियाओं और प्रौद्योगिकियों का विकास
69. समिति मेडटेक मित्रा प्लेटफॉर्म के बेहद आशाजनक परिणामों की सराहना करती है, जिसने पहले ही 400 से अधिक नवप्रवर्तकों को मार्गदर्शन दिया है, और सात आईआईटी में उत्कृष्टता केंद्रों (सीओई) की स्थापना की है, जिससे 43 स्वदेशी चिकित्सा प्रौद्योगिकियां और 16 स्टार्टअप विकसित हुए हैं। समिति का मानना है कि चिकित्सा प्रौद्योगिकी में आत्मनिर्भरता प्राप्त करना महत्वपूर्ण उपचारों की लागत को काफी कम करने का सबसे टिकाऊ मार्ग है, जैसे कि आइसोट्रेटिनोइन और प्रीवॉल जैसी बाल चिकित्सा दवाओं की कीमतों में पहले ही भारी कमी आई है। इसलिए, समिति उपचार की लागत को कम करने के उद्देश्य से देश भर के अन्य प्रमुख इंजीनियरिंग और चिकित्सा संस्थानों में सीओई योजना का व्यापक विस्तार करने की सिफारिश करती है। समिति यह भी सिफारिश करती है कि सरकार को स्वदेशी रूप से विकसित, प्रमाणित प्रौद्योगिकियों के लिए राष्ट्रीय स्वास्थ्य कार्यक्रमों के तहत एक समर्पित खरीद कोटा स्थापित करना चाहिए ताकि स्टार्टअप और एमएसएमई को बाजार तक पहुंच सुनिश्चित हो सके, जो चुनौतियों का सामना करते हुए सफलता की राह तलाश रहे हैं।
(पैरा 3.2.5)
70. स्वास्थ्य और स्वास्थ्य संबंधी शोध समिति (डीएचआर) की रिपोर्ट में स्वास्थ्य हस्तक्षेपों की लागत–प्रभावशीलता और सुरक्षा पर सटीक, साक्ष्य–आधारित सिफारिशें प्रदान करने में भारत में स्वास्थ्य प्रौद्योगिकी मूल्यांकन (एचटीएआईएन) की महत्वपूर्ण भूमिका पर प्रकाश डाला गया है। सरकारी खर्च को अनुकूलित करने और नागरिकों पर जेब से होने वाले बोझ को कम करने की अनिवार्यता को देखते हुए, समिति का मानना है कि व्यवस्थित मूल्यांकन सभी सार्वजनिक स्वास्थ्य देखभाल व्यय का आधार बनना चाहिए। इसलिए, समिति सिफारिश करती है कि राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन और प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना (पीएमजेएवाई) की खरीद सूचियों में किसी भी नए निदान उपकरण, चिकित्सा उपकरण, टीके या चिकित्सीय प्रक्रिया को शामिल करने के लिए एचटीएआईएन की मंजूरी को अनिवार्य शर्त बनाया जाए। समिति आगे सिफारिश करती है कि राज्य–स्तरीय एचटीए नोड्स की स्थापना की जाए ताकि लागत–प्रभावशीलता की सीमाएं क्षेत्रीय स्वास्थ्य प्राथमिकताओं और आर्थिक वास्तविकताओं के अनुरूप हों और कार्यक्रमों की स्वास्थ्य योजनाओं का विस्तार अंतिम छोर तक हो सके।
(पैरा 3.2.6)
71. प्रस्तावित मेडिकल इनोवेशन डेवलपमेंट एक्सीलरेशन काउंसिल (एमआईडीएसी) उन क्षेत्रों में जैव चिकित्सा अनुसंधान के जोखिम को कम करने के लिए एक महत्वपूर्ण पहल है, जिनमें आकर्षक वाणिज्यिक प्रोत्साहन की कमी है, लेकिन सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए उनका अत्यधिक महत्व है। इसके अलावा, मॉडल ग्रामीण स्वास्थ्य अनुसंधान इकाइयाँ (एमआरएचआरयू) और जनजातीय स्वास्थ्य अनुसंधान नेटवर्क यह सुनिश्चित करने के लिए आवश्यक हैं कि नवाचार सबसे कमजोर आबादी, विशेष रूप से ग्रामीण, पहाड़ी और आदिवासी क्षेत्रों तक पहुँचें। समिति का मानना है कि एक न्यायसंगत स्वास्थ्य सेवा प्रणाली केवल बाजार–आधारित अनुसंधान पर निर्भर नहीं रह सकती, बल्कि कल्याणकारी उपायों के माध्यम से गरीब आबादी तक इसकी पहुंच बनानी होगी। इसलिए, समिति उपेक्षित उष्णकटिबंधीय रोगों और क्षेत्रीय प्रकोपों को लक्षित करते हुए सार्वजनिक–निजी भागीदारी को बढ़ावा देने के लिए एमआईडीएसी के तत्काल संचालन और मजबूत पूंजीकरण की सिफारिश करती है। समिति का मानना है कि एमआरएचआरयू को सीधे मेडटेक मित्रा इकोसिस्टम से जोड़ने से यह सुनिश्चित होगा कि नए पॉइंट-ऑफ-केयर डायग्नोस्टिक्स (जैसे एआई–सक्षम हैंडहेल्ड एक्स-रे डिवाइस और सीआरआईएसपीआर–सीएएस किट) का फील्ड-टेस्ट किया जाए और उन्हें सीधे वंचित ग्रामीण और आदिवासी क्षेत्रों में तैनात किया जाए।
(पैरा 3.2.7)
72. मार्च 2025 में पेटेंट मित्र पहल की शुरुआत एक सराहनीय कदम है, जिसके चलते पहले ही 24 पेटेंट आवेदनों को सुगम बनाया जा चुका है और एक तकनीक को उद्योग में सफलतापूर्वक स्थानांतरित किया जा चुका है। हालांकि, प्रयोगशाला की सफलता को व्यापक पहुंच में बदलने के लिए, पेटेंट और वाणिज्यिक स्तर पर उत्पादन के बीच के सेतु को मजबूत और विस्तारित करना आवश्यक है। समिति का मानना है कि एक मजबूत बौद्धिक संपदा ढांचा तभी प्रभावी होता है जब वह लिंग भेद के बिना सभी के लिए किफायती स्वास्थ्य समाधानों के तीव्र व्यावसायीकरण और तैनाती में परिणत हो। इसलिए, समिति पेटेंट मित्र के अंतर्गत एक त्वरित प्रौद्योगिकी हस्तांतरण तंत्र बनाने की सिफारिश करती है जो पेटेंट धारकों को सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों (पीएसयू) और स्थापित निजी निर्माताओं से सक्रिय रूप से जोड़े। समिति पेटेंट मित्र और सीओई ढांचे के तहत संरक्षित उन तकनीकों को सफलतापूर्वक लाइसेंस देने और बड़े पैमाने पर उत्पादन करने वाली निजी क्षेत्र की संस्थाओं को लक्षित वित्तीय राजसहायता या कर प्रोत्साहन प्रदान करने की भी सिफारिश करती है, जिनका उद्देश्य स्वास्थ्य सुविधाओं की सुलभता और सामर्थ्य सुनिश्चित करना है।
(पैरा 3.2.8)
स्वास्थ्य संबंधी लागतों को कम करने के लिए प्रभावी निवारक स्वास्थ्य देखभाल कार्यनीतियाँ
73. समिति स्वास्थ्य लागत को कम करने के लिए डीएचआर की निवारक स्वास्थ्य कार्यनीतियों को नोट करती है। डीएचआर ने स्पष्ट रूप से प्रदर्शित किया है कि सिकल सेल रोग के लिए त्वरित निदान परीक्षण, सार्वभौमिक नवजात श्रवण जांच (सोहम) और मधुमेह रेटिनोपैथी के लिए टेली–स्क्रीनिंग जैसे निवारक उपायों से सरकारी खजाने में हजारों करोड़ रुपये की बचत हुई है और साथ ही रोग की अपरिवर्तनीय प्रगति को भी रोका गया है। समिति का मत है कि स्वास्थ्य सेवा के मॉडल को उपचारात्मक उपचार से हटाकर सक्रिय और प्रारंभिक पहचान की ओर ले जाना, भारत के रोग भार को प्रबंधित करने की सबसे प्रभावी रणनीति है। इसलिए, समिति सभी आयुष्मान आरोग्य मंदिरों और प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों (पीएचसी) में आईसीएमआर द्वारा मान्य सिंड्रोमिक निदान एल्गोरिदम और प्वाइंट–ऑफ–केयर स्क्रीनिंग उपकरणों के तत्काल एकीकरण और राष्ट्रव्यापी कार्यान्वयन की सिफारिश करती है। समिति का यह भी मानना है कि राज्य सरकारों को तमिलनाडु में सफल हेपेटाइटिस बी और सी स्क्रीनिंग और गुजरात में ईसीजी तैनाती के समान विकेंद्रीकृत स्क्रीनिंग मॉडल लागू करने के लिए समर्पित बजटीय आवंटन किया जाना चाहिए, ताकि पुरानी बीमारियों को उनके आरंभ में ही रोका जा सके।
(पैरा 3.3.9)
74. डीएचआर के आंकड़ों के तर्कसंगत विश्लेषण से पता चलता है कि लक्षित लागत–प्रभावशीलता विश्लेषण, जैसे कि भारत में स्वास्थ्य सेवाओं की लागत निर्धारण (सीएचएसआई) और स्तन कैंसर के उपचार (ट्रास्टुज़ुमाब) को 1 वर्ष से घटाकर 6 महीने की अवधि में करने से, प्रतिपूर्ति दक्षता में काफी सुधार हुआ है और सालाना सैकड़ों करोड़ रुपये की बचत हुई है। समिति का मानना है कि संश्लेषित, स्वदेशी साक्ष्यों (‘सारांश’ जैसे प्लेटफार्मों के माध्यम से) के आधार पर उपचार पद्धतियों का मानकीकरण अति–चिकित्सीयकरण को रोकने और सार्वजनिक स्वास्थ्य बीमा की वित्तीय स्थिरता सुनिश्चित करने के लिए आवश्यक है। इसलिए, समिति सिफारिश करती है कि राष्ट्रीय स्वास्थ्य प्राधिकरण (एनएचए) एबी–पीएमजेएवाई के तहत सभी स्वास्थ्य लाभ पैकेजों की लागतों को लगातार पुनर्मूल्यांकन और संशोधित करने के लिए डीएचआर के सीएचएसआई डेटा और साक्ष्य–आधारित नैदानिक दिशानिर्देशों का अनिवार्य रूप से उपयोग करे। समिति आगे सिफारिश करती है कि सरकारी बीमा योजनाओं के अंतर्गत सूचीबद्ध सभी निजी अस्पतालों के लिए इन लागत–प्रभावी, मानकीकृत नैदानिक प्रोटोकॉल का पालन करना अनिवार्य किया जाए ताकि रोगियों के जेब से होने वाले अत्यधिक खर्च को कम किया जा सके।
(पैरा 3.3.10)
स्वास्थ्य अनुसंधान के माध्यम से एक समावेशी और न्यायसंगत स्वास्थ्य सेवा प्रणाली का विकास
75. समिति का मानना है कि समावेशी और न्यायसंगत स्वास्थ्य सेवा प्रणाली के पर्याप्त विकास के लिए 118 बहु–विषयक अनुसंधान इकाइयों (एमआरयू) और 36 मॉडल ग्रामीण स्वास्थ्य अनुसंधान इकाइयों (एमआरएचआरयू) का वर्तमान नेटवर्क पर्याप्त नहीं है। हालांकि ‘दिशा’ निगरानी प्रणाली और ‘टाइ-स्मार्ट’ स्ट्रोक प्रबंधन ऐप जैसी सफल पायलट परियोजनाएं प्रभावी साबित हुई हैं, समिति का मानना है कि केवल 36 एमआरएचआरयू का भौगोलिक दायरा ग्रामीण भारत की विविध महामारी विज्ञान संबंधी प्रोफाइल का प्रतिनिधित्व करने के लिए अपर्याप्त है। समिति का मानना है कि चिकित्सा अनुसंधान को वास्तव में न्यायसंगत बनाने के लिए ग्रामीण आबादी को नैदानिक परीक्षणों में सक्रिय रूप से शामिल किया जाना चाहिए। इसलिए, समिति देश भर के प्रत्येक सरकारी मेडिकल कॉलेज में कम से कम एक एमआरयू और प्रत्येक जिले में एक एमआरएचआरयू स्थापित करने के लिए एक समयबद्ध विस्तार योजना की सिफारिश करती है। समिति यह भी सिफारिश करती है कि इन इकाइयों को जमीनी स्तर पर उभरते प्रकोपों पर नज़र रखने और ग्रामीण समुदायों के भीतर सीधे बड़े पैमाने पर, बहु–केंद्रित नैदानिक परीक्षण करने के लिए एकीकृत पर्यावरण और रोग निगरानी प्रणालियों (जैसे डीडीईएस) को संचालित करने का स्पष्ट रूप से आदेश दिया जाए।
(पैरा 3.4.5)
स्वास्थ्य देखभाल संबंधी सूचित निर्णय लेने के लिए स्वास्थ्य साक्षरता
76. समिति का मानना है कि डीएचआर ने राज्य स्तर पर जागरूकता कार्यशालाओं और डीएआरपीएएन डैशबोर्ड जैसे डिजिटल उपकरणों के माध्यम से वैज्ञानिक अनुसंधान को सुलभ ज्ञान में बदलने के लिए महत्वपूर्ण कदम उठाए हैं। हालांकि, समिति का मानना है कि यदि अनुसंधान केवल अकादमिक दायरे तक सीमित रहता है और इसे व्यवस्थित रूप से स्वास्थ्य कर्मियों और आम जनता तक नहीं पहुंचाया जाता है, तो वैज्ञानिक प्रगति और नैदानिक प्रमाण अपना पूरा प्रभाव नहीं दिखा पाते हैं। इसलिए, समिति राज्य स्वास्थ्य विभागों के भीतर समर्पित “एवीडेंस ट्रांसलेशन सेल” स्थापित करने की सिफारिश करती है ताकि आईसीएमआर के अनुसंधान निष्कर्षों और एचटीएआईएन मूल्यांकनों को आशा और आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं के लिए स्थानीय भाषा में, अत्यंत सुलभ दिशा–निर्देशों में व्यवस्थित रूप से परिवर्तित किया जा सके। समिति का मानना है कि क्षेत्रीय डिजिटल साक्षरता कार्यक्रमों को व्यापक स्तर पर लागू करना आवश्यक है ताकि जिला स्तर के सार्वजनिक स्वास्थ्य अधिकारियों को वास्तविक समय में कार्यक्रम–आधारित निर्णय लेने के लिए साक्ष्य संश्लेषण उपकरणों और डेटा डैशबोर्ड का उपयोग करने के लिए पूर्ण रूप से प्रशिक्षित किया जा सके।
(पैरा 3.5.2)
रोग निगरानी और स्वास्थ्य सेवा वितरण में एआई, ड्रोन और आईटी का उपयोग
77. समिति आई–ड्रोन पहल के तहत सफल पायलट परियोजनाओं जैसे नागालैंड और हिमाचल प्रदेश के पहाड़ी इलाकों में वैक्सीन वितरण, कर्नाटक में अति-संवेदनशील इंट्राऑपरेटिव बायोप्सी परिवहन, दिल्ली-एनसीआर में रक्त वितरण और हरियाणा में कॉर्नियल परिवहन, पर ध्यान देती है जो यह दर्शाता है कि ड्रोन तकनीक गंभीर भौगोलिक और लॉजिस्टिक बाधाओं को पार कर सकती है। हालांकि, समिति का मानना है कि सार्वभौमिक स्वास्थ्य पहुंच प्राप्त करने के लिए अलग–थलग पायलट परियोजनाओं से एक पूर्णतः संचालित, राष्ट्रव्यापी चिकित्सा ड्रोन वितरण प्रणाली की ओर बढ़ना सर्वोपरि है। समिति का मानना है कि पैथोलॉजिकल परीक्षणों के लिए लगने वाले समय को कम करने और अंग प्रत्यारोपण के लिए इस्केमिक विंडो को कम करने से सीधे तौर पर मरीज की जान को बचाया जाता है। इसलिए, समिति सिफारिश करती है कि स्वास्थ्य अनुसंधान विभाग नागर विमानन मंत्रालय के साथ मिलकर सभी पहाड़ी, द्वीपीय और दुर्गम क्षेत्रों में परिधीय स्वास्थ्य केंद्रों को जिला और तृतीयक देखभाल अस्पतालों से जोड़ने वाले निर्दिष्ट “ग्रीन मेडिकल एयर कॉरिडोर” स्थापित करे। समिति का यह मत है कि टीकों, नैदानिक नमूनों, रक्त उत्पादों और ऊतक प्रत्यारोपण के निर्बाध और तीव्र परिवहन को सुनिश्चित करने के लिए ड्रोन–आधारित लॉजिस्टिक्स को सार्वभौमिक टीकाकरण कार्यक्रम (यूआईपी), राष्ट्रीय टीबी उन्मूलन कार्यक्रम (एनटीईपी) और राष्ट्रीय अंग एवं ऊतक प्रत्यारोपण संगठन (एनओटीटीओ) में औपचारिक रूप से एकीकृत किया जाना चाहिए।
(पैरा 3.8.5)
78. समिति को इस बात का भरोसा है कि आईसीएमआर–आईआईएससी सेंटर फॉर मेडिकल इमेज डेटासेट्स (एमआईडीएएस) की स्थापना और स्वास्थ्य सेवा में एआई के लिए नैतिक दिशानिर्देशों का जारी होना महत्वपूर्ण प्रगति के संकेत हैं। समिति का मानना है कि एआई–संचालित प्वाइंट–ऑफ–केयर उपकरण सीमित संसाधनों वाले ग्रामीण सार्वजनिक स्वास्थ्य केंद्रों में विशिष्ट निदान विशेषज्ञता को सभी के लिए सुलभ बना सकते हैं। हालांकि, समिति का यह भी मानना है कि मानकीकृत, स्वदेशी संदर्भ डेटा की कमी अक्सर भारत में निजी और अकादमिक चिकित्सा प्रौद्योगिकी नवाचार को बाधित करती है। इसलिए, समिति सिफारिश करती है कि एमआईडीएएस पहल को ओरल कैंसर और ड्यूरल घावों से आगे बढ़ाकर इसमें मधुमेह रेटिनोपैथी, मातृ–भ्रूण असामान्यताएं और छाती रेडियोग्राफ जैसी उच्च–बोझ वाली स्थितियों के लिए विषयगत संदर्भ डेटासेट को शामिल किया जाए। समिति यह भी सिफारिश करती है कि एआई–सक्षम उपकरणों को धीरे–धीरे सभी आयुष्मान आरोग्य मंदिरों में स्थापित किया जाए ताकि मध्य–स्तरीय स्वास्थ्य सेवा प्रदाताओं को तत्काल, उच्च–सटीकता वाली निदान क्षमताएं प्रदान की जा सकें।
(पैरा 3.8.6)
79. समिति नोट करती है कि आईसीएमआर ने नव स्थापित आईसीएमआर–नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ रिसर्च इन डिजिटल हेल्थ एंड डेटा साइंसेज के माध्यम से डेंगू, मलेरिया और कोविड-19 जैसी बीमारियों के प्रकोप के लिए रोग भार आकलन और प्रारंभिक चेतावनी प्रणालियों हेतु एआई–आधारित पूर्वानुमान विश्लेषण शुरू किया है। समिति का मानना है कि सक्रिय, डेटा–आधारित महामारी पूर्वानुमान, प्रतिक्रियात्मक प्रकोप प्रबंधन की तुलना में कहीं अधिक लागत प्रभावी है, जो स्वास्थ्य सेवा अवसंरचना और सार्वजनिक वित्त पर भारी दबाव डालता है। अतः समिति वेक्टर-जनित और संक्रामक रोगों के प्रसार के स्वचालित अलर्ट के लिए आईसीएमआर के एआई प्रारंभिक चेतावनी पूर्वानुमान मॉडल और राज्य जन स्वास्थ्य प्रबंधन कैडरों के बीच वास्तविक समय में संपर्क स्थापित करने की सिफारिश करती है। समिति का मानना है कि गैर–संक्रामक रोगों (एनसीडी) के जोखिम पूर्वानुमान पर केंद्रित अन्वेषक–प्रेरित एआई/एमएल परियोजनाओं के लिए समर्पित निधि उपलब्ध कराई जानी चाहिए, जिससे आपातकालीन स्थिति में अस्पताल में भर्ती होने से बहुत पहले ही लक्षित जीवनशैली और नैदानिक हस्तक्षेप संभव हो सकें।
(पैरा 3.8.7)
80. समिति लागत में कमी लाने में हुई महत्वपूर्ण उपलब्धियों की सराहना करती है, जैसे कि बाल चिकित्सा ल्यूकेमिया के लिए प्रीवॉल जैसी दवाओं को अंतरराष्ट्रीय लागत के दसवें हिस्से पर उपलब्ध कराना, साथ ही सिलिकोसिस जैसी व्यावसायिक बीमारियों के लिए निदान समाधान उपलब्ध कराना। समिति का मानना है कि किसी भी परिवार को विशेष प्रकार के बाल चिकित्सा कैंसर या कमजोर श्रमिक वर्ग को प्रभावित करने वाले व्यावसायिक खतरों के कारण स्वास्थ्य संबंधी भारी खर्च या गरीबी का सामना नहीं करना चाहिए। समिति का मत है कि सभी दुर्लभ और उच्च लागत वाली बीमारियों के मामलों में बाजार के मूल्यों को कम करने के लिए सार्वजनिक क्षेत्र के उत्पादन और खरीद का लाभ उठाया जाना चाहिए। इसलिए, समिति सिफारिश करती है कि प्रीवॉल और बच्चों के आइसोट्रेटिनॉइन जैसे फॉर्मूलेशन को राष्ट्रीय आवश्यक दवा सूची (एनईएमएल) में शामिल किया जाए और केंद्रीय सार्वजनिक खरीद योजनाओं के माध्यम से सुनिश्चित किया जाए, ताकि सभी सरकारी बाल चिकित्सा ऑन्कोलॉजी केंद्रों में इनकी मुफ्त उपलब्धता सुनिश्चित हो सके। समिति भारत के सभी उच्च-जोखिम वाले औद्योगिक, खनन और निर्माण क्षेत्रों में सिलिकोसिस जैसी व्यावसायिक बीमारियों के लिए डीएचआर–प्रमाणित सस्ते निदान का उपयोग करके लक्षित, अनिवार्य जांच अभियान शुरू करने की भी सिफारिश करती है।
(पैरा 3.8.8)
अल्पसेवित आबादी के लिए स्वास्थ्य सेवाओं के सुदृढ़ीकरण हेतु संसाधनों का इष्टतम उपयोग
81. समिति यह देखकर प्रसन्न है कि राष्ट्रीय स्वास्थ्य अनुसंधान प्राथमिकताएँ (एनएचआरपी) रोगाणुरोधी प्रतिरोध (एएमआर), वन हेल्थ, तपेदिक, वेक्टर जनित रोग, कैंसर और गैर–संक्रामक रोगों पर केंद्रित हैं, जिनमें उच्च बोझ वाले और अल्पसेवित क्षेत्रों पर विशेष जोर दिया गया है। इस संबंध में, समिति सिफारिश करती है कि प्रधानमंत्री आयुष्मान भारत हेल्थ इंफ्रास्ट्रक्चर मिशन (पीएम–अभिम) के तहत, डीएचआर–आईसीएमआर को वायरस अनुसंधान और निदान प्रयोगशालाओं (वीआरडीएल) को अपग्रेड करके महामारी की तैयारियों को मजबूत करना जारी रखना चाहिए, ताकि रोगजनकों का शीघ्र पता लगाने, प्रकोप की जांच और बीमारी को नियंत्रित करने में सुधार हो सके।
(पैरा 3.9.3)
82. समिति कोटा, ऋषिकेश, रायपुर, राजकोट और बिबीनगर में पांच बीएसएल-3 सुविधाओं की महत्वपूर्ण स्थापना, मोबाइल बीएसएल-3 इकाइयों की तैनाती और नागपुर में चार क्षेत्रीय राष्ट्रीय विषाणु विज्ञान संस्थानों (एनआईवी) के साथ ‘राष्ट्रीय एक स्वास्थ्य संस्थान’ (एनआईओएच) की स्थापना को नोट करती है। समिति का मानना है कि कि रोगज़नक़ों के समूहों का शीघ्र पता लगाने और स्थानीय प्रकोपों को राष्ट्रीय संकट में बदलने से रोकने के लिए विकेंद्रीकृत क्षेत्रीय जैव सुरक्षा बुनियादी ढांचा आवश्यक है। समिति का मानना है कि मानव–पशु–पर्यावरण के अंतर्संबंधों में व्याप्त खतरों के लिए एक एकीकृत शासन संरचना की आवश्यकता है। अतः समिति जम्मू, जबलपुर, डिब्रूगढ़ और बेंगलुरु स्थित चार क्षेत्रीय एनआईवी केंद्रों और नागपुर स्थित ‘राष्ट्रीय एक स्वास्थ्य संस्थान (एनआईओएच)‘ के समयबद्ध संचालन और पूर्ण स्टाफिंग की सिफारिश करती है। समिति का मानना है कि भौगोलिक रूप से पृथक, पर्यावरण–संवेदनशील और अंतर्राष्ट्रीय सीमावर्ती क्षेत्रों में मोबाइल बीएसएल-3 निदान इकाइयों की तैनाती का विस्तार करने से निश्चित रूप से प्रकोप की त्वरित ऑन–साइट जांच सुनिश्चित होगी और जरूरतमंद रोगियों के लिए तत्काल आवश्यक चिकित्सा सहायता उपलब्ध कराई जा सकेगी।
(पैरा 3.9.5)
स्वास्थ्य सेवाओं की वहनीयता और सुलभता बढ़ाने वाली अनुसंधान एवं विकास परियोजनाएं
83. समिति इस बात की सराहना करती है कि डीएचआर की अनुसंधान एवं विकास पहलों ने स्वदेशी निदान, चिकित्सा प्रौद्योगिकियों और किफायती उपचारों के विकास के माध्यम से स्वास्थ्य सेवा की वहनीयता और पहुंच में उल्लेखनीय सुधार किया है। प्रमुख नवाचारों में एआई–सक्षम टीबी स्क्रीनिंग उपकरण, सीआरआईएसपीआर–आधारित निदान किट शामिल हैं। संक्रामक रोगों के लिए त्वरित परीक्षण, स्वचालित गर्भाशय ग्रीवा कैंसर स्क्रीनिंग, मस्तिष्क क्षति मूल्यांकन उपकरण और कम लागत वाली बाल चिकित्सा कैंसर उपचार जैसी सुविधाएं उपलब्ध हैं। डीएचआर ने भारत उच्च रक्तचाप नियंत्रण पहल (आईएचएमआई) और एनीमिया मुक्त भारत जैसे राष्ट्रीय कार्यक्रमों को भी मजबूत किया है, जबकि भारत में स्वास्थ्य प्रौद्योगिकी मूल्यांकन (एचटीएआईएन) ने आयुष्मान भारत और अन्य सार्वजनिक स्वास्थ्य कार्यक्रमों के तहत लागत प्रभावी उपायों को साक्ष्य–आधारित तरीके से अपनाने में सहायता प्रदान की है।
(पैरा 3.10.1)
स्वास्थ्य नवाचार में बाधाएं और उन्हें दूर करने की कार्यनीतियां
84. समिति इस बात की सराहना करती है कि डीएचआर ने एक एकीकृत कार्यनीति अपनाई है जिसमें फर्स्ट–इन–द–वर्ल्ड चैलेंज और मेडटेक मित्रा के माध्यम से जोखिम न्यूनीकरण सहायता; लागत प्रभावी उपायों को बड़े पैमाने पर अपनाने के लिए स्वास्थ्य प्रौद्योगिकी मूल्यांकन (एचटीए); किफायती मेडटेक नवाचार को गति देने के लिए आईआईटी और अन्य शैक्षणिक संस्थानों में उत्कृष्टता केंद्र; तपेदिक, रोगाणुरोधी प्रतिरोध (एएमआर), कैंसर और गैर–संक्रामक रोगों पर केंद्रित राष्ट्रीय स्वास्थ्य अनुसंधान प्राथमिकताओं (एनएचआरपी) का कार्यान्वयन; और मानव, पशु और पर्यावरण स्वास्थ्य क्षेत्रों में सहयोगात्मक अनुसंधान को मजबूत करने के लिए वन हेल्थ दृष्टिकोण को बढ़ावा देना शामिल है।
(पैरा 3.11.3)
85. समिति ने इस बात पर प्रकाश डाला है कि आईसीएमआर द्वारा नवंबर 2024 में शुरू किए गए आई–राइज पोर्टल ने उच्च स्तरीय अनुसंधान अवसंरचना के लिए 1,700 से अधिक बुकिंग की सुविधा प्रदान की है, जिससे प्रारंभिक चरण के नवप्रवर्तकों के लिए अनुपालन और सत्यापन संबंधी बाधाएं सीधे तौर पर कम हो गई हैं। इसके अलावा, डीएचआर ने धारा 8 कंपनी एमआईडीएसी के तहत बायोबैंक और सत्यापन केंद्रों का एक राष्ट्रीय नेटवर्क स्थापित करने का प्रस्ताव दिया है। समिति का मानना है कि सार्वजनिक संस्थानों में पूंजी–गहन जैव चिकित्सा उपकरणों को अलग–थलग संस्थागत संपत्ति के बजाय राष्ट्रीय संपत्ति के रूप में माना जाना चाहिए। समिति का मत है कि जैविक नमूनों और मानकीकृत परीक्षण सुविधाओं तक पहुंच की कमी भारतीय एमएसएमई के लिए एक बड़ी बाधा बनी हुई है। इसलिए, समिति सिफारिश करती है कि सभी केंद्रीय स्वास्थ्य संस्थानों, एम्स और सरकारी अनुदान प्राप्त करने वाले राज्य मेडिकल कॉलेजों के लिए साझा पहुंच के लिए अपने उन्नत अनुसंधान उपकरणों को आई–राइज पोर्टल पर सूचीबद्ध करना अनिवार्य किया जाए। समिति आगे सिफारिश करती है कि स्टार्टअप्स को उच्च गुणवत्ता वाले नैदानिक नमूनों और परीक्षण सुविधाओं तक निर्बाध पहुंच प्रदान करने के लिए एमआईडीएसी के तहत मान्यता प्राप्त बायोबैंक और सत्यापन केंद्रों के प्रस्तावित राष्ट्रीय नेटवर्क को तुरंत शुरू किया जाए।
(पैरा 3.11.4)
86. समिति ने भारतीय उच्च रक्तचाप नियंत्रण पहल (आईएचएमआई) के विस्तार और उच्च वसा, चीनी और नमक (एचएफएसएस) वाले खाद्य पदार्थों की लेबलिंग के संबंध में आईसीएमआर-एनआईएन द्वारा किए जा रहे पोषण संबंधी जागरूकता अभियानों के माध्यम से गैर–संचारी रोगों से निपटने के लिए डीएचआर के प्रयासों पर जोर दिया है। हालांकि, समिति का मानना है कि केवल स्थानीय चिकित्सा उपचार से चयापचय संबंधी विकारों, उच्च रक्तचाप और हृदय रोगों के बढ़ते बोझ को रोका नहीं जा सकता। समिति का मानना है कि स्वस्थ जीवनशैली को बढ़ावा देने और दीर्घकालिक स्वास्थ्य देखभाल लागत को कम करने के लिए सशक्त, निवारक सार्वजनिक नीतिगत हस्तक्षेप आवश्यक हैं। इसलिए, समिति सरकार से आईसीएमआर–राष्ट्रीय पोषण संस्थान (एनआईएन) द्वारा स्थापित वैज्ञानिक मानकों को शामिल करते हुए, अनिवार्य, मानकीकृत एचएफएसएस खाद्य लेबलिंग नियमों को शीघ्रता से लागू करने की सिफारिश करती है। समिति भारतीय उच्च रक्तचाप नियंत्रण पहल (आईएचएमआई) ढांचे को देश के प्रत्येक प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र में एक सार्वभौमिक प्रोटोकॉल के रूप में विस्तारित करने की भी सिफारिश करती है, जिससे प्रोटोकॉल–आधारित प्रबंधन और आवश्यक उच्च रक्तचाप रोधी दवाओं की निर्बाध आपूर्ति श्रृंखला सुनिश्चित हो सके।
(पैरा 3.11.5)
87. समिति समझती है कि अभूतपूर्व जैव चिकित्सा प्रौद्योगिकी के विकास में उच्च पूंजी की आवश्यकता, जटिल नियामक अनुपालन और अत्यधिक बाजार जोखिम शामिल हैं, जिसके कारण प्रायः निजी क्षेत्र की भागीदारी सीमित हो जाती है। “फर्स्ट इन द वर्ल्ड चैलेंज” जैसी योजनाएं और ट्रांसलेशनल अनुदान ढांचे इन वित्तीय चुनौतियों को कम करने के लिए बनाए गए हैं। समिति का मानना है कि केवल आयातित अत्याधुनिक प्रौद्योगिकियों पर निर्भर रहने से राष्ट्रीय स्वास्थ्य सुरक्षा आपूर्ति श्रृंखला की कमजोरियों और अत्यधिक कीमतों के प्रति संवेदनशील हो जाती है। समिति का मत है कि स्वदेशी वैश्विक प्रौद्योगिकी नेताओं के निर्माण के लिए राज्य समर्थित जोखिम–साझाकरण तंत्र आवश्यक हैं। इसलिए, समिति उच्च जोखिम, उच्च प्रतिफल वाले ट्रांसलेशनल अनुसंधान के लिए ‘फर्स्ट इन द वर्ल्ड चैलेंज‘ जैसे कार्यक्रमों का विस्तार करने हेतु डीएचआर के तहत एक समर्पित, उच्च–मूल्य वाले ‘राष्ट्रीय जैव चिकित्सा अभूतपूर्व नवाचार कोष‘ के निर्माण की सिफारिश करती है। समिति का मानना है कि कर–प्रोत्साहित सह–विकास ढांचे और मिलान–अनुदान योजनाओं की स्थापना से निजी मेडटेक और औषध उद्यमों को प्रोटोटाइप से लेकर बाजार में लाए जाने तक सार्वजनिक अनुसंधान एवं विकास परियोजनाओं के सह–वित्तपोषण के लिए प्रोत्साहित किया जा सकता है।
(पैरा 3.11.6)
भारत के वैश्विक चिकित्सा प्रौद्योगिकी पारिस्थितिकी तंत्र और उत्पाद विकास को सुदृढ़ करना
88. समिति राष्ट्रीय औषधि मूल्य निर्धारण प्राधिकरण (एनपीपीए) द्वारा डीपीसीओ 2013 के तहत प्रशासित वर्तमान बाजार–आधारित औषधि मूल्य निर्धारण तंत्र की सीमाओं को समझती है, विशेष रूप से नवीन बायोलॉजिक्स, बायोसिमिलर्स और उच्च लागत वाली चिकित्साओं के संबंध में। समिति का मानना है कि औसत खुदरा विक्रेता मार्जिन पर आधारित मूल्य निर्धारण नवीन उपचारों के लिए उचित और टिकाऊ मूल्य निर्धारण प्रदान करने में विफल रहता है। समिति का मानना है कि मूल्य निर्धारण प्रशासन को लागत–आधारित मॉडल और मूल्य–आधारित मॉडल के बीच संतुलन बनाना चाहिए ताकि वहनीयता और उद्योग की स्थिरता दोनों सुनिश्चित हो सकें। इस संबंध में, समिति सिफारिश करती है कि नैदानिक प्रभावकारिता, सामाजिक मूल्य और लागत–प्रभावशीलता पर स्वास्थ्य प्रौद्योगिकी मूल्यांकन (एचटीएआईएन) के परिणामों को सभी उच्च लागत वाले बायोलॉजिक्स, ऑर्फन ड्रग्स और बायोसिमिलर्स के लिए एनपीपीए के मूल्य निर्धारण दिशानिर्देशों में औपचारिक रूप से एकीकृत किया जाए। समिति आगे सिफारिश करती है कि डीएचआर, एनपीपीए के साथ मिलकर मूल्य–आधारित कीमत निर्धारण और प्रबंधित प्रवेश समझौतों (एमईए) के लिए कानूनी और आर्थिक नीतिगत ढांचे स्थापित करे, साथ ही महत्वपूर्ण, जीवन रक्षक चिकित्साओं के लिए टीआरआईपीएस लचीलेपन का उपयोग करने की क्षमता को मजबूत करे।
(पैरा 3.22.2)
89. डीएचआर–आईसीएमआर की विकसित भारत कार्यनीतिक योजना (2025-2029) में कृत्रिम अंगों, जीन थेरेपी प्लेटफार्मों और चिकित्सीय टीकों के क्षेत्र में अग्रणी अनुसंधान को बढ़ावा देकर भारत को एक उच्च–मूल्यवान वैश्विक नवाचार केंद्र में बदलने के महत्वाकांक्षी लक्ष्य निर्धारित किए गए हैं। इसे समर्थन देने के लिए, चरणबद्ध वित्तपोषण तंत्र – जैसे “फर्स्ट इन द वर्ल्ड चैलेंज” (जिसमें पीओसी के लिए 1 करोड़ रुपये, प्रोटोटाइप के लिए 4 करोड़ रुपये और रोलआउट के लिए 10 करोड़ रुपये दिए जाते हैं) – तैयार किए गए हैं। समिति का मानना है कि भारत की दीर्घकालिक स्वास्थ्य सुरक्षा कम लागत वाले जेनेरिक विनिर्माण से हटकर परिवर्तनकारी, अत्याधुनिक उपचारों की ओर बढ़ने पर निर्भर करती है। इसलिए, समिति 2025-2029 की कार्यनीतिक योजना के तहत जीन थेरेपी और सिंथेटिक बायोलॉजी में उच्च जोखिम वाले, अग्रणी जैव चिकित्सा अनुसंधान के लिए विशेष रूप से निर्धारित वार्षिक बजटीय आवंटन की सिफारिश करती है। समिति ने प्रमुख अनुसंधान संस्थानों में विशेष ‘फ्रंटियर हेल्थ एक्सेलरेटर‘ स्थापित करने की भी सिफारिश की है ताकि डीएचआर के त्रिस्तरीय वित्तपोषण ढांचे के माध्यम से परियोजनाओं को अवधारणा से लेकर राष्ट्रव्यापी बाजार तैनाती तक सुचारू रूप से आगे बढ़ाया जा सके।
(पैरा 3.22.3)
90. समिति ने नोट किया है कि वैश्विक मूल्य श्रृंखला में घरेलू मेडटेक क्षेत्र को बढ़ावा देने के लिए, आईसीएमआर ने प्रथम चरण के फर्स्ट–इन–ह्यूमन ट्रायल नेटवर्क, द्वितीय/तृतीय चरण के परीक्षणों के लिए 79 केंद्रों वाले इंटेंट नेटवर्क और आईआईटी दिल्ली में एमपीआरएजीएटीआई (एमप्रगति) धातु योजक विनिर्माण सुविधा को चालू किया है। इसके अलावा, व्यय विभाग ने एमआईडीएसी की स्थापना के लिए सैद्धांतिक स्वीकृति प्रदान की है। समिति का मानना है कि किफायती प्रोटोटाइपिंग उपकरणों की कमी और नैदानिक सत्यापन में देरी घरेलू मेडटेक उद्यमों के लिए प्रमुख बाधाएं बनी हुई हैं। इसलिए, समिति एमप्रगति रैपिड–प्रोटोटाइपिंग और योजक विनिर्माण मॉडल को सभी प्रमुख तकनीकी और चिकित्सा केंद्रों में लागू करने की सिफारिश करती है ताकि स्टार्टअप और एमएसएमई को उन्नत इंजीनियरिंग उपकरणों तक किफायती पहुंच मिल सके। समिति का मानना है कि एमआईडीएसी के तहत 79 केंद्रों वाले इंटेंट नेटवर्क में त्वरित सत्यापन प्रक्रिया स्थापित करने से घरेलू निर्माताओं को निर्धारित, त्वरित समयसीमा के भीतर नियमों के अनुरूप प्रीक्लिनिकल और नैदानिक मूल्यांकन करने में मदद मिलेगी।
(पैरा 3.22.4)
91. समिति इस बात को समझती है कि सार्वभौमिक स्वास्थ्य कवरेज (यूएचसी) के लिए पहुंच के पांच आयामों – वहनीयता, उपलब्धता, सुगमता, अनुकूलनशीलता और स्वीकार्यता – के बीच संतुलन आवश्यक है। डीएचआर ने दिव्यांगजनों के लिए सहायक तकनीक, कम साक्षरता वाले उपयोगकर्ताओं के लिए ध्वनि–आधारित अनुप्रयोगों और वैज्ञानिक रूप से प्रमाणित आयुष औषधियों (जैसे एनीमिया के लिए पुनर्नवादि मंडूरा) पर अनुसंधान एवं विकास शुरू किया है। समिति का मानना है कि उपेक्षित आबादी की सामाजिक–सांस्कृतिक, शारीरिक और साक्षरता संबंधी बाधाओं के अनुरूप स्वास्थ्य सेवा प्रदान किए बिना समानता प्राप्त नहीं की जा सकती। इसलिए, समिति डीएचआर को डिजिटल और सहायक नवाचारों के लिए एक लक्षित अनुदान योजना शुरू करने की सिफारिश करती है, जिसमें कम साक्षरता वाली आबादी के लिए ध्वनि–सहायता प्राप्त निदान उपकरणों और प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों के लिए एआई–आधारित ट्राइएजिंग प्रणालियों को प्राथमिकता दी जाए। समिति आयुष–आईसीएमआर उन्नत केंद्रों के तहत नैदानिक परीक्षणों का विस्तार करने के पक्ष में है ताकि लागत प्रभावी पारंपरिक औषधियों का मूल्यांकन, मानकीकरण और व्यापक स्तर पर राष्ट्रीय स्वास्थ्य कार्यक्रमों में शामिल किया जा सके और जेब से होने वाले चिकित्सीय खर्चों को कम किया जा सके।
(पैरा 3.22.5)
आयुष मंत्रालय
92. समिति आयुष मंत्रालय द्वारा भारतीय बीमा नियामक एवं विकास प्राधिकरण (आईआरडीएआई) के साथ की गई सक्रिय परामर्श प्रक्रिया और उसके बाद जारी उस परामर्शी पर ध्यान देती है जिसमें नकदरहित आयुष उपचारों के लिए 100 प्रतिशत प्रतिपूर्ति अनिवार्य की गई है। हालांकि, समिति का मानना है कि समाज के सबसे कमजोर वर्गों के लिए वास्तविक वहनीयता तभी प्राप्त की जा सकती है जब समग्र स्वास्थ्य सेवा को सशक्त जन कल्याण योजनाओं में सुदृढ़ रूप से एकीकृत किया जाए। समिति का मानना है कि राष्ट्रीय स्वास्थ्य प्राधिकरण (एनएचए) के साथ चल रही परामर्श प्रक्रिया को बिना किसी विलंब के पूरा किया जाना चाहिए। अतः समिति सिफारिश करती है कि सरकार आयुष्मान भारत–प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना (एबी–पीएमजेएवाई) के अंतर्गत व्यापक आयुष उपचार पैकेजों को तत्काल औपचारिक रूप से शामिल करे। इसके अलावा, यह सुनिश्चित करने के लिए एक सख्त निगरानी तंत्र स्थापित किया जाना चाहिए कि निजी बीमाकर्ता आईआरडीएआई के निर्देशों का सुचारू रूप से पालन करें, जिससे प्रशासनिक बाधाएं कम हों और जनता के लिए जेब से होने वाला खर्च (ओओपीई) कम हो।
(पैरा 3.23.8)
93. समिति केंद्रीय सरकार स्वास्थ्य योजना (सीजीएचएस) के तहत निजी संस्थानों को सूचीबद्ध करके आयुष स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंच बढ़ाने के लिए किए जा रहे प्रयासों को स्वीकार करती है। हालांकि, समिति का मानना है कि आयुष डे केयर सेंटरों को प्रायोगिक आधार पर दिल्ली–एनसीआर क्षेत्र तक सीमित रखने से लाभार्थियों के लिए स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंच में भौगोलिक असमानताएं पैदा होती हैं। इसलिए, समिति सिफारिश करती है कि मंत्रालय वर्तमान में विचाराधीन प्रस्ताव को शीघ्रता से अनुमोदित और कार्यान्वित करे, जिसके तहत सीजीएचएस के अंतर्गत आने वाले सभी शहरों में निजी आयुर्वेद, योग एवं प्राकृतिक चिकित्सा, यूनानी और सिद्ध डे केयर सेंटरों के साथ–साथ आईपीडी अस्पतालों को सूचीबद्ध किया जाए। यह विस्तार अस्पतालों एवं स्वास्थ्य सेवा प्रदाताओं के लिए राष्ट्रीय प्रत्यायन बोर्ड (एनएबीएच) प्रत्यायन से निकटता से जुड़ा होना चाहिए ताकि देश भर में उच्च स्तरीय सेवा वितरण और समग्र स्वास्थ्य सेवाओं तक समान पहुंच सुनिश्चित की जा सके।
(पैरा 3.23.9)
94. समिति मंत्रालय के इस कथन पर चिंता व्यक्त करती है कि खुले बाजार में आयुष दवाओं के लिए वर्तमान में कोई वैधानिक कीमत नियंत्रण तंत्र मौजूद नहीं है। केंद्रीय सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रम (आईएमपीसीएल) पर लागू कीमत निर्धारण पद्धति को स्वीकार करते हुए, समिति का मानना है कि निजी क्षेत्र की आयुष दवा कंपनियों को अनियमित रहने देना रोगियों को मनमानी कीमतों के जोखिम में डालता है, जो राष्ट्रीय आयुष मिशन के किफायती स्वास्थ्य सेवा के उद्देश्य का प्रत्यक्ष उल्लंघन है। अतः समिति सिफारिश करती है कि आयुष मंत्रालय, वित्त मंत्रालय और संबंधित दवा कीमत निर्धारण प्राधिकरणों के समन्वय से, एक व्यापक वैधानिक कीमत नियंत्रण ढांचा तैयार करे और उसे लागू करे। इस तंत्र के तहत आवश्यक और व्यापक रूप से निर्धारित आयुष दवाओं के अधिकतम खुदरा कीमतों पर सीमा निर्धारित की जानी चाहिए, जिससे यह सुनिश्चित हो सके कि वे आम जनता के लिए सस्ती बनी रहें और साथ ही जेब से होने वाले कुल खर्च को भी कम किया जा सके।
(पैरा 3.23.10)
95. समिति राष्ट्रीय आयुष मिशन (एनएएम) की महत्वपूर्ण भूमिका को स्वीकार करती है, जिसने आयुष्मान आरोग्य मंदिर–आयुष [एएएम (आयुष)] के माध्यम से समग्र स्वास्थ्य मॉडल स्थापित करके निवारक स्वास्थ्य देखभाल को बढ़ावा दिया है और समग्र रोग भार को कम किया है। हालांकि, समिति का मानना है कि अनुदान सहायता के लिए राज्य वार्षिक कार्य योजनाओं (एसएएपी) पर निर्भरता अक्सर प्रक्रियात्मक विलंब का कारण बन सकती है, जिससे मानव संसाधनों की समयबद्ध नियुक्ति और महत्वपूर्ण स्वास्थ्य देखभाल अवसंरचना को मजबूत करने में बाधा उत्पन्न होती है। समिति का मानना है कि जमीनी स्तर पर सुदृढ़ निवारक और प्रोत्साहक स्वास्थ्य देखभाल जेब से होने वाले खर्च को स्थायी रूप से कम करने की सबसे प्रभावी कार्यनीति है। इसलिए, समिति सिफारिश करती है कि मंत्रालय एसएएपी के मूल्यांकन और अनुमोदन के लिए एक सख्त, समयबद्ध ढांचा स्थापित करे। इसके अलावा, राज्य और संघ राज्य क्षेत्र सरकारों द्वारा शीघ्र निधि वितरण और कार्यान्वयन सुनिश्चित करने के लिए एक समर्पित निगरानी तंत्र स्थापित किया जाना चाहिए, जिससे लागत प्रभावी और समान आयुष सेवाओं की राष्ट्रव्यापी प्रदायगी में तेजी लाई जा सके।
(पैरा 3.23.11)
96. समिति राष्ट्रीय होम्योपैथी संस्थान (एनआईएच) द्वारा शुरू की गई स्वास्थ्य सेवाओं को नोट करती है और उनकी सराहना करती है, विशेष रूप से हिंदुस्तान कॉपर लिमिटेड के सहयोग से आयोजित निःशुल्क स्वास्थ्य शिविरों और गंगासागर मेले के दौरान 2,000 से अधिक रोगियों को प्रदान की गई चिकित्सा सहायता की। समिति का मानना है कि जनसभाओं के दौरान इस प्रकार के सार्वजनिक–निजी सहयोग और लक्षित हस्तक्षेप किफायती आयुष स्वास्थ्य सेवाओं को सीधे जनता तक पहुंचाने में अत्यंत प्रभावी हैं। समिति का मानना है कि यह सक्रिय स्वास्थ्य सेवा मॉडल एक अलग प्रयास बनकर नहीं रहना चाहिए, बल्कि इसे सभी क्षेत्रों में व्यवस्थित रूप से लागू किया जाना चाहिए। इसलिए, समिति सिफारिश करती है कि मंत्रालय एक संरचित नीति तैयार करे जिसमें उसके अधिकार क्षेत्र के अंतर्गत आने वाले सभी राष्ट्रीय संस्थानों और स्वायत्त निकायों को केंद्रीय सार्वजनिक क्षेत्र के उद्यमों (सीपीएसई) और निजी हितधारकों के साथ सक्रिय रूप से साझेदारी करने का निर्देश दिया जाए। कॉर्पोरेट सामाजिक उत्तरदायित्व (सीएसआर) निधियों का व्यवस्थित रूप से उपयोग करके, ये संस्थान दूरस्थ और कम सुविधा प्राप्त क्षेत्रों में निःशुल्क स्वास्थ्य शिविरों और मोबाइल क्लीनिकों की तैनाती को स्थायी रूप से बढ़ा सकते हैं, जिससे जमीनी स्तर पर स्वास्थ्य सेवाओं की पहुंच में उल्लेखनीय वृद्धि होगी।
(पैरा 3.23.12)
97. समिति ने माननीय प्रधानमंत्री की अध्यक्षता में 27 फरवरी 2025 को हुई समीक्षा बैठक में लिए गए उस निर्णय पर ध्यान दिया है जिसमें आयुष औषधियों के प्रचार–प्रसार के लिए प्रधानमंत्री भारतीय जन औषधि केंद्रों का उचित सह–ब्रांडिंग के माध्यम से उपयोग करने का निर्णय लिया गया था। हालांकि, समिति का मानना है कि स्वास्थ्य सेवाओं पर जेब से होने वाले खर्च को कम करने के उद्देश्य से जारी कार्यकारी निर्देश के उत्तर में केवल “आगे की कार्रवाई पर विचार करना” अपर्याप्त है। समिति का मानना है कि जन औषधि केंद्रों के स्थापित राष्ट्रव्यापी खुदरा नेटवर्क का उपयोग करने से आवश्यक, गुणवत्ता–परीक्षित आयुष औषधियों की उपलब्धता और वहनीयता में अभूतपूर्व वृद्धि होगी। अतः समिति सिफारिश करती है कि आयुष मंत्रालय इस सह–ब्रांडिंग पहल को शीघ्रता से अंतिम रूप दे और इसे कड़ाई से, समयबद्ध तरीके से कार्यान्वित करे, ताकि उच्च गुणवत्ता वाली, मानकीकृत आयुष औषधियां बिना किसी प्रशासनिक देरी के सभी जन औषधि केंद्रों पर उपलब्ध हों।
(पैरा 3.23.19)
98. समिति राष्ट्रीय संस्थानों और अनुसंधान परिषदों द्वारा अपनाई गई विविध प्रचार कार्यनीतियों की सराहना करती है, जैसे कि सीसीआरएम और सीसीआरएस द्वारा प्रमुख एलोपैथिक अस्पतालों में यूनानी और सिद्ध ओपीडी की सह–स्थापना, एनईआईएएच द्वारा ग्रामीण गांवों को गोद लेना और आईटीआरए द्वारा उपग्रह क्लीनिकों की स्थापना। साथ ही, समिति यह भी मानती है कि प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों (पीएचसी), सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों (सीएचसी) और जिला अस्पतालों (डीएच) में सह–स्थापना के माध्यम से आयुष को व्यापक रूप से मुख्यधारा में लाना वर्तमान में राज्यों और संघ राज्य क्षेत्रों द्वारा अपनी–अपनी कार्यक्रम कार्यान्वयन योजनाओं (पीआईपी) और राज्य वार्षिक कार्य योजनाओं (एसएएपी) में अनुमानित मानव संसाधन सहायता और मांग पर निर्भर है। समिति का मानना है कि केवल राज्यों के सक्रिय अनुरोधों पर निर्भर रहने से स्वास्थ्य सेवा तक पहुंच में गंभीर क्षेत्रीय असमानताएं उत्पन्न होती हैं, और अत्यधिक लागत प्रभावी एकीकृत मॉडल को विशिष्ट स्वायत्त संस्थानों तक सीमित नहीं रखा जाना चाहिए, बल्कि इसे मानक संचालन प्रक्रिया के रूप में सार्वभौमिक रूप से अपनाया जाना चाहिए।
(पैरा 3.23.20)
99. समिति का मानना है कि जब रोगियों को उनके समुदाय में ही एक ही छत के नीचे पारंपरिक और समग्र आयुष उपचारों की निर्बाध सुविधा उपलब्ध हो, तो जेब से होने वाले खर्च को सबसे प्रभावी ढंग से कम किया जा सकता है। इसलिए, समिति सिफारिश करती है कि आयुष मंत्रालय, स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय के साथ मिलकर, एक अनिवार्य आधारभूत नीति बनाए जिसमें सभी नव स्वीकृत और मौजूदा प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों (पीएचसी), सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों (सीएचसी) और जिला अस्पतालों (डीएच) में न्यूनतम प्रतिशत में कार्यरत, सह–स्थित आयुष सुविधाएं होना अनिवार्य हो। केंद्र सरकार को राष्ट्रीय आयुष मिशन (एनएएम) का सक्रिय रूप से उपयोग करके राज्यों को इन एकीकरण लक्ष्यों को पूरा करने के लिए प्रोत्साहित करना चाहिए, न कि निष्क्रिय रूप से प्रस्तावों की प्रतीक्षा करनी चाहिए। इसके अलावा, मंत्रालय को अपने सभी संस्थानों में सैटेलाइट क्लिनिक मॉडल को संस्थागत रूप देना चाहिए ताकि देश भर में अल्पसेवित क्षेत्रों, आदिवासी क्षेत्रों और संवेदनशील आबादी को व्यवस्थित रूप से शामिल किया जा सके।
(पैरा 3.23.21)
100. समिति टेली–परामर्श, ई–प्रिस्क्रिप्शन और रोगी पंजीकरण सुविधा के लिए सीसीआरएस और एनईआईएएच जैसी संस्थाओं द्वारा ई–संजीवनी, ए–एचएमआईएस और आयुष नेक्स्ट जैसे डिजिटल स्वास्थ्य प्लेटफार्मों के एकीकरण की सराहना करती है। समिति का मानना है कि भौगोलिक अंतर को पाटने में डिजिटल अंत:क्षेप अत्यंत महत्वपूर्ण हैं, विशेष रूप से ऐसे रोगियों के लिए जिन्हें शारीरिक स्वास्थ्य सेवा तक पहुँचने में संभार और वित्तीय बाधाओं का सामना करना पड़ता है। समिति का मानना है कि आयुष के सभी विषयों में इन टेली–मेडिसिन सेवाओं का विस्तार करने से स्वास्थ्य सेवा की अप्रत्यक्ष लागत, जैसे यात्रा व्यय और वेतन हानि में भारी कमी आएगी। इसलिए, समिति सिफारिश करती है कि मंत्रालय ई–संजीवनी और व्यापक अस्पताल प्रबंधन सूचना प्रणाली (एचएमआईएस) को देश भर के सभी आयुष औषधालयों को सहायक संस्थानों और नैदानिक इकाइयों के लिए एकीकृत करने के लिए एक केंद्रीकृत अधिदेश जारी करे ताकि किफायती देखभाल तक अनवरत दूरस्थ पहुँच सुनिश्चित की जा सके।
(पैरा 3.23.22)
101. समिति राष्ट्रीय होम्योपैथी संस्थान (एनआईएच) द्वारा प्रदान की जा रही अत्यधिक रियायती और व्यापक स्वास्थ्य सेवाओं की सराहना करती है, जिसमें दवाओं सहित मात्र ₹5 का पंजीकरण शुल्क शामिल है। समिति ने इसके 100 बिस्तरों वाले अस्पताल को 250 बिस्तरों वाले अस्पताल में विस्तारित करने की योजना को भी नोट किया है। दूसरी ओर, समिति ने यह पाया है कि राष्ट्रीय सोवा–रिग्पा संस्थान (एनआईएसआर) जैसे विकासशील संस्थान अपेक्षाकृत छोटे 10 बिस्तरों वाले शिक्षण अस्पताल में कार्यरत हैं। समिति का मानना है कि जटिल, दीर्घकालिक और गैर–संक्रामक रोगों के समग्र प्रबंधन के लिए मजबूत इनपेशेंट अवसंरचना अत्यंत महत्वपूर्ण है। समिति का मानना है कि एनआईएच द्वारा अपनाई गई अत्यंत किफायती शुल्क संरचना और बढ़ती इनपेशेंट क्षमता को आयुष क्षेत्र में संरचनात्मक समानता सुनिश्चित करने के लिए एक मानक के रूप में स्थापित किया जाना चाहिए। अतः समिति सिफारिश करती है कि मंत्रालय एनआईएसआर जैसे छोटे संस्थानों की बिस्तर क्षमता और निदान अवसंरचना को उन्नत करने के लिए तत्काल लक्षित निधि आवंटित करे। साथ ही, मंत्रालय को यह सुनिश्चित करना होगा कि पंजीकरण, निदान और आवश्यक दवाओं को कवर करने वाली एक सार्वभौमिक रूप से सब्सिडी वाली टैरिफ संरचना सभी राष्ट्रीय संस्थानों में लागू की जाए ताकि आर्थिक रूप से वंचित आबादी को वास्तव में लाभ मिल सके।
(पैरा 3.23.23)
102. समिति आयुर्ज्ञान योजना के तहत संचालित क्षमता–निर्माण प्रयासों और अखिल भारतीय आयुर्वेद संस्थान (एआईआईए) तथा उत्तर पूर्वी आयुर्वेद एवं होम्योपैथी संस्थान (एनईआईएएच) द्वारा संचालित विशिष्ट प्रशिक्षण कार्यक्रमों की सराहना करती है। हालांकि, समिति का मानना है कि वर्तमान में लगभग 5,000 कर्मियों और सीमित संख्या में नर्सिंग एवं तकनीकी कर्मचारियों को लाभान्वित करने वाला प्रशिक्षण स्तर सुलभ आयुष स्वास्थ्य सेवा की राष्ट्रव्यापी मांग को पूरा करने के लिए अपर्याप्त है। समिति का मानना है कि पंचकर्म तकनीशियनों और आयुष विशेषज्ञ नर्सों जैसे प्रशिक्षित संबद्ध पेशेवरों की गंभीर कमी जमीनी स्तर पर किफायती और समग्र स्वास्थ्य सेवा प्रदान करने में प्रत्यक्ष तौर पर अवरोध उत्पन्न करती है। इसलिए, समिति सिफारिश करती है कि मंत्रालय अपने अधिकार क्षेत्र के अंतर्गत आने वाले सभी राष्ट्रीय संस्थानों और शिक्षण अस्पतालों को एनईआईएएच मॉडल की तर्ज पर संबद्ध आयुष स्वास्थ्य कर्मियों के लिए औपचारिक डिप्लोमा और प्रमाण पत्र पाठ्यक्रम प्रारंभ करने का अधिदेश प्रदान करे। इसके अलावा, विकेंद्रीकृत, राष्ट्रव्यापी प्रशिक्षण नेटवर्क को सहायता प्रदान करने के लिए आयुर्ज्ञान योजना के अंतर्गत निधि में पर्याप्त वृद्धि की जानी चाहिए।
(पैरा 3.23.33)
103. समिति राष्ट्रीय आयुष मिशन (एनएएम) के अंतर्गत सुप्राजा, वायो मित्रा, करुण्य जैसे विशेष आयुष जन स्वास्थ्य कार्यक्रमों के सृजन और वंचित, आदिवासी और दूरस्थ क्षेत्रों में आयुष मोबाइल चिकित्सा इकाइयों की तैनाती की सराहना करती है। समिति का मानना है कि ये निवारक और संवर्धक उपाय गैर–संक्रामक रोगों के प्रबंधन और सबसे कमजोर जनसांख्यिकीय वर्गों में दीर्घकालिक रोग भार को कम करने के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। समिति का मानना है कि राष्ट्रीय स्वास्थ्य समानता सुनिश्चित करने के लिए इन विशिष्ट आउटरीच कार्यक्रमों का निर्बाध संचालन आवश्यक है। अतः समिति सिफारिश करती है कि मंत्रालय एनएएम के अंतर्गत इन लक्षित जन स्वास्थ्य कार्यक्रमों और मोबाइल चिकित्सा इकाइयों के लिए एक समर्पित, आरक्षित बजट आवंटन करे। यह सुनिश्चित करने के लिए कड़ी निगरानी लागू की जानी चाहिए कि ग्रामीण और आदिवासी स्वास्थ्य देखभाल आउटरीच के लिए निर्धारित धन का दुरुपयोग न हो, जिससे हाशिए पर रहने वाली आबादी के लिए सस्ती आयुष देखभाल की निरंतर उपलब्धता सुनिश्चित हो सके।
(पैरा 3.23.34)
104. समिति औषधि नीति अनुभाग (डीपीएस) द्वारा “आयुष उपचारों के बीमा कवरेज और विभिन्न उपचारों/अंत:क्षेपों की मानक दरों के आधार पर दावों के निपटान के लिए दिशा-निर्देश (2016)” को संशोधित करने हेतु एक समर्पित समिति के गठन की सराहना करती है। समिति का मानना है कि पुरानी मानक दरें और गैर–मानकीकृत उपचार मूल्य निर्धारण मनमानी दावा निपटान अभिमुखी हैं, जिससे रोगियों को अपनी जेब से अतिरिक्त भुगतान करना पड़ता है या बीमा प्रदाताओं द्वारा दावा अस्वीकृति का सामना करना पड़ता है। समिति का मानना है कि पारदर्शी, बीमा–आधारित और अद्यतन शुल्क अनुसूचियां यह सुनिश्चित करने के लिए आवश्यक हैं कि गैर-सरकारी और सरकारी स्वास्थ्य बीमा पॉलिसियां आयुष उपचार चाहने वाले पॉलिसीधारकों को वास्तविक वित्तीय सुरक्षा प्रदान करें। इसलिए, समिति आयुष मंत्रालय से समयबद्ध तरीके से संशोधित दिशा-निर्देशों को अंतिम रूप देने और लागू करने में तेजी लाने की सिफारिश करती है। इस संशोधन में सभी मान्यता प्राप्त आयुष उपचारों के लिए एक समान, मानकीकृत मानक दरें स्थापित करना और दावा निपटान के दौरान जेब से होने वाली लागत में वृद्धि को रोकने के लिए बीमा प्रदाताओं द्वारा इन्हें अपनाना अनिवार्य करना आवश्यक है।
(पैरा 3.23.41)
105. समिति ने अनुसंधान परिषदों (सीसीआरएएस, सीसीआरयूएम और सीसीआरएस) द्वारा प्रस्तुत रिपोर्टों से पाया है कि आयुष चिकित्सा की उच्च लागत का मुख्य कारण कच्चे माल की कीमतों में अस्थिरता, मौसमी आपूर्ति की कमी और जटिल निर्माण प्रक्रियाएं हैं। मेट्टूर बांध पर सिद्ध औषधीय पादप उद्यान और लघु एवं मध्यम उद्यमों (एमएसएमई) को प्रोत्साहन देने जैसी पहलों को नोट करते हुए समिति का मानना है कि कच्चे माल की अव्यवस्थित आपूर्ति श्रृंखला से इनपुट लागत में भारी वृद्धि होती है, जिसका बोझ अंततः उपभोक्ता पर पड़ता है। समिति का मानना है कि संरचित, स्थानीय आपूर्ति श्रृंखलाओं और विकेंद्रीकृत प्रसंस्करण के माध्यम से कच्चे माल की कीमतों को स्थिर करना, तैयार आयुष औषधियों के खुदरा मूल्य को कम करने के लिए एक महत्वपूर्ण शर्त है। इसलिए, समिति सिफारिश करती है कि मंत्रालय राज्य वन और कृषि विभागों के समन्वय से क्षेत्रीय हर्बल खेती क्लस्टर स्थापित करने के लिए एक राष्ट्रीय रणनीति तैयार करे। इसके अलावा, मंत्रालय को विकेंद्रीकृत, गुड मैन्युफैक्चरिंग प्रैक्टिस (जीएमपी) प्रमाणित लघु एवं मध्यम उद्यम (एमएसएमई) फार्मेसी इकाइयों के लिए सहायता बढ़ानी चाहिए, जिससे किफायती, उच्च गुणवत्ता वाले कच्चे माल और तैयार औषधियों की निरंतर आपूर्ति सुनिश्चित की जा सके।
(पैरा 3.23.42)
106. समिति ने सीसीआरएएस, सीसीआरएम और सीसीआरएस द्वारा शुरू की गई सहयोगात्मक अनुसंधान पहलों को रेखांकित किया है, जिनमें उच्च–प्रदर्शन तरल क्रोमैटोग्राफी (एचपीएलसी) जैसी आधुनिक विश्लेषणात्मक तकनीकों का उपयोग करके दवा मानकीकरण, केंद्रीकृत उपकरण अनुसंधान सुविधाएं (सीआईआरएफ) और विभिन्न एमआईएस सुविधाओं में आयुष–आईसीएमआर एकीकृत स्वास्थ्य अनुसंधान के उन्नत केंद्रों (एआई–एसीआईएचआर) की स्थापना शामिल है। समिति का मानना है कि मानकीकृत गुणवत्ता नियंत्रणों की कमी और सीमित फार्माकोइकॉनॉमिक डेटा के कारण अक्सर उपचार प्रोटोकॉल लंबे हो जाते हैं और संसाधनों का अनावश्यक व्यय होता है। समिति का मानना है कि ठोस नैदानिक प्रमाण की स्थापना और गुणवत्ता–समायोजित जीवन वर्ष (क्यूएएलवाई) का मात्रात्मक निर्धारण आयुष अंत:क्षेपों की वास्तविक लागत–प्रभावशीलता को प्रदर्शित करने के साथ ही स्वास्थ्य सेवा परिदान में होने वाली अपव्यय पर रोक लगाएगा। इसलिए, समिति सिफारिश करती है कि मंत्रालय सभी व्यापक रूप से निर्धारित पारंपरिक और मालिकाना आयुष फॉर्मूलेशन के लिए व्यवस्थित फार्माकोइकॉनॉमिक अध्ययन अनिवार्य करे। इसके अतिरिक्त, मंत्रालय को आयुष–आईसीएमआर एआई–एसीआईएचआर नेटवर्क का विस्तार देश भर के सभी प्रमुख तृतीयक चिकित्सा महाविद्यालयों तक करना चाहिए ताकि उपचार प्रोटोकॉल को मानकीकृत किया जा सके, अप्रभावी दवा विविधताओं को समाप्त किया जा सके और साक्ष्य–आधारित एकीकृत चिकित्सा के माध्यम से दीर्घकालिक उपचार लागत को कम किया जा सके।
(पैरा 3.23.43)
107. समिति स्वास्थ्य सेवा प्रदाताओं के बीच आयुष के बारे में सीमित जागरूकता और समझ के कारण सामर्थ्य और पहुंच संबंधी बाधाओं पर चिंता व्यक्त करती है। जबकि औषधि नीति अनुभाग (डीपीएस) वर्तमान में मानक उपचार दिशा-निर्देश (एसटीजी) और बीमा दावों के लिए मानकीकृत दस्तावेज़ीकरण विकसित कर रहा है, समिति का मानना है कि संस्थागत नैदानिक प्रोटोकॉल की कमी के कारण ऐतिहासिक रूप से एलोपैथिक चिकित्सकों और निजी स्वास्थ्य बीमाकर्ताओं के बीच संदेह बना रहा है, जिसके परिणामस्वरूप मनमाने ढंग से दावों को अस्वीकार किया जाता है या उपचार में देरी होती है। समिति का मानना है कि प्रदाताओं का विश्वास बढ़ाने, देखभाल परिदान को मानकीकृत करने और पूर्वानुमानित प्रतिपूर्ति सुनिश्चित करने के लिए साक्ष्य–आधारित, सार्वभौमिक रूप से मान्यता प्राप्त नैदानिक मानदंड स्थापित करना आवश्यक है। इसलिए, समिति सिफारिश करती है कि आयुष मंत्रालय को सभी मान्यता प्राप्त आयुष धाराओं में व्यापक एसटीजी अधिसूचना में तेजी लानी चाहिए। इसके अलावा, मंत्रालय को इन दिशा-निर्देशों को सभी सूचीबद्ध सार्वजनिक और गैर-सरकारी स्वास्थ्य संस्थानों के लिए अनिवार्य बनाने के साथ ही सेवा प्रदाताओं और बीमाकर्ताओं के बीच समझ की कमी को दूर करने के लिए इन्हें अंतर–विषयक सीएमई मॉड्यूल में एकीकृत करना चाहिए।
(पैरा 3.23.48)
108. समिति भारत को पारंपरिक चिकित्सा के वैश्विक स्थल के रूप में स्थापित करने के लिए मंत्रालय की पहलों, जिनमें एक समर्पित आयुष वीज़ा की शुरुआत, एडवांटेज हेल्थकेयर इंडिया पोर्टल का शुभारंभ और विश्व स्तर पर अंतर्राष्ट्रीय समझौता ज्ञापनों और आयुष सूचना प्रकोष्ठों की स्थापना शामिल है, की सराहना करती है। समिति का मानना है कि यद्यपि चिकित्सा मूल्य यात्रा (एमवीटी) से पर्याप्त विदेशी मुद्रा और अंतर्राष्ट्रीय मान्यता प्राप्त होती है, फिर भी इस बढ़ते क्षेत्र के आर्थिक लाभों का रणनीतिक रूप से उपयोग घरेलू स्वास्थ्य सेवा में समानता को बढ़ावा देने के लिए किया जाना चाहिए। समिति का मानना है कि उच्च लाभ वाले अंतर्राष्ट्रीय स्वास्थ्य और चिकित्सा पर्यटन, कम वित्तपोषित सार्वजनिक स्वास्थ्य अवसंरचना को समर्थन देने के लिए एक महत्वपूर्ण वित्तीय साधन के रूप में कार्य कर सकते हैं। इसलिए, समिति सिफारिश करती है कि मंत्रालय, स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय के समन्वय से एक ऐसा ढांचा तैयार करे जिसके तहत मान्यता प्राप्त गैर-सरकारी और सार्वजनिक एमवीटी–सूचीबद्ध आयुष अस्पतालों के लिए विदेशी रोगियों से प्राप्त राजस्व का एक निर्धारित प्रतिशत ‘आयुष सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवा समानता कोष‘ में योगदान करना अनिवार्य हो। इस कोष का उपयोग विशेष रूप से आर्थिक रूप से कमजोर घरेलू रोगियों हेतु जटिल आयुष उपचारों, निदान और आवश्यक दवाओं पर सब्सिडी देने के लिए किया जाना चाहिए।
(पैरा 3.23.49)
109. समिति ने अंतर्राष्ट्रीय और राष्ट्रीय गुणवत्ता मानकों को सुगम बनाने में हुई प्रगति, जैसे कि आईएसओ तकनीकी समिति (आईएसओ/टीसी 249/एससी 2) और चिकित्सा स्पा सेवा आवश्यकताओं के संबंध में आईएस/आईएसओ 21426:2018 का प्रकाशन, को नोट किया है । हालांकि, समिति का मानना है कि सख्त नियामक प्रवर्तन के बिना, गैर-सरकारी स्वास्थ्य और आयुष क्षेत्र में सेवा की गुणवत्ता में असमानता, सुरक्षा प्रोटोकॉल में भिन्नता और व्यावसायिक शोषण की आशंका बनी रहेगी। समिति का मानना है कि मान्यता प्राप्त गुणवत्ता मानकों का पालन सीधे तौर पर रोगी सुरक्षा और उचित मूल्य निर्धारण से जुड़ा है। इसलिए, समिति सिफारिश करती है कि आयुष मंत्रालय भारतीय मानक ब्यूरो (बीआईएस) और भारतीय गुणवत्ता परिषद (क्यूसीआई) के सहयोग से देश में संचालित सभी वाणिज्यिक आयुष स्वास्थ्य केंद्रों और क्लिनिकल स्पा के लिए आईएसओ/बीआईएस मानकों पर आधारित एक अनिवार्य प्रत्यायन ढांचा स्थापित करे। गैर-सरकारी क्षेत्र में वहनीयता सुनिश्चित करने और अनुचित मूल्य निर्धारण पर रोक लगाने के लिए यह प्रत्यायन सभी प्रस्तावित उपचारों हेतु सार्वजनिक मूल्य प्रकटीकरण और पारदर्शी शुल्क संरचनाओं के साथ कड़ाई से जुड़ा होना चाहिए।
(पैरा 3.23.50)
आयुष सेवाओं को सुदृढ़ बनाना
110. समिति का मत है कि सच्ची समग्र स्वास्थ्य सेवा के लिए मरीजों को एक ही छत के नीचे पारंपरिक और आधुनिक चिकित्सा प्रणालियों तक निर्बाध पहुंच की आवश्यकता है, ताकि क्रॉस–रेफरल और एकीकृत प्रबंधन को सुगम बनाया जा सके। अतः समिति एक ऐसी नीति के कड़ाई से प्रवर्तन की सिफारिश करती है जो आयुर्वेद और अन्य आयुष औषधालयों या अस्पतालों को सभी सरकारी एलोपैथिक केंद्रों, प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों (पीएचसी), सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों (सीएचसी) और जिला अस्पतालों के साथ अनिवार्य रूप से स्थापित करने का निर्देश देती है। समिति का मानना है कि पारंपरिक स्वास्थ्य सेवा वितरण में भौगोलिक समानता सर्वोपरि है। अतः समिति एक ऐसी निश्चित नीति के निर्माण और तत्काल कार्यान्वयन की सिफारिश करती है जो पूरे देश में समान रूप से जनसंख्या आधारित आयुर्वेद और आयुष सुविधाओं की स्थापना सुनिश्चित करे।
(पैरा 3.23.55)
111. आयुष अनुसंधान परिषदों (सीसीआरएएस, सीसीआरयूएम, सीसीआरएच, सीसीआरएस) और एम्स, आईसीएमआर और आईआईटी जैसे प्रमुख संस्थानों के बीच सहयोगात्मक प्रयासों को स्वीकार करते हुए, समिति का मानना है कि आयुष प्रणाली के तहत रोगों के उपचार को सुनिश्चित करने के लिए साक्ष्य–आधारित अनुसंधान और विकास को सक्रिय रूप से विस्तारित किया जाना चाहिए। समिति का मानना है कि आयुष प्रणाली के तहत उपचार की पारंपरिक पद्धतियों की मुख्यधारा और वैश्विक स्वीकृति के लिए कठोर अनुभवजन्य सत्यापन महत्वपूर्ण है। इसलिए, समिति सुदृढ़ शैक्षणिक और उद्योग साझेदारी के माध्यम से आयुष हस्तक्षेपों के वैज्ञानिक सत्यापन में तेजी लाने के लिए समर्पित, आरक्षित निधि के आवंटन की सिफारिश करती है। समिति का मत है कि जलवायु परिवर्तन और वैश्विक पारिस्थितिक आपदा और अव्यवस्था के कारण होने वाली बीमारियों के उभरते रुझानों को समझने के लिए स्वास्थ्य सेवा की विभिन्न शाखाओं (एलोपैथी, आयुर्वेद, योग, होम्योपैथी, आदि) को एक सख्त अनुसंधान मानसिकता के साथ एकीकृत किया जाना चाहिए। आयुष–आईसीएमआर एकीकृत स्वास्थ्य अनुसंधापन के लिए आयुष- आईसीएमआर उन्नत केंद्र (एआई–एसीआईएचआर) की स्थापना को सभी प्रमुख तृतीयक देखभाल केंद्रों तक बढ़ाया जाना चाहिए, जिसमें गैर–संक्रामक रोगों (एनसीडी), कैंसर देखभाल और वृद्धावस्था स्वास्थ्य के लिए संयुक्त नैदानिक परीक्षणों को प्राथमिकता दी जानी चाहिए।
(पैरा 3.23.56)
112. समिति केंद्रीय औषधि मानक नियंत्रण संगठन (सीडीएससीओ) के साथ आयुष विभाग की स्थापना और मानक उपचार दिशानिर्देशों (एसटीजी) की शुरुआत में हुई प्रगति को स्वीकार करती है। अतः समिति सुरक्षित, साक्ष्य–आधारित और मानकीकृत एकीकृत देखभाल सुनिश्चित करने के लिए आयुष के सभी विषयों में सभी प्रमुख रोग श्रेणियों के लिए व्यापक एसटीजी को शीघ्र अंतिम रूप देने और राष्ट्रव्यापी स्तर पर लागू करने की सिफारिश करती है। समिति का मानना है कि घरेलू और अंतर्राष्ट्रीय विश्वास समझौता रहित गुणवत्ता नियंत्रण पर निर्भर करता है। अतः समिति सभी आयुष औषधि उत्पादों के लिए डब्ल्यूएचओ–सीओपीपी (औषधीय उत्पाद प्रमाणपत्र) और भारतीय गुणवत्ता परिषद (क्यूसीआई) प्रमाणपत्रों को निरंतर और शीघ्रता से बढ़ावा देने और लागू करने की सिफारिश करती है।
(पैरा 3.23.57)
113. समिति का मानना है कि एकीकृत चिकित्सा मॉडल का सफल कार्यान्वयन पूरी तरह से सुप्रशिक्षित, बहु–कुशल और निष्पक्ष स्वास्थ्य सेवा कार्यबल पर निर्भर करता है। अतः समिति आयुष सेवाओं को मुख्यधारा के मानक उपचार प्रक्रियाओं में सुरक्षित रूप से एकीकृत करने के लिए विशेष रूप से डिज़ाइन किए गए योग्यता–आधारित, साक्ष्य–उन्मुख प्रशिक्षण कार्यक्रमों के तत्काल विकास और कार्यान्वयन की सिफारिश करती है। समिति का मानना है कि एलोपैथिक और पारंपरिक चिकित्सकों के बीच आपसी सम्मान और व्यावहारिक तालमेल को बढ़ावा देना प्रणालीगत पूर्वाग्रह को कम करने के लिए महत्वपूर्ण है। अतः समिति एलोपैथिक और आयुष दोनों शिक्षण संस्थानों में एकीकृत पाठ्यक्रम मॉड्यूल, विनिमय फैलोशिप और अंतर–प्रणाली सतत चिकित्सा शिक्षा (सीएमई) सत्रों की तत्काल शुरुआत की सिफारिश करती है ताकि ये एक दूसरे के पूरक हों और जमीनी स्तर पर, विशेष रूप से ग्रामीण, पहाड़ी और जनजातीय क्षेत्रों में चिकित्सा सुविधाओं की उपलब्धता में ग्रामीण–शहरी अंतर को कम कर सकें।
(पैरा 3.23.58)
राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन (एनएचएम) का स्वॉट (एसडब्ल्यूओटी) विश्लेषण
114. समिति का मानना है कि पिछले दो दशकों में एनएचएम ने भारत के सार्वजनिक स्वास्थ्य बुनियादी ढांचे को काफी मजबूत किया है और आवश्यक स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंच का विस्तार किया है। हालांकि, सतत विकास लक्ष्यों, सार्वभौमिक स्वास्थ्य कवरेज और देश में समान स्वास्थ्य सेवा प्राप्त करने के लिए गुणवत्ता, समानता, शहरी स्वास्थ्य देखभाल, मानव संसाधन और प्रणालीगत लचीलेपन में शेष कमियों को निरंतर निवेश, एकीकृत प्रबंधन और अन्य उपायों के माध्यम से दूर किया जाना आवश्यक होगा।
(पैरा 3.24.3)
115. समिति का मानना है कि आयुष्मान भारत के तहत प्राथमिक स्वास्थ्य सेवा अवसंरचना में किए गए परिवर्तन सराहनीय हैं, लेकिन मूलभूत मानव संसाधन की कमी, वित्तीय अड़चनों और डेटा के बिखराव को दूर करने में विफलता मिशन की समान स्वास्थ्य सेवा प्रदान करने और गैर–संचारी रोगों (एनसीडी) के बढ़ते बोझ से निपटने की क्षमता को गंभीर रूप से कमजोर करती है। समिति का मानना है कि सार्वभौमिक स्वास्थ्य कवरेज (यूएचसी) और सतत विकास लक्ष्यों (एसडीजी) को प्राप्त करने के लिए क्रमिक परिचालन सुधारों से आगे बढ़कर एक समन्वित रणनीति की आवश्यकता है जो मानव संसाधन समानता, वित्तीय सरलीकरण और एकीकृत डिजिटल शासन को समाहित करे।
(पैरा 3.24.4)
116. अतः समिति सिफारिश करती है कि स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय, आयुष मंत्रालय और राज्य सरकारों के सहयोग से, निम्नलिखित संरचित उपायों के माध्यम से एनएचएम कार्यान्वयन ढांचे का व्यापक सुधार करे:
- मानव संसाधन युक्तिकरण और कर्मचारी सुरक्षा: संविदात्मक और स्थायी स्वास्थ्य सेवा कर्मचारियों के बीच भारी असमानताओं को दूर करने के लिए एक समान राष्ट्रीय नीति तैयार की जाए, ग्रामीण और दूरस्थ क्षेत्रों में चिकित्सकों, विशेषज्ञों और पैरामेडिकल कर्मियों को आकृष्ट करने और उनकी सेवाएँ बनाए रखने के लिए कठिनाई भत्ते और कैरियर उन्नयन मार्ग की व्यवस्था की जाए तथा अग्रिम पंक्ति के स्वास्थ्य कर्मियों (आशा और एएनएम) के लिए डिजिटल प्रशिक्षण मॉड्यूल का व्यवस्थित रूप से बढ़ाया जाए।
- राजकोषीय सुव्यवस्थितीकरण और अवशोषण क्षमता: राज्यों को केंद्रीय अनुदान जारी करने में प्रशासनिक विलंब को दूर करने के लिए प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण (डीबीटी) से संबद्ध निधि वितरण की वास्तविक समय ट्रैकिंग प्रणाली स्थापित की जाए। इसके अलावा, मंत्रालय को छोटे राज्यों, संघ राज्य क्षेत्रों और उत्तर–पूर्वी राज्यों को उनकी राजकोषीय अवशोषण क्षमता बढ़ाने और संसाधनों के निर्बाध उपयोग को सुनिश्चित करने के लिए विशेष तकनीकी और प्रशासनिक सहायता प्रदान करनी चाहिए।
- डेटा अभिसरण और निरंतर स्वास्थ्य सेवा: अतिव्यापी डेटा रिपोर्टिंग सॉफ़्टवेयर को तर्कसंगत बनाकर आयुष्मान भारत डिजिटल मिशन (एबीडीएम) के साथ एकीकृत एक एकल, एकीकृत संरचना में समाहित किया जाए। यह प्लेटफ़ॉर्म आयुष्मान आरोग्य मंदिरों को सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों, ज़िला अस्पतालों और आयुष्मान भारत–प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना के तृतीयक स्वास्थ्य सेवा नेटवर्क से जोड़कर निर्बाध डिजिटल रेफरल मार्ग स्थापित करे, ताकि प्रत्येक नागरिक को जीवनपर्यंत निरंतर स्वास्थ्य सेवा सुनिश्चित हो सके।
(पैरा 3.24.5)
एम्स नई दिल्ली
117. समिति का मानना है कि प्रौद्योगिकी आधारित स्वास्थ्य सेवा समाधान भौगोलिक दूरियों को कम करने, विशेषज्ञ चिकित्सकों की कमी को दूर करने और उच्च स्तरीय तृतीयक चिकित्सा केंद्रों में मरीजों की भीड़ को कम करने का अभूतपूर्व अवसर प्रदान करते हैं। समिति का मत है कि राष्ट्रीय महत्व के संस्थानों (आईएनआई) द्वारा विकसित सिद्ध और लागत प्रभावी डिजिटल नवाचारों को केवल सीमित सफलता तक सीमित नहीं रखना चाहिए, बल्कि इन्हें राष्ट्रीय स्तर पर लागू किया जाना चाहिए। इसलिए, समिति एम्स, नई दिल्ली से सर्वोत्तम प्रशासनिक और नैदानिक पद्धतियों को प्रलेखित करने, मानकीकृत करने और सभी राज्य शासकीय चिकित्सा महाविद्यालयों और जिला अस्पतालों में लागू करने के लिए एक समर्पित राष्ट्रीय कार्यक्रम की तत्काल स्थापना की सिफारिश करती है। इसमें संरचित मार्गदर्शन, डिजिटल रोगी नेविगेशन प्रणाली, सार्वजनिक डैशबोर्ड, गतिशील कतार प्रबंधन और एकीकृत अपॉइंटमेंट मॉड्यूल को सम्मिलित किया जाए।
(पैरा 3.25.9)
118. समिति प्रमाणित एआई प्लेटफार्मों को व्यापक स्तर पर लागू करने की सिफारिश करती है, विशेष रूप से: (i) सीमित संसाधनों वाले प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों में डायबिटिक रेटिनोपैथी की प्रारंभिक जांच और पहचान के लिए मधुनेत्रएआई; (ii) उन्नत अवस्था के कैंसर रोगियों की सहायक देखभाल के लिए एक एआई–सक्षम मोबाइल एप्लिकेशन, यूपीपीसीएचएआर; (iii) प्रमाणित रेडियोलॉजिस्ट की देखरेख में चेस्ट एक्स–रे को प्राथमिकता प्रदान करते हुए 5-10 मिनट के भीतर प्रारंभिक रिपोर्ट तैयार करने वाला एआई–सहायता प्राप्त चेस्ट एक्स–रे ट्राइएज; और (iv) चौबीसों घंटे स्क्रीनिंग और सुगम विशेषज्ञ परामर्श के लिए “नेवर अलोन” डिजिटल मानसिक स्वास्थ्य ढांचा (व्हाट्सएप–एकीकृत)। समिति आयुष्मान भारत डिजिटल मिशन (एबीडीएम) के तहत ई–प्रिस्क्रिप्शन, क्लिनिकल डिसीजन सपोर्ट सिस्टम (सीडीएसएस) और रिमोट पेशेंट मॉनिटरिंग के पूर्ण एकीकरण में तेजी लाने की भी सिफारिश करती है।
(पैरा 3.25.10)
119. समिति का मानना है कि वर्तमान में अव्यवस्थित रोगी प्रवाह से एम्स जैसे तृतीयक संस्थानों पर अत्यधिक दबाव पड़ता है, जिससे अत्यधिक भीड़भाड़, लंबे समय तक प्रतीक्षा और लंबी दूरी तय करने वाले ग्रामीण परिवारों के लिए अप्रत्यक्ष आर्थिक कठिनाई उत्पन्न होती है। इसके अलावा, सार्वजनिक और निजी दोनों क्षेत्रों को स्वास्थ्य प्रणाली के पूरक घटकों के रूप में देखा जाना चाहिए। इसलिए, समिति आयुष्मान आरोग्य मंदिरों (एएएम), जिला अस्पतालों और तृतीयक/निजी संस्थानों को जोड़ने वाली एक अनिवार्य, प्रौद्योगिकी–आधारित रेफरल प्रणाली के कार्यान्वयन की सिफारिश करती है। मानकीकृत इलेक्ट्रॉनिक रेफरल प्रोटोकॉल और वास्तविक समय पर फीडबैक लूप यह सुनिश्चित करेंगे कि तृतीयक देखभाल सुविधाएं प्राथमिक और द्वितीयक स्तर की चिकित्सा स्थितियों का उपचार केवल संरचित, सत्यापन योग्य रेफरल के माध्यम से ही करें, जिससे भीड़भाड़ कम हो सके।
(पैरा 3.25.11)
120. समिति का मत है कि निजी क्षेत्र की क्षमता, जो वर्तमान में शहरी क्षेत्रों तक सीमित है और जिसका विनियमन अलग–अलग है, का सार्वजनिक स्वास्थ्य लक्ष्यों की पूर्ति के लिए रणनीतिक रूप से उपयोग किया जाना चाहिए। समिति उन्नत निदान, आपातकालीन एम्बुलेंस नेटवर्क, टेलीमेडिसिन और चिकित्सा शिक्षा सहित उच्च स्तरीय सेवा क्षेत्रों में सुदृढ़ पीपीपी (पब्लिक–प्राइवेट पार्टनरशिप) ढाँचा तैयार करने की सिफारिश करती है। व्यावसायिक शोषण की रोकथाम के लिए, सभी पीपीपी पहलों को कठोर मूल्य सीमा, परिभाषित सेवा स्तर समझौतों (एसएलए) और स्वतंत्र गुणवत्ता लेखा–परीक्षण के तहत संचालित किया जाना चाहिए ताकि संवेदनशील आबादी के लिए समान पहुंच सुनिश्चित हो सके।
(पैरा 3.25.12)
121. समिति का मानना है कि केवल बीमा कवरेज से वित्तीय सुरक्षा प्राप्त नहीं की जा सकती; इसके लिए कड़े लागत नियंत्रण, अनुचित या शोषणकारी चिकित्सा पद्धतियों का उन्मूलन और दोनों क्षेत्रों में साक्ष्य–आधारित चिकित्सा का कड़ाई से पालन आवश्यक है। अतः समिति सिफारिश करती है कि मंत्रालय सामान्य चिकित्सा प्रक्रियाओं, निदान पैनलों और शल्य प्रत्यारोपणों के लिए मानकीकृत आधारभूत मूल्य निर्धारण और शुल्कों का अनिवार्य सार्वजनिक प्रकटीकरण अनिवार्य करे। निजी अस्पतालों को अनावश्यक जांच, अनावश्यक अस्पताल में भर्ती और बहु–दवाओं के उपयोग को समाप्त करने के लिए राष्ट्रीय मानक उपचार दिशानिर्देशों (एसटीजी) का कड़ाई से पालन करना चाहिए। समिति सभी सार्वजनिक और सूचीबद्ध निजी अस्पतालों में आवश्यक निदान सूचियों (ईडीएल), रोगाणुरोधी प्रबंधन कार्यक्रमों और जेनेरिक दवाओं के अनिवार्य प्रिस्क्रिप्शन को लागू करने की भी सिफारिश करती है। जन औषधि केंद्र और अमृत फार्मेसियों को सभी द्वितीयक और तृतीयक अस्पताल परिसरों में स्टॉक की उपलब्धता की गारंटी के साथ स्थापित किया जाना चाहिए।
(पैरा 3.25.13)
122. समिति का मत है कि सार्वजनिक अस्पताल औसत भर्ती अवधि (एएलओएस), बिस्तर अधिभोग दर, स्वास्थ्य सेवा–संबद्ध संक्रमण दर और प्रतीक्षा अवधि जैसे प्रमुख प्रदर्शन संकेतकों (केपीआई) की निगरानी और सार्वजनिक प्रकटीकरण करें और साथ ही गतिशील संसाधन आवंटन तथा स्वचालित आपूर्ति श्रृंखला प्रबंधन के माध्यम से अपनी कार्यक्षमता बढ़ाएं। अनावश्यक जांच और अत्यधिक बिलिंग प्रवृत्तियों पर अंकुश लगाने के लिए कठोर लेखापरीक्षा तंत्र लागू करना आवश्यक है।
(पैरा 3.25.14)
123. समिति का मानना है कि भारत की बदलती जनसांख्यिकीय संरचना को देखते हुए, वृद्धजनों की देखभाल की ओर तत्काल ध्यान देना आवश्यक है। इसके साथ ही, मात्रा–आधारित देखभाल से हटकर रोगी–केंद्रित, मूल्य–आधारित स्वास्थ्य सेवा की ओर मूलभूत परिवर्तन होना चाहिए, जहाँ रोगी अपनी देखभाल यात्रा का सक्रिय और जागरूक भागीदार हो। इसलिए, समिति प्राथमिक (आयुष्मान आरोग्य मंदिर) और द्वितीयक (जिला अस्पताल) देखभाल स्तरों में समर्पित जराचिकित्सा, प्रशामक देखभाल, पुनर्वास और गृह–आधारित देखभाल नेटवर्क को एकीकृत करने की सिफारिश करती है। गैर–संक्रामक रोगों (एनसीडी) और वृद्धावस्था संबंधी बीमारियों के बढ़ते बोझ से निपटने के लिए जराचिकित्सा नर्सिंग और संबद्ध स्वास्थ्य देखभाल में विशेष कार्यबल प्रशिक्षण को तेजी से आगे बढ़ाया जाना चाहिए। समिति बहुभाषी रोगी मार्गदर्शन डेस्क स्थापित करने और औपचारिक रोगी हित संरक्षण समूहों/रोगी प्रतिनिधि संगठनों की स्थापना की भी सिफारिश करती है। इन मंचों को रोगियों को न केवल रोग प्रबंधन पर, बल्कि उपलब्ध सरकारी वित्तीय सहायता योजनाओं (जैसे एबी–पीएमजेएवाई और रोगी सहायता कोष) के बारे में भी सक्रिय रूप से शिक्षित करना चाहिए ताकि उपचार पर भारी-भरकम व्यक्तिगत व्यय को समाप्त किया जा सके।
(पैरा 3.25.15)
124. समिति का मत है कि स्वास्थ्य प्रणाली के वित्तपोषण को क्रमिक रूप से मानकीकृत रोगी सुरक्षा मापदण्डों तथा राष्ट्रीय गुणवत्ता आश्वासन मानकों (एनक्यूएएस/एनएबीएच) द्वारा मापे गए मूल्य-आधारित परिणामों की ओर संक्रमण करना चाहिए। इसके अतिरिक्त, सभी सूचीबद्ध संस्थानों में सुदृढ़, वास्तविक समय आधारित डिजिटल शिकायत निवारण तंत्र को अनिवार्य बनाया जाना चाहिए।
(पैरा 3.25.16)
125. समिति का मत है कि केवल भौतिक अवसंरचना के आधार पर पर्याप्त रूप से प्रशिक्षित, समान रूप से वितरित तथा प्रेरित स्वास्थ्य कार्यबल के बिना स्वास्थ्य सेवाएं प्रदान नहीं की जा सकती हैं। जिला तथा परिधीय स्वास्थ्य संस्थानों में विशेषज्ञों, नर्सों तथा सहायक स्वास्थ्य पेशेवरों की गंभीर कमी और उनका शहरी तथा ग्रामीण क्षेत्रों के बीच अत्यधिक असमान वितरण स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंच में मूलभूत बाधाएं बनी हुई हैं। अतः समिति सिफारिश करती है कि मंत्रालय द्वारा , राज्य सरकारों तथा राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग (एनएमसी) के परामर्श से, दूरस्थ एवं ग्रामीण जिला अस्पतालों में सेवाएं दे रहे चिकित्सा विशेषज्ञों के लिए एक समर्पित संवर्ग संरचना तथा पारदर्शी प्रोत्साहन व्यवस्था, जिसमें वित्तीय प्रोत्साहन राशि, स्नातकोत्तर पाठ्यक्रमों में अधिमान्य सीटें तथा त्वरित पदोन्नति के प्रावधान शामिल हों, तैयार की जाए।
(पैरा 3.25.17)
126. समिति का मत है कि जिला स्तर के सभी अस्पतालों में स्नातकोत्तर चिकित्सा सीटों (एमडी/एमएस/डीएनबी) तथा नैदानिक प्रशिक्षण कार्यक्रमों का शीघ्र विस्तार किया जाना चाहिए। इसके अतिरिक्त, कार्यों के पुनर्वितरण तथा बहु-कौशल आधारित स्वास्थ्य सेवा प्रदान करने को समर्थन देने के लिए नर्सों, पैरामेडिकल कर्मियों तथा सहायक स्वास्थ्य पेशेवरों के लिए वैधानिक मान्यता तथा सतत व्यावसायिक विकास को संस्थागत रूप दिया जाना चाहिए। समिति सिफारिश करती है कि एबीडीएम के अंतर्गत एक गतिशील, पारदर्शी राष्ट्रीय स्वास्थ्य कार्यबल रजिस्ट्री स्थापित की जाए, ताकि वास्तविक समय में कार्मिकों की उपलब्धता के स्तर का पता लगाया जा सके और सेवाओं से वंचित क्षेत्रों में दीर्घकालिक रिक्तियों की स्थिति को रोका जा सके।
(पैरा 3.25.18)
127. समिति का मत है कि आपातकालीन प्रतिक्रिया में विलंब तथा वास्तविक समय पर गंभीर देखभाल में समन्वय का अभाव, चिकित्सीय संकटों के दौरान टाली जा सकने वाली मृत्यु दर और जेब से किए जाने वाले अत्यधिक व्यय के प्रमुख कारण हैं। समिति, अतः सिफारिश करती है कि एकीकृत, प्रौद्योगिकी-सक्षम आपातकालीन देखभाल नेटवर्क का सृजन किया जाए, जो मूलभूत/उन्नत जीवन रक्षक सहायता वाली एम्बुलेंसों, जिला आपातकालीन विभागों, आघात केंद्रों तथा तृतीयक अस्पतालों को एकल राष्ट्रीय संपर्क लाइन और जीआईएस-आधारित निगरानी प्रणाली के माध्यम से जोड़े।
(पैरा 3.25.19)
128. समिति विचार करती है कि सार्वजनिक तथा सूचीबद्ध निजी संस्थानों को अनिवार्य रूप से केंद्रीयकृत सार्वजनिक डैशबोर्ड पर आईसीयू बेड्स, वेंटिलेटर की उपलब्धता तथा आपातकालीन विभाग में स्थान की उपलब्धता से संबंधित वास्तविक समय में अद्यतन सूचना प्रकाशित करने चाहिए, जिससे संकटग्रस्त परिवारों द्वारा अस्पतालों में अव्यवस्थित रूप से भटकने की स्थिति को रोका जा सके। समिति सिफारिश करती है कि सार्वभौमिक आपातकालीन प्राथमिकता निर्धारण दिशा-निर्देशों तथा टेली-आईसीयू संपर्क व्यवस्थाओं का कार्यान्वयन किया जाए, जिससे जिला चिकित्सक हस्तांतरण से पूर्व अथवा हस्तांतरण के दौरान शीर्ष संस्थानों, जैसे एम्स, के विशेषज्ञ परामर्श के अंतर्गत गंभीर रूप से बीमार रोगियों की स्थिति स्थिर कर सकें।
(पैरा 3.25.20)
129. समिति का मत है कि गैर-संचारी रोगों (एनसीडी) के शीघ्र पता लगाने तथा उनकी रोकथाम की दिशा में व्यापक रूप से ध्यान केंद्रित करने के साथ-साथ केंद्र सरकार की दृढ़ वित्तीय प्रतिबद्धता के बिना दीर्घकालिक वहनीयता बनाए रखना संभव नहीं है। अतः समिति सिफारिश करती है कि मंत्रालय द्वारा राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति में परिकल्पित प्रावधानों के अनुसार, एक निर्धारित समय-सीमा के भीतर सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यय को सकल घरेलू उत्पाद के 2.5–3 प्रतिशत तक क्रमिक रूप से बढ़ाने के लिए वर्ष-दर-वर्ष वैधानिक कार्ययोजना निर्धारित की जाए।
(पैरा 3.25.21)
130. समिति का मत है कि सार्वजनिक स्वास्थ्य खरीद व्यवस्था को “रणनीतिक क्रय” की दिशा में परिवर्तित किया जाना चाहिए, जिसमें आयुष्मान भारत (एबी-पीएमजेएवाई) के व्यापक लाभार्थी आधार का उपयोग करते हुए लागत दरों को कम किया जाए, कठोर नैदानिक गुणवत्ता मानदण्डों को लागू किया जाए तथा वर्तमान में अत्याधिक स्वास्थ्य व्यय के जोखिम से प्रभावित संवेदनशील आबादी तक स्वास्थ्य सेवाओं का विस्तार किया जाए। समिति सिफारिश करती है कि सभी आयुष्मान आरोग्य मंदिरों (एएएम) में जनसंख्या-आधारित जांच, वयस्कों के लिए नियमित टीकाकरण, जीवनशैली संबंधी हस्तक्षेप तथा गैर-संचारी रोगों के प्रारंभिक निदान का विस्तार किया जाए, जिससे उन्नत द्वितीयक और तृतीयक स्तर की बीमारियों से उत्पन्न होने वाले दीर्घकालिक उच्च वित्तीय भार को कम किया जा सके।
(पैरा 3.25.22)
चयनित अस्पतालों के विचार
स्टार डेंटल
131. समिति का मत है कि राष्ट्रीय स्वास्थ्य ढांचे के अंतर्गत मौखिक एवं दंत स्वास्थ्य देखभाल को पर्याप्त प्राथमिकता प्रदान नहीं की गई है, जिसके परिणामस्वरूप वहनीयता और पहुंच, दोनों के संबंध में महत्वपूर्ण अंतर है। समिति को प्राप्त अभ्यावेदनों से यह संकेत मिलता है कि सार्वजनिक और निजी, दोनों ही स्वास्थ्य बीमा योजनाओं में दंत चिकित्सा सेवाओं के लिए कवरेज का स्पष्ट अभाव है, साथ ही निजी दंत चिकित्सा संगठनों और सार्वजनिक स्वास्थ्य संस्थानों के बीच सहयोगात्मक पहलों का भी अभाव है। यद्यपि संगठित निजी दंत चिकित्सा नेटवर्क ने द्वितीय श्रेणी के शहरों में सफलतापूर्वक विस्तार किया है और सॉफ्टवेयर-समन्वित मानकीकृत बिलिंग प्रणालियां स्थापित की हैं, तथापि ग्रामीण क्षेत्रों में उनकी पूर्ण अनुपस्थिति के कारण जनसंख्या का एक बड़ा वर्ग दंत स्वास्थ्य सेवाओं से वंचित रह जाता है।
(पैरा 3.26.2)
132. समिति का मत है कि जब तक दंत चिकित्सा देखभाल को औपचारिक रूप से मान्यता प्रदान कर मुख्यधारा की चिकित्सा देखभाल के समान बढ़ावा नहीं दिया जाता, तब तक सार्वजनिक स्वास्थ्य के सर्वोत्तम परिणाम प्राप्त नहीं किए जा सकते। निजी क्षेत्र में मानकीकृत उपचार दरों और पारदर्शी रोगी अभिलेखों के रखरखाव की व्यवस्था यह दर्शाती है कि दंत स्वास्थ्य देखभाल की लागतों को बीमा योजनाओं में समावेशन के लिए व्यवस्थित रूप से संरचित, विनियमित और निगरानी योग्य बनाया जा सकता है। अतः समिति सिफारिश करती है कि सरकार दंत स्वास्थ्य देखभाल को मुख्यधारा में लाने के लिए तत्काल ठोस नीतिगत उपाय करे तथा सरकार द्वारा प्रायोजित स्वास्थ्य बीमा योजनाओं में व्यापक दंत उपचारों को स्पष्ट रूप से शामिल करे। इसके अतिरिक्त, सरकार को निजी दंत स्वास्थ्य सेवा प्रदाताओं को ग्रामीण क्षेत्रों में अपनी नैदानिक और परिचालन उपस्थिति का विस्तार करने के लिए प्रोत्साहित करने हेतु सार्वजनिक-निजी भागीदारी को सक्रिय रूप से बढ़ावा देना चाहिए, जिससे यह सुनिश्चित किया जा सके कि देशभर के सभी नागरिकों को समान, पारदर्शी और वहनीय दंत स्वास्थ्य देखभाल उपलब्ध हो सके।
(पैरा 3.26.3)
जवाहरलाल नेहरू मेडिकल कॉलेज
133. समिति का मत है कि सरकारी स्वास्थ्य योजनाओं के अंतर्गत दावों के निपटान में अत्यधिक विलंब, कमजोर लाभार्थियों के लिए स्वास्थ्य सेवाओं की उपलब्धता को मूल रूप से प्रभावित करता है। जबकि कर्नाटक के सुवर्ण आरोग्य सुरक्षा ट्रस्ट (एसएएसटी) जैसे तंत्रों के अंतर्गत दावों के प्रसंस्करण के लिए स्वीकार्य निपटान अवधि 15 से 21 दिनों के बीच निर्धारित है, वहीं जवाहरलाल नेहरू मेडिकल कॉलेज जैसे संस्थानों द्वारा सूचित वास्तविक औसत निपटान अवधि 6 से 8 माह होना अस्वीकार्य है। यह प्रणालीगत बाधा, निजी बीमा कंपनियों द्वारा लिए जाने वाले 25 से 30 दिनों की अवधि के विपरीत, सूचीबद्ध सेवा प्रदाताओं की कार्यशील पूंजी को गंभीर रूप से प्रभावित करती है। अस्पष्ट रूप से परिभाषित “शल्य चिकित्सा के बाद अपर्याप्त जांचों” के कारण बार-बार बिल अस्वीकृत होने के साथ मिलकर ये विलंब निजी क्षेत्र की भागीदारी को हतोत्साहित करते हैं तथा सहभागी चिकित्सा महाविद्यालयों की परिचालन स्थिरता को प्रभावित करने का खतरा उत्पन्न करते हैं।
(पैरा 3.27.2)
134. समिति मानती है कि वर्तमान प्रतिपूर्ति प्रणाली की संरचनात्मक जटिलता गंभीर देखभाल प्रदान करने वाले सेवा प्रदाताओं को प्रतिकूल रूप से प्रभावित करती है तथा रोगियों की स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंच को सीमित करती है। वर्तमान असमानता, जिसमें सरकारी पैकेज दरें निजी बीमा समकक्ष दरों की तुलना में औसतन 30 प्रतिशत कम हैं, गुणवत्तापूर्ण स्वास्थ्य सेवा प्रदान करने की स्थिरता के समक्ष चुनौती उत्पन्न करती है। विशेष रूप से, शल्य चिकित्सा हस्तक्षेप की आवश्यकता वाले गंभीर रोगियों के लिए पृथक आईसीयू पैकेजों का अभाव तथा पीएमजेएवाई के अंतर्गत द्विपक्षीय शल्य चिकित्सा प्रक्रियाओं पर अव्यावहारिक प्रतिबंध, रोगियों के लिए अनुकूलतम चिकित्सा प्रक्रियाओं के स्थान पर कम प्रभावी उपचार मार्ग अपनाने को बाध्य करते हैं, जिससे अनावश्यक वित्तीय भार उत्पन्न होता है और रोगियों को बार-बार अस्पताल में भर्ती होना पड़ता है। अतः समिति सिफारिश करती है कि स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय द्वारा, राष्ट्रीय स्वास्थ्य प्राधिकरण (एनएचए) तथा संबंधित राज्य स्वास्थ्य एजेंसियों (एसएचए) के साथ समन्वय में, निम्नलिखित प्रणालीगत हस्तक्षेपों को तत्काल क्रियान्वित किया जाए:
- दावों के निपटान के लिए सेवा स्तर समझौतों (एसएलए) का प्रवर्तन: सभी सरकारी योजना दावों के निपटान के लिए प्रौद्योगिकी–आधारित अधिकतम 30 दिनों की कठोर समय–सीमा निर्धारित की जाए तथा इस निर्धारित अवधि से अधिक विलंब होने पर स्वास्थ्य सेवा प्रदाताओं द्वारा दण्डात्मक ब्याज का स्वतः भुगतान अनिवार्य किया जाए।
- लाभ पैकेजों का युक्तिसंगतीकरण: शल्य चिकित्सा के बाद गंभीर देखभाल के लिए पृथक, स्वतंत्र आईसीयू पैकेजों को शामिल करने हेतु स्वास्थ्य लाभ पैकेजों (एचबीपी) का व्यापक और तत्काल पुनरीक्षण किया जाए तथा समग्र पैकेज दरों को तृतीयक स्वास्थ्य देखभाल की वास्तविक परिचालन लागतों के अनुरूप व्यवस्थित रूप से निर्धारित किया जाए।
- द्विपक्षीय प्रक्रियाओं को अनुमति प्रदान करना: पीएमजेएवाई के अंतर्गत द्विपक्षीय रोगों के उपचार तथा एक साथ की जाने वाली शल्य चिकित्सा प्रक्रियाओं को अनुमति प्रदान की जाए, जिससे एक ही शल्य चिकित्सा सत्र में समवर्ती नैदानिक हस्तक्षेप किए जा सकें, रोगियों को होने वाली पीड़ा को कम किया जा सके, जोखिमों को न्यून किया जा सके तथा स्वास्थ्य देखभाल की संचयी लागत को कम किया जा सके।
- नैदानिक लेखा–परीक्षणों का मानकीकरण: एसएएसटी जैसी राज्य योजनाओं द्वारा दावों की मनमानी अस्वीकृति को समाप्त करने तथा निर्णय प्रक्रिया को सुव्यवस्थित करने के लिए आवश्यक शल्योत्तर जांचों की एक विस्तृत, मानकीकृत और विशेषज्ञता–विशिष्ट जांच सूची तैयार कर प्रकाशित की जाए।
(पैरा 3.27.3)
135. समिति का मत है कि विशिष्ट ऑन्कोलॉजी सुविधाओं की स्थापना की पूंजी-प्रधान प्रकृति, जिसमें चार वर्ष की परिपक्वता (जेस्टेशन) अवधि के साथ 500-बेड वाले अस्पताल के लिए लगभग ₹1,000 करोड़ के निवेश की आवश्यकता होती है, क्षेत्र में प्रवेश हेतु गंभीर बाधाएं उत्पन्न करती है तथा परिचालन एवं उपचार लागत में वृद्धि का कारण बनती है। श्रेणी-I एवं श्रेणी-II के शहरों में संस्थागत भूमि की अत्यधिक कमी तथा उसकीउच्च अधिग्रहण लागत (राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (एनसीआर) में पाँच एकड़ भूमि के लिए 50 करोड़ रुपए से ₹250 करोड़ तक) और प्राथमिकता क्षेत्र ऋण की अनुपलब्धता के कारण स्वास्थ्य सेवा प्रदाताओं को उच्च लागत वाले वाणिज्यिक वित्तपोषण अथवा निजी इक्विटी पर निर्भर रहना पड़ता है, जिसका अंतिम प्रभाव मरीजों पर बढ़ते वित्तीय बोझ के रूप में पड़ता है। इसके अतिरिक्त, यद्यपि वर्तमान में स्वास्थ्य सेवाओं को जीएसटी से छूट प्राप्त है, तथापि इस व्यवस्था के कारण तृतीयक स्वास्थ्य सेवा अस्पताल विशिष्ट निर्माण कार्यों, उपभोग्य सामग्रियों तथा उन्नत चिकित्सा उपकरणों पर किए गए भारी पूंजीगत व्यय के संबंध में इनपुट टैक्स क्रेडिट (ITC) का दावा नहीं कर पाते हैं। उन्नत चिकित्सा उपकरणों पर 18 प्रतिशत जीएसटी तथा उच्च आयात शुल्क लागू होने के कारण भारत में इन उपकरणों की लागत लगभग 35 प्रतिशत तक अधिक हो जाती है।अतः समिति अनुशंसा करती है कि सरकार द्वारा निम्नलिखित संरचनात्मक हस्तक्षेप किए जाएं:
(क) प्राथमिकता क्षेत्र वित्तपोषण एवं रियायती दरों पर भूमि आवंटन: स्वास्थ्य अवसंरचना, विशेष रूप से स्वतंत्र रूप से संचालित, गैर-लाभकारी तथा तृतीयक ऑन्कोलॉजी केंद्रों को कम लागत वाले संस्थागत वित्तपोषण की सुविधा उपलब्ध कराने के उद्देश्य से प्राथमिकता क्षेत्र ऋण का दर्जा प्रदान किया जाए। राज्य सरकारों के लिए यह अनिवार्य किया जाना चाहिए कि वे शहरी एवं अर्ध-शहरी क्षेत्रों में जनहित से जुड़ी स्वास्थ्य सेवा परियोजनाओं के लिए संस्थागत भूमि का आवंटन रियायती दरों पर करें।
(ख) जीएसटी के अंतर्गत स्वास्थ्य सेवाओं को शून्य-दर श्रेणी में शामिल करना: स्वास्थ्य सेवाओं को ‘जीएसटी से छूट’ श्रेणी से हटाकर ‘शून्य-दर जीएसटी (0%)’ व्यवस्था के अंतर्गत पुनर्वर्गीकृत किया जाए, जिससे अस्पतालों को चिकित्सा उपकरणों, उपभोग्य सामग्रियों तथा का लाभ प्राप्त हो सके। इससे अस्पतालों की समग्र परिचालन लागत में प्रत्यक्ष रूप से कमी लाई जा सकेगी।
(ग) सीमा शुल्क का युक्तिकरण एवं घरेलू विनिर्माण को प्रोत्साहन: देश में निर्मित न होने वाले उच्च-स्तरीय विकिरण एवं नैदानिक उपकरणों पर लागू आयात शुल्क का युक्तिकरण किया जाए। इसके साथ ही, उन्नत चिकित्सा प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में स्वदेशी विनिर्माण क्षमताओं के विकास हेतु ‘मेक इन इंडिया‘ पहल के अंतर्गत लक्षित प्रोत्साहन प्रदान किए जाएं।
(पैरा 3.27.8)
136. समिति कैंसर उपचार पर होने वाले व्यय का लगभग 70 प्रतिशत से 80 प्रतिशत भाग भारत में मरीजों द्वारा स्वयं अत्यधिक खर्च वहन किए जाने के तथ्य पर गंभीर चिंता व्यक्त करती है, जिसमें प्रति मरीज उपचार की औसत लागत लगभग 7.5 रुपए लाख तक पहुंच जाती है। आयुष्मान भारत (पीएम-जेएवाई), सीजीएचएस ईसीएचएस तथा ईएसआईसी जैसी सार्वजनिक स्वास्थ्य योजनाओं के अंतर्गत प्रमुख विशिष्ट कैंसर अस्पतालों की संबद्धता (Empanelment) अत्यंत सीमित बनी हुई है, क्योंकि वर्तमान प्रतिपूर्ति पैकेज दरें, जो प्रायः बाजार लागत से 70 प्रतिशत तक कम हैं, सीमांत लागत के सिद्धांतों के आधार पर निर्धारित की जाती हैं तथा इनमें पूंजीगत निवेश, चिकित्सा मुद्रास्फीति एवं परिचालन की दीर्घकालिक व्यवहार्यता जैसे महत्वपूर्ण कारकों को पर्याप्त रूप से शामिल नहीं किया जाता है। इसके अतिरिक्त, औषधि मूल्य नियंत्रण आदेश के अंतर्गत मूल्य विनियमन के बावजूद, कैंसर-रोधी औषधियों पर खुदरा मार्जिन अभी भी अत्यधिक उच्च (50–60 प्रतिशत) बना हुआ है तथा निर्माता प्रायः वैकल्पिक शक्तियों अथवा नई फॉर्मूलेशनों को प्रस्तुत करके मूल्य सीमा से बचने का प्रयास करते हैं। महत्वपूर्ण रूप से, वर्तमान रोगी सहायता कार्यक्रम सार्वजनिक स्वास्थ्य बीमा योजनाओं के अंतर्गत आने वाले लाभार्थियों को शामिल नहीं करते हैं, जबकि पीईटी-सीटी एमआरआई तथा आनुवंशिक परीक्षण जैसी नैदानिक जाँचों के लिए मानकीकृत मूल्य निर्धारण के अभाव से उपचार लागत में और वृद्धि होती है। अतः समिति अनुशंसा करती है कि स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय, राष्ट्रीय स्वास्थ्य प्राधिकरण तथा राष्ट्रीय औषधि मूल्य निर्धारण प्राधिकरण के समन्वय से निम्नलिखित उपायों को क्रियान्वित करे:
- परिवर्तनशील पैकेज दर संशोधन: पीएम-जेएवाई तथा अन्य सरकारी स्वास्थ्य योजनाओं के अंतर्गत संबद्धता हेतु निर्धारित पैकेज दरों की मुद्रास्फीति-सूचकांक आधारित व्यापक समीक्षा एवं संशोधन किया जाए। प्रतिपूर्ति की व्यवस्था में पूंजीगत परिसंपत्तियों का मूल्यह्रास, विशिष्ट स्वास्थ्य अवसंरचना तथा आधुनिक ऑन्कोलॉजी उपचार प्रोटोकॉल जैसे कारकों को समुचित रूप से शामिल किया जाए, ताकि अस्पतालों की वित्तीय व्यवहार्यता सुनिश्चित हो सके तथा निजी क्षेत्र के अस्पतालों की व्यापक भागीदारी को प्रोत्साहन मिल सके।
- व्यापार मार्जिन युक्तिकरण (टीएमआर ) का प्रवर्तन एवं डीपीसीओ का विस्तार: आवश्यक औषधियों की राष्ट्रीय सूची तथा औषधि मूल्य नियंत्रण आदेश के दायरे का विस्तार करते हुए सभी वैकल्पिक शक्तियों), फॉर्मूलेशनों सहायक उपचारों जैसे वमनरोधी एवं संक्रमणरोधी औषधियों तथा फंगल संक्रमणरोधी औषधियों को इसमें शामिल किया जाए। कृत्रिम खुदरा मूल्य वृद्धि को समाप्त करने के लिए सभी कैंसर-रोधी औषधि अणुओं पर व्यापार मार्जिन युक्तिकरण को सख्ती से लागू किया जाए।
- नैदानिक जाँचों के लिए अधिकतम मूल्य सीमा एवं सार्वभौमिक पीएपी तक पहुंच: पीईटी-सीटी), एमआरआई तथा आनुवंशिक प्रोफाइलिंग सहित अधिक मात्रा में की जाने वाली नैदानिक जाँच प्रक्रियाओं के लिए राष्ट्रीय स्तर पर अधिकतम मूल्य सीमा निर्धारित की जाए तथा स्वास्थ्य सेवा संस्थानों के बीच साझा नैदानिक अवसंरचना को प्रोत्साहित किया जाए। इसके अतिरिक्त, ऐसे स्पष्ट दिशा-निर्देश जारी किए जाएं, जिनके माध्यम से सार्वजनिक स्वास्थ्य योजनाओं के अंतर्गत आने वाले मरीजों को निर्माता-वित्तपोषित रोगी सहायता कार्यक्रमों का लाभ बिना किसी अपात्रता के प्राप्त हो सके।
(पैरा 3.27.9)
137. समिति का मानना है कि कैंसर के बोझ को कम करने के लिए, अलग-थलग तृतीयक देखभाल (विशेषज्ञ चिकित्सा सेवा) के बजाय एक ऐसे एकीकृत ढांचे की ज़रूरत है जो सार्वजनिक-निजी साझेदारी (पीपीपी), सामुदायिक जांच और शुरुआती इलाज पर ज़ोर दे। पहले के पीपीपी मॉडल अक्सर गलत प्रोत्साहन के कारण विफल रहे हैं; हालाँकि, एक व्यवस्थित आमदनी-साझाकरण मॉडल – जिसमें सरकार ज़मीन और शुरुआती सहायता देती है, जबकि विशेष निजी या लाभेत्तर संस्थान कामकाज, मोबाइल डायग्नोस्टिक्स और तकनीकी प्रशिक्षण का प्रबंधन करते हैं – कम सुविधा वाले इलाकों में तृतीयक देखभाल के विस्तार के लिए एक बहुत ही टिकाऊ रास्ता दिखाता है। इसलिए, समिति सरकार से संयुक्त कार्रवाई के निम्नलिखित निर्देशों को लागू करने की सिफारिश करती है:
- मानकीकृत आमदनी–साझाकरण पीपीपी ढांचा: कैंसर के इलाज के क्षेत्र में सार्वजनिक–निजी साझेदारी (पीपीपी) के लिए एक राष्ट्रीय नीतिगत ढांचा तैयार करना। इसके तहत सरकार ज़मीन और बुनियादी ढांचा उपलब्ध कराएगी, जबकि निजी संस्थाएं अस्पताल के कामकाज का प्रबंधन करेंगी। इससे होने वाली कमाई का एक हिस्सा सार्वजनिक स्वास्थ्य बीमा को सब्सिडी देने और बुनियादी ढांचे के चल रहे विस्तार के लिए निधियन करने में लगाया जाना चाहिए।
- कैंसर जांच का पीएम–जेएवाई में एकीकरण: आयुष्मान भारत के निवारक स्वास्थ्य पैकेज में कैंसर की व्यापक जांच (मुंह, ग्रीवा और स्तन) को औपचारिक रूप से शामिल करना।
- ज़मीनी स्तर पर जांच और टीकाकरण के लिए सहयोग: समुदाय तक पहुँचने के लिए आशा और आंगनवाड़ी नेटवर्क का इस्तेमाल करने के मकसद से राज्य के स्वास्थ्य विभागों और कैंसर के इलाज के विशेषीकृत ऑन्कोलॉजी संस्थानों के बीच मिलकर काम करने की व्यवस्था को संस्थागत रूप देना। मोबाइल डायग्नोस्टिक यूनिट का इस्तेमाल करके प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र (पीएचसी) और सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र (सीएचसी) में नियमित डायग्नोस्टिक शिविर लगाना, सरकारी स्वास्थ्य सेवा कर्मचारियों के लिए संयुक्त क्षमता-निर्माण कार्यक्रम शुरू करना, और 9-26 साल की लड़कियों के लिए एचपीवी टीकाकरण का राष्ट्रीय अभियान चलाना।
(पैरा 3.27.10)
नैदानिक और विशेष सेवाओं के लिए सार्वजनिक-निजी साझेदारी (पीपीपी) और कॉर्पोरेट सामाजिक जिम्मेदारी (CSR) को संस्थागत बनाना
138. समिति ने नोट किया कि जेब से होने वाला ज़्यादा खर्च (ओओपीई) मुख्य रूप से नैदानिक जांच और विशेष इलाज पर होने वाले बहुत ज़्यादा खर्च की वजह से होता है। समिति का विचार है कि पंजाब द्वारा लागू किए गए कार्यनीतिक सार्वजनिक-निजी साझेदारी (पीपीपी) मॉडल – जो केंद्र सरकार स्वास्थ्य योजना (सीजीएचएस) की बहुत कम दरों पर अत्याधुनिक रेडियो-डायग्नोस्टिक (एमआरआई/सीटी) और लेबोरेटरी सेवाएँ देते हैं – और गोवा का नि:शुल्क डायलिसिस सेवाओं के लिए सहयोग, लागत कम करने के बहुत असरदार तरीके हैं। इसके अलावा, समिति दिल्ली नगर निगम (एमसीडी) के इस सुझाव को मानती है कि महँगे मेडिकल उपकरणों की शुरुआती लागत के लिए बाहरी निधियन का इस्तेमाल किया जा सकता है। इसलिए, समिति केंद्र सरकार से सिफ़ारिश करती है कि वह एक मानक पीपीपी ढांचा बनाए ताकि सभी राज्यों को तय दरों पर महँगी डायग्नोस्टिक और डायलिसिस सेवाओं को आउटसोर्स करने में मदद मिल सके। साथ ही, मंत्रालय को ऐसे दिशा-निर्देश बनाने चाहिए जिनसे कॉर्पोरेट सामाजिक दायित्व (सीएसआर) निधि को व्यवस्थित तरीके से सरकारी अस्पतालों के लिए महँगी चिकित्सा अवसंरचना खरीदने में लगाया जा सके।
(पैरा 3.32.2)
दूर-दराज़ के इलाकों में भौगोलिक बाधाओं को पार करना और टेलीमेडिसिन का विस्तार करना
139. समिति मणिपुर राज्य द्वारा बताई गई दूर-दराज़, ग्रामीण और पहाड़ी इलाकों में पहुँचने से जुड़ी गंभीर चुनौतियों को समझती है; इन इलाकों में बुनियादी सुविधाओं की कमी और विशेषज्ञ डॉक्टरों की भारी कमी का सबसे ज़्यादा असर कमज़ोर वर्गों पर पड़ता है। साथ ही, भले ही ई-संजीवनी जैसे टेलीमेडिसिन प्लेटफ़ॉर्म एक अच्छा समाधान देते हैं, लेकिन एमसीडी ने देखा है कि लगातार जन-जागरूकता के बिना इनका इस्तेमाल अक्सर कम हो जाता है। समिति का मानना है कि मुश्किल इलाकों में भौतिक बुनियादी ढांचे के विकास के साथ-साथ डिजिटल पहुँच को भी तेज़ी से बढ़ाना ज़रूरी है। इसलिए, समिति भौगोलिक रूप से मुश्किल ज़िलों में विशेषज्ञ हब बनाने के लिए एक खास अवसंरचना निधि बनाने की सलाह देती है। इसके अलावा, समिति सरकार को सलाह देती है कि वह टेलीमेडिसिन सेवाओं के प्रचार के लिए ज़ोरदार सूचना, शिक्षा और संचार (आईईसी) अभियान चलाए और मरीज़ों के यात्रा पर होने वाले अनावश्यक खर्च को कम करने के लिए ज़िला-स्तरीय स्पेशलिस्ट हब को प्राथमिक ग्रामीण क्लीनिकों से जोड़ने को अनिवार्य बनाए।
(पैरा 3.32.4)
140. समिति समुक्ति करती है कि मज़बूत प्राथमिक स्वास्थ्य सेवा ही बीमारियों की रोकथाम और शुरुआती इलाज की नींव है। आंध्र प्रदेश का सक्रिय कदम – जिसमें भारतीय सार्वजनिक स्वास्थ्य मानकों (आईपीएचएस) से कहीं बेहतर, हर 2,500–3,000 की आबादी के लिए ग्रामीण स्वास्थ्य क्लीनिक बनाए गए – और केरल का प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों को ज़्यादा समय तक खुलने वाले ‘फ़ैमिली हेल्थ सेंटर्स‘ में बदलना (जिन्हें स्थानीय स्व-शासन संस्थाएं चलाती हैं), ज़मीनी स्तर पर स्वास्थ्य सेवाएँ पहुँचाने के बेहतरीन उदाहरण हैं। समिति का मत है कि प्राथमिक देखभाल सुविधाओं का दायरा बढ़ाने से तृतीयक अस्पतालों (बड़े अस्पतालों) पर बोझ काफ़ी कम हो जाता है। इसलिए, समिति सलाह देती है कि जो राज्य अपने प्राथमिक देखभाल नेटवर्क का दायरा सफलतापूर्वक बढ़ाते हैं और स्थानीय स्व-शासन संस्थाओं को ज़मीनी स्तर पर स्वास्थ्य निगरानी के लिए खास निधि आवंटित करने का अधिकार देते हैं, उन्हें आर्थिक प्रोत्साहन दिया जाना चाहिए।
(पैरा 3.32.6)
141. समिति ने इस बात पर गहरी चिंता जताई है कि स्ट्रोक और मायोकार्डियल इन्फार्क्शन (एसटीईएमआई) जैसी जानलेवा आपात स्थिति में अक्सर प्रभावित परिवारों को भारी आर्थिक तंगी का सामना करना पड़ता है। समिति गोवा सरकार के एसटीईएमआई परियोजना और स्ट्रोक कार्यक्रम की सराहना करती है, जो ‘गोल्डन आवर‘ (इलाज के लिए सबसे अहम शुरुआती समय) के भीतर इलाज सुनिश्चित करने के लिए ‘हब-एंड-स्पोक‘ मॉडल का इस्तेमाल करते हैं और क्लॉट-बस्टिंग दवाएं (जैसे टेनेक्टेप्लेस) पूरी तरह मुफ्त देते हैं। इसी तरह, बच्चों के दिल और कैंसर के इलाज के लिए खास प्राइवेट संस्थानों के साथ समझौता ज्ञापन करने की पुडुचेरी की कार्यनीति सरकारी क्षेत्र की कमियों को प्रभावी ढंग से दूर करती है। समिति का मानना है कि पैसे की कमी के कारण किसी भी नागरिक को जान बचाने वाली गंभीर देखभाल से वंचित नहीं किया जाना चाहिए। इसलिए, समिति सभी सरकारी ज़िला अस्पतालों में महंगी, जान बचाने वाली आपातकालीन दवाओं (जैसे नई थ्रोम्बोलाइटिक्स) के लिए सब्सिडी देने हेतु एक राष्ट्रीय कोष (कॉर्पस) बनाने की सिफारिश करती है। इसके अलावा, सरकार को राज्यों को प्रोत्साहित करना चाहिए कि वे कैंसर और बच्चों की बीमारियों जैसी गंभीर समस्याओं के लिए मुफ्त या बहुत कम कीमत पर तृतीयक देखभाल (विशेष इलाज) उपलब्ध कराने हेतु खास निजी और लाभेत्तर संस्थानों के साथ कार्यनीतिक समझौता ज्ञापन करें।
(पैरा 3.32.8)
142. समिति एमसीडी द्वारा इंगित गंभीर प्रशासनिक और लॉजिस्टिकल बाधाओं को मानती है। इनमें खास तौर पर सही कौशल वाले पेशेवरों (जैसे रेडियोलॉजिस्ट, एनेस्थिसियोलॉजिस्ट) की कमी और ज़रूरी दवाओं व सर्जिकल सामान की खरीद में होने वाली अत्यधिक देरी शामिल है। समिति का मत है कि खरीद की सक्षम प्रणालियों की कमी और कौशल बढ़ाने के लिए अपर्याप्त बजट सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवा के बुनियादी ढांचे को बुरी तरह प्रभावित करते हैं। इसलिए, समिति सरकार से सिफारिश करती है कि वह जीवन रक्षक दवाओं और सर्जिकल सामान के लिए अनिवार्य और तेज़ी से काम करने वाले ‘रेट कॉन्ट्रैक्ट एग्रीमेंट्स‘ (आरसीए) लागू करके डिजिटल मार्केटप्लेस पर खरीद में होने वाली देरी को तुरंत दूर करे। इसके अलावा, समिति विशेष मेडिकल और पैरामेडिकल कर्मचारियों की भर्ती, कौशल बढ़ाने और नए कौशल सिखाने के लिए बजट आवंटन में खास तौर पर बढ़ोतरी करने की सिफारिश करती है।
(पैरा 3.32.10)
143. समिति समुक्ति करती है कि सार्वभौमिक स्वास्थ्य कवरेज (यूएचसी) हासिल करने के लिए प्रौद्योगिकी का इस्तेमाल बहुत ज़रूरी है। कुछ पहलें – जैसे फेफड़ों के कैंसर का जल्दी पता लगाने के लिए गोवा में छाती के डिजिटल एक्स-रे की एआई–आधारित जांच, केरल में डिजिटल पैथोलॉजी और रोबोटिक सर्जरी का इस्तेमाल, और असम में स्कीम का पूरा कवरेज सुनिश्चित करने के लिए प्रोएक्टिव डिजिटल स्क्रीनिंग और राष्ट्रीय पहचान सत्यापन के तरीके – सार्वजनिक स्वास्थ्य में आधुनिक प्रौद्योगिी की बदलाव लाने की क्षमता को दिखाती हैं। समिति का मानना है कि गैर-संचारी बीमारियों (एनसीडी) का जल्दी पता लगाने और स्कीम से किसी के छूटने को रोकने के लिए कृत्रिम बुद्धिमता और केंद्रीकृत डिजिटल स्वास्थ्य रिकॉर्ड बहुत ज़रूरी हैं। इसलिए, समिति सिफारिश करती है कि मंत्रालय सभी माध्यमिक और तृतीयक सार्वजनिक स्वास्थ्य केंद्रों में कैंसर और एनसीडी स्क्रीनिंग के लिए एआई–आधारित डायग्नोस्टिक टूल्स लगाने की एक केंद्रीकृत पहल शुरू करे। साथ ही, राज्यों को प्रोएक्टिव, घर-घर जाकर डिजिटल सत्यापन अभियान चलाने के लिए तकनीकी मदद दी जानी चाहिए ताकि राष्ट्रीय स्वास्थ्य सुरक्षा स्कीमों के तहत योग्य लाभार्थियों का 100% कवरेज और शामिल होना सुनिश्चित किया जा सके।
(पैरा 3.32.12)
144. समिति समुक्ति करती है कि सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवा संस्थान अक्सर बारहमासी बजटीय बाधाओं से जूझते हैं जो बुनियादी ढांचे के नियमित रखरखाव और उन्नयन में बाधा डालते हैं। समिति का विचार है कि असम राज्य द्वारा अपनाई गई नवीन कार्यनीति, जिसके तहत सार्वजनिक अस्पताल अपने स्वयं के बुनियादी ढांचे के विकास के लिए राष्ट्रीय स्वास्थ्य सुरक्षा योजनाओं (जैसे एबी-पीएमजेएवाई) के तहत प्रतिपूर्ति के दावों को बनाए रखते हैं और उनका उपयोग करते हैं, एक अत्यधिक व्यावहारिक और अनुकरणीय मॉडल है। यह तंत्र प्रभावी रूप से राज्य अनुदान पर संस्थागत निर्भरता को कम करता है और सार्वजनिक अस्पतालों को अपनी सेवाओं को लगातार उन्नत करने में सक्षम आत्मनिर्भर संस्थाओं में बदल देता है। इसलिए, समिति सिफारिश करती है कि स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय सभी राज्यों के सार्वजनिक अस्पतालों को बीमा दावों के माध्यम से उत्पन्न धन के एक बड़े हिस्से को सीधे स्थानीय अस्पताल के बुनियादी ढांचे, चिकित्सा उपकरण खरीद और रोगी कल्याण पहल में पुनर्निवेश करने में सक्षम और प्रोत्साहित करने के लिए मानक संचालन प्रक्रिया जारी करे।
(पैरा 3.32.14)
145. समिति केरल राज्य द्वारा शुरू की गई नई और अहम पहलों की सराहना करती है, जैसे कि एक कानूनी ‘वरिष्ठ नागरिक आयोग‘ बनाना, बिस्तर पर पड़े मरीज़ों की निगरानी के लिए एआई–आधारित प्रणाली लगाना, और स्थानीय सरकारों के लिए यह ज़रूरी करना कि वे अपनी नियोजित निधि का 5% हिस्सा खास तौर पर बुज़ुर्गों की देखभाल के लिए रखें। इसके अलावा, समिति दिल्ली नगर निगम (एमसीडी) के उस सुझाव को भी मानती है जिसमें स्वास्थ्य को ‘मौलिक अधिकार‘ का दर्जा देने पर विचार करने की बात कही गई है। समिति का मानना है कि जैसे-जैसे देश की आबादी की बनावट बदल रही है, स्वास्थ्य सेवा प्रणाली को बुज़ुर्ग होती आबादी की जटिल और खास ज़रूरतों को पूरा करने के लिए पहले से तैयार रहना चाहिए। इसलिए, समिति यह सुझाव देती है कि केंद्र सरकार खास तौर पर बुज़ुर्गों की देखभाल और गंभीर बीमारी में दी जाने वाली देखभाल (पैलिएटिव केयर) के लिए एक व्यापक राष्ट्रीय नीति बनाए। साथ ही, मंत्रालय को राज्यों को इसके लिए प्रोत्साहित करना चाहिए कि वे अपनी स्थानीय सरकारों के लिए यह ज़रूरी करें कि वे अपने बजट का एक निश्चित हिस्सा सिर्फ़ बुज़ुर्गों की देखभाल, घर पर दी जाने वाली पैलिएटिव केयर और सीनियर सिटिज़न के लिए मुफ़्त दवाइयों के लिए अलग रखें।
(पैरा 3.32.16)
‘स्टेप-डाउन‘ केयर प्रोटोकॉल के ज़रिए टर्शियरी बेड क्षमता को बेहतर बनाना
146. समिति टर्शियरी और सुपर-स्पेशियलिटी अस्पतालों पर पड़ने वाले भारी दबाव को समझती है। इन अस्पतालों में गंभीर देखभाल वाले कई बेड ऐसे मरीज़ों से भरे रहते हैं जिनकी हालत तो स्थिर हो गई है, लेकिन उन्हें लंबे समय तक कम-तीव्रता वाली रिकवरी देखभाल की ज़रूरत होती है। समिति का मानना है कि एमसीडी की प्रस्तावित कार्यनीति—जिसमें ऑपरेशन के बाद स्थिर हो चुके मरीज़ों को विशेष अस्पतालों से छोटे, बाहरी स्वास्थ्य केंद्रों में आसानी से स्थानांतरित करने के लिए औपचारिक सहयोग स्थापित किया जाए—नए और गंभीर मरीज़ों के लिए टर्शियरी बेड की उपलब्धता को बेहतर बनाने के लिए बहुत ज़रूरी है। इसलिए, समिति सरकार से सिफारिश करती है कि वह एक औपचारिक ‘स्टेप-डाउन केयर‘ रेफरल ढांचा स्थापित करे। ऐसे ढांचे में एकीकृत इलेक्ट्रॉनिक स्वास्थ्य रिकॉर्ड और एक सुदृढ़ एम्बुलेंस नेटवर्क की मदद से स्थिर मरीज़ों को बड़े टर्शियरी संस्थानों से वापस माध्यमिक या ज़िला अस्पतालों में आसानी से स्थानांतरित करने की सुविधा होनी चाहिए। इससे यह सुनिश्चित होगा कि अत्यधिक विशिष्ट स्वास्थ्य सेवा बुनियादी ढांचे का सही और मुख्य रूप से गंभीर व जटिल इलाज के लिए इस्तेमाल हो सके।
(पैरा 3.32.18)
147. समिति समुक्ति करती है कि भले ही प्रमुख स्वास्थ्य बीमा योजना ने कवरेज को काफी बढ़ाया है, लेकिन व्यावहारिक और वित्तीय चुनौतियां अभी भी बनी हुई हैं जो इनकी लंबी अवधि की प्रभावशीलता के लिए खतरा हैं। समिति ने एबी–पीएमजेएवाई के तहत प्रति परिवार ₹1,052 के केंद्रीय प्रीमियम की अपर्याप्तता के बारे में असम राज्य द्वारा व्यक्त की गई चिंताओं पर गंभीरता से ध्यान दिया है; इलाज की बढ़ती लागत और स्वास्थ्य लाभ पैकेज के विस्तार के बावजूद यह प्रीमियम स्थिर रहा है। साथ ही, समिति असम के मजबूत एंटी-फ्रॉड सिस्टम की सराहना करती है, जो सख्त क्लिनिकल और इंफ्रास्ट्रक्चर ऑडिट के लिए जिला चिकित्सा अधिकारी और तृतीय-पक्ष ऑडिटर का इस्तेमाल करता है। समिति का मानना है कि वित्तीय व्यवहार्यता और सख्त निगरानी सार्वभौमिक स्वास्थ्य कवरेज की सफलता के दो मुख्य स्तंभ हैं। इसलिए, समिति सिफारिश करती है कि केंद्र सरकार राष्ट्रीय स्वास्थ्य सुरक्षा योजना के तहत केंद्रीय प्रीमियम को मौजूदा मेडिकल महंगाई के हिसाब से बढ़ाने के लिए तुरंत एक व्यापक एक्चुअरियल समीक्षा करे। साथ ही, मंत्रालय को सभी राज्यों के लिए सख्त, मल्टी-लेवल क्लिनिकल और लाभार्थी ऑडिट शुरू करना अनिवार्य करना चाहिए ताकि गड़बड़ियों को खत्म किया जा सके और यह सुनिश्चित किया जा सके कि योजना का लाभ केवल सही लाभार्थियों तक ही पहुंचे।
(पैरा 3.32.20)
148. समिति का मानना है कि व्यापक स्वास्थ्य बीमा जेब से किए जाने वाले व्यय को कम करने के साथ ही सभी के लिए स्वास्थ्य सेवा को किफायती बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। आयुष्मान भारत–प्रधान मंत्री जन आरोग्य योजना (एबी–पीएमजेएवाई) ने 11 करोड़ से अधिक अस्पताल दाखिलों को कवर करने के साथ ही 38,038 सरकारी और गैर-सरकारी अस्पतालों को सूचीबद्ध करके स्वास्थ्य सेवा वित्तपोषण परिदृश्य को मौलिक रूप से बदल दिया है। समिति का मानना है कि एबी–पीएमजेएवाई के माध्यम से प्राप्त पर्याप्त लाभ, जिसके तहत ₹1.57 लाख करोड़ के उपचारों को अधिकृत किया गया है, को चिकित्सा मुद्रास्फीति और अनियंत्रित तकनीकी लागत वृद्धि से संरचनात्मक रूप से संरक्षित किया जाना चाहिए। इसलिए, समिति अनुशंसा करती है कि सरकार सभी सरकारी बीमा योजनाओं के तहत पैकेज दरों को समय–समय पर संशोधित करने के लिए एक वैधानिक तंत्र स्थापित करे, जिसमें क्षेत्रीय आर्थिक भिन्नताओं को ध्यान में रखा जाए ताकि देखभाल की गुणवत्ता से समझौता किए बिना गैर-सरकारी क्षेत्र के अस्पतालों की निरंतर और सक्रिय भागीदारी सुनिश्चित की जा सके। इसके अलावा, समिति का मानना है कि गैर-सरकारी क्षेत्र के अस्पतालों की दरों में अनुचित भिन्नताओं से स्वास्थ्य देखभाल में जेब से किए जाने वाले खर्चों में अप्रत्याशित बढ़ोतरी होती है, जिससे वित्तीय सुरक्षा कमजोर होती है। इसलिए, समिति सभी स्वास्थ्य सेवा प्रदाताओं के लिए पारदर्शी और मानकीकृत उपचार पैकेज अनिवार्य करने की सिफारिश करती है ताकि लागत का पूर्वानुमान सुनिश्चित किया जा सके, स्वास्थ्य संबंधी अप्रत्याशित खर्चों को कम किया जा सके और मरीजों का विश्वास कायम रखा जा सके।
(पैरा 4.1.3)
149. समिति का मानना है कि मध्यम आय वर्ग, जो अक्सर सार्वजनिक रूप से वित्त पोषित योजनाओं से वंचित रहता है, को चिकित्सा आपात स्थितियों के कारण अचानक गरीबी की स्थिति से बचाने के लिए सुदृढ़ और सुलभ सुरक्षा कवर की आवश्यकता है। इसलिए, समिति ऐसे मानकीकृत, कम लागत वाले स्वास्थ्य बीमा उत्पादों के त्वरित विस्तार की सिफारिश करती है जो आरोग्य संजीवनी के समान हों और जिनमें सरलीकृत पॉलिसी शर्तें और व्यापक जनसांख्यिकीय कवरेज हो। साथ ही, समिति का मानना है कि हाल ही में लागू किए गए आईआरडीएआई के नियामक सुधारों का कड़ाई से पालन, विशेष रूप से पॉलिसी खरीदने के लिए ऊपरी आयु सीमा को हटाना और पूर्व–मौजूदा बीमारियों के लिए प्रतीक्षा अवधि को घटाकर तीन वर्ष करना, रोगी समावेशन और ग्राहक संतुष्टि को बढ़ाने के लिए महत्वपूर्ण है। इसलिए, समिति त्वरित, पारदर्शी और नकद रहित दावा निपटान सुनिश्चित करने और सभी प्रदाताओं द्वारा इन आधुनिक बीमा जनादेशों का कड़ाई से पालन करने के लिए राष्ट्रीय स्वास्थ्य एक्सचेंज प्लेटफॉर्म के अधिकतम उपयोग की सिफारिश करती है।
(पैरा 4.1.4)
150. समिति 19,200 जन औषधि केंद्रों द्वारा की गई 45,000 करोड़ रुपये से अधिक और एएमआरआईटी फार्मेसियों द्वारा की गई 8,400 करोड़ रुपये की बचत को स्वीकार करती है। समिति का मानना है कि सस्ती जेनेरिक दवाएं और इंप्लांट समान स्वास्थ्य सेवा की आधारशिला हैं। अतः समिति शेष सभी ब्लॉक–स्तरीय सार्वजनिक स्वास्थ्य केंद्रों में जन औषधि केंद्र स्थापित करने और गैर-सरकारी तृतीयक अस्पतालों को एएमआरआईटी फार्मेसियों की मेजबानी करने के लिए प्रोत्साहित करने की सिफारिश करती है ताकि रियायती दरों पर इंप्लांट और शल्य चिकित्सा सामग्री अधिक से अधिक रोगियों तक पहुंच सके।
(पैरा 4.1.5)
151. समिति ने पाया है कि प्रधानमंत्री राष्ट्रीय डायलिसिस कार्यक्रम (पीएमएनडीपी) से मरीजों को पहले ही ₹10,102 करोड़ की बचत हो चुकी है। समिति का मानना है कि गुर्दे की अंतिम अवस्था से संबंधित बीमारी एक महत्वपूर्ण वित्तीय भार बनी हुई है। इसलिए, समिति जिला अस्पतालों से आगे उप–जिला स्तर तक मुफ्त या अत्यधिक रियायती हीमोडायलिसिस केंद्रों का विस्तार करने के लिए सार्वजनिक–निजी भागीदारी की संभावनाओं का पता लगाने की सिफारिश करती है।
(पैरा 4.1.6)
152. समिति का मानना है कि 19,200 जन औषधि केंद्रों और 1,816 से अधिक पीएमएनडीपी डायलिसिस केंद्रों के विशाल विकेंद्रीकृत बुनियादी ढांचे को बनाए रखने और विस्तारित करने के लिए, राज्य सरकारों को केंद्र सरकार के साथ–साथ अपने वित्तीय दायित्वों को भी आनुपातिक रूप से बढ़ाना होगा। अतः समिति अनुशंसा करती है कि केंद्र सरकार राज्यों को सक्रिय रूप से प्रोत्साहित करे कि वे अपने–अपने स्वास्थ्य आवंटन को अपने कुल राज्य व्यय के न्यूनतम 8% तक बढ़ाएं।
(पैरा 4.1.7)
153. समिति का यह मत है कि नागरिकों को व्यापक स्तर पर स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध कराने के लिए समग्र स्वास्थ्य को देश की प्राथमिक वित्तीय सुरक्षा योजनाओं में सहजता से एकीकृत किया जाना चाहिए। अतः समिति, लाभार्थियों को विनियमित, पारंपरिक चिकित्सा विकल्प प्रदान करने और जेब से कोई खर्च न करने की व्यवस्था बनाए रखने के लिए आयुष उपचार पैकेजों को औपचारिक रूप से एबी–पीएमजेएवाई के दायरे में शामिल करने की अनुशंसा करती है।
(पैरा 4.1.8)
154. समिति इस बात की सराहना करती है कि 1.86 लाख से अधिक आयुष्मान आरोग्य मंदिरों (एएएम) का संचालन और 41 करोड़ से अधिक नागरिकों की गैर–संक्रामक रोगों के लिए सक्रिय स्क्रीनिंग जमीनी स्तर पर निवारक और संवर्धक स्वास्थ्य सेवा की दिशा में एक महत्वपूर्ण और आवश्यक बदलाव है। इसके अलावा, समिति का मानना है कि प्रधान मंत्री आयुष्मान भारत स्वास्थ्य अवसंरचना मिशन (पीएम–एबीएचआईएम) के तहत एकीकृत सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रयोगशालाओं और गहन चिकित्सा अस्पताल ब्लॉकों की स्थापना के लिए लक्षित निवेश, जिन्हें त्वरित गति से लागू किया जा रहा है, विकेंद्रीकृत महामारी तैयारियों को सुदृढ़ करने के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। हालांकि, समिति पीएम– एबीएचआईएम के अंतर्गत सभी लंबित अवसंरचना परियोजनाओं के समय पर पूरा करना सुनिश्चित करने के लिए सख्त प्रशासनिक निगरानी की सिफारिश करती है। चूंकि कुशल जनशक्ति के बिना, अवसंरचना और उपकरण बेकार पड़े रहते हैं और सरकारी खजाने पर भार बन जाते हैं, इसलिए समिति एएएम में अग्रिम पंक्ति के स्वास्थ्य कर्मियों के निरंतर कौशल उन्नयन को अनिवार्य करने की भी सिफारिश करती है, जिससे गांव से लेकर जिला स्तर तक मानकीकृत, उच्च गुणवत्ता वाली प्राथमिक देखभाल सुनिश्चित की जा सकें।
(पैरा 4.1.10)
155. समिति ने नोट किया है कि डिजिटल स्वास्थ्य पहलों की असाधारण पहुंच, जिसका प्रमाण 93 करोड़ से अधिक आभा खातों का सृजन, 104 करोड़ डिजिटल स्वास्थ्य रिकॉर्ड और 45 करोड़ ई–संजीवनी टेली–परामर्शों का संचालन है, ने विशेषज्ञ स्वास्थ्य सेवा सुलभता में भौगोलिक बाधाओं को मौलिक रूप से समाप्त कर दिया है। समिति का मानना है कि देखभाल की निरंतरता में सुधार की इस गति को बनाए रखने के लिए संपूर्ण स्वास्थ्य सेवा क्षेत्र में व्यापक भागीदारी आवश्यक है। इसलिए, समिति अनुशंसा करती है कि सरकार को सभी गैर-सरकारी स्वास्थ्य सेवा प्रदाताओं को आयुष्मान भारत डिजिटल मिशन (एबीडीएम) पारितंत्र में एकीकृत करने के लिए वैधानिक दिशा-निर्देश तैयार करने के साथ ही साथ क्षेत्रीय टेली–‘मानस’ और ई–संजीवनी केंद्रों का विस्तार करना चाहिए ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि सबसे दूरस्थ क्षेत्रों में भी विशेषज्ञ मनोरोग और चिकित्सा परामर्श निर्बाध रूप से उपलब्ध हों। समिति का यह भी मानना है कि टेली–परामर्श इंटरफ़ेस उपयोगकर्ता के अनुकूल और उपयोग में आसान होना चाहिए और सुचारू रूप से कार्य करना चाहिए। डिजिटल पहलों की अधिकतम क्षमता का लाभ उठाने के लिए, सरकार को ग्रामीण और दूरदराज के क्षेत्रों में मिशन मोड पर इंटरनेट नेटवर्क को मजबूत करने के साथ ही आशा कार्यकर्ताओं और स्वास्थ्य सेवा स्वयंसेवकों को उचित डिजिटल प्रशिक्षण और आबादी को बुनियादी डिजिटल साक्षरता प्रदान करनी चाहिए।
(पैरा 4.1.11)
156. समिति का मानना है कि पिछले दशक में चिकित्सा शिक्षा अवसंरचना में अभूतपूर्व विस्तार, जिसमें मेडिकल कॉलेजों की संख्या बढ़ाकर 820 से अधिक की गई है और स्नातक एवं स्नातकोत्तर चिकित्सा सीटों में लगभग तीन गुना वृद्धि की गई है, मानव संसाधनों की गंभीर और ऐतिहासिक कमी को दूर करेगा। हालांकि, समिति का यह मत है कि शैक्षिक क्षमता सृजन के साथ–साथ तैनाती कार्यनीति भी आवश्यक है ताकि प्रधान मंत्री स्वास्थ्य सुरक्षा योजना (पीएमएसएसवाई) के तहत परिकल्पित तृतीयक स्वास्थ्य सेवा में क्षेत्रीय असमानताओं को प्रभावी ढंग से कम किया जा सके। अतः समिति एक लक्षित राष्ट्रीय तैनाती कार्यनीति के तत्काल निर्माण की अनुशंसा करती है जो मजबूत ग्रामीण सेवा प्रोत्साहनों, नव स्थापित नर्सिंग कॉलेजों के लिए उन्नत अवसंरचनात्मक सहायता और अधिमान्य व्यावसायिक विकास मार्गों को एकीकृत करे ताकि कम सुविधा प्राप्त जिलों में कुशल चिकित्सा, नर्सिंग और आयुष चिकित्सकों का समान वितरण सुनिश्चित किया जा सके।
(पैरा 4.1.12)
157. समिति का मत है कि चिकित्सा अवसंरचना में अभूतपूर्व मात्रात्मक विस्तार, जिसका प्रमाण मेडिकल कॉलेजों की संख्या 387 से बढ़कर 820 से अधिक होना, एम्स संस्थानों की संख्या बढ़कर 23 होना और 75,000 मेडिकल सीटों और 157 नर्सिंग कॉलेजों की योजनाबद्ध वृद्धि है, नैदानिक उत्कृष्टता के उच्चतम मानकों के अनुरूप होना चाहिए। समिति का मानना है कि कठोर और निरंतर मूल्यांकन के बिना केवल भौतिक अवसंरचना और सीट क्षमता में वृद्धि करने से राष्ट्रीय स्वास्थ्य सेवा ढांचे की परिचालन दक्षता कम होने का खतरा है। इसलिए, समिति अनुशंसा करती है कि केंद्रीय नियामक निकाय परिषदें सभी नवस्थापित या उन्नत चिकित्सा और नर्सिंग संस्थानों में संकाय की पर्याप्तता, नैदानिक अनुभव और बुनियादी ढांचे की व्यवहार्यता का मूल्यांकन करने के लिए एक अनिवार्य, स्वतंत्र वार्षिक लेखापरीक्षा ढांचा स्थापित करें ताकि शिक्षा और स्वास्थ्य सेवा परिदान मानकों से कोई समझौता न हो।
(पैरा 4.1.13)
158. समिति का मानना है कि एबी–पीएमजेएवाई के तहत 38,038 सरकारी और गैर-सरकारी अस्पतालों का सूचीबद्ध किया जाना द्वितीयक और तृतीयक स्वास्थ्य देखभाल प्रदान करने में एक महत्वपूर्ण कदम है, लेकिन इस विशाल नेटवर्क में एकसमान गुणवत्ता बनाए रखने के लिए गहन नियामकीय जांच की आवश्यकता है। समिति का मानना है कि समय–समय पर विधायी और वित्तीय निगरानी न केवल धन की बर्बादी को रोकने के लिए बल्कि यह सुनिश्चित करने के लिए भी आवश्यक है कि गैर-सरकारी क्षेत्र लाभ–प्रेरित नैदानिक अनावश्यकताओं के बजाय साक्ष्य–आधारित नैदानिक दिशानिर्देशों का सख्ती से पालन करे। इसलिए, समिति एक केंद्रीकृत, डेटा–आधारित नैदानिक लेखापरीक्षा प्राधिकरण के गठन की सिफारिश करती है, जिसे केंद्रीय स्वास्थ्य बीमा योजनाओं के तहत सूचीबद्ध सभी सार्वजनिक और गैर-सरकारी सुविधाओं के उपचार प्रोटोकॉल, रोगी परिणामों और वित्तीय दावों की समय–समय पर समीक्षा करने का कार्य सौंपा जाएगा।
(पैरा 4.1.14)
159. समिति ने पाया है कि निरंतर उपचार, आघात प्रतिक्रिया और मानसिक स्वास्थ्य देखभाल के लिए तृतीयक अस्पतालों पर अत्यधिक निर्भरता ग्रामीण और जिला स्तरीय आबादी के लिए पहुंच और वहनीयता को प्रभावित करती है। समिति का मानना है कि विशेष देखभाल के विकेंद्रीकरण के लिए हालिया नीतिगत आदेश, विशेष रूप से वित्त वर्ष 2025-26 के लिए 297 डे केयर कैंसर केंद्रों (डीसीसीसी) की स्वीकृति और जिला अस्पतालों में 24×7 आपातकालीन और आघात देखभाल केंद्रों की क्षमता में 50% विस्तार, एक महत्वपूर्ण संरचनात्मक सुधार है। इसके अलावा, उत्तर भारत में प्रस्तावित एनआईएमएचएएनएस-2 की स्थापना और रांची और तेजपुर में राष्ट्रीय मानसिक स्वास्थ्य संस्थानों को क्षेत्रीय शीर्ष संस्थानों में उन्नत करके उन्नत मनोरोग अवसंरचना का विस्तार मानसिक स्वास्थ्य देखभाल में एक महत्वपूर्ण भौगोलिक कमी को दूर करेगा। इसलिए, समिति अनुशंसा करती है कि सरकार प्रशासनिक देरी के बिना निर्बाध देखभाल की निरंतरता सुनिश्चित करने के लिए अनुमोदित डीसीसीसी और आघात देखभाल विस्तार के संचालन के लिए एक सख्त, केंद्रीय रूप से निगरानी वाली समय–सीमा निर्धारित करे। इसके अलावा, समिति एनआईएमएचएएनएस-2 और क्षेत्रीय शीर्ष संस्थानों के लिए भूमि अधिग्रहण और आधारभूत तैनाती में तेजी लाने के लिए सक्रिय अंतर–मंत्रालयी समन्वय सहित यह भी सुनिश्चित करने की सिफारिश करती है कि इन केंद्रों को जिला–स्तरीय सामुदायिक स्क्रीनिंग और डिजिटल परामर्श नेटवर्क के साथ व्यवस्थित रूप से एकीकृत किया जाए ताकि प्रारंभिक हस्तक्षेप को अधिकतम किया जा सके।
(पैरा 4.1.16)
160. समिति का मत है कि आनुपातिक रूप से पर्याप्त और उच्च कुशल तकनीकी कार्यबल के बिना विशेष देखभाल भौतिक अवसंरचना इष्टतम रूप से कार्य नहीं कर सकती। समिति का मानना है कि केंद्रीय बजट में एक लाख संबद्ध स्वास्थ्य कर्मियों के पद सृजित करने की घोषणा से लाभ होगा।पांच वर्षीय राष्ट्रीय रोडमैप के माध्यम से पेशेवरों को प्रशिक्षित करना निदान, शल्य चिकित्सा संबंधी देखभाल और उपचारोत्तर पुनर्वास में मौजूद प्रणालीगत कमियों को दूर करने के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। जनसांख्यिकीय और महामारी विज्ञान संबंधी परिवर्तनों, विकसित होते रोग पैटर्न और 2047 तक विकसित भारत के व्यापक दृष्टिकोण को प्रभावी ढंग से समझने के लिए इन विषयों का दायरा प्रारंभिक दस प्राथमिकता क्षेत्रों से आगे बढ़ना चाहिए। इसलिए, समिति पांच वर्षीय राष्ट्रीय रोडमैप को तत्काल लागू करने की सिफारिश करती है, जिसमें एक विस्तारित पाठ्यक्रम ढांचा शामिल करने के साथ ही औपचारिक रूप से उन्नत विषयों जिनमें गहन चिकित्सा, श्वसन एवं हृदय रोग देखभाल, आणविक निदान, परमाणु चिकित्सा, स्वास्थ्य सूचना विज्ञान, वृद्धावस्था देखभाल, पुनर्वास एवं प्रशामक देखभाल, पोषण विज्ञान और सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रयोगशाला विज्ञान शामिल हैं, को समाहित किया जाए। इसके अतिरिक्त, समिति यह भी सिफारिश करती है कि इन विस्तारित विषयों को भारतीय सार्वजनिक स्वास्थ्य मानकों (आईपीएचएस) के अनुरूप सुनिश्चित करने के लिए मजबूत मान्यता प्रोटोकॉल स्थापित किए जाएं, जिससे सार्वजनिक और गैर-सरकारी दोनों स्वास्थ्य सुविधाओं की परिचालन कार्यक्षमता और गुणवत्ता में प्रत्यक्ष रूप से सुधार हो सके।
(पैरा 4.1.17)
161. समिति का मानना है कि सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवा अवसंरचना अभूतपूर्व गति से विस्तारित हुई है, फिर भी आबादी का एक बड़ा हिस्सा उन्नत निदान और तृतीयक देखभाल के लिए गैर-सरकारी क्षेत्र पर निर्भर है। समिति का मानना है कि यदि गैर-सरकारी स्वास्थ्य सेवा की लागतें सरकारी बीमा प्रणालियों से भिन्न और काफी हद तक अनियमित बनी रहती हैं, तो वास्तविक वहनीयता प्राप्त नहीं की जा सकती। इसलिए, समिति नैदानिक प्रतिष्ठान (पंजीकरण और विनियमन) अधिनियम को शीघ्रता से राष्ट्रव्यापी स्तर पर अपनाने और कड़ाई से लागू करने की सिफारिश करती है। इसके अलावा, समिति गैर-सरकारी चिकित्सा सुविधाओं में अनैतिक प्रथाओं, अनावश्यक नैदानिक परीक्षणों और मनमाने मूल्य निर्धारण को रोकने के लिए मानक उपचार दिशा-निर्देशों (एसटीजी) संबंधी एक बाध्यकारी राष्ट्रीय चार्टर के निर्माण की सिफारिश करती है, जिससे नागरिकों को चिकित्सा के कारण होने वाली आर्थिक कठिनाईयों और गरीबी से बचाया जा सके।
(पैरा 4.1.18)
162. समिति का मानना है कि फ्लैगशिप पहलों द्वारा निर्धारित महत्वाकांक्षी लक्ष्य, जिनमें डे केयर कैंसर केंद्रों की स्थापना, पीएम–एबीएचआईएम अवसंरचना परियोजनाएं और 75,000 चिकित्सा सीटों का सृजन शामिल है, निरंतर और इष्टतम रूप से उपयोग किए गए पूंजीगत व्यय पर अत्यधिक निर्भर हैं। समिति का मानना है कि यदि राज्य स्तर पर प्रणालीगत प्रशासनिक बाधाओं के कारण बजटीय अनुमानों का कम उपयोग होता है और परिणामस्वरूप परियोजनाओं के क्रियान्वयन में देरी होती है तो केवल केंद्रीय निधियों का आवंटन ही पर्याप्त नहीं है। अतः समिति राज्य स्वास्थ्य विभागों द्वारा तिमाही आधार पर निधि उपयोग का कड़ाई से ऑडिट करने के लिए एक समर्पित, बहुस्तरीय वित्तीय निगरानी तंत्र की स्थापना की अनुशंसा करती है। इस तंत्र को केंद्रीय स्वास्थ्य अनुदान की आगामी किश्तों को पिछले आवंटनों की सत्यापित, जमीनी स्तर पर अवसंरचनात्मक प्रगति से सख्ती से जोड़ना होगा।
(पैरा 4.1.19)
163. समिति ने इस बात पर संतुष्टि व्यक्त की है कि जेब से किया जाने वाला व्यय (ओओपीई) घटकर कुल स्वास्थ्य व्यय (टीएचई) का 43.40% रह गया है, जो सरकारी स्वास्थ्य व्यय (जीएचई) में हुई वृद्धि (43.70%) से काफी हद तक संबंधित है। समिति का मानना है कि आवश्यक निदान सुविधाओं के निरंतर विस्तार और जन औषधि केंद्रों की संख्या में 19,200 तक अत्यधिक वृद्धि से आम नागरिक के लिए स्वास्थ्य सेवाओं की वहनीयता में मौलिक परिवर्तन आया है। हालांकि, स्वास्थ्य विभागों में निधि के इष्टतम उपयोग की महत्वपूर्ण आवश्यकता को स्वीकार करते हुए, समिति का मानना है कि मातृ मृत्यु दर और शिशु मृत्यु दर में उल्लेखनीय कमी सहित इन सकारात्मक परिणामों को बनाए रखने के लिए भविष्य में इन वित्तीय लाभों को मुद्रास्फीति के दबाव से सुरक्षित रखना आवश्यक है। इसलिए, समिति प्रति व्यक्ति सरकारी स्वास्थ्य व्यय (वर्तमान में ₹2,786) को चिकित्सा मुद्रास्फीति और विकसित हो रही जनसांख्यिकीय स्वास्थ्य आवश्यकताओं से व्यवस्थित रूप से जोड़ने के लिए एक वैधानिक, बहु–वर्षीय वित्तीय परिव्यय रोडमैप तैयार करने की सिफारिश करती है। इसके अतिरिक्त, समिति विस्तारित औषधि खरीद नेटवर्क के लिए कठोर वित्तीय निगरानी और उपयोग लेखापरीक्षाओं की व्यवस्था करने की सिफारिश करती है।
(पैरा 4.1.21)
164. समिति देश के चिकित्सा शिक्षा ढांचे में अभूतपूर्व और तेज वृद्धि को स्वीकार करती है, जो मेडिकल कॉलेजों की संख्या में 387 से 818 तक की तीव्र वृद्धि और स्नातक (128,875) एवं स्नातकोत्तर (82,059) मेडिकल सीटों की संख्या में लगभग तीन गुना वृद्धि से स्पष्ट होती है। समिति का मानना है कि क्षमता निर्माण, 23 एम्स संस्थानों के संचालन के साथ, ऐतिहासिक कमियों को दूर करने के लिए अपरिहार्य है, जैसा कि पंजीकृत एलोपैथिक डॉक्टरों की संख्या में 13.88 लाख और नर्सों की संख्या में 42.94 लाख की वृद्धि से स्पष्ट है। हालांकि, समिति का मानना है कि इस तरह की तीव्र मात्रात्मक वृद्धि उच्च परिचालन दक्षता, पर्याप्त संकाय तैनाती और सख्त सांविधिक अनुपालन के अनुरूप होनी चाहिए। इसलिए, समिति अनुशंसा करती है कि नामित राष्ट्रीय चिकित्सा और नर्सिंग नियामक आयोग सभी नव–अनुमोदित और उन्नत मेडिकल कॉलेजों का अनिवार्य, द्विवार्षिक सांविधिक ऑडिट करें ताकि बुनियादी ढांचे के अनुपालन और संकाय की पर्याप्तता का सूक्ष्म मूल्यांकन किया जा सके। इसके अतिरिक्त, समिति इस संवर्धित कार्यबल को ग्रामीण और कम सेवा प्राप्त तृतीय–स्तरीय जिलों में रणनीतिक रूप से एकीकृत करने के लिए एक विशेष तैनाती नीति बनाने की सिफारिश करती है ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि 8.40 लाख की संवर्धित बिस्तर क्षमता की परिणति प्रत्यक्ष तौर पर सुलभ, उच्च गुणवत्ता वाली रोगी देखभाल में हो सके।
(पैरा 4.1.22)
165. समिति का मत है कि जहां एबी–पीएमजेएवाई जैसी प्रमुख योजनाएं आर्थिक रूप से कमजोर आबादी के निचले 50% हिस्से को व्यापक सुरक्षा प्रदान करती हैं, वहीं एक बड़ा वर्ग, जिसमें लगभग 30% आबादी शामिल है, जिसे प्राय: “मध्यम वर्ग” कहा जाता है, संरचित वित्तीय स्वास्थ्य सुरक्षा से वंचित रहता है। समिति का मानना है कि इस प्रणालीगत अंतर को दूर करना वास्तविक सार्वभौमिक स्वास्थ्य कवरेज प्राप्त करने के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। इसलिए, समिति इस जनसांख्यिकी के लिए विशेष रूप से तैयार किए गए कम लागत वाले, व्यापक स्वैच्छिक स्वास्थ्य बीमा उत्पादों के तत्काल डिजाइन और सहयोगात्मक कार्यान्वयन की सिफारिश करती है। इसके अलावा, समिति सरकार को उपभोक्ता जागरूकता बढ़ाने, इन नए बीमा उत्पादों के नियामक मानकीकरण को लागू करने और सार्वजनिक और निजी दोनों बीमाकर्ताओं में परिचालन दक्षता को सुगम बनाने के लिए मजबूत डिजिटल एक्सचेंज प्लेटफॉर्म का उपयोग करने की सिफारिश करती है।
(पैरा 4.1.23)
166. समिति इस तथ्य पर गौर करती है कि देश भर में अस्पताल में भर्ती होने वाले मामलों का एक बड़ा हिस्सा निजी क्षेत्र द्वारा प्रबंधित किया जाता है, फिर भी इसका भौगोलिक वितरण महानगरों की ओर असमान रूप से झुका हुआ है। समिति का मानना है कि अत्यधिक विकेंद्रीकृत नियामक मानक, जहां अनुपालन संबंधी अधिकांश आदेश राज्यों के अनुसार बहुत भिन्न होते हैं, महत्वपूर्ण प्रशासनिक बाधाएं उत्पन्न करते हैं जो द्वितीय और तृतीय श्रेणी के शहरों में निजी स्वास्थ्य सेवा निवेश को हतोत्साहित करते हैं। इसलिए, समिति अस्पताल पंजीकरण, रक्त बैंक लाइसेंसिंग और चिकित्सा उपकरण निर्माण के लिए “सिंगल विंडो क्लीयरेंस” तंत्र स्थापित करने हेतु मौजूदा नियामक ढांचे में एक व्यवस्थित सुधार की सिफारिश करती है। समिति का मानना है कि राष्ट्रीय स्तर पर नैदानिक प्रतिष्ठान विनियमों का मानकीकरण व्यापार करने में सुगमता में सुधार के लिए महत्वपूर्ण है, जिससे वंचित क्षेत्रों में किफायती निजी स्वास्थ्य सेवा के विस्तार को प्रोत्साहन मिलेगा।
(पैरा 4.1.24)
नियामक निकायों की भूमिका
167. समिति का मत है कि राष्ट्रीय स्वास्थ्य प्राधिकरण (एनएचए) ने विश्व की सबसे बड़ी सार्वजनिक स्वास्थ्य बीमा योजना के माध्यम से स्वास्थ्य सेवा में समानता लाने में सफलता प्राप्त की है, जिससे जेब से होने वाले खर्च (ओओपीई) में अनुमानित ₹1.91 लाख करोड़ की बचत हुई है और 2026 के मध्य तक अस्पताल में भर्ती होने की 12.59 करोड़ अनुमति दी गई हैं। इस गति को बनाए रखने और लगातार बनी हुई भौगोलिक असमानताओं को दूर करने के लिए, अस्पताल नेटवर्क विस्तार के प्रति अधिक आक्रामक दृष्टिकोण अपनाना आवश्यक है। समिति का मानना है कि यद्यपि 37,413 अस्पतालों (जिनमें 17,265 निजी संस्थान शामिल हैं) को सूचीबद्ध करने से तृतीयक स्वास्थ्य सेवा के उपयोग में काफी सुधार हुआ है, फिर भी कम सेवा वाले और ग्रामीण जिलों में पहुंच में महत्वपूर्ण अंतर बना हुआ है। इसलिए, समिति सिफारिश करती है कि राष्ट्रीय स्वास्थ्य प्राधिकरण (एनएचए) राज्य स्वास्थ्य अधिकारियों के साथ सक्रिय रूप से सहयोग करे ताकि आकांक्षी और दूरस्थ जिलों में निजी स्वास्थ्य सुविधाओं को सूचीबद्ध करने को प्राथमिकता दी जा सके। इसके अलावा, समिति का यह भी मानना है कि विभिन्न केंद्रीय मंत्रालयों और सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों (पीएसयू) द्वारा प्रबंधित कम उपयोग वाली स्वास्थ्य सेवा अवसंरचना क्षमता बढ़ाने का एक तत्काल अवसर प्रस्तुत करती है। इसलिए, समिति यह भी सिफारिश करती है कि राष्ट्रीय स्वास्थ्य प्राधिकरण (एनएचए) सभी पात्र पीएसयू और संघीय मंत्रालय के अस्पतालों को एबी–पीएमजेएवाई नेटवर्क में सुचारू रूप से सूचीबद्ध करने के लिए एक त्वरित अनुपालन ढांचा स्थापित करे।
(पैरा 4.2.19)
168. समिति 70 वर्ष और उससे अधिक आयु के वरिष्ठ नागरिकों के लिए 1.27 करोड़ आयुष्मान वय वंदना कार्डों के त्वरित वितरण को भी स्वीकार करती है, और मानती है कि राष्ट्रीय स्वास्थ्य प्राधिकरण (एनएचए) को व्यापक वृद्धावस्था और उपशामक देखभाल नयाचार को शामिल करने के लिए विशेष स्वास्थ्य लाभ पैकेजों (एचबीपी) का सक्रिय रूप से विस्तार करना चाहिए, जिससे यह सुनिश्चित हो सके कि 60 वर्ष से अधिक आयु के बुजुर्ग वर्ग की विशिष्ट महामारी संबंधी आवश्यकताओं को बिना किसी अतिरिक्त खर्च के पूरी तरह से पूरा किया जा सके।
(पैरा 4.2.20)
169. समिति इस बात की सराहना करती है कि आयुष्मान भारत डिजिटल मिशन (एबीडीएम) की स्थापना ने आधुनिक डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना की मजबूत नींव रखी है, जैसा कि जुलाई 2026 तक 93.98 करोड़ आभा खातों के निर्माण और 105.27 करोड़ स्वास्थ्य अभिलेखों को जोड़ने से स्पष्ट होता है। हालांकि, एक अंतरसंचालनीय स्वास्थ्य पारिस्थितिकी तंत्र की वास्तविक क्षमता का एहसास केवल सार्वजनिक और निजी दोनों क्षेत्रों में व्यापक रूप से अपनाने के माध्यम से ही हो सकता है। समिति का मानना है कि राष्ट्रीय स्वास्थ्य प्राधिकरण (एनएचए) द्वारा विकसित कम लागत वाले डिजिटल उपकरण, जैसे कि…ई–सुश्रुत@क्लिनिक एम्स द्वारा प्रमाणित क्लिनिकल डिसीजन सपोर्ट सिस्टम (सीडीएसएस) छोटे क्लीनिकों और प्राथमिक स्वास्थ्य सुविधाओं को डिजिटल बनाने के लिए महत्वपूर्ण साधन हैं, जिससे चिकित्सकों पर प्रशासनिक बोझ नहीं पड़ता। इसलिए, समिति राष्ट्रीय स्वास्थ्य प्राधिकरण (एनएचए) से सभी निजी निदान केंद्रों और अस्पतालों को राष्ट्रीय स्वास्थ्य दावा विनिमय (एनएचसीएक्स) और एकीकृत स्वास्थ्य इंटरफेस (यूएचआई) गेटवे में चरणबद्ध तरीके से एकीकृत करने की सिफारिश करती है। समिति को विश्वास है कि इस तरह की मंजूरी से डिजिटल स्वास्थ्य दावों का मानकीकरण और बढ़ेगा, नकद भुगतान में तेजी आएगी और परामर्श बुक करने या जेनेरिक दवाएं खोजने वाले रोगियों के लिए सूचना विषमता कम होगी।
(पैरा 4.2.21)
170. इसके अलावा, समिति का यह मत है कि संशोधित आरोग्य सेतु 2.0 ऐप को दीर्घकालिक स्वास्थ्य रिकॉर्ड के लिए केंद्रीय, नागरिक–केंद्रित नोड के रूप में उपयोग किया जाना चाहिए। इसलिए, समिति गहन स्थानीय जागरूकता अभियान चलाने की सिफारिश करती है ताकि नागरिक सहमति–आधारित डेटा साझाकरण का सक्रिय रूप से उपयोग कर सकें, जिससे खोई हुई भौतिक निदान रिपोर्टों से जुड़े बार–बार होने वाले खर्चों और लॉजिस्टिकल चुनौतियों से बचा जा सके।
(पैरा 4.2.22)
171. समिति समझती है कि प्राथमिक स्वास्थ्य देखभाल इकाइयाँ राष्ट्रीय स्वास्थ्य देखभाल ढांचे की महत्वपूर्ण रक्षक हैं, और इनका बेहतर प्रदर्शन तृतीयक स्वास्थ्य सुविधाओं में भीड़भाड़ को सीधे कम करता है। यद्यपि 1.86 लाख से अधिक आयुष्मान आरोग्य मंदिरों (एएएम) की स्थापना से 540 करोड़ रोगियों का प्रभावशाली दौरा दर्ज किया गया है, फिर भी सभी क्षेत्रों में देखभाल की गुणवत्ता को मानकीकृत करना एक अधूरा लक्ष्य बना हुआ है। समिति का मानना है कि प्राथमिक देखभाल को बुनियादी परामर्शों से आगे बढ़कर 12 व्यापक प्राथमिक स्वास्थ्य देखभाल (सीपीएचसी) सेवा पैकेजों की पूरी श्रृंखला प्रदान करनी चाहिए, जिसमें मानसिक स्वास्थ्य, नेत्र देखभाल और मौखिक स्वच्छता जैसे कम सेवा प्राप्त क्षेत्रों पर विशेष ध्यान दिया जाना चाहिए। इसलिए, समिति सिफारिश करती है कि सरकार “आईपीएचएस–अनुरूप कार्यात्मक एएएम” के लिए कठोर, एकसमान मानदंड स्थापित करे, जिसमें केंद्रीय निधि वितरण को मानव संसाधन, आवश्यक दवाओं और कार्यात्मक निदान उपकरणों की सत्यापित उपलब्धता से स्पष्ट रूप से जोड़ा जाए।
(पैरा 4.2.23)
172. निर्बाध देखभाल सुनिश्चित करने के लिए, समिति का मानना है कि स्थानीय स्क्रीनिंग डेटा को उन्नत उपचार प्लेटफार्मों से संरचनात्मक रूप से जोड़ा जाना चाहिए। इसलिए, समिति सिफारिश करती है कि राष्ट्रीय स्वास्थ्य प्राधिकरण (एनएचए) अग्रिम पंक्ति के कार्यकर्ताओं द्वारा उपयोग की जाने वाली सामुदायिक–आधारित मूल्यांकन चेकलिस्ट (सीबीएसी) को पूरी तरह से डिजिटाइज़ करे और इसे आभा आईडी और राष्ट्रीय गैर–संचारी रोग (एनसीडभ्) पोर्टल के साथ सीधे एकीकृत करे, ताकि ग्राम उप–केंद्रों से सूचीबद्ध द्वितीयक और तृतीयक अस्पतालों तक स्वचालित, डिजिटल निर्देश मार्ग स्थापित किए जा सकें।
(पैरा 4.2.24)
173. समिति का मत है कि ग्रामीण नागरिकों को यात्रा और उपचार के भारी खर्चों से बचाने के लिए विशेषीकृत कैंसर-विज्ञान संबंधी, आघात और मनोरोग संबंधी देखभाल का विकेंद्रीकरण आक्रामक रूप से किया जाना चाहिए। वित्त वर्ष 2025-26 और 2026-27 के बजट में 297 डे केयर कैंसर सेंटरों (डीसीसीसी) की स्वीकृति, जिला अस्पतालों में आपातकालीन देखभाल की क्षमता में 50% विस्तार और एनआईएमएनएचएस-2 की स्थापना सहित अन्य प्रावधान महत्वपूर्ण नीतिगत हस्तक्षेप हैं, जिन्हें शीघ्रता से लागू करने की आवश्यकता है। समिति का मानना है कि विशेषीकृत भौतिक अवसंरचना बिना समानांतर, उच्च विशिष्ट कार्यबल के कार्य नहीं कर सकती। इसलिए, समिति सिफारिश करती है कि सरकार एक लाख संबद्ध स्वास्थ्य पेशेवरों के सृजन के लिए केंद्रीय बजट घोषणा को एक सख्त, समयबद्ध 5 वर्षीय राष्ट्रीय रोडमैप के माध्यम से लागू करे।
(पैरा 4.2.25)
174. समिति का यह भी मत है कि बीमारियों के बदलते स्वरूप और 2047 तक विकसित भारत के व्यापक दृष्टिकोण के अनुरूप, प्रशिक्षण पाठ्यक्रम को बुनियादी स्वास्थ्य भूमिकाओं से आगे बढ़ाना आवश्यक है। इस संबंध में, समिति इस राष्ट्रीय योजना में उन्नत तकनीकी विषयों, विशेष रूप से क्रिटिकल केयर, श्वसन एवं हृदय रोग, आणविक निदान, परमाणु चिकित्सा, स्वास्थ्य सूचना विज्ञान और जन स्वास्थ्य प्रयोगशाला विज्ञान को औपचारिक रूप से शामिल करने की सिफारिश करती है। यह विविधीकरण सुनिश्चित करेगा कि पीएम–एबीएचआईएम के अंतर्गत नवनिर्मित क्रिटिकल केयर अस्पताल ब्लॉक और निजी तृतीयक केंद्र दोनों ही स्थायी रूप से विश्व स्तरीय, आईपीएचएस–अनुरूप कार्यबल से युक्त हों।
(पैरा 4.2.26)
175. समिति समझती है कि आयुष्मान भारत प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना (एबी-पीएमजएवाई) की दीर्घकालिक वित्तीय स्थिरता और वहनीयता सुदृढ़ नियामक निगरानी और संसाधनों के दुरुपयोग की पूर्ण रोकथाम से अंतर्निहित रूप से जुड़ी हुई है। समिति ने गौर किया है कि राष्ट्रीय स्वास्थ्य प्राधिकरण (एनएचए) प्रतिदिन भारी मात्रा में दावों का प्रसंस्करण करता है और उसने नैदानिक स्थितियों में विसंगति, दस्तावेज़ जालसाजी और डीपफेक चिकित्सा अभिलेखों का पता लगाने के लिए स्वचालित निर्णय इंजन (एएई) सहित कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) और मशीन लर्निंग (एमएल) मॉडल को सक्रिय रूप से तैनात किया है। समिति का मानना है कि धोखाधड़ी, अपव्यय और दुरुपयोग को कम करना यह सुनिश्चित करने के लिए सर्वोपरि है कि सीमित सार्वजनिक धन का उपयोग बेईमान संस्थाओं के बजाय वास्तविक लाभार्थियों के लिए ही किया जाए। इसलिए, समिति सिफारिश करती है कि एनएचए अपने एआई–संचालित राष्ट्रीय धोखाधड़ी–विरोधी इकाई (एनएएफयू) के एल्गोरिदम को आक्रामक रूप से विस्तारित करे ताकि सभी सूचीबद्ध सार्वजनिक और निजी अस्पतालों में अनियमित उपचार पैटर्न, बढ़ाए गए बिल और हेरफेर किए गए रेडियोलॉजिकल छवियों को सक्रिय रूप से चिह्नित किया जा सके।
(पैरा 4.2.27)
176. इसके अलावा, समिति इस तथ्य से अवगत है कि तकनीकी निवारण के साथ–साथ सख्त प्रशासनिक कार्रवाई भी आवश्यक है। अतः समिति धोखाधड़ीपूर्ण गतिविधियों में लिप्त चिकित्सा संस्थानों के लिए तत्काल निलंबन और भारी आर्थिक दंड सहित कठोर, वास्तविक समय पर दंडात्मक नयाचार लागू करने की सिफारिश करती है। साथ ही, समिति यह भी सिफारिश करती है कि इन उन्नत स्वतः निर्णय तंत्रों को इस प्रकार अनुकूलित किया जाए जिससे अनुपालन करने वाले स्वास्थ्य सेवा प्रदाताओं के दावों के निपटान में लगने वाला समय काफी कम हो जाए, जिससे उच्च स्तर का विश्वास बना रहे और योजना में निजी क्षेत्र की व्यापक भागीदारी को प्रोत्साहन मिले।
(पैरा 4.2.28)
राष्ट्रीय औषधि मूल्य निर्धारण प्राधिकरण (एनपीपीए)
177. समिति का मत है कि राष्ट्रीय औषधि मूल्य निर्धारण प्राधिकरण (एनपीपीए) द्वारा कार्यान्वित “व्यापार मार्जिन युक्तिकरण” (टीएमआर) प्रायोगिक परियोजनाएं स्वास्थ्य सेवा की वहनीयता बढ़ाने में प्रभावी सिद्ध हुई हैं। 42 गैर–अनुसूचित कैंसर रोधी दवाओं के लिए व्यापार मार्जिन को 30% और महत्वपूर्ण चिकित्सा उपकरणों (ऑक्सीजन कंसंट्रेटर, पल्स ऑक्सीमीटर और ग्लूकोमीटर सहित) के लिए वितरक मूल्य (पीटीडी) पर 70% की सीमा निर्धारित करने से उपभोक्ताओं को ₹1,984 करोड़ से अधिक की संचयी वार्षिक बचत प्राप्त हुई है। हालांकि, समिति का मानना है कि इस ढांचे का विस्तार करना अनुचित मूल्यह्रास से निपटने के लिए अत्यंत आवश्यक है, क्योंकि सामान्य खुराक रूपों के लिए सामूहिक औसत मूल्यह्रास वर्तमान में लगभग 43% है। अतः समिति सिफारिश करती है कि सरकार को औषधि (मूल्य नियंत्रण) आदेश (डीपीसीओ), 2013 के तहत व्यापार मार्जिन युक्तिकरण के लिए एक स्थायी वैधानिक ढांचा स्थापित करना चाहिए, जिसमें उच्च लागत वाली, गैर–अनुसूचित पुरानी बीमारियों की दवाओं के व्यापक स्पेक्ट्रम पर मूल्य सीमा का विस्तार किया जाए। हालांकि, समिति सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यमों (एमएसएमई) द्वारा उठाए गए वैध परिचालन संबंधी चिंताओं पर ध्यान देती है, जो बाजार तक पहुंच के लिए पारंपरिक व्यापार चैनलों पर बहुत अधिक निर्भर हैं। इसलिए, समिति सिफारिश करती है कि अंतिम रूप दिए गए टीएमआर ढांचे में एक श्रेणीबद्ध मार्कअप संरचना को शामिल किया जाए जो कम लागत वाले एमएसएमई विनिर्माणकर्ताओं को संस्थागत विस्थापन से बचाते हुए अंतिम उपभोक्ता के हितों की रक्षा करे।
(पैरा 4.2.35)
178. समिति का मत है कि एनपीपीए का दायित्व केवल व्यय सीमा निर्धारित करने तक ही सीमित नहीं है, बल्कि जीवन रक्षक औषधियों की निरंतर और निर्बाध उपलब्धता सुनिश्चित करना भी है। समिति नोट करती है कि डीपीसीओ, 2013 के ऐतिहासिक कार्यान्वयन से भारतीय औषधियों की लागत वैश्विक स्तर पर सबसे कम हो गई है, जिससे प्रति वर्ष ₹26,055 करोड़ की बचत हुई है। हालांकि, समिति का मानना है कि अत्यधिक मूल्य दबाव से व्यावसायिक अव्यवहार्यता नहीं होनी चाहिए, जिससे अनजाने में महत्वपूर्ण औषधियां बाजार से बाहर हो जाती हैं और रोगियों को महंगे विकल्पों का सहारा लेने के लिए विवश होना पड़ता है। समिति नोट करती है कि एनपीपीए ने समय–समय पर डीपीसीओ, 2013 के अनुच्छेद 19 के तहत अपनी आपातकालीन शक्तियों का प्रयोग किया है, सबसे हाल ही में जून 2026 में एसओ 3004(ई) और 3005(ई) के माध्यम से, आपूर्ति श्रृंखलाओं को संरक्षित करने के लिए आवश्यक अधिकतम कीमतों में एक बार 50% की वृद्धि की अनुमति दी है। इस संबंध में समिति सिफारिश करती है कि सरकार एनपीपीए के अंतर्गत कच्चे माल (जैसे सक्रिय फार्मास्युटिकल सामग्री) की लागत की निगरानी के लिए एक त्वरित, डेटा–आधारित संस्थागत तंत्र को औपचारिक रूप दे, जिससे बाजार में कमी उत्पन्न होने से पहले ही अनुच्छेद 19 को अस्थायी रूप से लागू किया जा सके। साथ ही, समिति सिफारिश करती है कि कृत्रिम या संरचनात्मक दवा की कमी को रोकने के लिए अनुच्छेद 3 के अंतर्गत रणनीतिक उत्पादन निर्देशों के साथ–साथ निर्धारित फॉर्मूलेशन को बंद करने संबंधी दिशानिर्देशों का कड़ाई से पालन किया जाए।
(पैरा 4.2.36)
179. समिति का मत है कि डीपीसीओ, 2013 के अंतर्गत फॉर्मूलेशन–आधारित, बाजार–डेटा औसत मूल्य निर्धारण दृष्टिकोण निष्पक्षता और वस्तुनिष्ठता सुनिश्चित करता है, फिर भी इसकी सफलता अंततः खुदरा स्तर पर पूर्ण कार्यान्वयन अनुपालन पर निर्भर करती है। जबकि एनपीपीए ने 935 फॉर्मूलेशन के लिए स्पष्ट अधिकतम मूल्य निर्धारित किया है और जुलाई 2026 तक नई दवाओं के लिए 3,845 खुदरा मूल्य निर्धारित किए हैं, सूचना विषमता आम नागरिक के लिए एक परिचालन चुनौती बनी हुई है। समिति का मानना है कि डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना इस अंतर को पाटने का सबसे शक्तिशाली हथियार है। इसलिए, समिति सिफारिश करती है कि सरकार को गैर–अनुसूचित दवाओं पर 10% वार्षिक मूल्य वृद्धि सीमा को लागू करने के लिए एकीकृत फार्मास्युटिकल डेटाबेस प्रबंधन प्रणाली (आईपीडीएमएस 2.0) को राज्य औषधि नियंत्रण पोर्टलों के साथ वास्तविक समय में सिंक्रनाइज़ करना अनिवार्य करना चाहिए। इसके अतिरिक्त, समिति सिफारिश करती है कि फार्मा सही दाम मोबाइल एप्लिकेशन को राष्ट्रव्यापी सार्वजनिक स्वास्थ्य नेटवर्क के माध्यम से सक्रिय रूप से बढ़ावा दिया जाए। इसके अतिरिक्त, समिति का यह मत है कि खुदरा विक्रेताओं द्वारा आधिकारिक निर्माता मूल्य सूचियों को प्रमुखता से प्रदर्शित करने के वैधानिक आदेश को लागू करने के लिए सख्त अनुपालन ऑडिट शुरू किए जाने चाहिए, ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि एनपीपीए मूल्य नियमों का वित्तीय लाभ खरीद के समय मरीजों को पारदर्शी रूप से और पूरी तरह से मिले।
(पैरा 4.2.37)
180. समिति का मत है कि स्वास्थ्य सेवा की सुलभता की परिभाषा में महत्वपूर्ण बदलाव आया है, जिसके चलते आधुनिक तृतीयक उपचार में उन्नत चिकित्सा उपकरण और जटिल संयोजन फार्मूलेशन का होना अनिवार्य हो गया है। कोरोनरी स्टेंट, घुटने के प्रत्यारोपण, कंडोम और गर्भाशय में प्रत्यारोपित किए जाने वाले उपकरणों को राष्ट्रीय आवश्यक औषधि सूची (एनएलईएम) में शामिल करने से लाखों लोगों को भारी चिकित्सा ऋण से बचाया जा सका है, और अकेले कोरोनरी स्टेंट की कीमत सीमा से उपभोक्ताओं को प्रति वर्ष ₹13,353 करोड़ की अभूतपूर्व बचत हुई है। समिति का मानना है कि प्रौद्योगिकी की प्रगति के साथ, उभरती महामारी संबंधी वास्तविकताओं के अनुरूप एनएलईएम के दायरे का भी गतिशील रूप से विस्तार होना चाहिए। इसलिए, समिति सिफारिश करती है कि स्थायी राष्ट्रीय औषधि समिति (एसएनसीएम) उन्नत पेसमेकर, नेत्र लेंस और प्रत्यारोपण योग्य पंप जैसे उच्च मात्रा में उपयोग होने वाले नैदानिक और उपचारात्मक चिकित्सा उपकरणों का व्यवस्थित रूप से मूल्यांकन करे और उन्हें आवश्यक औषधि आयोग (डीपीसीओ) की अनुसूचित सूची में शामिल करे। इसके अतिरिक्त, यह देखते हुए कि एनपीपीए ने परिवर्तित खुराक और संयोजनों में लागत भिन्नताओं को नियंत्रित करने के लिए 3,845 “नई दवाओं” (जिनमें 1,380 मधुमेह–रोधी और 677 हृदय संबंधी दवाएं शामिल हैं) को सफलतापूर्वक विनियमित किया है, समिति इस दिशा में सिफारिश करती है कि निर्धारित दवाओं में मामूली संरचनात्मक परिवर्तन करके निर्माताओं को अधिकतम मूल्य नियमों को दरकिनार करने से रोकने के लिए निश्चित खुराक संयोजनों (एफडीसी) की जांच को तेज किया जाए।
(पैरा 4.2.38)
181. समिति का यह सुविचारित मत है कि यद्यपि रोगियों की सुरक्षा के लिए सक्रिय मूल्य विनियमन सर्वोपरि है, नियामक ढांचे द्वारा साथ ही साथ घरेलू दवा अनुसंधान और उन्नत चिकित्सीय वितरण प्रणालियों के विकास को भी प्रोत्साहित करना चाहिए। समिति नोट करती है कि औषधि (मूल्य नियंत्रण) आदेश, 2013 के अनुच्छेद 32 के तहत, राष्ट्रीय औषधि मूल्य निर्धारण प्राधिकरण (एनपीपीए) ने 14 नव–पेटेंट या स्वदेशी रूप से शोधित उत्पादों को महत्वपूर्ण मूल्य नियंत्रण छूट प्रदान करके नवाचार को सफलतापूर्वक प्रोत्साहित किया है। समिति का मानना है कि इस प्रकार की रणनीतिक छूट भारतीय दवा क्षेत्र को जेनेरिक दवाओं के निर्माण से हटकर अग्रणी उन्नत औषधि खोज की ओर अग्रसर होने में एक महत्वपूर्ण उत्प्रेरक का काम करती है। अतः समिति सिफारिश करती है कि सरकार को एनपीपीए और औषधि विभाग के भीतर एक समर्पित, त्वरित मूल्यांकन प्रकोष्ठ स्थापित करना चाहिए ताकि अनुच्छेद 32 के तहत दी गई इन छूटों का वस्तुनिष्ठ मूल्यांकन और कार्यान्वयन में तेजी लाई जा सके, जिसमें कैंसर, दुर्लभ रोगों और रोगाणुरोधी प्रतिरोध के क्षेत्र में अभूतपूर्व उपचारों को विशेष प्राथमिकता दी जाए।
(पैरा 4.2.39)
182. हालाँकि, समिति का मानना है कि इस व्यावसायिक प्रोत्साहन से अनजाने में ऐसे दीर्घकालिक एकाधिकार को बढ़ावा नहीं मिलना चाहिए जो कमजोर रोगी जनसांख्यिकी को उपचार से वंचित कर दे। इसलिए, समिति एक सख्त, स्वचालित वैधानिक संक्रमण प्रोटोकॉल के प्रवर्तन की सिफारिश करती है। इस तंत्र को यह सुनिश्चित करना होगा कि अनिवार्य पांच वर्षीय छूट अवधि समाप्त होते ही, इन नवोन्मेषी फॉर्मूलेशन को बिना किसी प्रशासनिक देरी के, मानक डीपीसीओ खुदरा मूल्य सीमा के अंतर्गत सुचारू रूप से लाया जाए, जिससे वैज्ञानिक प्रगति के लाभ अंततः किफायती और व्यापक बाजार तक पहुंच सकें।
(पैरा 4.2.40)
भारतीय बीमा विनियामक और विकास प्राधिकरण (आईआरडीएआई):
183. समिति का मानना है कि राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण (एनएसएस) के 80वें दौर (2025) के आंकड़ों से उल्लेखनीय प्रगति का संकेत मिलता है, जिसमें 46% आबादी कम से कम एक स्वास्थ्य बीमा या वित्तपोषण योजना के अंतर्गत आती है। हालांकि, निजी क्षेत्र में स्वास्थ्य सेवाओं की लागत पर नियंत्रण न होने पर केवल कवरेज बढ़ाने से ही वहनीयता की गारंटी नहीं मिल सकती। समिति इस बात पर चिंता व्यक्त करती है कि निजी स्वास्थ्य सेवाओं का लाभ उठाने में परिवारों को भारी वित्तीय बोझ का सामना करना पड़ रहा है, जहां प्रति अस्पताल में भर्ती होने पर औसत जेब खर्च ₹34,064 है, जो सरकारी अस्पतालों के सुरक्षित और कम लागत वाले वातावरण की तुलना में काफी अधिक है। मानकीकृत उपचार प्रोटोकॉल की कमी और शोषणकारी बिलिंग प्रथाओं, जैसे कि क्लिनिकल प्रक्रियाओं के लिए कमरे के किराए से जुड़ी कीमतों, के कारण यह समस्या 10-13% की वार्षिक चिकित्सा मुद्रास्फीति दर से और भी गंभीर हो जाती है, जो सामान्य मुद्रास्फीति से कहीं अधिक है। समिति का मानना है कि बीमा नियामक और विकास प्राधिकरण (आईआरडीएआई) और स्वास्थ्य सेवा प्रदाताओं के बीच सहयोगात्मक नियामक हस्तक्षेप इस व्यवस्था को स्थिर करने के लिए अनिवार्य है। अतः समिति सिफारिश करती है कि सरकार, आईआरडीएआई और भारतीय उद्योग परिसंघ (सीआईआई) द्वारा गठित बहु–हितधारक कार्य समूहों का उपयोग करते हुए, मानकीकृत उपचार दिशानिर्देशों को लागू करने और मनमानी मूल्य भिन्नताओं पर रोक लगाने के लिए एक वैधानिक ढांचा तैयार करे। विशेष रूप से, समिति नागरिकों को जेब से होने वाले भारी खर्चों से बचाने के लिए सभी निजी अस्पतालों में मानक प्रक्रियाओं के लिए कमरे के किराए से जुड़े मुद्रास्फीति मॉडल को समाप्त करने की सिफारिश करती है।
(पैरा 4.2.46)
184. समिति का मानना है कि स्वास्थ्य बीमा प्रणाली वित्तीय सुरक्षा का एक अनिवार्य स्तंभ बन गई है, जैसा कि वित्त वर्ष 2024-25 के दौरान ₹94,248 करोड़ के 3.26 करोड़ स्वास्थ्य बीमा दावों के निपटान से स्पष्ट होता है। हालाँकि, समिति का मानना है कि इस जोखिम-साझाकरण ढांचे की वित्तीय स्थिरता प्रामाणिकता संबंधी जोखिमों के कारण गंभीर रूप से कमजोर हो गई है, जिसमें प्रदाता-प्रेरित मांग, धोखाधड़ी या फर्जी बिलिंग, और अयोग्य लाभार्थी शामिल हैं, जो व्यवस्थित रूप से दावों की लागत और बीमा प्रीमियम को बढ़ाते हैं। समिति का मानना है कि दावों के प्रबंधन में पूर्ण पारदर्शिता और दक्षता लाने के लिए एक मजबूत, एकीकृत डिजिटल बुनियादी ढांचा सबसे प्रभावी तंत्र है। अतः, समिति सिफारिश करती है कि सरकार राष्ट्रीय स्वास्थ्य प्राधिकरण (एनएचए) द्वारा विकसित राष्ट्रीय स्वास्थ्य दावा विनिमय (एनएचसीएक्स) प्लेटफॉर्म पर सभी निजी अस्पतालों और स्वास्थ्य सेवा प्रदाताओं के लिए अनिवार्य रूप से जुड़ना और भाग लेना सुनिश्चित करे। साथ ही, समिति यह भी सिफारिश करती है कि आईआरडीएआई सार्वजनिक बीमा रजिस्ट्री (पीआईआर) को एक मूलभूत डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना के रूप में पूर्ण रूप से लागू करने में तेजी लाए, ताकि सुरक्षित, सहमति–आधारित सूचना साझाकरण को सुगम बनाया जा सके, दावों के निपटान में देरी से होने वाले विवादों को कम किया जा सके और प्रणालीगत खामियों को दूर किया जा सके।
(पैरा 4.2.47)
185. समिति का यह मत है कि महामारी विज्ञान के संक्रमण से गुजर रही बुजुर्ग आबादी के लिए स्वास्थ्य बीमा को सुलभ बनाने के लिए, उन प्रणालीगत प्रवेश बाधाओं को पूरी तरह से हटाना आवश्यक है, जिन्होंने ऐतिहासिक रूप से कमजोर जनसांख्यिकी, विशेष रूप से 60 वर्ष और उससे अधिक आयु के वरिष्ठ नागरिकों और पुरानी गैर-संचारी रोगों (एनसीडी) से ग्रसित व्यक्तियों को नुकसान पहुंचाया है। समिति आईआरडीएआई द्वारा शुरू किए गए उपभोक्ता–केंद्रित सुधारों की सराहना करती है, जिनमें अधिकतम प्रवेश आयु सीमा को हटाना, पूर्व–मौजूदा बीमारियों (पीडीडी) के लिए प्रतीक्षा अवधि को चार वर्ष से घटाकर तीन वर्ष करना, स्थगन अवधि को घटाकर पांच वर्ष करना और सार्वभौमिक आयुष कवरेज को अनिवार्य करना शामिल है। समिति का मानना है कि इन प्रगतिशील दिशानिर्देशों को सख्त नियामक दंडों द्वारा समर्थित किया जाना चाहिए ताकि बीमा कंपनियों को कृत्रिम अनुपालन बाधाएं या छिपे हुए अपवर्जन बनाने से रोका जा सके। अतः, समिति सिफारिश करती है कि आईआरडीएआई एक कठोर अनुपालन ऑडिट ढांचा स्थापित करे ताकि कैशलेस डिस्चार्ज अनुमोदन के लिए अनिवार्य तीन घंटे की समय-सीमा का पूर्ण पालन सुनिश्चित हो सके और अस्पताल से छुट्टी मिलने में होने वाली देरी को समाप्त किया जा सके। इसके अतिरिक्त, समिति यह सिफारिश करती है कि बीमा सलाहकार समिति की उप–समिति को किफायती, सूक्ष्म बीमा मॉडल उत्पाद तैयार करने का निर्देश दिया जाए, जो विशेष रूप से देर से प्रवेश करने वालों और कम आय वाले परिवारों के लिए तैयार किए गए हों, ताकि सार्वभौमिक स्वास्थ्य कवरेज को मजबूत किया जा सके।
(पैरा 4.2.48)
186. समिति का मत है कि पारंपरिक स्वास्थ्य बीमा मॉडल, जो मुख्य रूप से द्वितीयक और तृतीयक अस्पताल में भर्ती होने को कवर करता है, भारत में चल रहे महामारी विज्ञान संबंधी परिवर्तन के अनुरूप नहीं है। समिति ने उपलब्ध आंकड़ों से पाया है कि मधुमेह, उच्च रक्तचाप और हृदय रोग जैसी गैर–संक्रामक बीमारियों (एनसीडी) की बढ़ती व्यापकता के कारण सामयिक अस्पताल में भर्ती होने के बजाय निरंतर, आजीवन चिकित्सा प्रबंधन की आवश्यकता है। समिति समुक्ति करती है कि वर्तमान में प्रति उपचार बाह्य रोगी देखभाल पर औसत जेब खर्च ₹861 है। समिति का मानना है कि केवल अस्पताल में भर्ती होने पर केंद्रित बीमा उत्पादों पर निर्भर रहने से पॉलिसीधारकों को नियमित दीर्घकालिक देखभाल के बढ़ते वित्तीय बोझ का सामना करना पड़ सकता है। इसलिए, समिति भारतीय बीमा नियामक और विकास प्राधिकरण (आईआरडीएआई) को मानक स्वास्थ्य बीमा ढांचे में व्यापक बाह्य रोगी विभाग (ओपीडी) कवरेज को शामिल करने को अनिवार्य करने की सिफारिश करती है। इसके अलावा, समिति यह सिफारिश करती है कि बीमाकर्ता ऐसे विशेष उत्पाद तैयार करें जो गैर–संचारी रोगों के लिए आजीवन निदान, फार्मेसी बिल और विशेषज्ञ परामर्श की आवर्ती लागतों को स्पष्ट रूप से सब्सिडी प्रदान करें, जिससे देखभाल की पूरी प्रक्रिया में वित्तीय सुरक्षा सुनिश्चित हो सके।
(पैरा 4.2.49)
187. समिति का मत है कि निजी स्वास्थ्य सेवा क्षेत्र में प्रसव का वित्तीय बोझ बहुत अधिक है, जो स्वास्थ्य सेवा की वहनीयता के व्यापक उद्देश्य को सीधे तौर पर कमजोर करता है। समिति नोट करती है कि सभी अस्पतालों में प्रसव का औसत खर्च ₹14,775 है, जो सार्वजनिक स्वास्थ्य सुविधाओं में जेब से होने वाले खर्च से काफी अधिक है। समिति का मानना है कि मातृत्व देखभाल एक मूलभूत स्वास्थ्य सेवा आवश्यकता है और इसे परिवारों के लिए संरचनात्मक वित्तीय संकट का स्रोत नहीं बनना चाहिए। अतः, समिति सिफारिश करती है कि आईआरडीएआई ऐसे विनियामक दिशानिर्देश लागू करे जो बीमाकर्ताओं को मानकीकृत मातृत्व लाभों को मूल स्वास्थ्य बीमा उत्पादों के एक मुख्य, सुलभ घटक के रूप में पेश करने के लिए बाध्य करें, न कि उन्हें अत्यधिक प्रतिबंधित या प्रीमियम ऐड-ऑन राइडर्स के रूप में वर्गीकृत करें। इसके साथ ही, समिति सिफारिश करती है कि बहु-हितधारक कार्य समूह पैनल में शामिल निजी अस्पतालों में मातृत्व और प्रसव उपचार प्रोटोकॉल के मानकीकरण को स्पष्ट रूप से प्राथमिकता दें, और यह सुनिश्चित करें कि संस्थागत प्रसव की लागत को सख्ती से विनियमित किया जाए और कीमतें पारदर्शी रूप से तय की जाएं। समन्वित सुधारों की आवश्यकता को पहचानते हुए, आईआरडीएआई ने सीआईआई के सहयोग से स्वास्थ्य सेवा लागत, उपचार मानकीकरण, धोखाधड़ी रोकथाम, सामान्य पैनलिंग, एनएचसीएक्स को अपनाने, पारदर्शिता और उपभोक्ता संरक्षण की जांच के लिए बहु-हितधारक कार्य समूह गठित किए हैं। इसके समानांतर, आईआरडीएआई सार्वजनिक बीमा रजिस्ट्री (पीआईआर) को एक डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना के रूप में विकसित कर रहा है ताकि बीमा जानकारी का सुरक्षित, सहमति–आधारित आदान–प्रदान सक्षम हो सके, पॉलिसी सेवा को सरल बनाया जा सके और पारदर्शिता एवं दक्षता में सुधार हो सके। समिति सार्वजनिक बीमा रजिस्ट्री के माध्यम से दावा निपटान में पारदर्शिता की पुरजोर सिफारिश करती है ताकि कॉर्पोरेट अस्पतालों द्वारा बढ़ाए गए दावों को कम किया जा सके और ऐसी कदाचारों पर रोक लगाई जा सके।
(पैरा 4.2.50)
“स्वास्थ्य बीमा व्यय” पर भारत के लिए 2022-23 के राष्ट्रीय स्वास्थ्य लेखा अनुमानों की व्याख्या
188. स्वास्थ्य बीमा में स्वास्थ्य वित्तपोषण योजनाएं शामिल हैं जिनका वित्तपोषण व्यक्तियों या सरकारों से एकत्रित अंशदान/प्रीमियम द्वारा किया जाता है और सरकार (स्वास्थ्य विभाग या सरकारी निगम/ट्रस्ट/सोसायटी) और/या बीमा कंपनी द्वारा स्वास्थ्य सेवा प्रदाताओं से सक्रिय रूप से सेवाएं खरीदने के लिए एकत्रित किया जाता है। समिति ने भारत के राष्ट्रीय स्वास्थ्य लेखा अनुमान 2022-23 से पाया कि निम्नलिखित पांच प्रकार की स्वास्थ्य वित्तपोषण योजनाओं के व्यय को स्वास्थ्य बीमा व्यय माना जाता है: (i) सामाजिक स्वास्थ्य बीमा (केंद्रीय सरकारी स्वास्थ्य योजना, कर्मचारी राज्य बीमा योजना और भूतपूर्व सैनिक अंशदायी स्वास्थ्य योजना); (ii) सरकार द्वारा वित्तपोषित स्वास्थ्य बीमा योजनाएं (केंद्र और राज्य सरकारों दोनों की); (iii) उद्यम योजनाओं के अलावा नियोक्ता–आधारित बीमा (निजी समूह स्वास्थ्य बीमा); (iv) अन्य प्राथमिक कवरेज योजनाएं (निजी व्यक्तिगत स्वास्थ्य बीमा); और (v) समुदाय–आधारित स्वास्थ्य बीमा।
(पैरा 4.2.51)
189. समिति ने स्वास्थ्य बीमा व्यय (2022-23) से संबंधित राष्ट्रीय स्वास्थ्य लेखा अनुमानों से प्राप्त आंकड़ों का गहन विश्लेषण किया है। समिति का मानना है कि निजी स्वास्थ्य बीमा व्यय का अत्यधिक प्रभुत्व, जो ₹81,012 करोड़ है और सामाजिक स्वास्थ्य बीमा (₹32,090 करोड़) और सरकारी वित्तपोषित बीमा दोनों को काफी पीछे छोड़ देता है, आबादी के एक बड़े हिस्से को अनियंत्रित चिकित्सा मुद्रास्फीति और बहिष्करण नीतियों के कारण अत्यधिक जेब खर्च के जोखिम में डालता है। इसलिए, समिति सिफारिश करती है कि नियामक प्राधिकरण देश भर में सभी निजी स्वास्थ्य बीमा पॉलिसियों को मानकीकृत करने के लिए एक सख्त मूल्य निर्धारण और कवरेज ढांचा लागू करें। समिति का मानना है कि निजी बीमा प्रदाताओं के लिए अपने प्रतिपूर्ति ढांचे और पैकेज की सीमाओं को सरकार द्वारा अनुमोदित नैदानिक प्रोटोकॉल के अनुरूप बनाना कानूनी रूप से अनिवार्य होना चाहिए। प्रीमियम में मनमानी बढ़ोतरी पर कानूनी लगाम लगाकर और व्यापक ओपीडी देखभाल को अनिवार्य करके, मध्यम वर्ग पर पड़ने वाले भारती वित्तीय बोझ को स्थायी रूप से नियंत्रित किया जा सकता है।
(पैरा 4.2.52)
190. समिति का मानना है कि सामुदायिक स्वास्थ्य बीमा पर मात्र 10 करोड़ रुपये का बेहद कम खर्च जमीनी स्तर पर वित्तीय जोखिम सुरक्षा के घोर दुरुपयोग को दर्शाता है, विशेष रूप से विशाल अनौपचारिक क्षेत्र के लिए जो नियोक्ता–आधारित निजी बीमा या विशिष्ट केंद्रीय योजनाओं के लिए काफी हद तक अपात्र है। इसलिए, समिति सरकार से सामुदायिक स्तर पर सहकारी बीमा मॉडलों के विस्तार को गति देने की सिफारिश करती है। समिति का यह भी मानना है कि स्वास्थ्य मंत्रालय को इन स्थानीय सामुदायिक योजनाओं में व्यवस्थित रूप से सार्वजनिक पूंजी डालने के लिए एक औपचारिक “मैचिंग ग्रांट” ढांचा शुरू करना चाहिए। यह संरचनात्मक सब्सिडी ग्रामीण और हाशिए पर स्थित समूहों को सामूहिक रूप से जोखिमों को साझा करने और क्षेत्रीय चिकित्सा सुविधाओं के साथ किफायती, स्थानीयकृत स्वास्थ्य देखभाल दरों पर तय करने में सक्षम बनाएगी।
(पैरा 4.2.53)
केंद्रीय औषधि मानक नियंत्रण संगठन (सीडीएससीओ)
191. समिति का मत है कि सार्वजनिक और निजी दोनों स्वास्थ्य संस्थानों में उच्च गुणवत्ता वाले, सुरक्षित और प्रभावी चिकित्सा उपकरणों की उपलब्धता सुनिश्चित करना जनविश्वास बढ़ाने और निम्न स्तरीय नैदानिक परिणामों से बचने के लिए सर्वोपरि है। समिति नोट करती है कि चिकित्सा उपकरण नियम (एमडीआर), 2017 के जोखिम–आधारित वर्गीकरण ढांचे के तहत, केंद्रीय औषधि मानक नियंत्रण संगठन (सीडीएससीओ) ने 1 जुलाई, 2026 तक श्रेणी ए और बी उपकरणों के लिए 3,480 विनिर्माण इकाइयों और श्रेणी सी और डी उपकरणों के लिए 1,100 विनिर्माण इकाइयों को सफलतापूर्वक लाइसेंस जारी किए हैं और 12,866 आयात लाइसेंस आवेदनों को मंजूरी दी है। इसके अलावा, आपूर्ति श्रृंखला को सुरक्षित करने के लिए, समिति नोट करती है कि सीडीएससीओ ने 25 नवंबर, 2025 को एक परिपत्र जारी किया, जिसमें यह अनिवार्य किया गया है कि सभी खरीद एजेंसियों, अस्पतालों और स्वास्थ्य संस्थानों को चिकित्सा उपकरणों की खरीद के लिए वैध सीडीएससीओ या राज्य लाइसेंसिंग प्राधिकरण (एसएलए) लाइसेंस की आवश्यकता होगी। समिति का मानना है कि मानवीय हस्तक्षेप के बिना प्रौद्योगिकी के माध्यम से संरचनात्मक जवाबदेही को संस्थागत रूप दिया जाना चाहिए ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि अप्रमाणित या गैर–अनुरूप उपकरण स्वास्थ्य सेवा वितरण नेटवर्क में प्रवेश न कर सकें। इसलिए, समिति सिफारिश करती है किस्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय को संबंधित राज्य सरकारों पर दबाव डालना चाहिए कि वे 25 नवंबर, 2025 के खरीद जनादेश के अनुपालन की सभी सार्वजनिक और निजी संस्थाओं में सख्ती से निगरानी करें ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि केवल कानूनी रूप से लाइसेंस प्राप्त, वैश्विक स्तर पर मानकीकृत तकनीकें ही रोगियों तक पहुंचें। समिति सरकार को यह भी सिफारिश करती है कि वह राज्य सरकारों को एमडीआर, 2017 के तहत प्रदत्त शक्तियों का पूर्ण उपयोग करने के लिए प्रोत्साहित करे ताकि वर्तमान में पंजीकृत 84 एमडीटीएल और 18 अधिसूचित निकायों से आगे बढ़कर अतिरिक्त चिकित्सा उपकरण परीक्षण प्रयोगशालाओं (एमडीटीएल) की स्थापना की जा सके और उन्हें अधिसूचित किया जा सके। समिति का दृढ़ मत है कि इस सार्वजनिक परीक्षण अवसंरचना का विस्तार और 258 अधिसूचित चिकित्सा उपकरण अधिकारियों (एमडीओ) के समूह की तैनाती से मजबूत घरेलू गुणवत्ता आश्वासन को बढ़ावा मिलेगा, जिससे अंततः सभी सामाजिक–आर्थिक वर्गों के लिए सुरक्षित चिकित्सा तकनीकें सुलभ हो जाएंगी। समिति राज्य लाइसेंसिंग प्राधिकरणों को गुणवत्ता जांच आयोग (क्यूसीआई) द्वारा अनुमोदित अधिसूचित प्रयोगशालाओं द्वारा अनुमोदित गुणवत्ता के अनुसार चिकित्सा उपकरणों के लाइसेंसिंग के लिए अधिक स्वायत्तता प्रदान करने की सिफारिश करती है।
(पैरा 4.2.57)
192. समिति का यह भी मत है कि उच्च लागत वाली आयातित चिकित्सा प्रौद्योगिकियों पर अत्यधिक वित्तीय निर्भरता पूरे भारत में रोगियों के जेब खर्च को काफी बढ़ा देती है। समिति नोट करती है कि नीति आयोग, आईसीएमआर और सीडीएससीओ द्वारा संयुक्त रूप से शुरू किया गया सहयोगी कार्यक्रम “मेडटेक मित्रा” घरेलू स्वदेशीकरण के लिए एक महत्वपूर्ण तंत्र के रूप में उभरा है, जिसे 856 आवेदन प्राप्त हुए हैं, 53 तकनीकी सलाहकार समिति (टीएसी) की बैठकें आयोजित की गई हैं और 798 नवप्रवर्तकों को संरचित जीवनचक्र मार्गदर्शन प्रदान किया गया है। यह संपूर्ण सुविधा कई महत्वपूर्ण परिचालन क्षेत्रों को कवर करती है, जिसमें 611 नवप्रवर्तकों के लिए नियामक रणनीति मार्गदर्शन, 74 नवप्रवर्तकों के लिए परीक्षण लाइसेंस सुविधा और 21 अवधारणाओं के प्रमाण की स्थापना शामिल है। समिति का मानना है कि स्वदेशी नवाचार के माध्यम से तकनीकी, नैदानिक, विनिर्माण और बाजार में प्रवेश संबंधी बाधाओं को व्यवस्थित रूप से दूर करना बाजार में लागत प्रभावी विकल्प पेश करने का सबसे टिकाऊ तरीका है। अतः समिति सरकार से यह सिफारिश करती है कि वह घरेलू प्रौद्योगिकियों के व्यावसायीकरण में तेजी लाने के लिए मेडटेक मित्रा प्लेटफॉर्म की बजटीय और संस्थागत क्षमता में उल्लेखनीय वृद्धि करे। समिति का यह मत है कि सीडीएससीओ को अपनी प्रक्रियाओं को सुव्यवस्थित करना चाहिए ताकि नामित प्लेटफॉर्म के माध्यम से आगे बढ़ने वाले नवप्रवर्तकों के लिए परीक्षण लाइसेंस की सुगमता, पूर्व–नैदानिक/नैदानिक परीक्षणों के लिए वित्तीय सहायता और अंतिम विनिर्माण लाइसेंस की उपलब्धता में तेजी लाई जा सके। समिति समझती है कि अत्यधिक प्रतिस्पर्धी घरेलू विनिर्माण पारिस्थितिकी तंत्र को बढ़ावा देने से, बाजार में प्रतिस्पर्धा बढ़ेगी और सार्वजनिक और निजी दोनों प्रकार के अस्पताल नेटवर्कों के लिए चिकित्सा उपकरणों की खरीद लागत स्वाभाविक रूप से कम हो जाएगी।
(पैरा 4.2.58)
193. समिति को यह जानकारी मिली है कि नियामक प्रक्रियाओं में लगने वाली लंबी समय–सीमा, प्रशासनिक अनावश्यकताएँ और अनुपालन का अत्यधिक बोझ अनजाने में चिकित्सा उपकरणों की अंतिम बाजार लागत को बढ़ा देते हैं, जिससे स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुँच बाधित होती है। समिति इस बात को ध्यान में रखती है कि सीडीएससीओ ने एमडीआर, 2017 संबंधी नीतिगत उपायों के तहत प्रगतिशील डिजिटल परिवर्तन के उपाय लागू किए हैं, जिनमें समीक्षकों को आवेदनों का स्वचालित आवंटन, नियामक प्रमाणपत्रों का स्वतः सृजन और अनुपालन प्रबंधन के लिए केंद्रीकृत ऑनलाइन मॉड्यूल शामिल हैं। समिति विनिर्माण लाइसेंस की समय–सीमा को कम करने के उद्देश्य से नीतिगत सुधारों की सिफारिश करती है, विशेष रूप से क्लास बी अनुमोदन की समय–सीमा को 140 दिनों से घटाकर 115 दिन करने और क्लास सी और डी की समय–सीमा को 105 दिनों से घटाकर 90 दिन करने के संबंध में। समिति का मानना है कि सुरक्षा मानकों से समझौता किए बिना व्यापार करने में आसानी को बेहतर बनाने के लिए डिजिटल ढांचे के माध्यम से दक्षता को अधिकतम करना आवश्यक है। इसलिए, समिति सरकार से परिचालन विलंब को समाप्त करने के लिए विनिर्माण लाइसेंस की कम समय–सीमा (क्लास बी के लिए 115 दिन; क्लास सी और डी के लिए 90 दिन) को औपचारिक रूप से अधिसूचित और लागू करने की सिफारिश करती है। समिति आगे यह अनुशंसा करती है कि सीडीएससीओ अपने केंद्रीकृत ऑनलाइन पोर्टल का विस्तार करे ताकि स्वचालित अनुमोदन–पश्चात परिवर्तन (पीएसीज़) को एकीकृत किया जा सके और डिजिटल स्वास्थ्य और कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित चिकित्सा सॉफ्टवेयर के लिए स्पष्ट, विशिष्ट नियामक प्रक्रियाओं को अंतिम रूप दिया जा सके। समिति का मानना है कि इन प्रवेश बाधाओं को कम करने से विनिर्माण में निजी क्षेत्र के अधिक निवेश को प्रोत्साहन मिलेगा, आपूर्ति श्रृंखला की समयबद्धता में सुधार होगा और प्रशासनिक बचत से रोगियों के उपचार खर्च में कमी आएगी। समिति का दृढ़ विश्वास है कि अपनाए गए नीतिगत सुधार और कार्य योजना से स्वदेशीकरण और आयात प्रतिस्थापन को बढ़ावा मिलेगा, जिससे स्वास्थ्य सुविधाओं की सुलभता और वहनीयता में वृद्धि होगी। समिति को आशा है कि चिकित्सा उपकरण नियम, 2017 सुरक्षित और उच्च गुणवत्ता वाले चिकित्सा उपकरणों को सुनिश्चित करके भारत की स्वास्थ्य प्रणाली को और मजबूत करेंगे, जिससे स्वास्थ्य सेवाओं की वहनीयता और व्यापक पहुंच को बढ़ावा मिलेगा। समाज के हर वर्ग को किफायती लागत पर गुणवत्तापूर्ण देखभाल प्रदान करना समय की मांग है।
(पैरा 4.2.59)
194. समिति का मत है कि आम जनता द्वारा स्वास्थ्य सेवाओं पर किए जाने वाले कुल खर्च का एक बड़ा हिस्सा दवाओं पर ही खर्च होता है, जिसके कारण महंगी, ब्रांडेड या पेटेंट वाली विदेशी दवाओं पर निर्भरता बढ़ती जा रही है, जो लंबे समय तक वहन करने योग्य नहीं है। समिति समुक्ति करती है कि औषधि एवं सौंदर्य प्रसाधन अधिनियम, 1940 के तहत सीडीएससीओ को दवा मानकों को निर्धारित करने और आयातित एवं घरेलू स्तर पर उत्पादित चिकित्सा उत्पादों की सुरक्षा, प्रभावकारिता और गुणवत्ता को विनियमित करने का निश्चित वैधानिक अधिकार प्राप्त है। समिति का मानना है कि जेनेरिक दवाओं के लिए नियामक प्रक्रियाओं को तेजी से लागू करना महत्वपूर्ण उपचारों तक पहुंच को लोकतांत्रिक बनाने का सबसे सीधा सार्वजनिक स्वास्थ्य तंत्र है। इसलिए, समिति सिफारिश करती है कि सीडीएससीओ जेनेरिक दवाओं के लिए विशेष रूप से तैयार किए गए अपने नैदानिक परीक्षण मूल्यांकन और लाइसेंसिंग ढांचे में तेजी लाए। समिति सिफारिश करती है कि नियामक तंत्र उच्च गुणवत्ता वाली, कम लागत वाली बायो–इक्विवेलेंट दवाओं को तेजी से मंजूरी देने पर ध्यान केंद्रित करे ताकि सार्वजनिक और निजी बाजारों में इनकी उपलब्धता सुनिश्चित हो सके और महंगी विदेशी ब्रांडों के एकाधिकार को प्रभावी ढंग से समाप्त किया जा सके। समिति का मानना है कि एकसमान प्रवर्तन के लिए राज्य औषधि नियंत्रण प्राधिकरणों के साथ निकट समन्वय बनाए रखने से यह सुनिश्चित होगा कि ये किफायती, जेनेरिक विकल्प अपनी त्रुटिहीन चिकित्सीय समरूपता बनाए रखें, जिससे रोगियों की जेब और नैदानिक सुरक्षा मानकों दोनों की रक्षा हो सके।
(पैरा 4.2.60)
195. समिति का दृष्टिकोण है कि भारत में घरेलू चिकित्सा उपकरण प्रणाली के विस्तार के साथ, दीर्घकालिक नियामक दक्षता और बाजार का विश्वास बनाए रखना अत्यंत आवश्यक है। इसके लिए प्रशासनिक मानव संसाधन को लगातार मजबूत करना और निगरानी तंत्रों का विकेंद्रीकरण करना अनिवार्य है। समिति नोट करती है कि नियामक प्रक्रियाओं को गति देने के लिए अनुमोदन के बाद के परिवर्तन (पीएसी) और जोखिम वर्गीकरण संबंधी निर्णय उप औषधि नियंत्रकों (डीडीसी) को सौंपने जैसे महत्वपूर्ण संस्थागत कदम पहले ही उठाए जा चुके हैं। इसके अलावा, नियामक ढांचे ने अतिरिक्त कर्मचारियों की भर्ती, निरीक्षकों के लिए लक्षित प्रशिक्षण कार्यक्रमों और वैश्विक सर्वोत्तम प्रथाओं के अनुरूप अंतरराष्ट्रीय नियामक निकायों के साथ सक्रिय सहयोग के माध्यम से तकनीकी क्षमता निर्माण का प्रयास किया है। समिति का मानना है कि नियामक विखंडन को रोकने और उच्च सुरक्षा मानकों को बनाए रखने के लिए सभी अधिकार क्षेत्रों में चिकित्सा उपकरण नियम (एमडीआर), 2017 का एकसमान प्रवर्तन सुनिश्चित करना अत्यंत महत्वपूर्ण है। अतः समिति स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय को 258 चिकित्सा उपकरण अधिकारियों (एमडीओ) और राज्य निरीक्षकों के विस्तारित समूह के लिए एक स्थायी, अनिवार्य प्रशिक्षण एवं क्षमता–निर्माण ढांचा स्थापित करने की अनुशंसा करती है, जिसमें 18 पंजीकृत अधिसूचित निकायों के समन्वय से उन्नत जोखिम–आधारित वर्गीकरण और गुणवत्ता प्रबंधन प्रणाली (क्यूएमएस) लेखापरीक्षा तकनीकों पर विशेष ध्यान दिया जाए। साथ ही, समिति यह भी अनुशंसा करती है कि चिकित्सा उपकरण तकनीकी सलाहकार समूह (एमडीटीएजी) को नियमित नीतिगत सुधारों को आगे बढ़ाने, अंतरराष्ट्रीय नियामक अद्यतनों का व्यवस्थित मूल्यांकन करने और वैश्विक सामंजस्य मार्गों को औपचारिक रूप देने के लिए नियमित, त्रैमासिक वैधानिक सभाओं का आयोजन करने का आदेश दिया जाए। समिति का विचार है कि स्थानीय नियामक विलंबों को दूर करने, घरेलू उद्यमों के लिए अनुपालन संबंधी त्रुटियों को कम करने और किफायती चिकित्सा प्रौद्योगिकियों के लिए भारत को एक अत्यधिक विश्वसनीय, वैश्विक स्तर पर अनुपालन करने वाले विनिर्माण केंद्र के रूप में स्थापित करने के लिए ये सक्रिय शासन उपाय आवश्यक हैं।
(पैरा 4.2.61)
196. समिति का यह सुविचारित मत है कि स्वास्थ्य सेवा में आत्मनिर्भरता हासिल करने और जीवनचक्र लागत को कम करने के लिए आयातित घटकों की मात्र असेंबली के बजाय वास्तविक स्वदेशी विनिर्माण अत्यंत आवश्यक है। समिति ने उन रिपोर्टों पर ध्यान दिया है जो यह दर्शाती हैं कि सरकारी ठेके हासिल करने के लिए आयातित घटकों, विशेष रूप से चीन से आयातित घटकों को असेंबल करने वाली संस्थाओं द्वारा ‘मेक इन इंडिया‘ खंड का दुरुपयोग किया जा रहा है। समिति का मानना है कि उच्च मूल्य वाली चिकित्सा प्रौद्योगिकियों के मूल स्रोत को सत्यापित करने के लिए केवल वर्तमान स्व–प्रमाणन आवश्यकताओं और वैधानिक दस्तावेज़ीकरण पर निर्भर रहना अपर्याप्त है।अतः समिति अनुशंसा करती है किसरकारी खरीद में भाग लेने वाली कंपनियों के लिए एक कठोर, अनिवार्य सत्यापन तंत्र का कार्यान्वयन। इस व्यापक ढांचे में कम से कम 40% स्थानीय मूल्यवर्धन अनिवार्य होना चाहिए, घटक–स्तर पर पता लगाने की क्षमता को लागू करना चाहिए और डिजिटल बिल ऑफ मैटेरियल्स (बीओएम) प्रस्तुत करना अनिवार्य होना चाहिए। इसके अलावा, समिति अनुशंसा करती है कि ऐसे तंत्र में आवधिक तृतीय–पक्ष संपरीक्षा, महत्वपूर्ण घटकों के लिए उत्पत्ति–देश का सख्त खुलासा और स्थानीय सामग्री का स्वतंत्र सत्यापन शामिल हो ताकि संपूर्ण आपूर्ति श्रृंखला की अखंडता सुनिश्चित हो सके और वास्तविक घरेलू प्रौद्योगिकी विकास को बढ़ावा मिल सके।
(पैरा 4.2.62)
197. समिति का मत है कि केंद्रीकृत, साझा अवसंरचना मॉडल, जो डिजाइन, सटीक विनिर्माण, परीक्षण, सत्यापन और नैदानिक अनुसंधान सुविधाएं एक ही छत के नीचे प्रदान करते हैं, अलग अलग कंपनियों के लिए पूंजी निवेश की आवश्यकताओं को काफी कम करते हैं और उत्पाद विकास की समयसीमा में तेजी लाते हैं। समिति नोट करती है कि विशाखापत्तनम मेडटेक पार्क (एएमटीज़ेड) का 270 एकड़ का मूल परिसर पूरी तरह से आवंटित और पूर्ण उपयोग में है, जिससे उद्योग की बढ़ती मांगों को पूरा करने और भारत के चिकित्सा उपकरण बाजार में 25-30% योगदान देने के रणनीतिक लक्ष्य को आगे बढ़ाने के लिए तत्काल विस्तार आवश्यक हो गया है। अतः समिति अनुशंसा करती है कि मौजूदा एएमटीजेड परिसर से सटी अतिरिक्त 300-350 एकड़ भूमि का शीघ्र अधिग्रहण और आवंटन किया जाए ताकि सुविधाओं का विस्तार किया जा सके और नए निवेशों को समायोजित किया जा सके। सरकार को विशाखापत्तनम मेडटेक पार्क की सफलता को ओडिशा, झारखंड, पश्चिम बंगाल, बिहार और उत्तर प्रदेश में चिकित्सा उपकरणों के लिए ऐसे अन्य पार्कों में भी दोहराना चाहिए और देश के विभिन्न क्षेत्रों जैसे ओडिशा, झारखंड, पश्चिम बंगाल, बिहार और उत्तर प्रदेश में मेडटेक पार्कों की संख्या बढ़ानी चाहिए ताकि स्थानीय विनिर्माण को बढ़ावा दिया जा सके और एएमटीजेड मॉडल को अपनाकर भारत में चिकित्सा उपकरण उद्योग को विश्व स्तरीय सुविधाएं प्रदान की जा सकें। घरेलू चिकित्सा उपकरण क्षेत्र के विकास और वैश्विक प्रतिस्पर्धा को और गति देने के लिए, समिति ने “इनोवेशन पासपोर्ट” तंत्र की औपचारिक शुरुआत की सिफारिश की है, जिसे तेजी से नियामक अनुमोदन और वैश्विक बाजारों तक निर्बाध पहुंच प्रदान करने के लिए डिज़ाइन किया गया है। इसके अतिरिक्त, समिति का मानना है कि सरकार को लक्षित वित्तीय और परिचालन प्रोत्साहन लागू करने चाहिए, विशेष रूप से स्टांप शुल्क और पंजीकरण शुल्क छूट, पूंजी और अनुसंधान सब्सिडी, और महत्वपूर्ण घटकों पर शुल्क छूट।
(पैरा 4.2.63)
198. संक्षेप में, समिति चाहती है कि सरकार मेडटेक मित्र जैसे संस्थानों सहित सरलीकृत अनुपालन प्रक्रियाओं, अधिसूचित परीक्षण प्रयोगशालाओं के विस्तार और नियामक कर्मियों के माध्यम से नियामक तंत्र को मजबूत करना जारी रखे। समिति का मानना है कि कम जोखिम वाले उपकरणों के लिए सरलीकृत लाइसेंसिंग, उन्नत परीक्षण अवसंरचना और अस्पतालों और सरकारी एजेंसियों द्वारा केवल लाइसेंस प्राप्त उपकरणों की खरीद सहित निरंतर नीतिगत उपायों से नियामक अनुपालन और बाजार में विश्वास और बढ़ेगा। समिति का यह सुविचारित मत है कि जमीनी स्तर पर लागू होने पर यह निश्चित रूप से घरेलू विनिर्माण को बढ़ावा देगा, प्रतिस्पर्धा बढ़ाएगा, नियामक बोझ कम करेगा और सार्वजनिक तथा निजी दोनों स्वास्थ्य सेवा क्षेत्रों में सुरक्षित, गुणवत्तापूर्ण और किफायती चिकित्सा उपकरणों की उपलब्धता में सुधार करेगा, जिससे एक अग्रणी वैश्विक मेडटेक केन्द्र के रूप में भारत की स्थिति सुनिश्चित होगी।
(पैरा 4.2.64)
199. समिति का मत है कि तेजी से जटिल होती जा रही औषधियों के फॉर्मूलेशन और जैव–औषधियों के मूल्यांकन के लिए आवश्यक तकनीकी दक्षता और विशेषज्ञता को केंद्रीय औषधि मानक नियंत्रण संगठन (सीडीएससीओ) की मौजूदा सामान्य प्रशासनिक संरचना के माध्यम से बनाए रखना संभव नहीं है। समिति यह नोट करती है कि औषधि नियंत्रकों के पदों में लगातार रिक्तियों के कारण संगठन की दैनिक नियामक प्रक्रियाओं में बाधा आ रही है। समिति का मानना है कि वैश्विक वैज्ञानिक और नियामक विकास के साथ तालमेल बनाए रखने के लिए सामान्य प्रशासनिक कर्मचारियों से अलग एक समर्पित तकनीकी कार्यबल आवश्यक है। अतः समिति अनुशंसा करती है कि सरकार सीडीएससीओ के भीतर विशिष्ट तकनीकी मूल्यांकन क्षमता को संस्थागत रूप देने के लिए शीघ्रता से एक विशेषज्ञ कोर कैडर और एक वैज्ञानिक समीक्षा कैडर का गठन करे। संक्षेप में, समिति अनुशंसा करती है कि औषधि नियंत्रकों के सभी मौजूदा रिक्त पदों को समयबद्ध तरीके से भरा जाए, ताकि स्वीकृत नियामक क्षमता के मुकाबले सीडीएससीओ में रिक्तियां अनुमोदन की समय–सीमा के लिए बाधा न बनने पाएं।
(पैरा 4.2.65)
200. समिति को यह जानकारी मिली है कि प्रयोगशाला परीक्षण और नैदानिक परीक्षण प्रक्रियाओं का क्रमिक स्वरूप नई दवाओं को बाजार में लाने में देरी का एक प्रमुख कारण रहा है, जिससे अप्रत्यक्ष रूप से लागत बढ़ जाती है और उपचार तक समय पर पहुंच सीमित हो जाती है। समिति का मानना है कि प्रक्रियाओं को क्रमिक रूप से चलाने के बजाय समवर्ती रूप से चलाने के लिए पुनर्गठित करके वैज्ञानिक जांच से समझौता किए बिना नियामक गति में काफी सुधार किया जा सकता है। इसलिए, समिति सिफारिश करती है कि सीडीएससीओ प्रयोगशाला परीक्षण और नैदानिक परीक्षण मूल्यांकन की समानांतर प्रक्रिया शुरू करे, जिसे एकल–खिड़की मंजूरी प्रणाली द्वारा समर्थित किया जाए, ताकि अनावश्यक प्रक्रियात्मक हस्तांतरण को समाप्त किया जा सके और परीक्षण और परीक्षण अनुमोदन में लगने वाले कुल समय को कम किया जा सके। समिति सरकार को यह भी सिफारिश करती है कि वह अतिरिक्त सार्वजनिक और निजी प्रयोगशालाओं को सूचीबद्ध करके अधिकृत परीक्षण प्रणाली का पर्याप्त विस्तार करे, जिसमें दवाओं और चिकित्सा उपकरणों की सभी श्रेणियां शामिल हों, जो भारतीय गुणवत्ता परिषद और सीडीएससीओ द्वारा निर्धारित मान्यता और दक्षता मानकों को पूरा करती हों। इसके अलावा, मौजूदा सीडीएससीओ से संबद्ध प्रयोगशालाओं को बढ़ती मांग और विकसित हो रही उत्पाद जटिलता के अनुरूप परीक्षण अवसंरचना को बनाए रखने के लिए परिभाषित वार्षिक योजनाओं के तहत चरणबद्ध तरीके से उन्नत किया जाना चाहिए। समिति ए एंड बी मेडिकल उपकरणों के विकेंद्रीकरण की पुरजोर सिफारिश करती है, ताकि संबंधित राज्य सरकारें एक प्रभावी नियामक तंत्र बना सकें और विभिन्न राज्य सरकारों के बीच प्रतिस्पर्धा बढ़ाकर वैश्विक कंपनियों को अपने राज्यों में विनिर्माण केंद्र स्थापित करने के लिए आकर्षित कर सकें, जिससे पूरे देश को लाभ हो। चूंकि स्वास्थ्य और उद्योग दोनों ही राज्य के विषय हैं, इसलिए राज्य सरकार के लिए यह उचित होगा कि वह ए एंड बी श्रेणी के चिकित्सा उपकरणों को अधिसूचित प्रयोगशालाओं के माध्यम से विनियमित करे।
(पैरा 4.2.66)
201. समिति का मत है कि दवाओं की गुणवत्ता की गारंटी के लिए केवल नियामक अनुमोदन पर्याप्त नहीं है, जब तक कि उस वितरण श्रृंखला की कड़ी निगरानी न रखी जाए, जिसके माध्यम से दवाएँ रोगियों तक पहुँचती हैं। समिति का मानना है कि पता लगाने की क्षमता में कमियों के कारण आपूर्ति श्रृंखला में घटिया या नकली दवाओं के प्रवेश की संभावना बढ़ जाती है। इसलिए, समिति सरकार से सिफारिश करती है कि वह दवा उत्पादों की संपूर्ण ट्रेसिबिलिटी लागू करे और निर्माताओं, वितरकों और खुदरा विक्रेताओं के लिए गुड डिस्ट्रीब्यूशन प्रैक्टिसेज (जीडीपी) का कड़ाई से अनुपालन अनिवार्य करे। समिति एक एकीकृत डिजिटल ड्रग रेगुलेटरी सिस्टम (डीडीआरएस) के निर्माण की भी सिफारिश करती है जो केंद्रीय और राज्य औषधि नियामकों को एक साझा प्रौद्योगिकी मंच पर निर्बाध रूप से जोड़े, जिसमें वास्तविक समय की निगरानी, गुणवत्ता संबंधी जोखिमों की शीघ्र पहचान और समन्वित प्रवर्तन कार्रवाई को सक्षम बनाने के लिए एक अंतर्निहित जोखिम प्रबंधन प्रणाली हो। समिति का विचार है कि इन उपायों को एक साथ अपनाने से एक मजबूत, पारदर्शी और प्रौद्योगिकी–सक्षम औषधि नियामक ढांचा तैयार होगा, जिसमें त्वरित अनुमोदन, बेहतर गुणवत्ता आश्वासन, विस्तारित परीक्षण क्षमता और जनता के लिए दवाओं की बेहतर सुरक्षा सुनिश्चित होगी।
(पैरा 4.2.67)
भारतीय गुणवत्ता परिषद (क्यूसीआई)
202. समिति का मत है कि भारत में गुणवत्ता प्रणाली में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है, फिर भी अस्पतालों और प्रयोगशालाओं की मान्यता काफी हद तक स्वैच्छिक है और बाजार की मांग से प्रेरित है। स्वास्थ्य सेवाओं की सुरक्षा, विश्वसनीयता और गुणवत्ता को समान रूप से मजबूत करने के लिए सार्वजनिक और निजी दोनों क्षेत्रों में एक मानक आधार–रेखा स्थापित करना आवश्यक है। हालांकि, इस परिवर्तन के परिणामस्वरूप नियामक अवरोध या प्रशासनिक देरी नहीं होनी चाहिए।अतः समिति अनुशंसा करती है किस्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय, क्यूसीआई के समन्वय से, प्रवेश स्तर पर अनिवार्य गुणवत्ता प्रमाणन की ओर चरणबद्ध तरीके से आगे बढ़ने के लिए एक रोडमैप तैयार करे। परिचालन संबंधी बाधाओं को दूर करने के लिए, क्यूसीआई द्वारा हाल ही में घोषित एकल, पेपरलेस, मॉड्यूलर वन–स्टॉप प्रत्यायन प्लेटफॉर्म द्वारा इस परिवर्तन को गति प्रदान की जानी चाहिए, जो पुराने मल्टी–पोर्टल सिस्टमों का स्थान लेगा। इसके साथ ही, समयबद्ध शिकायत निवारण के लिए क्वालिटी सेतु टिकट–आधारित प्रणाली का भी उपयोग किया जाना चाहिए। इस परिवर्तन में नैदानिक संस्थानों को प्राथमिकता दी जानी चाहिए, ताकि मानकों को धीरे–धीरे पूर्ण एनएबीएच और एनएबीएल मानकों तक पहुंचाया जा सके। इस व्यापक विस्तार को समर्थन देने के लिए, समिति युवा विशेषज्ञों को शामिल करने हेतु प्रवेश बाधाओं को कम करके राष्ट्रीय मूल्यांकनकर्ताओं के समूह का विस्तार करने की अनुशंसा करती है, जिससे अंतिम छोर तक मजबूत पहुंच सुनिश्चित हो सके और प्रक्रिया में लगने वाला समय काफी कम हो सके।
(पैरा 4.2.72)
203. समिति का मानना है कि स्वास्थ्य सेवा अवसंरचना में शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों के बीच मौजूद स्पष्ट अंतर को कम लागत वाली प्रमाणन संरचनाओं का लाभ उठाकर प्रभावी ढंग से पाटा जा सकता है। हालांकि, कठोर अनुपालन मानदंडों और पूंजी की कमी ने ऐतिहासिक रूप से छोटे, अर्ध–शहरी स्वास्थ्य केंद्रों को औपचारिक गुणवत्ता प्रणाली में प्रवेश करने से रोक रखा है।अतः समिति अनुशंसा करती है किसरकार को एनएबीएच के “एंट्री–लेवल सर्टिफिकेशन” कार्यक्रमों का निरंतर विस्तार करना चाहिए, विशेष रूप से टियर-2, टियर-3 और ग्रामीण क्षेत्रों के छोटे अस्पतालों को लक्षित करते हुए, क्यूसीआई के आसान मान्यता मानदंडों को लागू करके, जिससे 20% क्षमता वाले अस्पताल भी आवेदन कर सकें। छोटे संस्थानों पर पूंजी का बोझ डाले बिना इसे तेजी से अपनाने के लिए, प्रवर्तन ढांचे को व्यापक प्रतिबंधों से बदलकर श्रेणीबद्ध दंडों के साथ मार्गदर्शन और सुधार पर आधारित करना चाहिए। इसके अलावा, एनएबीएच के एमआईटीआरए कार्यक्रम के माध्यम से प्रत्यक्ष और व्यावहारिक सहायता प्रदान की जानी चाहिए, जिसमें प्रशिक्षित और आधिकारिक रूप से सूचीबद्ध सलाहकारों को छोटे शहरों के अस्पतालों का सक्रिय रूप से मार्गदर्शन करने के लिए नियुक्त किया जाए। रोगी सुरक्षा में डॉक्टरों, नर्सों और तकनीशियनों के लिए भूमिका–आधारित कौशल प्रदान करने के लिए गुणवत्ता पाठशाला पहल द्वारा इसकी भरपाई की जानी चाहिए, साथ ही लगातार अच्छा प्रदर्शन करने वाले अस्पतालों के लिए एआई–सहायता प्राप्त डेस्कटॉप निगरानी और डेस्क–आधारित निगरानी का उपयोग करके भौतिक निरीक्षणों की परेशानी को कम किया जाना चाहिए।
(पैरा 4.2.73)
204. समिति का विचार है कि दक्षता को संस्थागत रूप देना और अपव्यय को समाप्त करना सार्वजनिक व्यय को अनुकूलित करने और आम जनता के लिए उच्च स्तरीय स्वास्थ्य सेवा सुलभ बनाने के लिए महत्वपूर्ण मापदंड हैं। आयुष्मान भारत (पीएम–जेएवाई) के तहत प्रमाणित अस्पतालों के लिए पैनल में शामिल करने की प्रक्रिया को तेज करने के लिए क्यूसीआई और राष्ट्रीय स्वास्थ्य प्राधिकरण (एनएचए) के बीच साझेदारी एक उत्कृष्ट तंत्र है, लेकिन निरीक्षण–प्रधान मॉडल से विश्वास–आधारित प्रणाली में परिवर्तन के लिए इसमें गहन संरचनात्मक अनुकूलन की आवश्यकता है। अतः समिति अनुशंसा करती है कि इस प्रकार के डिजिटल स्वास्थ्य प्रमाणन ढांचे को सभी केंद्रीय और राज्य सरकार की बीमा योजनाओं में गहराई से एकीकृत किया जाना चाहिए, जिसमें कठोर निरीक्षण के बजाय उच्च–विश्वास और सरल प्रक्रिया पर जोर दिया जाए, जिसमें कागजी कार्रवाई कम हो और प्रक्रिया में लगने वाला समय कम हो। राज्य सरकारों को यह अनिवार्य करना चाहिए कि सार्वजनिक पैनल में शामिल होने के इच्छुक किसी भी निजी या सार्वजनिक चिकित्सा संस्थान के पास सत्यापित क्यूसीआई गुणवत्ता प्रमाणन होना चाहिए। प्रक्रियाओं को गति देने के लिए प्रौद्योगिकी–आधारित प्रणालियों का उपयोग करके, यह एकीकरण सार्वजनिक स्वास्थ्य बजट आवंटन की वित्तीय दक्षता को अधिकतम करेगा और कमजोर तबके के लोगों के लिए नकद–रहित देखभाल को गति प्रदान करेगा।
(पैरा 4.2.74)
205. समिति का मानना है कि सटीक निदान किफायती स्वास्थ्य सेवा की आधारशिला है, क्योंकि गलत या त्रुटिपूर्ण प्रयोगशाला परिणामों के कारण बार–बार परीक्षण, गलत निदान और चिकित्सा लागत में वृद्धि होती है। वैध प्रयोगशालाओं को बढ़ावा देने के साथ–साथ, राज्य को उपभोक्ताओं को सशक्त बनाना चाहिए और उस प्रशासनिक विलंब को दूर करना चाहिए जिसके कारण गुणवत्तापूर्ण प्रयोगशालाएँ मान्यता प्राप्त नेटवर्क से बाहर रहती हैं।अतः समिति अनुशंसा करती है किअनधिकृत और स्व–घोषित वाणिज्यिक परीक्षण प्रयोगशालाओं पर सख्त नियामक कार्रवाई की जानी चाहिए। सत्यापित प्रयोगशालाओं के नेटवर्क का तेजी से विस्तार करने के लिए, क्यूसीआई के एनएबीएल सुधारों को पूरी तरह से लागू किया जाना चाहिए, जिसमें देशव्यापी एकरूपता सुनिश्चित करने के लिए चिकित्सा परीक्षण प्रयोगशालाओं के लिए एक मॉडल कार्यक्षेत्र का परिचय, अधिकृत हस्ताक्षरकर्ताओं के अनुमोदन के लिए 48 घंटे की स्व–घोषणा अवधि और लंबी प्रतीक्षा अवधि को समाप्त करने के लिए समान परीक्षण विधियों के लिए 48 घंटे का कार्यक्षेत्र विस्तार शामिल है। जहां परीक्षण मापदंड पहले से ही शामिल हैं, वहां उत्पाद–आधारित मान्यता के लिए अतिरिक्त शुल्क समाप्त किए जाने चाहिए। प्रयोगशाला पारिस्थितिकी तंत्र की तकनीकी स्थिरता सुनिश्चित करने के लिए, सरकार को 2026 में 5,000 प्रयोगशाला कर्मियों को प्रशिक्षित करने के उद्देश्य से तकनीकी कौशल विकास पहलों का समर्थन करना चाहिए। इसके अलावा, नागरिकों को धोखाधड़ी और निम्न गुणवत्ता वाले क्लीनिकों से बचाने के लिए, सरकार को नव घोषित “क्यू मार्क – देश का हक” सुधार को व्यवस्थित रूप से लागू करना चाहिए। इस क्यूआर–कोड वाले गुणवत्ता चिह्न को सार्वजनिक स्वास्थ्य पोर्टलों में प्रमुखता से जोड़ा जाना चाहिए और प्रत्येक नैदानिक प्रयोगशाला के प्रवेश द्वार पर भौतिक रूप से अनिवार्य किया जाना चाहिए, जिससे पूर्ण सार्वजनिक पारदर्शिता सुनिश्चित हो सके, नकली प्रमाणपत्र समाप्त हो सके और आम नागरिक किसी सुविधा की वास्तविक प्रमाणन स्थिति को तुरंत सत्यापित कर सकें।
(पैरा 4.2.75)
राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग (एनएमसी)
206. समिति का मानना है कि चिकित्सा शिक्षा को किफायती बनाए रखना स्वास्थ्य सेवा के व्यवसायीकरण को रोकने के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। चिकित्सा मूल्यांकन एवं रेटिंग बोर्ड (एमएआरबी) द्वारा प्रबंधित वर्तमान नियामक संरचना के तहत, नए संस्थानों का मूल्यांकन सख्त अनुपालन दस्तावेज़ीकरण पर निर्भर करता है, जिसमें संबंधित राज्य या केंद्र शासित प्रदेश से तीन वर्ष के लिए वैध अनिवार्यता प्रमाण पत्र, मान्यता प्राप्त विश्वविद्यालय से संबद्धता की सहमति और चार्टर्ड अकाउंटेंट द्वारा प्रमाणित कोष और वित्तीय सुदृढ़ता का पुख्ता प्रमाण शामिल है। अतः समिति स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय को निजी मेडिकल कॉलेजों और डीम्ड विश्वविद्यालयों में 50% सीटों के लिए शुल्क और अन्य सभी शुल्कों के नियमन संबंधी एनएमसी दिशानिर्देशों को सख्ती से लागू करने की सिफारिश करती है। समिति आगे यह भी सिफारिश करती है कि इन अनिवार्य आधारभूत वित्तीय निगरानी तंत्रों का उपयोग संस्थागत लागत संरचनाओं की संपरीक्षा करने के लिए किया जाना चाहिए, ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि छिपा हुआ प्रति–व्यक्ति शुल्क चिकित्सा शिक्षा प्रशिक्षण में सामाजिक–आर्थिक समावेशिता के अधिदेश का उल्लंघन न करे।
(पैरा 4.2.80)
207. समिति का मत है कि राष्ट्रीय प्रशिक्षण क्षमताओं के विस्तार के साथ–साथ परिचालन संबंधी छूट भी दी जानी चाहिए, जिससे शैक्षिक अखंडता से समझौता किए बिना त्वरित विस्तार संभव हो सके। 1999 के पुराने एमएसआर दिशानिर्देशों से आधुनिक न्यूनतम मानक आवश्यकताएँ (एमएसआर) 2023 विनियमों में परिवर्तन एक महत्वपूर्ण प्रणालीगत सुधार है। उदाहरण के लिए, 100 सीटों वाले स्नातक संस्थान को अब 420 बिस्तरों और 85 संकाय सदस्यों की आवश्यकता है, जबकि पहले यह आवश्यकता 500 बिस्तरों की थी। वहीं, 250 सीटों वाले संस्थान में बिस्तरों की आवश्यकता 1,100 से घटाकर 900 कर दी गई है, साथ ही नैदानिक अनुभव को बनाए रखने के लिए अनिवार्य बिस्तर अधिभोग दर को 80% तक बढ़ा दिया गया है। एम्स, राष्ट्रीय महत्व के संस्थानों (आईएनआईज़) और एनबीईएमएस पाठ्यक्रमों सहित देश भर में कुल क्षमता लगभग 80,000 स्नातकोत्तर सीटों तक पहुंच गई है। इसलिए, समिति अनुशंसा करती है कि एमएआरबी स्नातकोत्तर छात्रों की गुणवत्ता और नैदानिक अनुभव को बढ़ाने के लिए अपने बहुआयामी रणनीतिक सुधारों को पूरी तरह से लागू करे, यह सुनिश्चित करते हुए कि नैदानिक आवश्यकता में कोई कमी न आए।
(पैरा 4.2.81)
208. समिति आगे यह अनुशंसा करती है कि सरकारी चिकित्सा संस्थानों को पर्याप्त नैदानिक अनुभव सुनिश्चित करने के बाद ही स्नातक पाठ्यक्रमों के साथ–साथ स्नातकोत्तर पाठ्यक्रम शुरू करने की अनुमति दी जाए, जबकि निजी मेडिकल कॉलेजों को अपने परिचालन वर्ष के तीसरे वर्ष से ही स्नातकोत्तर में विशेषज्ञता वाले कार्यक्रमों को शुरू करने की अनुमति दी जाए। इसके लिए सुव्यवस्थित संसाधन मॉडल का उपयोग किया जाना चाहिए, जिसमें कम से कम दो संकाय सदस्यों की आवश्यकता हो – विशेष रूप से एक प्रोफेसर और एक एसोसिएट या असिस्टेंट प्रोफेसर की, प्रत्येक विशेषज्ञता के अधीन, बशर्ते कि उनके पास सिद्ध नैदानिक अनुभव और व्यावहारिक प्रशिक्षण हो। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि समिति राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग (एनएमसी) को चिकित्सा शिक्षा की लागत कम करने और दक्षता बढ़ाने के लिए दृढ़ता से अनुशंसा करती है ताकि समावेशिता को बढ़ावा दिया जा सके और समाज के कमजोर वर्ग के उम्मीदवारों के लिए अवसरों का विस्तार किया जा सके। समिति गैर–पारंपरिक सार्वजनिक नैदानिक संसाधनों, जैसे कि विशेष रेलवे और खान अस्पतालों का उपयोग करने की भी अनुशंसा करती है, ताकि कम सेवा वाले क्षेत्रों, जैसे कि पहाड़ी और आदिवासी क्षेत्रों में क्षेत्रीय विशेषज्ञता प्रशिक्षण के विस्तार को तेजी से बढ़ाया जा सके। गुणवत्ता सुनिश्चित करने के लिए, समिति स्नातक और स्नातकोत्तर दोनों छात्रों के लिए एक निकास परीक्षा की सिफारिश करती है।
(पैरा 4.2.82)
209. समिति का मानना है कि पांच–वर्षीय आवधिक मान्यता निरीक्षणों की पुरानी प्रणाली ने चिकित्सा शिक्षा निगरानी में प्रणालीगत कमजोरियाँ और संरचनात्मक अक्षमताएँ पैदा कीं। चिकित्सा शिक्षा मानकों के रखरखाव विनियम (एमएसएमईआर) 2023 और स्नातकोत्तर चिकित्सा शिक्षा विनियम (जीएमईआर) के तहत, राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग (एनएमसी) ने एक केंद्रीकृत पोर्टल के माध्यम से प्रस्तुत वार्षिक स्व–घोषणाओं पर आधारित सतत निगरानी मॉडल की ओर व्यापक डिजिटल परिवर्तन किया है। नियमित सीट नवीनीकरण और संस्थागत अनुमोदन अब मानकीकृत आभासी निरीक्षणों के माध्यम से प्रबंधित किए जाते हैं ताकि व्यक्तिपरक पूर्वाग्रहों को कम किया जा सके और मूल्यांकनकर्ता के शोषण को समाप्त किया जा सके, जबकि नए आवेदकों के लिए भौतिक मूल्यांकन के लिए वास्तविक समय में अंतिम मूल्यांकन रिपोर्ट पर संयुक्त रूप से हस्ताक्षर करना और आईटी–सक्षम मॉड्यूल के माध्यम से तुरंत अपलोड करना आवश्यक है।
(पैरा 4.2.83)
210. अतः समिति केंद्रीकृत, आधार–सक्षम बायोमेट्रिक उपस्थिति प्रणाली (एईबीएएस) के पूर्ण समेकन की अनुशंसा करती है, जो राष्ट्र भर में 4 लाख से अधिक नामांकित संकाय सदस्यों, छात्रों, प्रशिक्षुओं और शिक्षकों की उपस्थिति दर्ज करती है। समिति भौगोलिक रूप से प्रतिबंधित राष्ट्रीय सूचना विज्ञान केंद्र (एनआईसी) मोबाइल एप्लिकेशन के माध्यम से शुरू किए गए चेहरे–प्रमाणीकरण उन्नयन के सार्वभौमिक अनुपालन को सुनिश्चित करने के पक्षधर है, ताकि “फर्जी संकाय” को व्यवस्थित रूप से समाप्त किया जा सके और रोजगार के सटीक रिकॉर्ड प्राप्त किए जा सकें। इस संबंध में, समिति पायलट अस्पताल प्रबंधन सूचना प्रणाली (एचएमआईएस) एपीआई एकीकरण मॉड्यूल को विस्तारित करने की भी अनुशंसा करती है ताकि सभी नैदानिक सामग्री मूल्यांकन को सीधे विशिष्ट रोगी आभा आईडी से जोड़ा जा सके। इस प्रकार की डिजिटल मैपिंग, साझा नेटवर्क वीडियो रिकॉर्डर (एनवीआर) लिंक के माध्यम से प्रसारित लाइव कक्षा और अस्पताल क्षेत्र सीसीटीवी निगरानी के साथ मिलकर, नैदानिक कार्यभार में हेरफेर या संस्थागत मूल्यांकन के दौरान फर्जी रोगियों के उपयोग को स्थायी रूप से रोकेगी।
(पैरा 4.2.84)
211. समिति समझती है कि राष्ट्रीय चिकित्सा परिषद (एनएमसी) का संरचनात्मक ढांचा —विशेष रूप से स्नातक चिकित्सा शिक्षा बोर्ड (यूजीएमईबी), स्नातकोत्तर चिकित्सा शिक्षा बोर्ड (पीजीएमईबी) और नैतिकता एवं चिकित्सा पंजीकरण बोर्ड (ईएमआरबी) के बीच कार्यात्मक समन्वय—जन स्वास्थ्य प्राथमिकताओं के साथ जुड़ा रहना चाहिए। इस संबंध में, समिति अनुशंसा करती है कि यूजीएमईबी प्राथमिक और निवारक नैदानिक दक्षताओं पर जोर देने के लिए योग्यता–आधारित चिकित्सा शिक्षा (सीबीएमई) पाठ्यक्रम को लगातार परिष्कृत करे। समिति का दृढ़ विश्वास है कि स्नातक प्रशिक्षण के भीतर ग्राम एवं परिवार दत्तक ग्रहण कार्यक्रमों का कड़ाई से प्रवर्तन यह सुनिश्चित करेगा कि भावी चिकित्सा स्नातकों को संरचनात्मक और सांस्कृतिक रूप से इस प्रकार तैयार किया जाए कि वे ग्रामीण समुदायों द्वारा सामना की जाने वाली स्वास्थ्य सेवा की सुलभता संबंधी बाधाओं को दूर कर सकें।
(पैरा 4.2.85)
212. समिति की यह दृढ़ राय है कि भारत में रोगियों के लिए स्वास्थ्य सेवाओं पर होने वाले भारी व्यक्तिगत खर्च में दवाओं पर होने वाला खर्च सबसे बड़ा है। महंगे ब्रांडेड दवाओं के बजाय बिना ब्रांड वाली जेनेरिक दवाओं का उपयोग करना जनता के लिए स्वास्थ्य सेवा लागत को कम करने का सबसे प्रभावी तरीका है। इसलिए, समिति अनुशंसा करती है कि नैतिकता और चिकित्सा पंजीकरण बोर्ड (ईएमआरबी) पेशेवर आचरण संहिता को सख्ती से लागू करे, जिसके तहत सभी पंजीकृत चिकित्सकों को महंगी ब्रांडेड दवाओं के बजाय सस्ती जेनेरिक दवाएं ही लिखनी अनिवार्य हैं। समिति की दृढ़ इच्छा है कि सरकार राष्ट्रीय चिकित्सा रजिस्टर को सार्वजनिक खरीद डेटा से जोड़े और राज्य चिकित्सा परिषदों के माध्यम से स्वचालित शिकायत निवारण तंत्र स्थापित करे ताकि सार्वजनिक और निजी दोनों प्रकार के अस्पतालों में दवाओं के उपयोग के तरीकों की निगरानी, समीक्षा और संपरीक्षा की जा सके।
(पैरा 4.2.86)
राष्ट्रीय परीक्षण एजेंसी (एनटीए)
213. समिति का मत है कि राष्ट्रीय परीक्षा एजेंसी (एनटीए) भारत की स्वास्थ्य सेवा प्रणाली में एक महत्वपूर्ण नियामक आधार के रूप में कार्य करती है। यद्यपि यह चिकित्सा शुल्क या दवाओं की कीमतों को सीधे नियंत्रित नहीं करती है, फिर भी मानव संसाधन पर इसकी प्रारंभिक निगरानी राष्ट्रीय स्वास्थ्य सेवा की गुणवत्ता, समानता और दीर्घकालिक लागत को सीधे प्रभावित करती है। 2024 और मई 2026 की परीक्षा में देखी गई प्रशासनिक चुनौतियाँ कागजी प्रक्रिया में मौजूद खामियों को उजागर करती हैं, जो योग्यता आधारित चयन की पवित्रता को खतरे में डालती हैं। यदि प्रणाली में कोई गड़बड़ी होती है, तो प्रवेश प्रक्रिया मनमानी व्यावसायिकता की ओर झुक सकती है, जिससे चिकित्सा पेशेवरों की लागत बढ़ जाएगी और जनता का विश्वास आहत होगा। इसलिए, समिति अनुशंसा करती है कि शिक्षा मंत्रालय और स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय संयुक्त रूप से उच्च स्तरीय विशेषज्ञ समिति (एचएलसीई) के रोडमैप के कार्यान्वयन में तेजी लाएँ। सरकार को राष्ट्रीय पात्रता–सह–प्रवेश परीक्षा (नीट–यूजी) को पेन–एंड–पेपर टेस्ट (पीपीटी) से कंप्यूटर–आधारित परीक्षा (सीबीटी) में चरणबद्ध और सशर्त रूप से परिवर्तित करने को प्राथमिकता देनी चाहिए ताकि असुरक्षित भौतिक प्रिंट–एंड–ट्रांसपोर्ट आपूर्ति श्रृंखलाओं को पूरी तरह से समाप्त किया जा सके।समिति आगे यह सिफारिश करती है कि संक्रमणकालीन चरण के दौरान, एनटीए को प्रस्तावित कंप्यूटर–सहायता प्राप्त सुरक्षित पीपीटी (सीपीपीटी) मॉडल को संस्थागत रूप देना चाहिए – जिसमें सुरक्षित कमरों के भीतर स्थानीय रूप से मुद्रित एन्क्रिप्टेड, उम्मीदवार–यादृच्छिकित पेपरों का उपयोग किया जाता है – साथ ही मजबूत, बहुस्तरीय बायोमेट्रिक प्रमाणीकरण और लाइव एआई–सक्षम सीसीटीवी विश्लेषण का उपयोग करके शून्य त्रुटि, छेड़छाड़–रोधी परीक्षण वातावरण की गारंटी दी जानी चाहिए।
(पैरा 4.2.90)
214. समिति का मानना है कि स्वास्थ्य सेवा वितरण में सच्ची समानता प्राप्त करने के लिए सामाजिक–आर्थिक और भौगोलिक रूप से विविध चिकित्सा कार्यबल की आवश्यकता है। ग्रामीण, दूरस्थ और आर्थिक रूप से कमजोर पृष्ठभूमि के उम्मीदवारों के सांख्यिकीय रूप से अपने चिकित्सा करियर में बाद में कम प्रतिनिधित्व वाले प्रांतीय क्षेत्रों में सेवा करने की अधिक संभावना होती है। भारी सब्सिडी वाले सरकारी संस्थानों में प्रवेश के लिए एक मानकीकृत प्रवेश द्वार प्रदान करके, एनटीए ने शोषणकारी “दान सीटों” पर सफलतापूर्वक अंकुश लगाया है और दर्जनों अलग–अलग संस्थागत परीक्षाओं में बैठने के वित्तीय बोझ को कम किया है। हालांकि, परीक्षा केंद्रों तक पहुंचने में भौतिक और आर्थिक बाधाएं अभी भी कम आय वाले उम्मीदवारों को सीमित करती हैं। इसलिए, समिति अनुशंसा करती है कि एनटीए, राज्य सरकारों के साथ घनिष्ठ समन्वय में, केंद्रीय विद्यालयों, नवोदय विद्यालयों और राज्य विश्वविद्यालयों को आधुनिक सुविधाओं से लैस करके सुरक्षित, सरकारी स्वामित्व वाले परीक्षा केंद्रों के निर्माण को बड़े पैमाने पर बढ़ाए। ग्रामीण उम्मीदवारों पर रसद और वित्तीय बोझ को कम करने के लिए, समिति कम सेवा वाले जिलों में विशेष मोबाइल परीक्षा इकाइयों की तैनाती की अनुशंसा करती है। इस अवसंरचना विस्तार को एक अत्यंत तर्कसंगत शुल्क संरचना और महिला, दिव्यांग और आर्थिक रूप से कमजोर छात्रों के लिए प्राथमिकता–आधारित केंद्र आवंटन द्वारा समर्थित किया जाना चाहिए ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि कोई भी योग्य उम्मीदवार भौगोलिक या वित्तीय संकट के कारण चिकित्सा शिक्षा से वंचित न रह जाए।
(पैरा 4.2.91)
215. समिति का यह मत है कि वैकल्पिक चिकित्सा (आयुष) और नर्सिंग पेशेवर ग्रामीण और अर्ध–शहरी भारत में चिकित्सा सुरक्षा की सर्वोपरि पहली पंक्ति हैं। इन क्षेत्रों में प्रवेश स्तर पर गुणवत्ता का मानकीकरण करना अत्यंत आवश्यक है ताकि गलत निदान और उसके परिणामस्वरूप होने वाली चिकित्सा जटिलताओं को रोका जा सके, जो कमजोर आबादी के लिए स्वास्थ्य देखभाल पर होने वाले भारी खर्च को कम करती हैं। राष्ट्रीय चिकित्सा प्राधिकरण (एनटीए) द्वारा बीएएमएस, बीएचएमएस, बीयूएमएस और नर्सिंग पाठ्यक्रमों के लिए एनईटी–यूजी को एकसमान प्रवेश परीक्षा बनाने का अधिदेश सभी चिकित्सा विषयों में मानव संसाधन की गुणवत्ता को एकसमान बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण नियामक कदम है।
(पैरा 4.2.92)
216. समिति की सिफ़ारिश है कि राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग (एनएमसी) और भारतीय चिकित्सा पद्धति के लिए राष्ट्रीय आयोग, प्रवेश परीक्षाओं की तकनीकी और मनोवैज्ञानिक जाँच को लगातार बेहतर बनाने के लिए एनटीए के साथ मिलकर काम करें। इस सहयोग से उम्मीदवारों के मूलभूत योग्यता और व्यावहारिक तर्क क्षमता दोनों का मूल्यांकन करने के लिए हाइब्रिड क्लासिकल टेस्ट थ्योरी और आइटम रिस्पॉन्स थ्योरी (सीटीटी–आईआरटी) मॉडल लागू किए जाने चाहिए। समिति शिक्षा मंत्रालय से कोचिंग केंद्रों के नियमन के लिए व्यापक दिशानिर्देश जारी करने की सिफ़ारिश करती है। अत्यधिक व्यवसायीकरण वाले परीक्षा–तैयारी संस्थानों पर छात्रों की निर्भरता को सक्रिय रूप से कम करके, सरकार उन उम्मीदवारों के लिए समान अवसर प्रदान करेगी जो पूरी तरह से सरकारी स्कूलों के पाठ्यक्रम पर निर्भर हैं, और यह सुनिश्चित करेगी कि ग्रामीण भारत में प्राथमिक स्वास्थ्य सेवा का प्रबंधन अधिक सक्षम , योग्यता के आधार पर चयनित पेशेवरों द्वारा किया जाए।
(पैरा 4.2.93)
217. समिति समझती है कि स्वास्थ्य कर्मियों की लगातार रिक्तियाँ और असमान वितरण, विशेष रूप से दूरस्थ और कम सुविधा वाले क्षेत्रों में, प्राथमिक स्वास्थ्य सेवा वितरण की प्रभावशीलता को मौलिक रूप से कमजोर करते हैं। समिति का मानना है कि ऐसी प्रणालीगत बाधाओं को दूर करने के लिए राज्यों को कठोर, केंद्रीकृत मानव संसाधन मॉडलों को छोड़कर नवीन, स्थानीयकृत और प्रोत्साहन–आधारित कार्यबल रणनीतियों को अपनाना होगा। इसलिए, समिति अनुशंसा करती है कि राज्य सरकारें तत्काल विकेंद्रीकृत भर्ती ढांचे में परिवर्तन करें, जिससे जिला और स्थानीय अधिकारियों को स्थानीय नैदानिक आवश्यकताओं के आधार पर कर्मियों की भर्ती करने का अधिकार मिले।कर्नाटक में संपन्न सामुदायिक स्वास्थ्य अधिकारियों (सीएचओ) की भर्ती को समयबद्धता को सुव्यवस्थित करने और ग्रामीण क्षेत्रों में रिक्तियों को कम करने के लिए एक संरचनात्मक मानक के रूप में अपनाया जाना चाहिए। समिति सरकार से दुर्गम क्षेत्रों में स्वास्थ्य पेशेवरों को आकर्षित करने और बनाए रखने के लिए प्रोत्साहन–आधारित मजबूत ग्रामीण पोस्टिंग लागू करने की पुरजोर अपील करती है। समिति चाहती है कि संरचनात्मक प्रोत्साहनों में आवास, त्वरित कैरियर विकास और उच्च चिकित्सा शिक्षा के लिए वरीयता प्राप्त अवसरों जैसे आवश्यक गैर–वित्तीय लाभों के साथ–साथ वित्तीय कठिनाई भत्ते भी व्यापक रूप से शामिल हों।
(पैरा 4.2.94)
218. समिति का दृढ़ मत है कि मौजूदा कार्यबल का अधिकतम उपयोग करना अत्यंत महत्वपूर्ण है; अतः समिति कार्य–स्थानांतरण प्रोटोकॉल के शीघ्र औपचारिकरण का समर्थन करती है। उचित रूप से प्रशिक्षित नर्सों, मध्य–स्तरीय स्वास्थ्य सेवा प्रदाताओं और सामुदायिक स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं को परिभाषित पर्यवेक्षी दिशा–निर्देशों के तहत लक्षित सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवाएं प्रदान करने के लिए चिकित्सकीय और कार्यात्मक रूप से सक्षम होना चाहिए। अतः समिति राज्य स्तर पर विशेषीकृत, समर्पित सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रबंधन कैडर की स्थापना की अनुशंसा करती है ताकि रोग निगरानी, आपातकालीन तैयारी, स्वास्थ्य संवर्धन और साक्ष्य–आधारित वित्तीय नियोजन को व्यवस्थित रूप से सुदृढ़ किया जा सके। इस संबंध में समिति स्थापित मेडिकल कॉलेजों और जमीनी स्तर के प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों के बीच संस्थागत साझेदारी को बढ़ावा देने की अनुशंसा करती है। इस प्रकार के सहयोग सभी अग्रिम पंक्ति के स्वास्थ्य कर्मियों के लिए नियमित विशेषज्ञ मार्गदर्शन, टेली–मेंटरिंग, सतत चिकित्सा शिक्षा और संरचनात्मक क्षमता निर्माण प्रदान करने के लिए आवश्यक हैं।
(पैरा 4.2.95)
219. समिति का मानना है कि उपलब्ध चिकित्सकों की राष्ट्रीय संख्या बढ़ाने के लिए चिकित्सा शिक्षा के विकास और परिचालन दक्षता को कृत्रिम रूप से बाधित करने वाली पुरानी नियामक बाधाओं को निर्णायक रूप से दूर करना आवश्यक है। समिति का मानना है कि चिकित्सा पेशेवरों के उत्पादन में तेजी लाने और मौजूदा नैदानिक अवसंरचना के अधिकतम उपयोग के लिए प्रतिबंधात्मक अनुपालन ढांचे से तर्कसंगत, संसाधन–अनुकूलित मॉडल की ओर संक्रमण करना अनिवार्य है। इस संबंध में, समिति नए मेडिकल कॉलेज की स्थापना के लिए राज्य सरकार से अनिवार्यता प्रमाण पत्र प्राप्त करने की आवश्यकता को पूरी तरह से समाप्त करने की सिफारिश करती है, जिससे संस्थागत प्रवेश में आने वाली एक महत्वपूर्ण नौकरशाही बाधा दूर हो जाएगी। समिति चिकित्सा मूल्यांकन और रेटिंग बोर्ड (एमएआरबी) से अनुमति पत्र के वार्षिक नवीनीकरण की प्रशासनिक आवश्यकता को भी समाप्त करने और उपयोगकर्ता नियामक तंत्र को अपनाने की सिफारिश करती है। समिति का मत है कि नियामक निगरानी को अनिवार्य वार्षिक ऑनलाइन प्रकटीकरण की एक मजबूत व्यवस्था के माध्यम से बनाए रखा जाना चाहिए।
(पैरा 4.2.96)
220. समिति पूंजीगत परिसंपत्तियों के अनावश्यक दोहराव को रोकने के लिए, पारस्परिक समझौतों और समझौता ज्ञापनों (एमओयू) के माध्यम से औपचारिक रूप से, एक ही विश्वविद्यालय के भीतर या विभिन्न विश्वविद्यालयों में कई कॉलेजों के बीच संस्थागत बुनियादी ढांचे को रणनीतिक रूप से साझा करने की अनुमति देने की सिफारिश करती है।
(पैरा 4.2.97)
221. समिति का मत है कि योग्य अतिथि शिक्षकों को न्यूनतम संस्थागत संकाय आवश्यकताओं की पूर्ति में स्पष्ट रूप से गिना जाना चाहिए, बशर्ते वे न्यूनतम कक्षा संचालन के लिए निर्धारित मानदंडों का कड़ाई से पालन करें। अतः समिति नए चिकित्सा संस्थानों के लिए दीर्घकालिक अचल संपत्ति और पूंजीगत बाधाओं को काफी हद तक कम करने के लिए अस्पताल पट्टे या औपचारिक समझौता ज्ञापन व्यवस्था के लिए अनिवार्य न्यूनतम अवधि को 30 वर्ष से घटाकर 25 वर्ष करने की सिफारिश करती है।
(पैरा 4.2.98)
उपचार लागत का युक्तिकरण
222. समिति का मत है कि सरकार को अस्पताल प्रबंधन और संबंधित चिकित्सा हितधारकों के परामर्श से व्यापक नियामक दिशानिर्देश तैयार करने चाहिए ताकि देश भर में समग्र उपचार और प्रक्रिया शुल्क को मानकीकृत और तर्कसंगत बनाया जा सके। इसके अलावा, समिति का मानना है कि इस तरह के ढांचे में सार्वजनिक क्षेत्र के कल्याणकारी उद्देश्यों को सख्ती से बनाए रखने के साथ ही निजी क्षेत्र के अस्पतालों को एक पूरक, नैतिक भूमिका निभाने के लिए प्रोत्साहित और प्रेरित करना चाहिए, जिससे निम्न और मध्यम वर्ग की आबादी के लिए स्वास्थ्य सुविधाओं तक समग्र सामर्थ्य और पहुंच सुनिश्चित हो सके। भारत के संविधान के भाग IV के अंतर्गत राज्य के नीति निर्देशक सिद्धांत में निहित राज्य के कल्याणकारी स्वरूप और समाज की समाजवादी प्रणाली के संवैधानिक प्रावधान के अंतर्गत तत्कालीन सरकार का देश के लोगों के लिए स्वास्थ्य सेवा को सुलभ और किफायती बनाने का दायित्व है, जो भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत सर्वोच्च न्यायालय के निर्देश, जिसमें स्वास्थ्य के मौलिक अधिकार के अंतर्निहित प्रावधान की व्याख्या की गई है, के अनुरुप है। दूसरी ओर, आज की अर्थव्यवस्था लोकतांत्रिक और प्रतिस्पर्धा–संचालित उदार अर्थव्यवस्था है, जहां बाजार शक्तियां दरों को निर्धारित करती हैं। स्वास्थ्य सेवाओं की गुणवत्ता, लागत–प्रभावशीलता, सुलभता और वहनीयता सुनिश्चित करने के लिए संवैधानिक प्रावधानों और प्रचलित बाजार अर्थव्यवस्था के बीच संतुलन बनाना आज की सबसे बड़ी आवश्यकता है। इस संदर्भ में, समिति यह भली–भांति समझती है कि चिकित्सा पेशेवरों की उपचार कला और अंतर्निहित कौशल की कीमत को सटीक रूप से सीमित नहीं किया जा सकता है, लेकिन निम्न और मध्यम वर्ग के लोगों के हित में इसे मानवीय रूप से तर्कसंगत बनाया जा सकता है।
(पैरा 5.1.1)
औषधि (मूल्य नियंत्रण) आदेश, 2013
223. व्यापार मार्जिन के मुद्दे पर, समिति ने पाया है कि गैर–अनुसूचित दवाओं के सामान्य खुराक रूपों, जैसे कि टैबलेट, कैप्सूल, पाउच, गोंद और स्ट्रिप्स पर वितरकों, स्टॉकिस्टों, थोक विक्रेताओं और खुदरा विक्रेताओं का औसत मार्कअप लगभग 43% है। ऐसे उदाहरणों से पता चलता हैं कि उच्च व्यापार मार्जिन की घटना सामान्यतः मानक नहीं है, समिति चाहती है कि सरकार उभरते/उल्लेखनीय मामलों में उच्च व्यापार मार्जिन के मामले पर ध्यान दे। इस संबंध में, समिति सिफारिश करती है कि सरकार को व्यापार मार्जिन के युक्तिकरण के लिए उपयुक्त नीति और नियामक प्रावधान बनाने हेतु हितधारकों के साथ परामर्श शुरू करना चाहिए। परामर्श प्रक्रिया के दौरान, उठाई गई वैध चिंताओं, विशेष रूप से कम लागत वाले सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यमों (एमएसएमई) के निर्माताओं द्वारा, पर ध्यान देने की आवश्यकता है, जो अपने कम लागत वाली दवाओं को उपभोक्ताओं तक पहुंचाने के लिए बाजार विकास के लिए मुख्य रूप से व्यापार चैनल पर निर्भर हैं।
(पैरा 5.3.2)
224. समिति इस बात से प्रसन्न है कि मौजूदा मूल्य निर्धारण और नीतिगत ढांचे के परिणामस्वरूप भारत में गैर–अनुसूचित और अनुसूचित दोनों प्रकार की दवाओं की कीमतें आम तौर पर सभी श्रेणियों में और विनिर्माण एवं गैर–विनिर्माण दोनों देशों में सबसे कम हैं। हालांकि, समिति का मानना है कि आवश्यक दवाओं की सूची तैयार करने का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना होना चाहिए कि ये दवाएं पर्याप्त मात्रा में, उचित खुराक में और सुनिश्चित गुणवत्ता के साथ उपलब्ध हों। ऐसा इसलिए है क्योंकि आवश्यक दवाएं वे दवाएं हैं जो किसी भी आबादी की प्राथमिकता वाली स्वास्थ्य देखभाल आवश्यकताओं को पूरा करती हैं, जो प्रभावकारिता, सुरक्षा, गुणवत्ता पर आधारित होती हैं और इसमें उपचार की कुल लागत भी शामिल होती है। राष्ट्रीय स्वास्थ्य और प्रबंधन में (एनएलईएम) मूल रूप से ऐसी दवाओं की सूची होनी चाहिए जो सुरक्षित, प्रभावी हों और सामूहिक रूप से भारत की अधिकांश सार्वजनिक स्वास्थ्य चिंताओं का समाधान करती हों और लागत प्रभावी हों।
(पैरा 5.3.3)
राष्ट्रीय औषघ मूल्य निर्धारण प्राधिकरण (एनपीपीए)
225. समिति का मत है कि केवल दवाओं के मूल्य नियंत्रण तंत्र से सभी वर्गों के लिए सार्वभौमिक स्वास्थ्य सेवा की उपलब्धता सुनिश्चित करना अपर्याप्त है। राष्ट्रीय औषधि मूल्य निर्धारण नीति (एनपीपीपी), 2012 के मूलभूत सिद्धांतों के अनुसार, दवाओं की कीमतों पर नियामक नियंत्रण सस्ती स्वास्थ्य सेवा के लिए आवश्यक व्यापक रणनीति का केवल एक हिस्सा है। समिति का मानना है कि कम लागत वाली चिकित्सा सेवाएं प्रदान करने के लिए वैकल्पिक बुनियादी ढांचे का तेजी से विस्तार किया जाना चाहिए ताकि कमजोर वर्ग को अत्यधिक जेब खर्च से बचाया जा सके। इसलिए, समिति सिफारिश करती है कि सरकार को व्यापक रूप से विस्तारित कम लागत वाली जन–औषधि फार्मेसी श्रृंखला कार्यक्रम को तेजी से बढ़ाना चाहिए और ग्रामीण और अर्ध–शहरी जिलों में इसकी पहुंच को प्राथमिकता देनी चाहिए। समिति का यह भी मत है कि सरकार को इन फार्मेसी श्रृंखलाओं को प्रत्यक्ष सरकारी स्वास्थ्य सेवा और राज्य बीमा कार्यक्रमों के साथ सुचारू रूप से एकीकृत करना चाहिए, ताकि सस्ती जेनेरिक दवाएं सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवा वितरण के लिए पहली पसंद बन सकें। समिति जन औषधि केंद्रों के माध्यम से वितरित की जाने वाली दवाओं की गुणवत्ता संबंधी आशंकाओं को दूर करने के लिए गुणवत्ता जांच तंत्र की सिफारिश करती है।
(पैरा 5.4.6)
226. समिति का मत है कि डीपीसीओ, 2013 के अनुच्छेद 16 के तहत वैधानिक प्रावधान, जो थोक मूल्य सूचकांक (डब्ल्यूपीआई) के आधार पर निर्धारित दवाओं के लिए अधिकतम मूल्य सीमा के वार्षिक संशोधन की अनुमति देता है, व्यापक आर्थिक मुद्रास्फीति को ध्यान में रखने के लिए एक आवश्यक तंत्र है। हालांकि, समिति का मानना है कि चूंकि डब्ल्यूपीआई–आधारित वृद्धि स्पष्ट रूप से अधिकतम अनुमत वृद्धि को दर्शाती है और अनिवार्य वृद्धि नहीं है, इसलिए निर्माताओं द्वारा अपनी वास्तविक, स्थानीय उत्पादन लागतों की परवाह किए बिना नियमित रूप से और एकसमान रूप से अधिकतम अनुमत मूल्य वृद्धि का लाभ उठाने का जोखिम है। इसलिए, समिति सिफारिश करती है कि राष्ट्रीय औषधि मूल्य निर्धारण प्राधिकरण (एनपीपीए) को दवा कंपनियों द्वारा डब्ल्यूपीआई–आधारित मूल्य वृद्धि के औचित्य की जांच करने के लिए साक्ष्य–आधारित निगरानी और लेखापरीक्षा ढांचा स्थापित करना चाहिए। समिति का मत है कि इस तरह की बढ़ी हुई नियामक सतर्कता निर्धारित दवाओं की नियमित, मनमानी मूल्य वृद्धि को रोकेगी और यह सुनिश्चित करेगी कि डीपीसीओ का मूल उद्देश्य, आवश्यक दवाओं को उचित और न्यायसंगत कीमतों पर उपलब्ध कराना, पूरी तरह से अक्षुण्ण रहे।
(पैरा 5.7.4)
शंकर नेत्रालय
227. समिति इस बात की सराहना करती है कि शंकर नेत्रालय एक गैर–लाभकारी संस्था होने के नाते सभी उपचारों और सेवाओं के लिए एक पारदर्शी और मानकीकृत मूल्य निर्धारण नीति का पालन करता है। अस्पताल परिवर्तनीय शुल्क संरचना नहीं अपनाता है और सभी प्रकार के रोगियों के लिए उपचार लागत में एकरूपता सुनिश्चित करता है। इसने सामान्य शल्य चिकित्सा प्रक्रियाओं के लिए सुव्यवस्थित पैकेज दरें निर्धारित की हैं, जिनमें सर्जन की फीस, उपभोग्य वस्तुएं, जांच और शल्य चिकित्सा पश्चात देखभाल शामिल हैं, जिससे अस्पष्टता दूर होती है और रोगियों को अपने चिकित्सा खर्चों की योजना पहले से बनाने में मदद मिलती है। कई गैर-सरकारी अस्पतालों के विपरीत यह संस्था मांग, समय या तात्कालिकता के आधार पर भेदभावपूर्ण मूल्य निर्धारण नहीं करती है, जिससे सेवा वितरण में निष्पक्षता और समानता सुनिश्चित होती है। सर्जरी से पहले, रोगियों को लागू पैकेज दरों के साथ–साथ शुल्कों का विस्तृत विवरण दिया जाता है, जबकि किसी भी प्रकार की छूट, जैसे कि डिस्चार्ज के बाद की दवाएं, अस्पताल में अधिक समय तक रहना या विशेष जांच, के बारे में पहले से ही स्पष्ट रूप से सूचित किया जाता है। समिति ने पाया कि परामर्श शुल्क, डे–केयर सेवाएं और शल्य चिकित्सा पैकेज दरें अस्पताल के रिसेप्शन पर प्रदर्शित की जाती हैं और अनुरोध करने पर रोगियों को उपलब्ध कराई जाती हैं, जिससे पारदर्शिता को बढ़ावा मिलता है और रोगियों के अधिकारों की रक्षा होती है। अस्पताल प्रबंधन ने समिति के समक्ष लिखित रूप में इस बात पर ज़ोर दिया कि अस्पताल निदान या उपचार सेवाओं के लिए अत्यधिक शुल्क नहीं लेता है और सभी लागतें मानकीकृत, पारदर्शी और गुणवत्तापूर्ण नेत्र देखभाल को रोगी की आर्थिक स्थिति की परवाह किए बिना सुलभ बनाने के अपने उद्देश्य के अनुरूप हैं। समिति का मानना है कि शंकर नेत्रालय जैसे अन्य उत्कृष्टता केंद्रों को गुणवत्ता, सामर्थ्य और जनविश्वास के मानकों पर एक आदर्श माना जाना चाहिए और गैर-सरकारी तथा सरकारी दोनों क्षेत्रों के अन्य अस्पतालों को भी इसका अनुसरण करना चाहिए।
(पैरा 5.5.2)
228. समिति का मानना है कि कई गैर-सरकारी अस्पतालों में प्रचलित परिवर्तनशील, मांग–आधारित या आपातकालीन स्थिति–आधारित मूल्य निर्धारण की प्रथा स्वास्थ्य सेवाओं की वहनीयता को गंभीर रूप से प्रभावित करती है और रोगियों के लिए आर्थिक संकट का कारण बनती है। समिति का मानना है कि पूर्ण पारदर्शिता प्रभावी लागत युक्तिकरण की दिशा में पहला कदम है। इसलिए, समिति सिफारिश करती है कि सरकार सभी गैर-सरकारी और सरकारी स्वास्थ्य संस्थानों के लिए सभी मानक शल्य चिकित्सा और चिकित्सा प्रक्रियाओं के लिए निश्चित, एकीकृत पैकेज दरें तैयार करने और इन्हें सार्वजनिक रूप से प्रदर्शित करने के प्रावधान को सख्ती से अनिवार्य करे। ऐसे अनिवार्य पैकेजों में सर्जन की फीस, नैदानिक जांच, उपभोग्य वस्तुएं और मानक शल्य चिकित्सा पश्चात देखभाल शामिल होनी चाहिए। समिति का मानना है कि ऐसे उपायों से अस्पतालों द्वारा उपचार लागत का स्व–नियमन और युक्तिकरण होगा। समिति का यह भी मानना है कि छिपे हुए शुल्कों और भिन्न मूल्य निर्धारण को कानूनी रूप से समाप्त करने से उपचार लागत पर वास्तविक रूप से एक सीमा लग जाएगी और यह भी सुनिश्चित होगा कि रोगी मनमानी बिलिंग वृद्धि के डर के बिना अपने चिकित्सा खर्चों की सटीक योजना बना सकें।
(पैरा 5.5.8)
229. समिति का मानना है कि किफायती स्वास्थ्य सेवाओं की दीर्घकालिक स्थिरता, विशेष रूप से गैर-सरकारी और गैर–लाभकारी अस्पतालों द्वारा प्रदान की जाने वाली सेवाएं आयुष्मान भारत जैसी सरकारी स्वास्थ्य बीमा योजनाओं की दक्षता पर अत्यधिक निर्भर है। समिति का मत है कि दावों के निपटान में लगातार होने वाली प्रशासनिक देरी और अनियमितताएं गैर-सरकारी संस्थानों को आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों के लिए बिस्तर आरक्षित करने से हतोत्साहित करती हैं। इसलिए, समिति प्रतिपूर्ति प्रणाली में तत्काल सुधार और स्वचालन की सिफारिश करती है। सरकार को सभी राज्य और केंद्रीय स्वास्थ्य योजनाओं के तहत अस्पताल के बकाया भुगतान के लिए एक सख्त, वैधानिक समय-सीमा निर्धारित करनी चाहिए। समिति का दृढ़ विश्वास है कि जरूरतमंद मरीजों के हित और इलाज करने वाले अस्पतालों की परिचालन दक्षता में सुधार के लिए आयुष्मान भारत कार्ड बनाने की प्रक्रिया और अस्पतालों द्वारा दावों के निपटान की प्रक्रिया को सरल बनाया जाना चाहिए। इसके अलावा, पारस्परिक विश्वास, जवाबदेही और रियायती स्वास्थ्य सेवाओं में गैर-सरकारी सेवा प्रदाताओं की निर्बाध भागीदारी सुनिश्चित करने के लिए विलंबित भुगतानों पर दंडात्मक ब्याज का प्रावधान शुरू किया जाना चाहिए।
(पैरा 5.5.9)
230. समिति का मानना है कि वास्तविक स्वास्थ्य सेवाओं की सुलभता के लिए विशेषीकृत, उच्च गुणवत्ता वाली स्वास्थ्य सेवाओं को सीधे ग्रामीण और वंचित आबादी तक पहुंचाना आवश्यक है, जिससे यात्रा, आवास और वेतन हानि से जुड़े विनाशकारी अप्रत्यक्ष खर्चों को समाप्त किया जा सके। समिति का मानना है कि मोबाइल नेत्र शल्य चिकित्सा इकाइयों (एमईएसयू) जैसे विकेंद्रीकृत देखभाल मॉडल शहरी–ग्रामीण स्वास्थ्य सेवा अंतर को पाटने में अत्यधिक प्रभावी साबित हुए हैं। इसलिए, समिति सिफारिश करती है कि सरकार को पूरी तरह से सुसज्जित मोबाइल शल्य चिकित्सा और निदान इकाइयों को तैनात करने वाले सार्वजनिक और गैर-सरकारी संस्थानों के लिए लक्षित नीतिगत मान्यता, रसद सहायता और पूंजीगत सब्सिडी प्रदान करनी चाहिए। इन मोबाइल इकाइयों को राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य कार्यक्रमों में औपचारिक रूप से एकीकृत करने के साथ ही यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि नैदानिक सुरक्षा या गुणवत्ता से समझौता किए बिना मानकीकृत उपचार सबसे वंचित आबादी तक पहुंचे।
(पैरा 5.5.10)
231. समिति का मानना है कि अनावश्यक और बार–बार दोहराई जाने वाली अनुपालन संबंधी आवश्यकताएं स्वास्थ्य सेवा प्रदाताओं, विशेष रूप से क्रॉस–सब्सिडी मॉडल पर काम करने वाले गैर–लाभकारी संगठनों पर अनावश्यक प्रशासनिक और वित्तीय बोझ डालती हैं। समिति का मत है कि इस तरह की परिचालन संबंधी बाधाओं को कम करना स्वास्थ्य सेवा वितरण की समग्र लागत को कम करने के लिए आवश्यक है। इसलिए, समिति अस्पतालों से अपेक्षित सभी वैधानिक अनुपालन और रिपोर्टिंग के लिए एक केंद्रीकृत, एकल–खिड़की डिजिटल पोर्टल को तत्काल लागू करने की सिफारिश करती है, जिससे बार–बार होने वाले भौतिक दस्तावेज़ीकरण को प्रभावी ढंग से समाप्त किया जा सके। इसके अतिरिक्त, समिति का मानना है कि दीर्घकालिक स्वास्थ्य देखभाल लागतों को युक्तिसंगत बनाने का सबसे प्रभावी तरीका प्रारंभिक जांच, निदान, पहचान और आवश्यकता पड़ने पर उपचार है। समिति दृढ़ता से मानती है कि रोकथाम हमेशा इलाज से बेहतर है। समिति का मत है कि गैर–संक्रामक रोगों को निवारक स्वास्थ्य देखभाल के माध्यम से आसानी से नियंत्रित किया जा सकता है। इसके अलावा, समिति सिफारिश करती है कि सरकार निवारक जांच पहलों, जैसे कि स्कूल स्वास्थ्य कार्यक्रम, सामुदायिक आउटरीच शिविर और हृदय संबंधी जांच के लिए वित्तीय आवंटन में भारी वृद्धि करे ताकि राज्य और नागरिक दोनों पर उन्नत और जटिल बीमारियों के भविष्य के आर्थिक बोझ को काफी हद तक कम किया जा सके। इसके अलावा, नीतिगत कार्रवाई में स्कूल/कॉलेज जाने वाले बच्चों में जागरूकता कार्यक्रम और साथ ही सामुदायिक जागरूकता पर भी बल देने की आवश्यकता है।
(पैरा 5.5.11)
उपचार लागत के संबंध में गैर-सरकारी स्वास्थ्य सेवा क्षेत्र के मत
232. समिति को यह जानकारी मिली है कि मौजूदा कराधान संरचना अनजाने में चिकित्सा उपचार की कुल लागत को बढ़ा देती है। हालांकि स्वास्थ्य सेवाएँ जीएसटी से मुक्त हैं, फिर भी गैर-सरकारी स्वास्थ्य सेवा प्रदाता खरीदी गई वस्तुओं, चिकित्सा उपभोग्य सामग्रियों और सहायक सेवाओं पर भुगतान किए गए जीएसटी पर इनपुट टैक्स क्रेडिट (आईटीसी) का दावा नहीं कर सकते। यह दावा न किया जा सकने वाला कर एक अंतर्निहित परिचालन लागत बन जाता है जो अंततः रोगी पर ही पड़ता है। इसलिए, समिति सिफारिश करती है कि वित्त मंत्रालय को स्वास्थ्य सेवा क्षेत्र पर लागू जीएसटी ढांचे की व्यापक समीक्षा करनी चाहिए। सरकार को महत्वपूर्ण स्वास्थ्य सेवाओं को शून्य–कर छूट देने या एक विशेष धनवापसी/छूट तंत्र शुरू करने की व्यवहार्यता का मूल्यांकन करना चाहिए जिससे स्वास्थ्य सेवा प्रदाता आईटीसी का दावा कर सकें। समिति का मानना है कि इस अंतर्निहित कर भार को कम करने से गैर-सरकारी अस्पतालों के परिचालन खर्चों में तत्काल कमी आएगी, जिससे रोगी उपचार की निर्धारित लागत को कम करने के लिए तत्काल वित्तीय संसाधन उपलब्ध होंगे।
(पैरा 5.6.3)
233. समिति का मानना है कि अत्याधुनिक चिकित्सा प्रौद्योगिकी की खरीद के लिए आवश्यक अत्यधिक पूंजी, जिसका एक बड़ा हिस्सा आयात करना पड़ता है, निदान और शल्य चिकित्सा की उच्च लागत का मुख्य कारण है। इसलिए, समिति उन्नत, जीवन रक्षक चिकित्सा उपकरणों और उनके महत्वपूर्ण घटकों पर सीमा शुल्क, उपकर और संबंधित करों को काफी हद तक कम करने या समाप्त करने के लिए एक तर्कसंगत शुल्क संरचना तैयार करने की सिफारिश करती है। यह सुनिश्चित करने के लिए कि यह वित्तीय राहत सस्ती चिकित्सा देखभाल में तब्दील हो, समिति का मत है कि ऐसे उपकरणों पर कर छूट आयात करने वाली स्वास्थ्य सुविधाओं द्वारा उस विशिष्ट मशीनरी का उपयोग करने वाले निदान परीक्षणों और प्रक्रियाओं के लिए मानकीकृत, सीमित मूल्य निर्धारण के लिए प्रतिबद्धता पर सख्ती से निर्भर होनी चाहिए।
(पैरा 5.6.4)
234. समिति समझती है कि अचल संपत्ति अधिग्रहण की अत्यधिक व्यावसायिक लागत किफायती स्वास्थ्य सेवा अवसंरचना के विस्तार को गंभीर रूप से बाधित करती है, जिससे गैर-सरकारी संस्थानों को उपचार शुल्क बढ़ाकर भूमि निवेश की वसूली करनी पड़ती है। अतः समिति सिफारिश करती है कि स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय राज्य सरकारों के साथ समन्वय स्थापित करके नई स्वास्थ्य सुविधाओं की स्थापना के लिए रियायती या वरीयता–आधारित भूमि आवंटन हेतु एक एकीकृत राष्ट्रीय नीति का मसौदा तैयार करे। समिति का मानना है कि स्वास्थ्य सेवा क्षेत्र में निजी निवेशकों को दी जाने वाली ऐसी वरीयता–आधारित भूमि अनुदानों को विधिक रूप से इस बात से बाध्य किया जाना चाहिए कि वे जरूरतमंद रोगियों को रियायती/सब्सिडी दरों पर उपचार प्रदान करने के लिए मजबूत सामाजिक दायित्वों का पालन करें। रियायती भूमि से लाभान्वित होने वाले अस्पतालों को अपनी कुल बिस्तर क्षमता का 20% तक एक निश्चित प्रतिशत बाह्य रोगी, विशेष रूप से आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों के लिए, निर्धारित और सरकार द्वारा अनुमोदित दरों पर सेवाओं के लिए समर्पित करना अनिवार्य होना चाहिए।
(पैरा 5.6.5)
235. समिति को यह जानकारी मिली है कि सरकार द्वारा प्रायोजित स्वास्थ्य योजनाओं के लिए एकतरफा दर निर्धारण में आम तौर पर निजी क्षेत्र द्वारा आवश्यक बुनियादी ढांचे के निवेश, विशेषीकृत मानव संसाधन और प्रौद्योगिकी अपनाने की व्यावहारिक वास्तविकताओं को ध्यान में नहीं रखा जाता है। यद्यपि अनुभवजन्य डेटा संग्रह महत्वपूर्ण है, समिति का मानना है कि ऐसे डेटा की व्याख्या के लिए व्यावहारिक उद्योग संदर्भ आवश्यक है। इसलिए, समिति एक स्थायी, वैधानिक परामर्शदात्री मूल्य निर्धारण बोर्ड की स्थापना की सिफारिश करती है, जिसमें राष्ट्रीय स्वास्थ्य प्राधिकरण और प्रमुख निजी स्वास्थ्य देखभाल संघों के प्रतिनिधि शामिल हों। इस बोर्ड को पैकेज दरों के निर्धारण के लिए उपयोग किए जाने वाले वैज्ञानिक, साक्ष्य–आधारित लागत मॉडल को संयुक्त रूप से विकसित करने का कार्य सौंपा जाएगा। यह सुनिश्चित करके कि स्वास्थ्य योजनाओं के तहत मुआवजा गुणवत्तापूर्ण देखभाल प्रदान करने की वास्तविक लागत को सटीक रूप से दर्शाता है, समिति का दृढ़ विश्वास है कि सरकार इन कार्यक्रमों की वित्तीय स्थिरता सुनिश्चित कर सकती है और निजी अस्पतालों को सामान्य श्रेणी के रोगियों के उपचार लागत को बढ़ाकर योजना से हुए नुकसान की भरपाई करने से रोक सकती है।
(पैरा 5.6.6)
जवाहरलाल नेहरू मेडिकल कॉलेज (जेएनएमसी)
236. समिति का विचार है कि पूर्वनिर्धारित पैकेज अवधियों को सख्ती से लागू करने से जटिल और गंभीर मामलों का इलाज करने वाले स्वास्थ्य देखभाल संस्थानों को अनुचित रूप से नुकसान होता है। न्यूरोसर्जरी, कार्डियोवैस्कुलर और थोरेसिक सर्जरी (सीवीटीएस), ऑर्थोपेडिक्स और क्रिटिकल केयर जैसी उच्च लागत वाली विशिष्टताओं से जुड़े उपचारों में अक्सर मानक पैकेज मापदंडों से अधिक समय तक गहन चिकित्सा इकाई (आईसीयू) में रहने की आवश्यकता होती है। समिति का मानना है कि अस्पतालों को इन अतिरिक्त लागतों को वहन करने के लिए मजबूर करना योजना के गंभीर रूप से बीमार लाभार्थियों की भर्ती में एक गंभीर बाधा के रूप में कार्य करता है। इसलिए, समिति अधिक अवधि तक चलने वाले क्रिटिकल केयर को मानक सर्जिकल पैकेजों से तुरंत अलग करने की सिफारिश करती है। “असामान्य घटनाओं” को वर्गीकृत करने के लिए स्पष्ट नैदानिक मापदंड परिभाषित करने होंगे। चिकित्सा आवश्यकता के कारण निर्धारित पैकेज अवधि से अधिक समय तक अस्पताल में रहने की स्थिति में, अस्पतालों को उक्त पैकेज के स्थान पर एक पूर्वनिर्धारित दैनिक सीमा के अधीन एक खुली, मद–वार बिलिंग प्रणाली अपनाने की अनुमति दी जानी चाहिए, जिससे कुल व्यय पर अधिकतम सीमा बनाए रखते हुए उचित मुआवजा सुनिश्चित हो सके।
(पैरा 5.7.11)
237. समिति का मानना है कि आयुष्मान भारत–पीएमजेएवाई आईटी पोर्टल और इसी तरह के राज्य पोर्टलों में कार्यात्मक सीमाओं और कठोर प्रक्रियात्मक एल्गोरिदम के कारण दावों की परिहार्य अस्वीकृति और प्रशासनिक देरी होती है, जिससे अंततः स्वास्थ्य देखभाल प्रदायगी की परिचालन लागत बढ़ जाती है। इसलिए, समिति सभी राष्ट्रीय और राज्य स्वास्थ्य बीमा आईटी पोर्टलों के व्यापक तकनीकी कायाकल्प की सिफारिश करती है। उन्नत बुनियादी ढांचे में परिवार स्तर पर उच्च लागत वाली नैदानिक जांचों (जैसे एमआरआई और सीटी स्कैन) के लिए वार्षिक उपयोग सीमा की वास्तविक समय में जानकारी उपलब्ध होनी चाहिए ताकि सटीक उपचार योजना बनाई जा सके। इसके अलावा, समिति इन पोर्टलों पर डिजिटल भंडारण क्षमता के तत्काल विस्तार की सिफारिश करती है ताकि लंबे समय तक आईसीयू में रहने से संबंधित भारी मात्रा में चिकित्सा अभिलेखों को आसानी से अपलोड किया जा सके। एक पारदर्शी, द्विदिशी ट्रैकिंग तंत्र भी अनिवार्य रूप से स्थापित किया जाना चाहिए, जो स्वास्थ्य प्राधिकारियों को दावों की अस्वीकृति का विस्तृत औचित्य-स्थापन करने के लिए बाध्य करे और अस्पतालों को वर्तमान 15-दिन की सीमित समय सीमा से परे एक उचित अपील अवधि प्रदान करे।
(पैरा 5.7.12)
238. समिति का मत है कि गंभीर स्थिति वाले रोगियों को तृतीयक चिकित्सा देखभाल प्राप्त करने से पहले प्राथमिक और जिला स्तरीय अस्पतालों से अनिवार्य रूप से क्रमबद्ध तरीके से गुजारने से घातक देरी होती है, रोगी की नैदानिक स्थिति और बिगड़ जाती है और अंततः भर्ती होने पर उपचार की लागत बढ़ जाती है। इसलिए, समिति सभी स्तरों की स्वास्थ्य देखभाल सुविधाओं को जोड़ने वाली एक वास्तविक समय, डिजिटल रेफरल प्रणाली को तत्काल लागू करने की सिफारिश करती है। स्पष्ट नैदानिक ट्राइएज प्रोटोकॉल स्थापित करने होंगे ताकि निचले स्तर के चिकित्सा अधिकारी मध्यवर्ती जिला अस्पतालों को दरकिनार करते हुए जटिल, जानलेवा स्थितियों के लिए सूचीबद्ध तृतीयक चिकित्सा देखभाल संस्थानों में सीधे रेफर कर सकें। समिति का मानना है कि इस प्रक्रिया को सुव्यवस्थित करने से अस्पताल में रहने की कुल अवधि काफी कम हो जाएगी, कई सुविधा केन्द्रों में अनावश्यक नैदानिक परीक्षण कराने की आवश्यकता कम हो जाएगी और उपचार की कुल लागत में भारी कमी आएगी।
(पैरा 5.7.13)
239. समिति का विचार है कि विशेष उपचारों, विशेषकर अस्थि रोग और हृदय रोग के क्षेत्र में, वास्तविक वहनीयता प्राप्त करना तब तक असंभव है जब तक यह क्षेत्र आयातित इम्प्लांट्स और चिकित्सा उपकरणों पर अत्यधिक निर्भर रहेगा। इसके अलावा, लाइसेंस और उपयोगिता शुल्क के उद्देश्य से अस्पतालों को वाणिज्यिक उद्योगों के रूप में मानना अनावश्यक रूप से उनकी बुनियादी परिचालन लागतों को बढ़ा देता है। इसलिए, समिति सिफारिश करती है कि सरकार को उच्च लागत वाले सर्जिकल इम्प्लांट्स, स्टेंट और विशेष गहन देखभाल उपभोग्य सामग्रियों के घरेलू उत्पादन को सख्ती से लक्षित करने के लिए उत्पादन–आधारित प्रोत्साहन (पीएलआई) योजना का सक्रिय रूप से विस्तार करना चाहिए। साथ ही, समिति का यह भी मत है कि राज्य सरकारों को स्वास्थ्य देखभाल सुविधाओं पर लगाए गए संस्थागत लाइसेंसिंग शुल्कों की व्यापक समीक्षा करने और उन्हें युक्तिसंगत बनाने का निर्देश दिया जाना चाहिए। समिति वैधानिक लाइसेंस, उपयोगिता शुल्क और परिचालन शुल्क के उद्देश्य से अस्पतालों को औद्योगिक श्रेणी के बजाय आवश्यक सेवा श्रेणी के अंतर्गत पुनर्वर्गीकृत करने की सिफारिश करती है, जिससे रोगियों पर पड़ने वाली अतिरिक्त लागतों में प्रत्यक्ष रूप से कमी आएगी।
(पैरा 5.7.14)
240. समिति का मत है कि आयुष्मान भारत–पीएमजेएवाई और विभिन्न राज्य–संचालित स्वास्थ्य बीमा योजनाओं, जैसे आयुष्मान भारत आरोग्य कर्नाटक (एबी–आर्क), के तहत दी जाने वाली पैकेज दरों में मौजूदा असमानता स्वास्थ्य देखभाल वित्तपोषण के एक खंडित पारितंत्र को जन्म देता है। समिति ने तृतीयक देखभाल प्रदाताओं द्वारा प्रस्तुत उन सुझावों पर ध्यान दिया है जिनमें यह बताया गया है कि कई उच्च लागत वाली विशिष्टताओं के लिए वर्तमान पीएमजेएवाई दरें अपर्याप्त हैं, जो निजी क्षेत्र की भागीदारी को हतोत्साहित करती हैं और लाभार्थियों की जटिल प्रक्रियाओं तक पहुंच को सीमित करती हैं। समिति का मानना है कि उचित संस्थागत मुआवजे का निर्धारण करने के लिए एक मानकीकृत, साक्ष्य–आधारित दृष्टिकोण की तत्काल आवश्यकता है। इसलिए, समिति सिफारिश करती है कि सरकार एक स्वतंत्र, बहु–विषयक ‘स्वास्थ्य प्रौद्योगिकी मूल्यांकन और लागत निर्धारण बोर्ड‘ का गठन करे, जिसे सभी राष्ट्रीय और राज्य स्वास्थ्य बीमा योजनाओं में मानक पैकेज दरों के वैज्ञानिक युक्तिकरण और आवधिक संशोधन का कार्य सौंपा जाए। इस बोर्ड को यह सुनिश्चित करना होगा कि पैकेज दरें वास्तविक क्षेत्रीय खरीद लागत, मुद्रास्फीति और मानकीकृत नैदानिक प्रोटोकॉल के अनुरूप सक्रिय रूप से अनुक्रमित हों, जिससे स्वास्थ्य देखभाल प्रदाताओं के लिए समान पारिश्रमिक सुनिश्चित करते हुए केंद्रीय और राज्य दरों में सामंजस्य स्थापित हो सके।
(पैरा 5.7.15)
241. समिति का विचार है कि योजना की पात्रता, उपयोग सीमा और जटिल दस्तावेज़ीकरण संबंधी आवश्यकताओं के संबंध में सूचना की विषमता अक्सर लाभार्थियों और अस्पताल प्रशासनों के बीच गंभीर परिचालन संबंधी बाधाओं और अनावश्यक विवादों को जन्म देती है। समिति का मानना है कि समर्पित संस्थागत सुविधा, जैसा कि जेएनएमसी में जनसंपर्क अधिकारियों (पीआरओ) और परामर्शदाताओं की सफल तैनाती से प्रदर्शित होता है, योजना के उपयोग में उल्लेखनीय सुधार ला सकती है और कमजोर तबके के रोगियों को शोषण से बचा सकती है। इसके अलावा, समिति का विचार है कि एक मजबूत, सुलभ शिकायत निवारण अवसंरचना जनता का भरोसा जीतने के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। इसलिए, समिति सिफारिश करती है कि सरकार राष्ट्रीय स्वास्थ्य योजनाओं के अंतर्गत सूचीबद्ध सभी तृतीयक देखभाल अस्पतालों में समर्पित ‘रोगी मार्गदर्शन और शिकायत निवारण प्रकोष्ठ‘ स्थापित करने को अनिवार्य करे। लाभार्थियों को सक्रिय रूप से शिक्षित करने, सुगम दस्तावेज़ीकरण में सहायता करने और रोगियों की शिकायतों के समयबद्ध और पारदर्शी समाधान को सुनिश्चित करने के लिए इन प्रकोष्ठों में प्रशिक्षित परामर्शदाताओं की पूरी संख्याबल के साथ-साथ डिजिटल ट्रैकिंग, व्हाट्सएप इंटरफेस और भौतिक शिकायत पेटियों सहित बहुआयामी संचार प्लेटफार्मों की सुविधा उपलब्ध होनी चाहिए।
(पैरा 5.7.16)
आरआईएमएस अस्पताल, इम्फाल
242. समिति का मत है कि चिकित्सा उपचारों की बुनियादी लागत को कम करने के लिए पारदर्शी संस्थागत खरीद तंत्र स्थापित करना अत्यंत आवश्यक है। सरकारी ई–मार्केटप्लेस (जेम) के सफल एकीकरण और आरआईएमएस जैसे सार्वजनिक संस्थानों में ‘अमृत’ और जन औषधि केंद्रों की स्थापना को ध्यान में रखते हुए, समिति का मानना है कि ऐसे मॉडल दवाओं और उपभोग्य सामग्रियों पर रोगी की जेब से होने वाले अत्यधिक खर्च को काफी हद तक कम करते हैं। अतः समिति सिफारिश करती है कि सरकार को सार्वजनिक और निजी दोनों क्षेत्रों के सभी एबी-पीएमजेएवाई सूचीबद्ध अस्पतालों के परिसर में ‘अमृत’ और जन औषधि फार्मेसियों की स्थापना अनिवार्य करनी चाहिए। इसके अतिरिक्त, समिति सिफारिश करती है कि सरकार ऐसे नियामक दिशानिर्देश तैयार करे जिनके तहत निजी सूचीबद्ध अस्पतालों के लिए केंद्रीकृत, पारदर्शी निविदा–आधारित खरीद प्रणाली अपनाना आवश्यकता हो, ताकि जीवन रक्षक उपभोग्य सामग्रियों और चिकित्सा उपकरणों पर लगाए जाने वाले आंतरिक मार्क–अप को पारस्परिक रूप से सहमत सीमा तक सख्ती से सीमित किया जा सके, जैसे कि सक्रिय संस्थानों में देखा जाने वाला 20 प्रतिशत मार्जिन।
(पैरा 5.8.7)
243. समिति समझती है कि जब संस्थागत स्टॉक की कमी के कारण मरीजों को निजी विक्रेताओं से शल्य चिकित्सा सामग्री और निदान उपकरण अपनी जेब से खरीदने के लिए मजबूर होना पड़ता है, तो पूरी तरह से मुफ्त सार्वजनिक स्वास्थ्य देखभाल का मूल उद्देश्य गंभीर रूप से कमजोर हो जाता है। समिति चिंता के साथ समुक्ति करती है कि यहां तक कि उन सार्वजनिक संस्थानों में भी जो स्पष्ट रूप से मुफ्त प्रमुख शल्य चिकित्सा प्रक्रियाएं प्रदान करते हैं, मरीजों को अक्सर कैंसर संबंधी सामग्री या विशेष डायलिसिस ट्यूबिंग जैसी महत्वपूर्ण वस्तुओं के लिए भारी वित्तीय बोझ उठाना पड़ता है। समिति का मानना है कि व्यापक स्वास्थ्य देखभाल की उपलब्धता यह सुनिश्चित करती है कि सरकारी तृतीयक सुविधा में उपचार चाहने वाले किसी भी मरीज को आवश्यक शल्य चिकित्सा सामग्री के लिए भारी अतिरिक्त लागत का सामना न करना पड़े। इसलिए, समिति सिफारिश करती है कि सरकार सरकारी अस्पतालों में उच्च मूल्य वाली सामग्री और शल्य चिकित्सा इम्प्लाट्स की निरंतर, निर्बाध आपूर्ति के लिए विशेष रूप से निर्धारित बजटीय आवंटन में वृद्धि करे। समिति आगे डिजिटल इन्वेंटरी प्रबंधन प्रणालियों द्वारा समर्थित एक स्वचालित ‘जीरो–स्टॉकआउट पॉलिसी‘ के कार्यान्वयन की सिफारिश करती है जो क्रिटिकल आपूर्ति सीमा पार होने से बहुत पहले ही त्वरित सरकारी खरीद को सक्रिय कर दे।
(पैरा 5.8.8)
उपचार लागतों का मानकीकरण
244. समिति का यह सुविचारित मत है कि मानक पैकेज दरों का सार्वजनिक प्रदर्शन आवश्यक है, लेकिन कैंसर जैसी जटिल, बहु–चरण वाली बीमारियों के प्रबंधन के लिए अत्यधिक व्यक्तिगत उपचार योजनाओं की आवश्यकता होती है, जिससे आम नागरिक के लिए कुल लागत का अनुमान लगाना मुश्किल हो जाता है। समिति का मानना है कि रोगियों को वित्तीय अनिश्चितताओं और उपचार के दौरान बिल में अचानक होने वाली वृद्धि से बचाना आवश्यक है। इसलिए, समिति सिफारिश करती है कि सरकार एक वैधानिक आदेश लागू करे जिसके तहत सभी तृतीयक देखभाल अस्पतालों को किसी भी जटिल या दीर्घकालिक चिकित्सा प्रक्रिया शुरू करने से पहले रोगी को एक व्यापक, कानूनी रूप से बाध्यकारी अग्रिम लागत अनुमान प्रदान करना अनिवार्य हो। इसके अलावा, अस्पतालों के लिए समर्पित ‘वित्तीय मार्गदर्शक‘ नियुक्त करना बाध्यकारी किया जाना चाहिए, जो विशेष परामर्शदाता हों और रोगियों और उनके परिवारों को इन अनुमानों, उपलब्ध परोपकारी सहायता और स्वास्थ्य बीमा सीमाओं के बारे में मार्गदर्शन प्रदान करें, जिससे पूर्ण रूप से सूचित वित्तीय योजना बनाना संभव हो सके।
(पैरा 5.9.7)
245. समिति का यह सुविचारित मत है कि कुछ निजी अस्पताल, विशेषकर महानगरों में स्थित निजी अस्पताल, अस्पताल में रहने के लिए भारी शुल्क वसूलते हैं। अस्पतालों के बिलिंग ढांचे का विश्लेषण करने के बाद समिति का मानना है कि कमरे के शुल्कों को तर्कसंगत बनाना तत्काल आवश्यक है। समिति समझती है कि अस्पताल के कमरे के शुल्क एक समान नहीं होते और भौगोलिक क्षेत्रों के साथ–साथ एक ही क्षेत्र के अस्पतालों में भी बुनियादी ढांचे, सेवा स्तर और परिचालन लागत में अंतर के कारण ये भिन्न होते हैं। इसलिए समिति सिफारिश करती है कि किसी अस्पताल के कमरे का शुल्क अस्पताल के आसपास के क्षेत्र में स्थित तीन सितारा होटलों के कमरे के शुल्क से अधिक नहीं होना चाहिए। मूल कमरे के शुल्क में रेसिडेंट डॉक्टर की लागत, नर्सिंग लागत, उपभोग्य सामग्रियों की लागत, भोजन शुल्क और कपड़े धोने का शुल्क जोड़ा जा सकता है, जिससे कुल लागत तर्कसंगत हो जाए।
(पैरा 5.9.8)
246. समिति का दृढ़ मत है कि वर्तमान व्यवस्था में वित्तीय सीमा अक्सर केवल गंभीर उपचारों या शल्य चिकित्सा प्रक्रियाओं तक ही सीमित रहती है, जिससे मरीज़ों को लंबे समय तक चलने वाले फॉलो–अप, पुनर्वास या जीवन के अंतिम चरण की देखभाल के दौरान अनियंत्रित जेब खर्चों का सामना करना पड़ता है। समिति का मानना है कि वास्तविक वहनीयता में रोग प्रबंधन का संपूर्ण जीवनचक्र शामिल होना चाहिए। इसलिए, समिति ‘निरंतर देखभाल‘ पैकेजों के निर्माण और नियामक प्रवर्तन की सिफारिश करती है। इन उन्नत पैकेजों में निवारक जांच, निदान, उपचारात्मक और प्रशामक सेवाओं को एक ही सीमित वित्तीय दायरे में व्यापक रूप से शामिल किया जाना चाहिए, जिससे यह सुनिश्चित हो सके कि आर्थिक रूप से कमजोर मरीज़ महत्वपूर्ण प्रशामक या सहायक चरणों के दौरान चिकित्सा देखभाल छोड़ने के लिए मजबूर न हों।
(पैरा 5.9.9)
247. समिति का मत है कि इम्युनोथेरेपी, जीनोमिक चिकित्सा और लक्षित चिकित्सा जैसी नवीन, अत्यंत प्रभावी उपचार पद्धतियाँ अत्यंत महंगी बनी हुई हैं। इन्हें सीधे मानक निर्धारित पैकेजों में एकीकृत करने से स्वास्थ्य बीमा योजनाओं के वित्तीय संधारणीयता पर गंभीर संकट आ सकता है। समिति का मानना है कि प्रत्येक अस्पताल द्वारा कारपोरेट सामाजिक उत्तरदायित्व (सीएसआर) और परोपकारी निधियों का खंडित रूप से जुटाया जाना, हालांकि सराहनीय है, राष्ट्रीय स्तर पर इसे प्राप्त करने के लिए अपर्याप्त है। इसलिए, समिति एक उच्च विनियमित, केंद्रीकृत राष्ट्रीय/राज्य स्वास्थ्यदेखभाल कोष की स्थापना की सिफारिश करती है। इस कोष को कारपोरेट क्षेत्र से सीएसआर योगदान, परोपकारी दान और धर्मार्थ अनुदानों को व्यवस्थित रूप से एकत्रित करना चाहिए। इन एकत्रित संसाधनों को पात्र रोगियों के लिए उन्नत, उच्च लागत वाली चिकित्साओं पर सब्सिडी देने या पूरी तरह से वित्तपोषित करने के लिए सख्ती से निर्धारित किया जाना चाहिए, जिससे अस्पताल के परिचालन बजट पर बोझ डाले बिना मानक वाणिज्यिक मूल्य निर्धारण बाधाओं को दरकिनार किया जा सके।
(पैरा 5.9.10)
248. समिति को ज्ञात है कि गंभीर बीमारियों का तीव्र मनोवैज्ञानिक और भावनात्मक आघात अक्सर गंभीर अवसाद, आजीविका की हानि और अंततः उपचार को बीच में छोड़ने की ओर ले जाता है। इस प्रकार उपचार बीच में छोड़ना न केवल रोगी के जीवन को खतरे में डालता है, बल्कि पहले से खर्च किए गए चिकित्सा संसाधनों और वित्तीय निवेशों की भारी बर्बादी भी करता है। समिति का मत है कि मानसिक स्वास्थ्य और मनोसामाजिक सहायता कोई अतिरिक्त विलासिता नहीं हैं, बल्कि नैदानिक आवश्यकताएँ हैं जो उपचार के प्रति प्रतिबद्धता को सीधे तौर पर बढ़ाती हैं और परिणामों को बेहतर बनाती हैं। इसलिए, समिति सिफारिश करती है कि संरचित मनोवैज्ञानिक परामर्श, भावनात्मक सहायता सेवाएँ और रोगी सहायता समूह सार्वजनिक और निजी दोनों क्षेत्रों में गंभीर, दीर्घकालिक और असाध्य रोगों के लिए सभी अनुमोदित उपचार प्रोटोकॉल और सीमित वित्तीय पैकेजों में अनिवार्य, निःशुल्क घटकों के रूप में औपचारिक रूप से एकीकृत किए जाएँ।
(पैरा 5.9.11)
249. समिति का मत है कि चिकित्सा उपकरणों के 70 से 80 प्रतिशत घटकों, जैसे कि चिकित्सा–ग्रेड इलेक्ट्रॉनिक्स, सेंसर, सेमीकंडक्टर और सटीक इंजीनियरिंग वाले पुर्जों के लिए आयात पर संरचनात्मक निर्भरता, भारत की वैश्विक प्रतिस्पर्धात्मकता को गंभीर रूप से बाधित करती है और स्वास्थ्य सेवा की आधारभूत लागत को संरचनात्मक रूप से बढ़ाती है। समिति का मानना है कि चिकित्सा उपकरण घटक निर्माण में निहित उच्च पूंजी गहनता, लंबी निर्माण अवधि और प्रौद्योगिकी जोखिमों को संभालने के लिए पारंपरिक वित्तपोषण तंत्र मौलिक रूप से अपर्याप्त हैं। इसलिए, समिति सिफारिश करती है कि सरकार राष्ट्रीय चिकित्सा उपकरण नीति, 2023 के तहत प्रस्तावित राष्ट्रीय चिकित्सा उपकरण घटक वित्तपोषण ढांचा (एनएमडीसीएफएफ) को तत्काल लागू करे। इस ढांचे में जीवनचक्र–आधारित वित्तपोषण दृष्टिकोण को अपनाना होगा, जिसमें दीर्घकालिक रियायती ऋण, ऋण गारंटी योजनाएं और अनुसंधान एवं विकास अनुदान जैसे लक्षित साधनों का उपयोग करके घरेलू उद्योग को केवल संयोजन कार्यों से उच्च–मूल्य वाले, महत्वपूर्ण इनपुट के स्वदेशी विनिर्माण की ओर अग्रसर किया जा सके।
(पैरा 5.11.7)
250. समिति इस बात पर विचार करती है कि क्षमता निर्माण के लिए पूंजी और तकनीकी सहायता अत्यंत आवश्यक हैं, वहीं स्वदेशी चिकित्सा उपकरण घटक निर्माताओं की व्यावसायिक व्यवहार्यता सुनिश्चित करने के लिए एक पूर्वानुमानित और सुनिश्चित घरेलू बाजार का निर्माण भी उतना ही आवश्यक है। समिति का मानना है कि गारंटीकृत मांग के बिना, घरेलू निर्माताओं को स्थापित वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं के मुकाबले पैमाने की अर्थव्यवस्थाओं को प्राप्त करने में कठिनाई होगी। इसलिए, समिति सिफारिश करती है कि सरकार को सख्त तरजीही सार्वजनिक खरीद नीतियों को लागू करके एनएमडीसीएफएफ के ‘बाजार विकास और मांग आश्वासन‘ स्तंभ को सक्रिय रूप से कार्यान्वित करना चाहिए। स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय के अंतर्गत आने वाले खरीद मंचों और एजेंसियों, जिनमें प्रमुख रूप से जीईएम, पीएमजेएवाई, सीजीएचएस और ईएसआईसी शामिल हैं, को कड़े घरेलू मूल्यवर्धन मानदंडों को लागू करने और घरेलू निर्माताओं को दीर्घकालिक खरीद प्रतिबद्धताएं प्रदान करने के लिए अनिवार्य किया जाना चाहिए, जिससे संरचनात्मक रूप से आत्मनिर्भरता को प्रोत्साहन मिले।
(पैरा 5.11.8)
251. समिति का मत है कि एनएमडीसीएफएफ के सफल क्रियान्वयन के लिए विभिन्न प्रशासनिक, वैज्ञानिक और वित्तीय क्षेत्रों में निर्बाध समन्वय आवश्यक है, न कि मंत्रालयों को अलग–थलग नौकरशाही तंत्र में कार्य करने की अनुमति देना। समिति का मानना है कि प्रायोगिक विनिर्माण और प्रौद्योगिकी हस्तांतरण से लेकर वैश्विक बाजार विस्तार तक की जटिल चुनौतियों का समाधान करने के लिए एक एकीकृत और गतिशील संस्थागत संरचना की आवश्यकता है। अतः समिति औषध विभाग के नेतृत्व में एक समन्वित, बहु–एजेंसी शीर्ष तंत्र की औपचारिक स्थापना की सिफारिश करती है। इस निकाय को जोखिम साझाकरण के लिए एसआईडीबीआई और एनएबीएफआईडी जैसे वित्तीय संस्थानों, अनुसंधान और नवाचार के लिए डीबीटी, डीएसटी और आईसीएमआर जैसे वैज्ञानिक निकायों और निर्यात प्रोत्साहन के लिए वाणिज्य और उद्योग मंत्रालय को व्यवस्थित रूप से एकीकृत करना चाहिए, जिससे एक समग्र, संपूर्ण पारिस्थितिकी तंत्र सुनिश्चित हो सके जो भारत की चिकित्सा उपकरण आपूर्ति श्रृंखला को स्थायी रूप से सुरक्षित करे।
(पैरा 5.11.9)
252. समिति का मत है कि चिकित्सा उपकरणों की कीमतों को तर्कसंगत बनाने के लिए तदर्थ या विशुद्ध रूप से प्रतिक्रियात्मक निर्णय लेने की ऐतिहासिक निर्भरता एक जटिल, आधुनिक स्वास्थ्य सेवा प्रणाली के लिए अपर्याप्त है। इसलिए, समिति 100-अंकों वाले चिकित्सा उपकरण मूल्य विनियमन स्कोर (एमडीपीआरएस) के समान संरचित, बहु–मानदंड, साक्ष्य–आधारित प्राथमिकता निर्धारण ढांचे के औपचारिक संस्थागतकरण की सिफारिश करती है। सरकार को सभी अनियमित चिकित्सा उपकरणों का महत्वपूर्ण आयामों, जिनमें प्रमुख रूप से रोग का बोझ, वार्षिक प्रक्रिया मात्रा और जेब से होने वाला खर्च शामिल है, के आधार पर मूल्यांकन करने के लिए एक वैधानिक जनादेश स्थापित करना चाहिए। समिति का मानना है कि इस पारदर्शी, पुनरुत्पादक कार्यपद्धति को लागू करने से नियामक प्राधिकरण उन उपकरणों की व्यवस्थित रूप से पहचान और प्राथमिकता निर्धारित कर सकेंगे जिन पर तत्काल हस्तक्षेप की आवश्यकता है, जिससे नियामक कार्रवाइयों को उद्योग की अपारदर्शिता और मनमानी नीति निर्माण से बचाया जा सकेगा।
(पैरा 5.11.10)
253. समिति का मानना है कि सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए सबसे अधिक आवश्यक श्रेणी में रखे गए चिकित्सा उपकरण, विशेष रूप से एमडीपीआरएस ढांचे पर 80 से अधिक अंक प्राप्त करने वाले उपकरण, कमजोर रोगी आबादी के लिए सबसे बड़ा वित्तीय जोखिम पैदा करते हैं। इसलिए, समिति ‘प्राथमिकता I’ के रूप में वर्गीकृत सभी चिकित्सा उपकरणों के लिए तत्काल और पूर्ण रूप से वैधानिक मूल्य सीमा निर्धारित करने की सिफारिश करती है। इस वर्गीकरण के तहत अधिकतम खुदरा मूल्य निर्धारित करने के लिए स्वचालित नियामक हस्तक्षेप होना चाहिए, जैसा कि पहले कोरोनरी स्टेंट और घुटने के प्रत्यारोपण के मामले में सफलतापूर्वक किया गया था। समिति का यह मत है कि अधिक मात्रा में उपयोग किए जाने वाले और अधिक बीमारियों से प्रभावित करने वाले उपकरणों को लक्षित करने से निम्न और मध्यम आय वर्ग के लोगों द्वारा वहन किए जाने वाले स्वास्थ्य व्यय की सबसे गंभीर समस्याओं को तुरंत कम किया जा सकेगा।
(पैरा 5.11.11)
254. समिति का मानना है कि निर्माता या आयातक और अंतिम उपभोक्ता तक पहुंचने के बीच अक्सर होने वाले अत्यधिक और अनियमित व्यापार लाभ मार्जिन, विभिन्न स्वास्थ्य सेवा प्रदाताओं में देखी जाने वाली कीमतों में भारी अंतर के मुख्य कारण हैं। इसलिए, समिति सिफारिश करती है कि ‘प्राथमिकता II’ श्रेणी (एमडीपीआरएस 60-79) में आने वाले उपकरणों या आयात पर अत्यधिक निर्भरता दर्शाने वाले उपकरणों के लिए, सरकार को व्यापार लाभ मार्जिन को तर्कसंगत बनाने के लिए सख्त नियम लागू करने चाहिए। एक समान मूल्य सीमा लगाने के बजाय, नियामक प्राधिकरण को बिक्री के पहले बिंदु (वितरक को मूल्य) से अधिकतम खुदरा मूल्य (एमआरपी) तक अधिकतम अनुमेय प्रतिशत लाभ को सीमित करना चाहिए। समिति का मानना है कि यह लक्षित दृष्टिकोण आपूर्ति श्रृंखला में शोषणकारी मुनाफाखोरी को समाप्त करेगा और साथ ही विभिन्न प्रकार के विशिष्ट नैदानिक उपकरणों के लिए बाजार की व्यवहार्यता को बनाए रखेगा।
(पैरा 5.11.12)
255. समिति का मानना है कि लागत को तर्कसंगत बनाना एक प्राथमिक उद्देश्य है, लेकिन मूल्य विनियमन से अनजाने में चिकित्सा नवाचार बाधित नहीं होना चाहिए, अत्याधुनिक उपचारों की उपलब्धता सीमित नहीं होनी चाहिए या नैदानिक परिणामों पर कोई नकारात्मक प्रभाव नहीं पड़ना चाहिए। इसलिए, समिति सिफारिश करती है कि किसी भी विशिष्ट उपकरण के लिए मूल्य विनियमन की सीमा तय करने से पहले नियामक ढांचे में स्वास्थ्य प्रौद्योगिकी मूल्यांकन (एचटीए) और ठोस नैदानिक साक्ष्यों को संरचनात्मक रूप से एकीकृत किया जाए। समीक्षाधीन उपकरणों के लिए चिकित्सीय श्रेष्ठता और चिकित्सीय विकल्पों की उपलब्धता का मूल्यांकन एक समर्पित विशेषज्ञ समिति द्वारा किया जाना चाहिए। समिति का मानना है कि यदि नियामक निर्णय पूरी तरह से साक्ष्य–आधारित हों, तो एक ओर तर्कसंगत लागत पर उपचार की सुलभता और वहनीयता तथा दूसरी ओर सार्वजनिक और निजी स्वास्थ्य सेवा क्षेत्रों में विश्व स्तरीय नैदानिक मानकों को बनाए रखने की दोहरी अनिवार्यता के बीच संतुलन स्थापित किया जा सकेगा।
(पैरा 5.11.13)
256. समिति का मत है कि किसी मेडिकल डिवाइस पार्क की सफलता तभी संभव है जब उसमें विश्व स्तरीय परीक्षण प्रयोगशालाएँ हों, जिन्हें भारतीय गुणवत्ता परिषद द्वारा गुणवत्ता मानकों के लिए अधिसूचित और प्रमाणित किया गया हो। इन प्रयोगशालाओं को श्रेणी ए, बी, सी और डी सहित सभी प्रकार के चिकित्सा उपकरणों की जाँच करने का अधिकार होना चाहिए। श्रेणी ए और बी के चिकित्सा उपकरणों के लिए भी लाइसेंसिंग व्यवस्था को विभिन्न राज्य सरकारों को विकेंद्रीकृत किया जाना चाहिए। इससे राज्यों के बीच स्वस्थ प्रतिस्पर्धा को बढ़ावा मिलेगा, जिससे विश्व भर से चिकित्सा उपकरण निर्माताओं को आकर्षित किया जा सकेगा, रोजगार के अवसर पैदा होंगे, बहुमूल्य विदेशी मुद्रा की बचत होगी और देश चिकित्सा उपकरणों के क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनेगा।
(पैरा 5.11.14)
257. समिति आगे यह सिफारिश करती है कि सरकार राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन (एनएचएम) के अंतर्गत उपभोग्य अंतिम उत्पादों का चयन करके अंतर–सरकारी कार्य योजना तैयार करे और इस प्रकार मांग को विकास के इंजन में परिवर्तित करके वैश्विक निवेश को आकर्षित करे। समिति का मानना है कि राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन (एनएचएम) के अंतर्गत उत्पादों को लक्षित करने की आवश्यकता है और संबंधित मंत्रालय के साथ मिलकर इन उत्पादों का निर्माण देश में ही किया जाना चाहिए ताकि उत्पाद और चिकित्सा उपकरण किफायती हों और जरूरतमंद रोगियों को लाभ मिल सके।
(पैरा 5.11.15)
258. समिति इस बात को मानती है कि भारत में चिकित्सा उपकरणों के निर्माण में अपार विकास क्षमता है। भारत में विनिर्माण में निर्माताओं को प्रतिस्पर्धात्मक लाभ प्रदान करने के उद्देश्य से सुव्यवस्थित अंतर–मंत्रालयी और अंतर–सरकारी (केंद्र और राज्य) कार्यनीतियों के परिणामस्वरूप आयातकों को आयात की तुलना में भारत में विनिर्माण करना अधिक लाभदायक लगेगा। समिति का मानना है कि साझा विनिर्माण सुविधाओं में रसद संबंधी सहायता जैसेमेडटेक पार्क निर्माताओं के पूंजीगत व्यय को काफी हद तक कम कर देंगे, जिससे भारत में विनिर्माण को बढ़ावा मिलेगा। मेडिपार्क में एनएबीएल (राष्ट्रीय परीक्षण और अंशशोधन प्रयोगशाला प्रत्यायन बोर्ड) द्वारा अनुमोदित चिकित्सा उपकरण परीक्षण प्रयोगशालाएं होनी चाहिए, जिससे उत्पाद निर्माण में लगने वाला समय कम हो सके।
(पैरा 5.11.16)
259. समिति आगे यह भी सिफारिश करती है कि कुछ मेडिपार्क्स को चिकित्सा उपकरण घटकों के निर्माण पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए, जिससे आवश्यक सेवाओं के विस्तार के प्रावधान के साथ देश स्पेयर पार्ट्स के मामले में आत्मनिर्भर बन सके। इससे भारत चिकित्सा उपकरण स्पेयर पार्ट्स के प्रमुख केंद्र और अन्य देशों के लिए चिकित्सा उपकरण मरम्मत एवं सेवा केंद्रों के हब के रूप में उभरने में और अधिक मजबूती प्राप्त कर सकता है। इस प्रकार चिकित्सा उपकरण उद्योग को रोजगार सृजन की अपार क्षमता का अतिरिक्त लाभ मिलेगा।
(पैरा 5.11.17)
260. समिति का यह मत है कि स्वदेशी विनिर्माण को प्रोत्साहित करने के लिए सरकार को सरकारी खरीद में घरेलू स्तर पर निर्मित उत्पादों के लिए प्रोत्साहन देना चाहिए या उन्हें प्राथमिकता देनी चाहिए। इस संबंध में, विभाग को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि सभी सार्वजनिक खरीद में कम से कम 50% घरेलू सामग्री वाले भारतीय निर्मित चिकित्सा उपकरणों को प्राथमिकता दी जाए।
(पैरा 5.11.18)
शिकायत निवारण तंत्र
261. समिति को उन घटनाओं की जानकारी दी गई जिनमें एनएबीएच ने झूठी शिकायतों के आधार पर तुच्छ कारणों से मान्यता देने से इनकार कर दिया है, जिसके परिणामस्वरूप छोटे चिकित्सा संस्थानों को उत्पीड़न का सामना करना पड़ा है। इसलिए, समिति को लगता है कि एनएबीएच/एनएबीएल जैसे सभी मान्यता निकायों के लिए भारत के गुणवत्ता नियंत्रण विभाग द्वारा एक उपयुक्त शिकायत निवारण तंत्र स्थापित करने की आवश्यकता है, ताकि वे भ्रष्टाचार, मनमानी और खुलेआम उत्पीड़न का एक और जरिया न बन जाएं और इस प्रकार स्वास्थ्य सेवा की लागत में वृद्धि न हो।
(पैरा 5.11.19)
262. संक्षेप में, समिति चाहती है कि सरकार उत्पाद की गुणवत्ता की जांच के लिए पर्याप्त संख्या में टेस्टिंग लैब की व्यवस्था करे; उचित कीमत पर घरेलू उत्पादन को बढ़ावा देकर कच्चे माल के घटकों की उपलब्धता सुनिश्चित करे; और देश में कंपोनेंट स्टार्टअप्स को बढ़ावा देने के लिए पीपीपी मॉडल के तहत मेडिकल डिवाइस के घरेलू उत्पादन को प्रोत्साहित करने वाली कंपोनेंट-आधारित वित्तीय योजनाएं बनाए और लागू करे। समिति चाहती है कि सरकार विभिन्न प्रोत्साहनों के माध्यम से स्टार्टअप्स को उचित कीमत पर इम्प्लांटेबल कार्डियोवर्टर डिफिब्रिलेटर (आईसीडी), हार्ट वाल्व, कार्डियक कैथ लैब, पेसमेकर और पीईटी स्कैन जैसे मेडिकल डिवाइस बनाने के लिए प्रोत्साहित करे। समिति लैंडिंग कॉस्ट और अधिकतम खुदरा मूल्य (एमआरपी) के बीच के अंतर को कम करने में विनियामक निकायों की अहम भूमिका पर ज़ोर देती है क्योंकि इनमें से कुछ इम्प्लांट आयुष्मान भारत योजना के दायरे में नहीं आते हैं, जिससे मरीज़ों का अपनी जेब से होने वाला खर्च (ओओपीई) बढ़ जाता है। समिति विशाखापत्तनम में एएमटीजेड जैसे मेडटेक पार्क को देश के अन्य हिस्सों में भी बढ़ावा देने के लिए सिंगल विंडो सिस्टम की सिफारिश करती है।
(पैरा 5.11.20)
263. समिति ने इस तथ्य के बावजूद कि भारत को दुनिया की फार्मेसी माना जाता है, मेडिकल डिवाइस या दवाओं की लैंडिंग लागत और अधिकतम खुदरा मूल्य (एमआरपी) के बीच बड़े अंतर पर गंभीर चिंता जताई है। समिति का पुरजोर मानना है कि इस अंतर को कम करने की ज़रूरत है ताकि ज़रूरतमंद मरीज़ों को अच्छी गुणवत्ता के मेडिकल डिवाइस और दवाएं सस्ती कीमत पर मिल सकें। उदाहरण के लिए, गोल्डन आवर में दी जाने वाली हार्ट अटैक की जीवन रक्षक दवा टेनेक्टेप्लेस की लैंडिंग कॉस्ट 18,000 रुपये है, लेकिन एमआरपी 50,000 रुपये है और बिलिंग लागत एमआरपी पर है। समिति 2017 में कार्डियक स्टेंट की कीमत 25,000 रुपये से 30,000 रुपये तक सीमित करने के सरकार के फैसले की तारीफ़ करती है, जो पहले लगभग 1,90,000 रुपये हुआ करती थी। इसलिए, समिति यह सिफारिश करती है कि अच्छी क्वालिटी की दवाएं और मेडिकल डिवाइस सस्ती कीमत पर मिलें, इसके लिए मेडिकल डिवाइस और दवाओं की लैंडिंग मूल्य और एमआरपी के बीच 20% से ज़्यादा का अंतर नहीं होना चाहिए। समिति ने पेरिफेरल स्टेंट और ड्रग-एल्यूटिंग बैलून की कीमत को सही करने की भी सिफारिश की है। क्योंकि मेडिकल डिवाइस सीधे मरीज़ की देखभाल में इस्तेमाल होते हैं, इसलिए समिति यह सिफारिश करती है कि विनिर्माता को आईएसओ 13485 और एफडीए 21 सीएफआर पार्ट 820 जैसे कड़े गुणवत्ता प्रबंधन प्रणाली के तहत काम करना चाहिए। समिति यह भी सिफारिश करती है कि महंगे मेडिकल कंज्यूमेबल्स की कीमत को सही करते समय, सरकार को कड़े गुणवत्ता नियंत्रण और बिना रुकावट मार्केट में उपलब्धता सुनिश्चित करनी चाहिए। बेशक, सरकार को खास कंज्यूमेबल्स के लिए एक ऐसा डायनामिक और सही तरीका बनाना चाहिए जो उपभोक्ता को आसानी से सस्ती कीमत और ज़रूरी विनिर्माण मार्जिन के बीच संतुलन बनाए रखे और कृत्रिम बाजार में कमी और काला बाजारी को रोके।
(पैरा 5.11.21)
264. समिति को बताया गया है कि क्लियर अलाइनर्स की कीमत 1.5 से 5 लाख रुपये के बीच होती है, इसलिए विनियामक निकाय को क्लियर अलाइनर्स और दंत सामग्री की कीमत के मानकीकरण पर विचार करना चाहिए। समिति का मानना है कि दवा की वहनीयता के साथ-साथ उसकी उपलब्धता भी ज़रूरी है, और फार्मा कंपनियों को किसी भी दवा की उपलब्धता को उस दवा से जुड़े कम लाभ मार्जिन की वजह से नज़रअंदाज़ नहीं करना चाहिए। समिति को पता चला है कि बाइपोलर डिसऑर्डर को नियंत्रित करने के लिए लिथियम एक बहुत ज़रूरी दवा है और पूरे साल वहनीय कीमत पर इसकी उपलब्धता पक्की की जानी चाहिए।
(पैरा 5.11.22)
265. समिति ने सरकार को मौजूदा विनिर्माण सहायता योजना को सपोर्ट करने के लिए एक समर्पित मेडिकल डिवाइस सब्सिडी कोष बनाने की भी सलाह दी है। इस कोष से उन्नत मेडिकल इक्विपमेंट के अनुसंधान, विकास और स्केलिंग लागत को कुछ हद तक कम किया जाना चाहिए, जिससे सरकारी अस्पताल कम कीमत पर देश में बने डिवाइस खरीद सकें और आयात के दूसरे तरीकों पर निर्भरता धीरे-धीरे कम हो सके।
(पैरा 5.11.23)
टाटा मेमोरियल सेंटर
266. समिति का मानना है कि सार्वजनिक और निजी संस्थानों के बीच स्वास्थ्य देखभाल लागत में भारी असमानता रोगी कल्याण को गंभीर रूप से प्रभावित करती है। एक एकीकृत ढांचे के अभाव में, निम्न और मध्यम आय वर्ग के लोगों के लिए जेब से होने वाला खर्च असहनीय रूप से अधिक बना रहता है। इसलिए, समिति सभी माध्यमिक और तृतीयक देखभाल अस्पतालों में एक मानकीकृत, साक्ष्य–आधारित उपचार प्रोटोकॉल को अनिवार्य रूप से लागू करने की सिफारिश करती है। स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय को आवश्यक प्रक्रियाओं और निदान पर एक कठोर सीमा निर्धारित करने और उसे लागू करने के लिए एक राष्ट्रीय वैधानिक निकाय की स्थापना करनी चाहिए। अनुपालन सुनिश्चित करने के लिए, सरकार को सभी स्वास्थ्य देखभाल सुविधाओं को अपने–अपने प्लेटफॉर्म पर एक एकीकृत, पारदर्शी ‘शुल्क अनुसूची‘ प्रकाशित करने का आदेश देना चाहिए, जो टीएमसी मॉडल के अनुरूप हो, ताकि मनमानी मूल्य निर्धारण और अनावश्यक नैदानिक जांचों को रोका जा सके।
(पैरा 5.12.9)
267. समिति का मत है कि निजी क्षेत्र के अस्पतालों को सार्वजनिक कल्याणकारी पहलों में पूरक भूमिका निभाने के लिए प्रोत्साहित और संरचनात्मक रूप से निर्देशित किया जाना चाहिए। कई निजी संस्थाओं का वर्तमान विशुद्ध व्यावसायिक दृष्टिकोण आर्थिक रूप से कमजोर रोगियों के लिए चिकित्सा सामर्थ्य और पहुंच को सीमित करता है। इसलिए, समिति प्रमुख निजी और ट्रस्ट द्वारा संचालित अस्पतालों में क्रॉस–सब्सिडी मॉडल लागू करने की सिफारिश करती है। क्रॉस–सब्सिडी मॉडल को कई दक्षिण एशियाई देशों में सफलतापूर्वक लागू किया गया है। ऐसी नीतियां बनाई जानी चाहिए जिनमें यह अनिवार्य हो कि मानक या प्रीमियम भुगतान करने वाली श्रेणियों से प्राप्त राजस्व का एक निश्चित प्रतिशत आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों के लिए चिकित्सा देखभाल पर सब्सिडी देने के लिए कानूनी रूप से निर्धारित किया जाए। सरकार को उन निजी अस्पतालों को कर प्रोत्साहन या पूंजीगत सब्सिडी प्रदान करनी चाहिए जो अपनी बिस्तर क्षमता का कम से कम 20 प्रतिशत अत्यधिक रियायती या मुफ्त उपचार के लिए निर्धारित करने में सफल होते हैं।
(पैरा 5.12.10)
268. समिति का मानना है कि दवाओं, चिकित्सा सामग्री और उपकरणों के अनियंत्रित मूल्य निर्धारण से उपचार की कुल लागत में काफी वृद्धि होती है। इसलिए, समिति सभी गंभीर चिकित्सा दवाओं और उच्च श्रेणी के चिकित्सा उपकरणों के लिए एक केंद्रीकृत डिजिटल खरीद प्रणाली स्थापित करने की सिफारिश करती है। निजी और सरकारी अस्पतालों को पारदर्शी निविदा प्रक्रियाओं का उपयोग करके प्रचलित बाजार दरों से काफी कम कीमतों पर बातचीत करने का निर्देश दिया जाना चाहिए। दोनों क्षेत्रों के चिकित्सकों के लिए यह कानूनी रूप से बाध्यकारी होना चाहिए कि वे चिकित्सकीय रूप से उपयुक्त होने पर उच्च गुणवत्ता वाली जेनेरिक दवाओं के परामर्श और वितरण को प्राथमिकता दें, जिससे मरीजों के जेब से होने वाले खर्च में तत्काल कमी आएगी।
(पैरा 5.12.11)
269. समिति का मानना है कि जटिल बिलिंग प्रक्रियाएं और स्वास्थ्य बीमा लाभों को जानबूझकर अस्पष्ट रखना, मरीजों को समय पर माध्यमिक या तृतीयक देखभाल प्राप्त करने से रोकते हैं। इसलिए, समिति सिफारिश करती है कि सभी माध्यमिक और तृतीयक स्वास्थ्य देखभाल सुविधाओं में एक पूर्णतः एकीकृत अस्पताल सूचना प्रणाली (हॉस्पिटल इंफॉर्मेशन सिस्टम) स्थापित की जाए, जो सीधे उनके स्वीकृत शुल्क अनुसूची से जुड़ी हो, ताकि स्वचालित रूप से हेरफेर रहित बिल तैयार किए जा सकें। निर्धारित बिस्तर क्षमता से अधिक वाले प्रत्येक निजी अस्पताल के लिए एक समर्पित दावा प्रबंधन प्रकोष्ठ स्थापित करना अनिवार्य होना चाहिए, ताकि आयुष्मान भारत–प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना (एबी–पीएमजेएवाई) जैसी सरकारी योजनाओं के तहत कैशलेस उपचार की सुविधा प्रदान की जा सके। इन केंद्रीय या राज्य प्रायोजित स्वास्थ्य बीमा योजनाओं के तहत पात्र मरीजों को प्रवेश देने से इनकार करने वाले अस्पतालों के लिए कठोर दंडात्मक प्रावधान लागू किए जाने चाहिए।
(पैरा 5.12.12)
270. उच्च मूल्य और उच्च लागत वाली दवाओं की सामूहिक खरीद: टाटा मेमोरियल सेंटर (टीएमसी) ने उच्च मूल्य वाली कैंसर और सहायक देखभाल दवाओं की खरीद में सुगमता लाने के लिए सामूहिक खरीद का प्रायोगिक परीक्षण किया। इस परीक्षण में कुल 40 दवाएं शामिल थीं। 23 केंद्रों से दवाओं की सामूहिक मांग अधिकतम खुदरा मूल्यों के आधार पर 15.6 अरब भारतीय रुपये (197 मिलियन अमेरिकी डॉलर) के बराबर थी। इस प्रक्रिया में तकनीकी और वित्तीय मूल्यांकन के बाद व्यक्तिगत केंद्रों और चयनित विक्रेताओं के बीच अनुबंध किए गए। अधिकतम खुदरा मूल्यों की तुलना में 13.2 बिलियन भारतीय रुपये (166.7 मिलियन अमेरिकी डॉलर) की बचत हुई। बचत 23% से 99% (औसत: 82%) तक रही और जेनेरिक दवाओं में यह बचत नवप्रवर्तित और नए पेटेंट वाली दवाओं की तुलना में अधिक थी। इस प्रक्रिया से प्रभावी लेकिन महंगी दवाओं तक पहुंच में सुधार करना संभव हुआ है, जिससे ये अधिकांश रोगियों के लिए सस्ती हो गई हैं और भौगोलिक रूप से दूरदराज के क्षेत्रों में स्थित छोटे केंद्रों में दवाओं की कमी की समस्या कम हुई है।
(पैरा 5.13.4)
271. समिति का मानना है कि भौगोलिक और सामाजिक–आर्थिक स्वास्थ्य देखभाल असमानताओं को कम करने के लिए एकीकृत, राष्ट्रीय रोग–विशिष्ट नेटवर्क की स्थापना अत्यंत महत्वपूर्ण है। अतः समिति सरकार को राष्ट्रीय कैंसर ग्रिड (एनसीजी) मॉडल को अपनाकर हृदय रोग और मधुमेह जैसी अन्य गंभीर गैर–संक्रामक बीमारियों के लिए भी इसी प्रकार के राष्ट्रीय ग्रिड स्थापित करने की सिफारिश करती है। समिति का मत है कि इन विशेषज्ञ ग्रिडों द्वारा विकसित संसाधन–स्तरीकृत उपचार दिशानिर्देशों को आयुष्मान भारत प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना (एबी पीएम–जेएवाई) की प्रतिपूर्ति संरचनाओं से स्पष्ट रूप से जोड़ा जाना चाहिए। इस प्रकार के एकीकरण से सार्वजनिक और निजी दोनों क्षेत्रों में व्यापक स्वास्थ्य लाभ पैकेजों (एचबीपी) को अपनाना अनिवार्य हो जाएगा, जिससे एकसमान, मूल्य–आधारित देखभाल सुनिश्चित होगी और साथ ही रोग की उन्नत अवस्था वाले रोगियों पर आर्थिक बोझ भी कम होगा।
(पैरा 5.13.13)
272. समिति का मत है कि दवाओं की खंडित खरीद से स्वास्थ्य सेवा वितरण की परिचालन लागत में काफी वृद्धि होती है, जिसका बोझ अंततः रोगियों पर पड़ता है। समिति का मानना है कि उच्च मूल्य वाली कैंसर दवाओं के लिए सामूहिक खरीद पायलट परियोजना द्वारा प्रदर्शित की गई भारी बचत, जिससे औसत लागत में 82% की कमी आई है, उसे राष्ट्रीय नीति के लिए एक आधारभूत खाका के रूप में कार्य करना चाहिए। इसलिए, समिति सभी सार्वजनिक स्वास्थ्य संस्थानों और सूचीबद्ध निजी अस्पतालों में सभी उच्च लागत वाली, जीवन रक्षक और सहायक देखभाल दवाओं के लिए एक केंद्रीकृत, सामूहिक खरीद तंत्र को तत्काल संस्थागत रूप देने की सिफारिश करती है। यह एकीकृत मांग ढांचा दवा विक्रेताओं के विरुद्ध सौदेबाजी की शक्ति को अधिकतम करेगा, जिससे अधिकतम खुदरा कीमतों में भारी कमी आएगी और भौगोलिक रूप से दूरस्थ केंद्रों में महत्वपूर्ण दवाओं की कमी दूर होगी। समिति यह भी सिफारिश करती है कि सामूहिक खरीद से होने वाली बचत रोगियों को दी जानी चाहिए, ताकि उनकी जेब से होने वाला खर्च कम हो और इसका उपयोग प्रति–सब्सिडी के स्रोत के रूप में किया जा सके।
(पैरा 5.13.14)
273. समिति का मानना है कि महानगरों में उच्च स्तरीय चिकित्सा सेवा प्राप्त करने वाले रोगियों के लिए यात्रा, आवास और आजीविका हानि सहित स्वास्थ्य देखभाल की अप्रत्यक्ष लागतें, स्वास्थ्य संबंधी भारी खर्चों को और भी गंभीर बना देती हैं। इसलिए, समिति सभी जिला स्तरीय अस्पतालों में वर्चुअल डिजीज बोर्ड और व्यापक टेलीकंसल्टेशन सुविधाओं को अनिवार्य रूप से लागू करके विशेषीकृत स्वास्थ्य देखभाल के आक्रामक विस्तार और विकेंद्रीकरण की सिफारिश करती है। समिति का यह मत है कि छोटे, दूरस्थ चिकित्सा केंद्रों को शीर्ष उच्च स्तरीय चिकित्सा संस्थानों से डिजिटल रूप से जोड़ने से विशेषज्ञ बहु–विषयक उपचार योजना और निदान के लिए बाह्य गुणवत्ता आश्वासन योजनाओं (ईक्यूएएस) में सुविधा होगी। इससे यह सुनिश्चित होगा कि रोगी को शारीरिक रूप से स्थानांतरित किए बिना जटिल नैदानिक निर्णय सटीक रूप से लिए जा सकें।
(पैरा 5.13.15)
274. समिति का मत है कि निर्बाध देखभाल की निरंतरता और पूर्ण वित्तीय पारदर्शिता रोगी का मौलिक अधिकार है और किफायती स्वास्थ्य सेवा प्रणाली के महत्वपूर्ण घटक हैं। उच्चतम न्यायालय ने भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21, अर्थात् जीवन के अधिकार और भाग IV में राज्य के नीति निर्देशक सिद्धांतों के तहत स्वास्थ्य के अधिकार की एक मौलिक अधिकार के रूप में व्याख्या की है, । इस प्रकार, प्रमुख संवैधानिक स्तंभों में अनुच्छेद 21; अनुच्छेद 47, जो सार्वजनिक स्वास्थ्य में सुधार, पोषण स्तर को बढ़ाने और जीवन स्तर को ऊपर उठाने के राज्य के कर्तव्य को रेखांकित करता है; और अनुच्छेद 39(ई), जो राज्य को श्रमिकों के स्वास्थ्य और शक्ति की रक्षा करने का निर्देश देता है, शामिल हैं। अतः समिति का दृढ़ विश्वास है कि देश के नागरिकों को किफायती लागत पर पर्याप्त स्वास्थ्य सुविधाएं प्रदान करके उन्हें स्वस्थ रखना सरकार का संवैधानिक दायित्व है। समिति चाहती है कि निजी क्षेत्र के अस्पताल इस दिशा में सार्वजनिक क्षेत्र के अस्पतालों के प्रयासों को पूरक करने में स्वेच्छा से महत्वपूर्ण भूमिका निभाएं।
(पैरा 5.13.16)
275. इसके अलावा, समिति का मानना है कि मरीजों को उनके अपने मेडिकल रिकॉर्ड तक सीमित पहुंच प्रदान करने से उनकी स्थानीय स्तर पर इलाज कराने या दूसरी राय लेने की क्षमता बाधित होती है, जिससे वे संभावित रूप से महंगे इलाज के जाल में फंस जाते हैं। इसलिए, समिति वेब पोर्टल के माध्यम से मरीजों को उनके नैदानिक डेटा का सुरक्षित और दूरस्थ स्वामित्व प्रदान करने वाले, परस्पर संचालन योग्य, विशेषज्ञता–विशिष्ट इलेक्ट्रॉनिक मेडिकल रिकॉर्ड (ईएमआर) को देशव्यापी स्तर पर तेजी से अपनाने की सिफारिश करती है। साथ ही, सभी माध्यमिक और तृतीयक देखभाल अस्पतालों के लिए वास्तविक समय डिजिटल बिलिंग अवसंरचना को लागू करना अनिवार्य होना चाहिए। मरीजों को जेनरेट किए गए बिलों और उपलब्ध धनराशि की निरंतर जानकारी देने के लिए स्मार्ट कार्ड और स्वचालित एसएमएस अलर्ट का उपयोग करने वाली प्रणालियों को लागू किया जाना चाहिए, जिससे अपारदर्शी बिलिंग प्रथाओं का उन्मूलन हो सके।
(पैरा 5.13.17)
276. समिति का मत है कि स्वास्थ्य लाभ पैकेजों के लिए मनमानी या स्थिर दर निर्धारण से सेवा प्रदाताओं की भागीदारी प्रभावित होती है और चिकित्सा देखभाल के वास्तविक परिचालन व्यय अस्पष्ट हो जाते हैं। लाभ पैकेजों का मानकीकरण महत्वपूर्ण है, लेकिन यह सुनिश्चित करना सर्वोपरि है कि ये पैकेज वास्तविकता को दर्शाते हों। अतः समिति एक मानकीकृत राष्ट्रीय लागत लेखा प्रणाली को तत्काल लागू करने की सिफारिश करती है। सरकार को इस ढांचे को अनिवार्य बनाना चाहिए ताकि सभी सूचीबद्ध केंद्रों या देश भर के अस्पतालों के एक सावधानीपूर्वक चयनित, प्रतिनिधि क्रॉस-सेक्शन से अनुभवजन्य, वास्तविक लागत डेटा एकत्र किया जा सके। समिति का मानना है कि यह सुनिश्चित करने के लिए कि स्वास्थ्य लाभ पैकेज अनुमानों के बजाय वास्तविक, डेटा–समर्थित लागतों से स्पष्ट रूप से जुड़े हों, रोगी के उपचार के प्रत्येक चरण में नैदानिक दिशा–निर्देशों को सावधानीपूर्वक लागू किया जाना चाहिए।
(पैरा 5.13.19)
277. इसके अलावा, समिति का दृढ़ मत है कि दर निर्धारण प्रक्रिया गतिशील होनी चाहिए। मूल्य निर्धारण संरचनाओं में रोगी की स्थिति की गंभीरता, सुविधा का भौगोलिक स्थान और अस्पताल के संस्थागत स्तर जैसे कारकों के लिए पूर्वनिर्धारित, अनुभवजन्य समायोजन शामिल होने चाहिए। समिति का मानना है कि इस स्तर की संरचनात्मक पारदर्शिता लागू करने से स्वास्थ्य सेवा प्रदाताओं को उचित और पर्याप्त मुआवजा सुनिश्चित होगा, जिससे राष्ट्रीय स्वास्थ्य योजनाओं में उनकी स्वैच्छिक भागीदारी में उल्लेखनीय वृद्धि होगी। साथ ही, इससे नीति निर्माताओं को प्रणालीगत लागत अक्षमताओं की सटीक पहचान करने, प्राथमिक लागत कारकों को अलग करने और नई चिकित्सा प्रौद्योगिकियों के एकीकरण से पहले सटीक बजट प्रभाव आकलन करने में मदद मिलेगी।
(पैरा 5.13.20)
278. समिति का मत है कि स्वास्थ्य लाभ पैकेजों (एचबीपी) के विकास और कार्यान्वयन को अनियमित कार्यान्वयन से एक सुव्यवस्थित, अच्छी तरह से प्रलेखित मानक संचालन प्रक्रिया में परिवर्तित किया जाना चाहिए। हालांकि ये पैकेज मौजूद हैं, लेकिन यह सुनिश्चित करने के लिए कि वे सबसे कमजोर जनसांख्यिकी तक पहुंचें, कड़ी निगरानी की आवश्यकता है। समिति का मानना है कि योजनाओं की प्रभावकारिता और समानता का निरंतर ऑडिट करने के लिए एक मजबूत निगरानी और मूल्यांकन ढांचा राष्ट्रीय स्वास्थ्य अवसंरचना में एकीकृत किया जाना चाहिए। इसलिए, समिति सभी डिजिटल स्वास्थ्य और बिलिंग प्लेटफार्मों पर एकीकृत नैदानिक प्रक्रिया कोडिंग के अनिवार्य कार्यान्वयन की सिफारिश करती है। रोगी की गोपनीयता से समझौता किए बिना जवाबदेही सुनिश्चित करने के लिए, सरकार को सभी सूचीबद्ध स्वास्थ्य सुविधाओं को पूर्वनिर्धारित प्रमुख प्रदर्शन संकेतक (केपीआई) को एक केंद्रीय निगरानी एजेंसी के साथ सुरक्षित रूप से साझा करने के लिए अनिवार्य करना चाहिए, जिससे इन योजनाओं के वास्तविक जमीनी स्तर के प्रभाव का पता लगाया जा सके।
(पैरा 5.13.22)
279. समिति कुछ औषधियों के गुणवत्ता मानकों पर सवाल उठाने वाली हालिया राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय रिपोर्टों पर गंभीर चिंता व्यक्त करती है। इसके अलावा, समिति का मानना है कि हालांकि आक्रामक मूल्य नियंत्रणों ने निस्संदेह आम जनता के लिए दवाओं की उपलब्धता बढ़ाई है, लेकिन विनिर्माण लागत को व्यवहार्य सीमा से नीचे लाने से दवाओं की गुणवत्ता और उद्योग की स्थिरता में प्रणालीगत समझौता होने का खतरा है। समिति का मानना है कि चिकित्सा आपूर्ति में पूर्ण विश्वास बहाल करने के लिए राष्ट्रीय औषधि अनुमोदन और गुणवत्ता नियंत्रण नियामक ढांचे की तत्काल और व्यापक समीक्षा अत्यंत आवश्यक है। इसलिए, समिति स्वास्थ्य मंत्रालय और औषधि उद्योग के बीच एक औपचारिक, पारस्परिक संवाद तंत्र स्थापित करने की सिफारिश करती है। इस मंच का उद्देश्य तर्कसंगत मूल्य सीमाएं निर्धारित करना होना चाहिए जो आम जनता की वहनीयता और गुणवत्ता आश्वासन तथा विनिर्माण की व्यवहार्यता के बीच संतुलन बनाए रखें। समिति इस सहयोगात्मक मंच का उपयोग नवीन, अत्यधिक प्रभावी चिकित्साओं के लिए राष्ट्रीय स्तर पर मूल्य निर्धारण पर बातचीत करने के लिए करने की सिफारिश करती है। बातचीत के जरिए तय दरों पर उन्नत दवाओं को नेशनल लिस्ट ऑफ़ एसेंशियल मेडिसिन्स (एनएलईएम) में शामिल करने से पूरे देश में उच्च गुणवत्ता वाली खरीद को रणनीतिक रूप से बढ़ावा मिलेगा।
(पैरा 5.13.23)
280. समिति कैंसर देखभाल योजना एवं प्रबंधन: रोकथाम, निदान, अनुसंधान एवं कैंसर उपचार की वहनीयता पर अपने 139वें प्रतिवेदन में की गई अपनी समुक्ति को दोहराती है। हब एंड स्पोक मॉडल देश के सभी राज्यों में हब और स्पोक बनाकर व्यापक कैंसर देखभाल प्रदान करने का एक कुशल वितरण मॉडल है। समिति नोट करती है कि टीएमसी ने राज्यों में हब और स्पोक स्थापित करने के लिए राज्य सरकारों के साथ मिलकर काम किया है। समिति का मानना है कि इस तरह के सहयोग से ज्ञान, कौशल और संसाधनों के आदान–प्रदान के साथ–साथ कैंसर देखभाल के बुनियादी ढांचे को और मजबूत बनाने में मदद मिलेगी। समिति टीएमसी और डीएई द्वारा किए गए कार्यों की सराहना करती है और सभी राज्यों में सरकारी वित्त पोषित हब एंड स्पोक कैंसर देखभाल मॉडल स्थापित करने की आवश्यकता पर बल देती है। समिति का यह भी मानना है कि हब एंड स्पोक मॉडल के तहत कैंसर केंद्रों में पर्याप्त मानव संसाधन सुनिश्चित करना भी केंद्रों के पूर्ण संचालन के लिए महत्वपूर्ण है। समिति अपनी इस सिफारिश को दोहराती है कि स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय को परमाणु ऊर्जा विभाग के साथ मिलकर प्रत्येक राज्य में हब एंड स्पोक मॉडल को लागू करने की समयसीमा तय करनी चाहिए। समिति सरकार से आग्रह करती है कि वह यह सुनिश्चित करे कि मौजूदा एससीआई/टीसीसीसी को उनकी मौजूदा अवसंरचना और क्षमताओं के आधार पर हब और स्पोक में अपग्रेड किया जाए।
(पैरा 5.14.2)
निजी स्वास्थ्य सेवाओं की बढ़ती लागत को कम करने के लिए क्रॉस-सब्सिडी मॉडल
281. समिति को निजी स्वास्थ्य सेवाओं की बढ़ती लागत से अवगत कराया गया। समिति के समक्ष प्रस्तुत किए गए विचारों में निजी उपचार की बढ़ती लागत का एक बड़ा कारण बुनियादी ढाँचे (इन्फ्रास्ट्रक्चर) की बढ़ती लागत को बताया गया। इसके अतिरिक्त, विश्वस्तरीय तकनीक का अधिकतर संकेंद्रण महानगरों में है और उसे स्थापित करने तथा बनाए रखने के लिए भारी पूंजी निवेश की आवश्यकता होती है। इस समस्या को और बढ़ाते हुए, अति-विशेषज्ञ डॉक्टरों को उच्च पारिश्रमिक दिया जाता है, जिससे अस्पतालों के संचालन संबंधी खर्चों में और वृद्धि होती है। चूँकि अधिकांश निजी निवेश लाभ-प्रेरित होता है, इसलिए रोगी देखभाल और उपचार के परिणामों को अक्सर प्राथमिक उद्देश्य के बजाय द्वितीयक चिंता के रूप में देखा जाता है। केवल लगभग 14 प्रतिशत आबादी के पास निजी स्वास्थ्य बीमा होने के कारण, अधिकांश मरीजों को अपनी जेब से होने वाले भारी खर्च का सामना करना पड़ता है। यह स्थिति अधिक बिलिंग (ओवरबिलिंग) की प्रथाओं से और खराब हो जाती है, जहाँ प्रक्रियात्मक लागतों को जोड़कर पेशेवर शुल्क को बढ़ा दिया जाता है। इसके अलावा, जटिलताओं का लगातार बना रहने वाला जोखिम किसी परिवार को गहरे आर्थिक संकट में डाल सकता है और स्वास्थ्य व्यवस्था में विश्वास को कमजोर कर सकता है, भले ही मूल उपचार उचित ही क्यों न रहा हो।
(पैरा 6.2.2)
282. समिति ने ओवरबिलिंग की समस्या के समाधान के लिए अस्पताल स्तर पर नैतिकता समितियों के माध्यम से नैतिक निगरानी व्यवस्था को मजबूत करने की सिफारिश की है। इन समितियों को पेशेवर शुल्क की समीक्षा करनी चाहिए और डॉक्टरों की जवाबदेही सुनिश्चित करनी चाहिए। नियमों का पालन न करने की स्थिति में चेतावनी, फटकार या अन्य उपयुक्त कार्रवाई जैसे वास्तविक परिणाम सुनिश्चित किए जाने चाहिए। समिति ने सार्वजनिक-निजी भागीदारी की निगरानी के लिए एक समर्पित नियामक निकाय स्थापित करने का भी आह्वान किया है, ताकि यह सत्यापित किया जा सके कि सेवाएँ वास्तव में जरूरतमंद लोगों तक पहुँच रही हैं और केवल औपचारिक प्रक्रिया बनकर नहीं रह गई हैं। समिति ने क्रॉस-सब्सिडी मॉडल अपनाने का सुझाव दिया है, जिसमें अधिक भुगतान करने वाले निजी मरीजों से प्राप्त राजस्व के माध्यम से गरीब मरीजों के उपचार की लागत को सहायता प्रदान की जा सके। इसके अतिरिक्त, समिति ने बड़े उद्योगों को प्रोत्साहित किया है कि वे अस्पतालों के साथ औपचारिक साझेदारी के माध्यम से अपनी सीएसआर निधि का उपयोग आर्थिक रूप से कमजोर मरीजों के उपचार खर्च को वहन करने के लिए करें।
(पैरा 6.2.3)
283. समिति यह समुक्ति करती है कि यद्यपि सरकार ने निजी अस्पतालों में बीपीएल कार्डधारकों तथा आयुष्मान भारत और पीएमजेएवाई जैसी योजनाओं के लाभार्थियों के लिए निःशुल्क उपचार हेतु एक निश्चित प्रतिशत बेड आरक्षित किए हैं, लेकिन अनेक निजी अस्पताल इन दायित्वों से स्वयं को अलग कर लेते हैं। इसके परिणामस्वरूप, यह प्रावधान व्यवहार में प्रभावी रूप से लागू नहीं हो पाता। एक संबंधित समस्या यह भी है कि बीपीएल पात्रता मानदंड स्वयं पुराने हो चुके हैं और लंबे समय से उनमें संशोधन नहीं किया गया है। इसके कारण अनेक ऐसे लोग, जो वास्तव में आर्थिक रूप से कमजोर हैं, इन लाभों से बाहर रह जाते हैं। इसमें गरीबी रेखा से थोड़ा ऊपर रहने वाला एक व्यापक “उच्च-मध्यम आय गरीबी” वर्ग भी शामिल है, जो लगभग समान आर्थिक कठिनाइयों का सामना करता है, लेकिन उसे कोई औपचारिक मान्यता या सुरक्षा प्राप्त नहीं है। वर्तमान में ऐसा कोई मजबूत नियामक निकाय भी नहीं है, जो यह सुनिश्चित कर सके कि निजी अस्पताल अपने इन जनसेवा संबंधी दायित्वों का उचित रूप से पालन करें।
(पैरा 6.2.4)
284. समिति ने निजी अस्पतालों में बीपीएल, ईडब्ल्यूएस और पीएमजेएवाई मरीजों के लिए अनिवार्य रूप से आरक्षित बेडों के कोटे को वर्तमान दस प्रतिशत से बढ़ाकर बीस प्रतिशत करने की सिफारिश की है। साथ ही, इस प्रावधान का देशभर के सभी निजी अस्पतालों में सख्त और समान रूप से क्रियान्वयन सुनिश्चित किया जाना चाहिए।इसके साथ ही, बीपीएल पात्रता मानदंडों में वर्तमान आर्थिक परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए संशोधन किया जाना चाहिए और गरीबी रेखा से थोड़ा ऊपर रहने वाली उस व्यापक आबादी को भी इसमें शामिल किया जाना चाहिए, जो समान प्रकार की आर्थिक कठिनाइयों का सामना करती है। समिति का यह भी सुझाव है कि अस्पतालों में ऐसी औपचारिक आंतरिक वित्तीय सुरक्षा व्यवस्था होनी चाहिए, जो उपचार के दौरान जटिलताओं के कारण अचानक बढ़ने वाली लागत का सामना कर रहे परिवारों को सहायता प्रदान कर सके। इस अतिरिक्त लागत का वहन जरूरतमंद मरीजों के लिए क्रॉस-सब्सिडी (परस्पर सब्सिडी) व्यवस्था के माध्यम से किया जाना चाहिए।
(पैरा 6.2.5)
ग्रामीण आबादी के लिए स्वास्थ्य सेवाओं की सुलभता सुनिश्चित करना
285. समिति यह पाती है कि भारत की ग्रामीण आबादी के लिए स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुँच अभी भी एक प्रमुख चुनौती बनी हुई है। ग्रामीण क्षेत्रों के लोगों को अक्सर अस्पताल तक पहुँचने के लिए लंबी दूरी तय करनी पड़ती है, क्योंकि उच्च गुणवत्ता वाली उपचार सुविधाएँ मुख्य रूप से शहरों में केंद्रित हैं और छोटे कस्बों तथा जिला केंद्रों में इनकी उपलब्धता सीमित है। यह समस्या प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों (पीएचसी) और सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों (सीएचसी) की कार्यप्रणाली में मौजूद कमियों से और बढ़ जाती है, जहाँ डॉक्टर हमेशा अपने अनुबंधित कार्यकाल के अनुसार सेवा नहीं देते या सेवा संबंधी दिशा-निर्देशों का पालन नहीं करते। अधिकांश ग्रामीण और दैनिक मजदूरी करने वाले मरीज उपचार के लिए अपने काम का एक दिन भी गंवाने की स्थिति में नहीं होते, जबकि ओपीडी (ओपीडी) के समय प्रायः उनकी इस वास्तविकता के अनुरूप नहीं होते। पहाड़ी, रेगिस्तानी और वन क्षेत्रों में यह कठिनाई और भी बढ़ जाती है, जहाँ केवल निकटतम अस्पताल तक पहुँचना ही अपने आप में एक बड़ी चुनौती है। समिति को अवगत कराया गया है कि स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुँचने में होने वाला अतिरिक्त खर्च, जिसमें यात्रा, भोजन और खोई हुई मजदूरी शामिल है, प्रति यात्रा लगभग पाँच सौ रुपये तक हो सकता है, जिसे अनेक ग्रामीण गरीब परिवार वहन करने में असमर्थ होते हैं।
(पैरा 6.2.6)
286. समिति ग्रामीण क्षेत्रों में स्वास्थ्य सेवाओं तक बेहतर पहुँच सुनिश्चित करने के लिए सस्ते और विश्वसनीय परिवहन साधनों में निवेश करने का आह्वान करती है, ताकि मरीज अपनी एक दिन की आय गंवाए बिना निकटतम अस्पताल तक पहुँच सकें। यह प्रयास मातृ एवं शिशु स्वास्थ्य के लिए आपातकालीन एम्बुलेंस सेवाओं के कवरेज में पहले से देखे गए सुधारों के आधार पर आगे बढ़ाया जाना चाहिए। समिति ने प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों (पीएचसी) और सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों (सीएचसी) में कर्मचारियों की आवश्यकताओं को सख्ती से लागू करने की भी सिफारिश की है। इसमें यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि डॉक्टर अपने अनुबंधित कार्यकाल को पूर्ण करें और सेवा संबंधी दिशा-निर्देशों का पालन करें। इसके लिए बायोमेट्रिक उपस्थिति प्रणाली के माध्यम से निगरानी और जवाबदेही को सुदृढ़ किया जाना चाहिए। जवाबदेही को और मजबूत करने के लिए समिति ने वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारियों तथा स्थानीय निर्वाचित प्रतिनिधियों, जैसे विधायकों (एमएलए) और सांसदों (एमपी), द्वारा आकस्मिक निरीक्षण किए जाने का सुझाव दिया है, ताकि यह सत्यापित किया जा सके कि स्वास्थ्य सुविधाएँ निर्धारित उद्देश्यों के अनुसार कार्य कर रही हैं। इससे स्थानीय शासन व्यवस्था में जनता का विश्वास पुनः स्थापित करने में भी सहायता मिलेगी। ओपीडी सेवाओं के समय को शाम तक बढ़ाना विशेष रूप से उपयोगी होगा, क्योंकि इससे दैनिक मजदूरी करने वाले और प्रवासी श्रमिक अपनी आय गंवाए बिना उपचार प्राप्त कर सकेंगे। समिति ने ऐसे मॉडल के बारे में जानकारी प्राप्त की है, जो गैर-सरकारी संगठनों (एनजीओ) द्वारा संचालित ओपीडी के माध्यम से प्रभावी रूप से कार्य कर रहा है। इन ओपीडी में शाम छह बजे से मध्यरात्रि के बाद तक निःशुल्क परामर्श और दवाएँ उपलब्ध कराई जाती हैं। अंततः, समिति का सुझाव है कि पहाड़ी, रेगिस्तानी और वन क्षेत्रों को लक्षित अवसंरचना निवेश के लिए प्राथमिकता दी जानी चाहिए, क्योंकि इन क्षेत्रों में स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुँच संबंधी चुनौतियाँ असमान रूप से अधिक प्रभावित करती हैं।
(पैरा 6.2.7)
287. समिति को अवगत कराया गया कि भारत के विभिन्न अस्पतालों में यकृत (लिवर) प्रत्यारोपण की लागत पच्चीस से पचास लाख रुपये तक होती है, जिसके कारण यह सुविधा उच्च आय वाले पेशेवरों और व्यवसायियों को छोड़कर अधिकांश लोगों की पहुँच से बाहर हो जाती है। देश में अंगदान की दरों में भी काफी असमानता है। दक्षिण भारत में अंगदान की स्थिति उत्तर भारत की तुलना में बेहतर है, जबकि पश्चिमी भारत भी उत्तर भारत की तुलना में कुछ बेहतर प्रदर्शन करता है। समिति आगे यह भी उल्लेख करती है कि कुछ निजी केंद्र अंग प्रत्यारोपण के लिए अत्यधिक बड़ी राशि लेते हैं, जो अंगदान की उस भावना के विपरीत है, जिसमें इसे अस्पतालों के लिए लाभ कमाने के अवसर के बजाय जनसेवा के रूप में देखा जाना चाहिए। समिति ने एबी-पीएमजेएवाई के अंतर्गत उपलब्ध कराए जा रहे ग्रामीण स्वास्थ्य सेवा मॉडल के विस्तृत अध्ययन की सिफारिश की है।
(पैरा 6.2.8)
288. समिति महाराष्ट्र के दृष्टिकोण को राष्ट्रीय स्तर पर दोहराए जाने योग्य एक आदर्श मॉडल के रूप में देखती है, जिसमें निजी क्षेत्र के वरिष्ठ सर्जनों को नगर निगम के अस्पतालों से जोड़ा जाता है और वे जटिल शल्य प्रक्रियाओं के दौरान सरकारी चिकित्सा टीमों का मार्गदर्शन और पर्यवेक्षण करते हैं। इससे सार्वजनिक क्षेत्र के मरीजों को उच्चस्तरीय शल्य चिकित्सा विशेषज्ञता उपलब्ध हो पाती है। व्यापक रूप से, समिति का सुझाव है कि सार्वजनिक-निजी भागीदारी को स्वास्थ्य अवसंरचना विकास की दीर्घकालिक आधारशिला के रूप में देखा जाना चाहिए, न कि सार्वजनिक और निजी स्वास्थ्य प्रणालियों को एक-दूसरे से अलग-अलग विकसित होने दिया जाना चाहिए।
(पैरा 6.2.9)
289. समिति ने विशेष रूप से प्रत्यारोपण की लागत के संबंध में सिफारिश की है कि सरकारी क्षेत्र के अस्पतालों में किए जाने वाले यकृत (लिवर) प्रत्यारोपण की कीमत को चार से पाँच लाख रुपये तक तर्कसंगत बनाया जाए। समिति को अवगत कराया गया कि अहमदाबाद स्थित आईकेडीआरसी और चेन्नई स्थित स्टेनली मेडिकल कॉलेज में यह मानक पहले ही प्राप्त किया जा चुका है। इससे यह प्रक्रिया भारत के कामकाजी मध्यम वर्ग की पहुँच के भीतर आ सकेगी। समिति ने एम्स स्तर के अंग प्रत्यारोपण कार्यक्रमों का विस्तार अन्य राज्यों तक करने की भी सिफारिश की है। उत्तर भारत में अंगदान की कम दर को देखते हुए, समिति ने सफल राज्य-स्तरीय व्यवस्थाओं को अपनाने का सुझाव दिया है। समिति ने उल्लेख किया कि तमिलनाडु के अंगदान संबंधी कानूनों को राष्ट्रीय स्तर पर लागू करने की संभावनाओं के लिए पहले ही नीति आयोग के एक पैनल सदस्य के साथ साझा किया जा चुका है। समिति ने इस बात पर जोर दिया है कि अंगदान को पूरी तरह जनसेवा-उन्मुख बनाए रखा जाना चाहिए और इसके लिए ऐसे नियामक सुरक्षा उपाय सुनिश्चित किए जाने चाहिए, जिससे निजी अस्पताल इसे लाभ कमाने के केंद्र के रूप में न देख सकें।
(पैरा 6.2.10)
290. समिति यह समुक्ति करती है कि चिकित्सा शिक्षा की बढ़ती लागत के कारण अनेक परिवार ऐसे शिक्षा ऋण लेने के लिए मजबूर हो रहे हैं, जिन्हें चुकाने में वर्षों लग जाते हैं। यह वित्तीय बोझ नए स्नातक डॉक्टरों के चिकित्सा व्यवसाय में प्रवेश करने के बाद उनके कैरियर संबंधी दृष्टिकोण और निर्णयों को प्रभावित करता है। इसी समय, यद्यपि अनेक जिलों में नए चिकित्सा महाविद्यालय स्थापित किए जा रहे हैं, लेकिन उनमें योग्य संकाय सदस्यों (फैकल्टी) की नियुक्ति करना एक वास्तविक चुनौती बनी हुई है। इसके अतिरिक्त, स्नातक डॉक्टरों के लिए ग्रामीण, पहाड़ी या जनजातीय क्षेत्रों में कुछ समय तक सेवा देना अनिवार्य होने के बावजूद, कई बार जुर्माना देकर इस दायित्व से बचने का प्रयास किया जाता है, जिससे उस नीति के मूल उद्देश्य को क्षति पहुँचती है।
(पैरा 6.2.11)
291. समिति चिकित्सा छात्रों पर वित्तीय बोझ को कम करने के लिए चिकित्सा शिक्षा शुल्क, विशेष रूप से निजी संस्थानों में, को तर्कसंगत बनाने की सिफारिश करती है, ताकि स्नातक छात्रों को वर्षों तक ऋण चुकाने के लिए बाध्य न होना पड़े, जो आगे चलकर उनके कैरियर संबंधी निर्णयों को प्रभावित कर सकता है। समिति स्नातक डॉक्टरों के लिए अनिवार्य ग्रामीण, जनजातीय और पहाड़ी क्षेत्रों में सेवा की आवश्यकता को सख्ती से लागू करने का भी आह्वान करती है। समिति का मत है कि जुर्माना देकर इस दायित्व से बचने की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए, ताकि इस नीति का मूल उद्देश्य वास्तव में पूरा हो सके। इसके अतिरिक्त, समिति भारतीय चिकित्सा प्रवासी समुदाय में वास्तविक संभावनाएँ देखती है और प्रस्ताव करती है कि एक सुव्यवस्थित पंजीकरण प्रक्रिया विकसित की जाए। यह प्रक्रिया उन राज्य चिकित्सा परिषदों के पंजीकरणों पर आधारित हो सकती है, जिन्हें अनेक एनआरआई डॉक्टर अभी भी बनाए रखते हैं। इससे भारतवंशी डॉक्टर, जो सेवानिवृत्ति के निकट हैं या सेवानिवृत्त हो चुके हैं, जिला चिकित्सा महाविद्यालयों में अपनी सेवाएँ दे सकेंगे। इससे मरीजों को अपने निकट ही विश्वस्तरीय अनुभव और भाषा-अनुकूल स्वास्थ्य सेवाएँ प्राप्त होंगी, साथ ही स्थानीय डॉक्टरों और छात्रों के लिए सीखने के अवसरों का भी विस्तार होगा।
(पैरा 6.2.12)
292. समिति को अवगत कराया गया कि आयु-संबंधी और जीवनशैली से जुड़ी स्वास्थ्य स्थितियाँ, जिनमें मधुमेह, उच्च रक्तचाप, उच्च कोलेस्ट्रॉल और मोटापा शामिल हैं, तेजी से बढ़ रही हैं। यदि इन स्थितियों का समय पर समाधान नहीं किया जाता है, तो ये गंभीर जटिलताओं को जन्म देती हैं और पूरे परिवार पर महत्वपूर्ण आर्थिक बोझ डालती हैं। समिति को यह भी सूचित किया गया कि यूनाइटेड किंगडम जैसे विकसित देशों में भी, जहाँ उपचार प्राप्ति के समय निःशुल्क उपलब्ध कराया जाता है, वहाँ की स्वास्थ्य व्यवस्था को कठिन स्थिति में बताया गया है, जिसमें लंबी प्रतीक्षा सूचियाँ और मरीजों में विश्वास की कमी जैसी समस्याएँ शामिल हैं। समिति यह समुक्ति करती है कि केवल वित्तीय संसाधनों की उपलब्धता से ही सुलभ, गुणवत्तापूर्ण और विश्वसनीय स्वास्थ्य सेवा सुनिश्चित नहीं की जा सकती।
(पैरा 6.2.13)
293. समिति रोकथाम, जनस्वास्थ्य शिक्षा तथा नमक, चीनी और जीवनशैली से जुड़ी बीमारियों के संबंध में जागरूकता बढ़ाने पर विशेष जोर देती है, क्योंकि इससे रोगियों के व्यवहार में मापनीय परिवर्तन लाने की क्षमता है। समिति कम लागत वाली निवारक स्वास्थ्य पद्धति के रूप में योग को बढ़ावा देने की वकालत करती है। यह अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस द्वारा निर्मित मंच का लाभ उठाते हुए योग को चिकित्सकीय देखभाल के पूरक के रूप में स्थापित करने पर बल देती है, न कि उसके विकल्प के रूप में। व्यापक रूप से, समिति कम बाधाओं वाले सामुदायिक ओपीडी मॉडल को दोहराने को प्रोत्साहित करती है, जिसमें शाम के समय निःशुल्क परामर्श और दवाओं की सुविधा उपलब्ध कराई जाती है तथा सेवाएँ सम्मान और आत्मसम्मान की भावना के साथ प्रदान की जाती हैं। ऐसे मॉडल सड़क विक्रेताओं, रिक्शा चालकों और अन्य दैनिक मजदूरी करने वाले उन वर्गों तक पहुँच बनाने का एक प्रभावी और विस्तार योग्य माध्यम हो सकते हैं, जो अन्यथा पर्याप्त स्वास्थ्य सेवाओं से वंचित रह जाते हैं।
(पैरा 6.2.14)
294. समिति यह स्वीकार करती है कि समान और न्यायसंगत स्वास्थ्य सेवा वितरण को सुनिश्चित करने के लिए संरचनात्मक कमियों को दूर किया जाना आवश्यक है। समिति ने उप-स्वास्थ्य केंद्रों (एसएचसी), प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों (पीएचसी) और सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों (सीएचसी ) में मौजूदा कमियों को आईपीएचएस 2022 मानकों के अनुरूप सख्ती से पूरा करने की सिफारिश की है। समिति ने आयुष सुविधाओं के उन्नयन के लिए आयुष आईपीएचएस 2024 मानकों के अनुरूप चरणबद्ध कार्य-योजना (रोडमैप) विकसित करने की भी सिफारिश की है।
(पैरा 6.2.15)
295. समिति का मानना है कि आवश्यक दवाओं और नैदानिक सेवाओं की सभी स्वास्थ्य सेवा स्तरों पर निर्बाध उपलब्धता सुनिश्चित करने के लिए खरीद और आपूर्ति श्रृंखला प्रबंधन प्रणालियों को सुदृढ़ करना अत्यंत महत्वपूर्ण है। समिति का मत है कि नैदानिक क्षमताओं के विस्तार, जैव-चिकित्सीय अपशिष्ट प्रबंधन में सुधार तथा उन क्षेत्रों में विशेषीकृत सेवाओं तक पहुँच बढ़ाने के लिए सार्वजनिक क्षेत्र की सीमाओं को देखते हुए सार्वजनिक-निजी भागीदारी को प्रोत्साहित किया जाना चाहिए।
(पैरा 6.2.16)
296. समिति का मानना है कि बच्चों और किशोरों के स्वास्थ्य से संबंधित मुद्दों का समाधान करना दीर्घकालिक मानव पूंजी विकास के लिए आधारभूत महत्व रखता है। समिति ने आरबीएसके (राष्ट्रीय बाल स्वास्थ्य कार्यक्रम) टीमों को सशक्त बनाकर रोग स्थितियों की जाँच (स्क्रीनिंग) की गुणवत्ता और कवरेज में उल्लेखनीय सुधार करने की सिफारिश की है। समिति ने विद्यालयी व्यवस्था के अंतर्गत सकारात्मक मानसिक स्वास्थ्य को बढ़ावा देने तथा मानसिक स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं के समाधान के लिए विशेष प्रावधानों को शामिल करने की भी सिफारिश की है। समिति का मत है कि विद्यालयों को पाठ्यक्रम और सह-पाठ्यक्रम दोनों माध्यमों से योग, ध्यान, शारीरिक गतिविधियों तथा व्यापक स्वास्थ्य एवं पोषण शिक्षा को बढ़ावा देना चाहिए। इसके साथ ही, विद्यालयों में प्राथमिक उपचार (फर्स्ट एड) की अनिवार्य व्यवस्था सुनिश्चित की जानी चाहिए।
(पैरा 6.2.17)
297. समिति ने नोट किया कि एनक्यूएएस को कोई वैधानिक आधार प्राप्त नहीं है तथा एनक्यूएएस प्रमाणन स्वैच्छिक है और किसी पृथक वैधानिक अधिनियम से प्राप्त नहीं होता, जबकि सार्वजनिक स्वास्थ्य संस्थानों के शत-प्रतिशत कवरेज का लक्ष्य निर्धारित किया गया है। समिति सिफारिश करती है कि एनक्यूएएस को चरणबद्ध रूप से वैधानिक अथवा कार्यपालिका के आदेश का आधार प्रदान करने पर विचार किया जाए। कम-से-कम, पीएमजेएवाई के अंतर्गत सूचीबद्ध किए जाने तथा एनएचएम के अंतर्गत निधियों के निर्गमन के लिए एनक्यूएएस प्रमाणन को अनिवार्य पूर्व-शर्त बनाया जाए, न कि केवल एनएचए के माध्यम से प्रोत्साहन-आधारित संबद्धता पर निर्भर रहा जाए। समिति आगे यह समुक्ति करती है कि मानव संसाधन क्षमता, गुणवत्ता प्रशासन व्यवस्था का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है और समिति ने सिफारिश की कि देश के विविध भौगोलिक क्षेत्रों में मानकों के समरूप क्रियान्वयन को सुगम बनाने तथा सहकर्मी अधिगम एवं सर्वोत्तम कार्य-पद्धतियों के आदान-प्रदान को प्रोत्साहित करने के लिए 2,350 से अधिक राष्ट्रीय प्रशिक्षित मूल्यांकनकर्ताओं तथा 10,500 से अधिक राज्य स्तरीय प्रशिक्षित मूल्यांकनकर्ताओं की तैनाती की जाए।
(पैरा 6.2.18)
298. समिति ने नोट किया कि वर्तमान में बहु-अभिकरणीय व्यवस्था खंडित है, जिसमें एनक्यूएएस स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय के अधीन है, जबकि एनएबीएच/एनएबीएल क्यूसीआई के अधीन हैं, जो पूर्णतः एक भिन्न मंत्रालय, अर्थात् उद्योग और आंतरिक व्यापार संवर्धन विभाग, को रिपोर्ट करती है। समिति मानती है कि इससे एकाधिक प्रत्यायनों के लिए प्रयासरत स्वास्थ्य संस्थानों के समक्ष मूल्यांकन, अभिलेखीकरण संबंधी अपेक्षाओं तथा प्रशासनिक प्रयासों की पुनरावृत्ति की संभावना उत्पन्न होती है। समिति सिफारिश करती है कि स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय तथा उद्योग और आंतरिक व्यापार संवर्धन विभाग/ क्यूसीआई के मध्य एक औपचारिक अंतर-मंत्रालयी समन्वय तंत्र स्थापित किया जाए, जिससे एनक्यूएएस, एनएबीएच तथा एनएबीएल के मध्य मानकों की तुलनात्मक अनुरूपता अथवा समतुल्यता का मानचित्रण विकसित किया जा सके, ताकि स्वास्थ्य संस्थानों का लगभग समान मानदंडों के आधार पर पुनः मूल्यांकन न किया जाए। मौजूदा सक्षम मंच का उपयोग करते हुए एक साझा डिजिटल साक्ष्य भंडार विकसित किया जा सकता है, जिससे मूल्यांकन संबंधी अभिलेखों का विभिन्न प्रणालियों में पुनः उपयोग किया जा सके।
(पैरा 6.2.19)
299. समिति समुक्ति करती है कि शिक्षण/अनुसंधान/अधिक मात्रा में सेवा प्रदान करने से संबंधित पहलुओं को मानकों में परिलक्षित नहीं किया गया है। वर्तमान रूपरेखाएँ सरकारी चिकित्सा महाविद्यालयों और सार्वजनिक क्षेत्र के अस्पतालों की व्यापक जिम्मेदारियों तथा परिचालन संबंधी वास्तविकताओं को पूर्ण रूप से प्रतिबिंबित नहीं कर सकती हैं, जिनमें शिक्षण, अनुसंधान, राष्ट्रीय स्वास्थ्य कार्यक्रम और अधिक मात्रा में सेवा प्रदान करना शामिल हैं। समिति सिफारिश करती है कि शिक्षण/तृतीयक अस्पतालों के लिए विशेष रूप से एक पूरक एनक्यूएएस मॉड्यूल विकसित किया जाए, जिसमें शैक्षणिक और अनुसंधान कार्यों को सम्मिलित किया जाए तथा इसे राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग (एनएमसी) की मान्यता मानदंडों के साथ समन्वित किया जाए, ताकि चिकित्सा महाविद्यालयों को परस्पर विरोधी या दोहराव वाली मान्यता आवश्यकताओं का सामना न करना पड़े।
(पैरा 6.2.20)
300. समिति पाती है कि छोटी/ग्रामीण/दूरस्थ सुविधाओं पर असमान भार से संबंधित कोई आंकड़ा उपलब्ध नहीं है। स्वास्थ्य संस्थानों की विभिन्न श्रेणियों में अनुपालन भार, स्थिरता अथवा लाभों के संबंध में कोई समेकित राष्ट्रीय मूल्यांकन नहीं किया गया है, जबकि यह स्वीकार किया गया है कि छोटी, ग्रामीण, दूरस्थ और वंचित क्षेत्रों में स्थित सुविधाओं को बड़े कॉर्पोरेट अस्पतालों की तुलना में अनुपातिक रूप से अधिक लागत का सामना करना पड़ सकता है। समिति सिफारिश करती है कि सुविधा के आकार/स्थान/स्वामित्व के आधार पर अनुपालन लागत, प्रमाणन प्राप्त करने में लगने वाला समय तथा मूल्यांकनकर्ताओं की उपलब्धता की तुलना करने के लिए एक संरचित राष्ट्रीय मूल्यांकन अध्ययन कराया जाए। निष्कर्षों का उपयोग एडीपी/एबीपी और वंचित क्षेत्रों की सुविधाओं के लिए चरणबद्ध समय-सीमा, अतिरिक्त मार्गदर्शन सहायता अथवा उच्चतर एनएचएम प्रोत्साहन भार निर्धारित करने हेतु किया जाना चाहिए, न कि सभी सुविधाओं को एक समान अनुपालन मानदंड के अंतर्गत रखा जाए।
(पैरा 6.2.21)
301. समिति का मत है कि एनक्यूएएस के अंतर्गत 2,350 से अधिक राष्ट्रीय और 10,500 से अधिक राज्य मूल्यांकनकर्ताओं के कार्यरत होने के साथ, तीव्र विस्तार से मूल्यांकन अंकों में एकरूपता का स्वाभाविक प्रश्न उत्पन्न होता है, यद्यपि मानकीकृत उपकरण और वस्तुनिष्ठ अंक निर्धारण की व्यवस्था उपलब्ध है। समिति सिफारिश करती है कि वर्तमान पाक्षिक अधिगम श्रृंखला के साथ-साथ समय-समय पर मूल्यांकनकर्ताओं के मध्य समन्वयन अभ्यास और पुनश्चर्या चक्रों को संस्थागत रूप दिया जाए तथा सक्षम के आंकड़ा विश्लेषण के अंतर्गत मूल्यांकनकर्ताओं के मध्य विश्वसनीयता के मापदंड प्रकाशित किए जाएँ।
(पैरा 6.2.22)
302. समिति का मत है कि सक्षम की विश्लेषणात्मक क्षमता का उपयोग एक सार्वजनिक, सुविधा-स्तरीय डैशबोर्ड प्रकाशित करने के लिए किया जाना चाहिए, जिसमें प्रमाणन की स्थिति, इसमें लगने वाला समय तथा भौगोलिक/स्तर-वार असमानताओं को दर्शाया जाए जिससे पहले से विकसित “डिजिटल पारिस्थितिकी तंत्र” को केवल कार्यप्रवाह प्रणाली के रूप में नहीं, बल्कि उत्तरदायित्व सुनिश्चित करने वाले उपकरण के रूप में उपयोग किया जा सकेगा।
(पैरा 6.2.23)
निवारक स्वास्थ्य देखभाल में निवेश
303. समिति समुक्ति करती है कि स्वास्थ्य देखभाल पर व्यय मुख्य रूप से रोगों की रोकथाम के स्थान पर उन्नत रोगों के उपचार की दिशा में केंद्रित है, जिसके परिणामस्वरूप दीर्घकालिक लागत में वृद्धि होती है। तृतीयक देखभाल संस्थान ऐसे रोगियों के कारण अत्यधिक भीड़ का सामना करते हैं, जिनकी स्थितियों का प्रभावी प्रबंधन प्राथमिक या द्वितीयक सुविधाओं पर किया जा सकता है, जिससे उन्नत विशेषज्ञ हस्तक्षेप की आवश्यकता वाले व्यक्तियों की पहुंच सीमित हो जाती है। रोगियों का एक महत्वपूर्ण अनुपात ऐसी स्थितियों के लिए प्राथमिक देखभाल को छोड़कर सीधे विशेषज्ञ परामर्श प्राप्त करने का प्रयास करता है, जिनका प्रबंधन प्राथमिक स्तर पर किया जा सकता है। अतः समिति सिफारिश करती है कि उच्च स्तरीय अस्पतालों पर भार कम करने के लिए निवारक स्वास्थ्य देखभाल, स्वास्थ्य संवर्धन और जांच कार्यक्रमों में निवेश बढ़ाया जाए। समिति का मत है कि तृतीयक देखभाल संस्थानों को वास्तविक रेफरल सेंटर के रूप में कार्य करना चाहिए, जहां गैर-आपातकालीन रोगियों का मूल्यांकन केवल रेफरल के आधार पर किया जाए, जबकि आपातकालीन स्थितियों के लिए तत्काल पहुंच सुनिश्चित रखी जाए। समिति का मत है कि पारिवारिक चिकित्सा प्रशिक्षण का विस्तार किया जाना चाहिए, जिससे स्वास्थ्य देखभाल प्रणाली में पारिवारिक चिकित्सकों को प्रथम संपर्क बिंदु के रूप में प्रभावी रूप से स्थापित किया जा सके।
(पैरा 6.2.24)
संरचित जिला आवासीय नैदानिक प्रशिक्षण
304. समिति समुक्ति करती है कि सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र (सीएचसी) और उप-जिला अस्पताल शिक्षण सुविधाओं के रूप में अभी भी पर्याप्त रूप से उपयोग में नहीं लाए जा रहे हैं, जिससे छात्रों को जिला स्तर की स्वास्थ्य देखभाल से परिचित होने के अवसर सीमित हो रहे हैं। वर्तमान संकाय मानदंड और प्रशिक्षण क्षमताएँ दीर्घकालिक देखभाल, कैंसर विज्ञान और गहन देखभाल में सुपर-स्पेशलिस्ट की बढ़ती मांग को पूरा करने के लिए संभवतः अपर्याप्त हैं। बेड और संकाय संबंधी आवश्यकताओं के मामले में सरकारी और निजी चिकित्सा महाविद्यालयों के मध्य अंतर, शैक्षणिक गुणवत्ता में वृद्धि किए बिना स्नातकोत्तर कार्यक्रमों की लागत को बढ़ाता है। कुछ संस्थानों में विशेषज्ञ संकाय की स्थानीय कमी है, जबकि अन्य संस्थानों में उपलब्ध विशेषज्ञता का पर्याप्त उपयोग नहीं हो रहा है। समिति सिफारिश करती है कि सभी चिकित्सा महाविद्यालय छात्रों और इंटर्न के लिए संरचित जिला आवासीय प्रशिक्षण और नैदानिक प्रशिक्षण की सुविधा हेतु नामित सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों (सीएचसी) और उप-जिला अस्पतालों से संबद्ध किए जाएँ।
(पैरा 6.2.25)
305. समिति का मत है कि संकाय मानदंडों में उपयुक्त लचीलेपन को पुनः लागू करके सुपर-स्पेशलिटी (डीएम/एमसीएच) प्रशिक्षण का विस्तार किया जाना चाहिए। अतः समिति सिफारिश करती है कि डीएम/एमसीएच संकाय और उनके नैदानिक बिस्तरों को स्नातक और स्नातकोत्तर शिक्षा के लिए पात्र शिक्षण संसाधनों के रूप में मान्यता दी जाए, ताकि संसाधनों का अनुकूलतम उपयोग किया जा सके और विशेषज्ञ जनशक्ति में वृद्धि की जा सके। समिति का मत है कि स्नातकोत्तर शिक्षा के लिए सभी संस्थानों में एकसमान दक्षता-आधारित मानकों को लागू किया जाना चाहिए, जिसमें संस्थागत स्वामित्व के स्थान पर नैदानिक अनुभव और केस मिश्रण पर ध्यान केंद्रित किया जाए। समिति सिफारिश करती है कि आगंतुक नियुक्तियों और दूरस्थ शिक्षा के माध्यम से विशेषज्ञता के उपयोग हेतु संकाय साझाकरण के लिए एक राष्ट्रीय रूपरेखा विकसित की जाए।
(पैरा 6.2.26)
लागत-प्रभावी देखभाल को बढ़ावा देने हेतु नैदानिक लेखा-परीक्षण
306. समिति नोट करती है कि कॉर्पोरेट अस्पतालों के शुल्कों में पारदर्शिता का अभाव है तथा विभिन्न प्रक्रियाओं और जांचों के लिए इनमें व्यापक भिन्नता पाई जाती है। जेब से किए जाने वाले व्यय का एक बड़ा भाग औषधियों, प्रत्यारोपणों और नैदानिक जांचों की लागत के कारण होता है। वर्तमान स्वास्थ्य देखभाल वित्तपोषण तंत्र मुख्य रूप से नैदानिक परिणामों के स्थान पर सेवा की मात्रा को प्रोत्साहित करते हैं। नैदानिक अभ्यासों में भिन्नताएँ अनावश्यक जांचों और बढ़ी हुई लागत का कारण बनती हैं। अतः समिति सिफारिश करती है कि मानकीकृत लागत लेखांकन और पारदर्शी मूल्य निर्धारण व्यवस्था लागू की जाए, ताकि शुल्कों का निर्धारण लेखा-परीक्षित लागत और उचित परिचालन लाभ के अनुरूप सुनिश्चित किया जा सके। समिति मानती है कि केंद्रीकृत खरीद व्यवस्था को सुदृढ़ किया जाना चाहिए, जेनेरिक औषधियों को प्रोत्साहित किया जाना चाहिए तथा आवश्यक औषधियों और प्रत्यारोपणों के मूल्यों को सख्ती से विनियमित किया जाना चाहिए। समिति का मत है कि अस्पतालों के प्रतिपूर्ति और प्रोत्साहन तंत्र को प्रक्रिया की मात्रा के स्थान पर गुणवत्ता संकेतकों, रोगी सुरक्षा और दक्षता से जोड़ा जाना चाहिए। समिति सिफारिश करती है कि लागत-प्रभावी देखभाल को बढ़ावा देने के लिए नियमित नैदानिक लेखा-परीक्षणों के साथ साक्ष्य-आधारित राष्ट्रीय उपचार प्रोटोकॉल लागू किए जाएँ।
(पैरा 6.2.27)
डिजिटल स्वास्थ्य रेकॉर्ड्स
307. समिति का मत है कि खंडित स्वास्थ्य रेकॉर्ड्स और दोहराई गई नैदानिक जांचें प्रणालीगत दक्षता को कम करती हैं तथा लागत में वृद्धि करती हैं। उन्नत नैदानिक और उपचारात्मक उपकरण अत्यधिक महंगे हैं और अक्सर उनका पर्याप्त उपयोग नहीं किया जाता है, जबकि अनेक जिलों में इनकी उपलब्धता नहीं है। राष्ट्रीय सार्वजनिक स्वास्थ्य उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए पर्याप्त निजी क्षेत्र की स्वास्थ्य देखभाल अवसंरचना का भी पूर्ण उपयोग नहीं किया जा रहा है। अनेक ऐसी प्रक्रियाएँ, जिनके लिए अस्पताल में भर्ती की आवश्यकता होती है, सुरक्षित रूप से डे-केयर शल्य प्रक्रियाओं के रूप में की जा सकती हैं। समिति सिफारिश करती है कि अंतर-संचालनीय इलेक्ट्रॉनिक स्वास्थ्य रेकॉर्ड्स , टेलीमेडिसिन सेवाएँ और एआई-समर्थित नैदानिक निर्णय प्रणालियाँ स्थापित की जाएँ। समिति का मत है कि मान्य एआई-समर्थित जांच कार्यक्रमों का विस्तार किया जाना चाहिए, ताकि सामान्य रोगों के शीघ्र निदान को सुगम बनाया जा सके। अतः समिति सिफारिश करती है कि क्षेत्रीय साझा-संसाधन नेटवर्क स्थापित किए जाएँ, जिससे सरकारी और मान्यता प्राप्त निजी अस्पताल पीईटी-सीटी, एमआरआई और आणविक नैदानिक सेवाओं जैसे उच्च लागत वाले उपकरणों तक पहुंच का समय निर्धारित कर सकें। समिति का मत है कि एक संरचित रूपरेखा स्थापित की जानी चाहिए, जिसके अंतर्गत मान्यता प्राप्त निजी अस्पतालों को रोग निगरानी और टीकाकरण सहित राष्ट्रीय स्वास्थ्य कार्यक्रमों में योगदान देने के लिए अनिवार्य या प्रोत्साहित किया जा सके। समिति सिफारिश करती है कि मानकीकृत नैदानिक प्रोटोकॉल और उपयुक्त प्रतिपूर्ति तंत्रों के कार्यान्वयन के माध्यम से डे-केयर शल्य चिकित्सा सेवाओं का विस्तार किया जाए।
(पैरा 6.2.28)
308. समिति का मत है कि इलेक्ट्रॉनिक चिकित्सा रिकार्ड (ईएमआर) और अस्पताल सूचना प्रणालियों (एचआईएस) के लिए वर्तमान वाणिज्यिक बाजार अत्यधिक महंगे लाइसेंसिंग अवरोधों के कारण महत्वपूर्ण डिजिटल अवसंरचना तक पहुंच को सीमित करता है। अतः, समिति सिफारिश करती है कि स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय, इलेक्ट्रॉनिकी और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय (एमईआईटीवाई) के साथ मिलकर, उच्च स्तरीय सॉफ्टवेयर उद्यमों को उद्यम-स्तरीय, मुक्त स्रोत डिजिटल स्वास्थ्य मंच के निर्माण में सहायता प्रदान करने के लिए एक समर्पित निधि स्थापित करे। समिति का मत है कि यह मंच सभी हितधारकों के मध्य अंतर को स्वाभाविक रूप से समाप्त करने में सक्षम होना चाहिए तथा बेडसाइड उपकरणों के साथ प्रत्यक्ष इंटरनेट ऑफ थिंग्स (आईओटी) एकीकरण को सम्मिलित करना चाहिए। एक बार अंतिम रूप दिए जाने के पश्चात, इस सॉफ्टवेयर को आधुनिक डिजिटल कार्यप्रवाहों तक पहुंच को लोकतांत्रिक बनाने के लिए मुक्त स्रोत लाइसेंस के अंतर्गत वैश्विक स्तर पर पूर्णतः निःशुल्क जारी किया जाना चाहिए। अतः, समिति पोर्टेबल एक्स-रे सहित एक्स-रे के विश्लेषण के लिए एक मुक्त स्रोत, अत्यंत किफायती एआई समाधान की पुरजोर सिफारिश करती है, ताकि सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों (सीएचसी) या प्राथमिक स्वास्थ्य देखभाल केंद्रों (पीएचसीसी) के स्तर पर ही उनका विश्लेषण किया जा सके। अतः, समिति सीएचसी और पीएचसीसी में ऐसे एक्स-रे के विश्लेषण हेतु उपयोग किए जाने वाले एआई की लागत को तर्कसंगत बनाने/सीमित करने की पुरजोर सिफारिश करती है।
(पैरा 6.2.29)
स्वास्थ्य बचत खाता (एचएसए) की रणनीतिक कार्य योजना
309. समिति समुक्ति करती है कि भारत के 85% से अधिक कार्यबल अनौपचारिक क्षेत्र में कार्यरत हैं, जिनके पास संस्थागत सामाजिक सुरक्षा या संरचित स्वास्थ्य देखभाल कवरेज पूर्णतः उपलब्ध नहीं है। जबकि सरकार सार्वजनिक स्वास्थ्य देखभाल पर अपने सकल घरेलू उत्पाद का लगभग 1.5% व्यय करती है, तथापि समिति ने व्यक्त किया है कि केवल सार्वजनिक वित्तपोषण ही लाखों परिवारों द्वारा जेब से किए जाने वाले विनाशकारी स्वास्थ्य व्यय (ओओपीई) को पूर्ण रूप से वहन नहीं कर सकता है। अल्पावधि में इन रोजगार संबंधों को मानक कॉर्पोरेट स्वास्थ्य कवरेज के अंतर्गत औपचारिक रूप प्रदान करना एक प्रशासनिक बाधा है। अतः समिति सिफारिश करती है कि सरकार को हेल्थ सेविंग्स अकाउंट्स (एचएसए) के आर्थिक उपकरण को लागू करना चाहिए, जो सफल वैश्विक उदाहरणों और ढांचों के आधार पर तैयार हुआ और सिंगापुर ने 1984 में मेडिसेव प्रणाली के माध्यम से एचएसए दृष्टिकोण की पहल की, इसके बाद चीन ने (300 मिलियन से अधिक कर्मचारियों को कवर करते हुए) और संयुक्त राज्य अमेरिका, जिसमें उपभोक्ता एचएसए में 50 बिलियन डॉलर से अधिक प्रबंधित हैं।
(पैरा 6.2.30)
310. इस संबंध में, समिति पाती है कि भारतीय रिज़र्व बैंक (आरबीआई) ने शून्य-बैलेंस स्वास्थ्य बचत खातों (एचएसए) (जो जन धन व्यवस्था के अनुरूप है) के लिए नियामकीय मार्ग को बैंक ऑफ बड़ौदा द्वारा 18 दिसंबर, 2025 को भारत का पहला समर्पित एचएसए उत्पाद प्रारंभ करने के साथ स्वीकृति प्रदान कर दी है । अतः, समिति सिफारिश करती है कि सरकार खाता बनाने को अनिवार्य बनाकर, स्वैच्छिक योगदान को प्रोत्साहित करके और बीमा के मध्यस्थीकरण को समाप्त करके एक रणनीतिक कार्य योजना प्रारंभ करे। केंद्र सरकार को यह अनिवार्य करना चाहिए कि सभी अस्थायी, गिग और अनौपचारिक क्षेत्र के श्रमिकों को शून्य-बैलेंस एचएसए के अंतर्गत पंजीकृत किया जाए। पंजीकरण की प्रशासनिक जिम्मेदारी तत्काल नियोक्ता या संविदा मंच पर होनी चाहिए। अस्थायी श्रमिकों के लिए अनिवार्य वेतन-कर के प्रति नियोक्ताओं के संभावित प्रतिरोध को दूर करने के लिए, प्रारंभिक चरण में योगदान को स्वैच्छिक रखा जाना चाहिए। नियोक्ताओं को प्रणालीगत रूप से प्रेरित किया जाना चाहिए कि वे प्रति श्रमिक प्रति माह 100 से 200 रुपये का मामूली योगदान करें। इन एचएसए में संचित निधियों को कानूनी रूप से पृथक सुरक्षित रखा जाना चाहिए, जिनका उपयोग केवल स्वास्थ्य संबंधी व्यय और सूक्ष्म स्वास्थ्य बीमा पॉलिसियों के प्रत्यक्ष प्रीमियम भुगतान के लिए किया जा सके। बीमाकर्ताओं को सीधे एचएसए धारकों से जोड़कर, सरकार का उद्देश्य उन मध्यस्थों और दलालों को समाप्त करना होना चाहिए, जो परंपरागत रूप से प्रीमियम वितरण का 30% से 40% तक हिस्सा ले लेते हैं, जिससे गरीबों के लिए बीमा लागत में अत्यधिक कमी आएगी।
(पैरा 6.2.31)
वैश्विक चिकित्सा उपकरण विनिर्माण केंद्र की ओर संक्रमण
311. भारतीय स्वास्थ्य देखभाल व्यवस्था आयातित चिकित्सा प्रौद्योगिकी पर अत्यधिक निर्भर है। अनेक सरकारी तृतीयक केंद्र या निजी अस्पताल तथा महत्वपूर्ण नैदानिक एवं लाइफ-सपोर्ट अवसंरचना लगभग पूर्णतः विदेशी कंपनियों के समूहों द्वारा निर्मित की जाती है, जो गंभीर राष्ट्रीय सुरक्षा जोखिम उत्पन्न करती है और घरेलू नैदानिक प्रक्रियाओं की लागत को विदेशी मुद्रा में उतार-चढ़ाव (यूएसडी/ईयूआर) से जोड़ती है। भारतीय चिकित्सा उपकरण उद्योग संघ (एआईएमईडी) के अनुसार, वर्तमान में भारत अपने चिकित्सा उपकरणों का लगभग 70-80% आयात करता है, जिससे स्वास्थ्य व्यवस्था बाहरी आपूर्ति बाधाओं और उच्च पूंजीगत व्यय आवश्यकताओं के प्रति संवेदनशील हो जाती है। समिति का मत है कि सरकार को आयात-निर्भर बाजार से चिकित्सा उपकरणों के वैश्विक विनिर्माण केंद्र की ओर संक्रमण करना चाहिए। घरेलू ऑटोमोबाइल क्षेत्र और चीन की औद्योगिक रूपरेखाओं द्वारा सफलतापूर्वक उपयोग किए गए चरणबद्ध विनिर्माण और प्रौद्योगिकी हस्तांतरण मॉडलों को अपनाने की तत्काल आवश्यकता है।
(पैरा 6.2.32)
312. सरकार को उन वैश्विक चिकित्सा उपकरण निर्माताओं को पूर्ण 0-5 वर्ष की कॉर्पोरेट कर छूट प्रदान करनी चाहिए, जो इसके लिए घटकों के स्थानीयकरण को अनिवार्य शर्त बनाते हुए भारत में पूर्ण पैमाने पर विनिर्माण सुविधाएँ स्थापित करते हैं। नीति में साधारण “स्क्रूड्राइवर असेंबली” संयंत्रों को स्पष्ट रूप से हतोत्साहित करने का प्रावधान होना चाहिए। कर रियायतों को चरणबद्ध स्थानीयकरण कार्यक्रमों से व्यवस्थित रूप से जोड़ा जाना चाहिए, जिसके अंतर्गत घटकों, सेंसरों और सॉफ्टवेयर संरचना का विकास देश में ही किया जाना आवश्यक हो। समिति यह समझती है कि वैश्विक प्रमुख कंपनियों के साथ सहयोग करने से भारतीय जैव-चिकित्सा अभियंताओं और तकनीशियनों का एक कुशल समूह तैयार होगा तथा समय के साथ ये व्यक्ति स्वदेशी उद्यमों को आगे बढ़ाएंगे, जिससे घरेलू ऑटोमोबाइल कंपनियों के उस विकास पथ की पुनरावृत्ति होगी, जिसके माध्यम से वे वैश्विक बाजार के अग्रणी कंपनियों के साथ सफलतापूर्वक प्रतिस्पर्धा करने में सक्षम हुईं।
(पैरा 6.2.33)
टियर-II एवं टियर-III शहरों तथा ग्रामीण क्षेत्रों में नैदानिक विशेषज्ञताओं की उपलब्धता सुनिश्चित करना
313. समिति का मत है कि टियर-2, टियर-3 और ग्रामीण क्षेत्रों में नैदानिक विशेषज्ञों की गंभीर कमी को दूर करने के लिए राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग (एनएमसी) को कठोर, पुरानी शैक्षणिक संरचनाओं से हटकर उपलब्ध चिकित्सा प्रतिभा संसाधनों का अनुकूलतम उपयोग करना चाहिए। हजारों एमबीबीएस स्नातक अपने सर्वाधिक उत्पादक नैदानिक वर्षों को पुस्तकालयों में अकेले बैठकर और अत्यधिक प्रतिस्पर्धी नीट-पीजी परीक्षा उत्तीर्ण करने के लिए बहुविकल्पीय प्रश्नों (एमसीक्यू) को रटकर तैयार करने में बिताते हैं। साथ ही, छोटे शहरों के रोगी सामान्य एमबीबीएस चिकित्सकों को स्वीकार नहीं करते हैं और विशेषज्ञ चिकित्सकों की मांग करते हैं। टियर-I शहरों से टियर-II और टियर-III शहरों तक विशेषज्ञों के वितरण को बढ़ाने के लिए सकारात्मक कार्रवाई और प्रोत्साहनों के माध्यम से क्षेत्रीय वितरण में संतुलन स्थापित किया जाना चाहिए।
(पैरा 6.2.34)
314. समिति समुक्ति करती है कि हृदयवाहिका रोग (सीवीडी) भारत में समयपूर्व मृत्यु का प्रमुख कारण बना हुआ है। कार्डियोलॉजी में डीएम करने वाले सुपर-स्पेशलिस्ट को कठोर प्रशिक्षण के लिए 14 वर्ष तक का समय लग सकता है और वे प्रायः टियर-I शहरों के बाहर बसना पसंद नहीं करते हैं। समिति के संज्ञान में आया है कि अठारह वर्ष पूर्व, इंदिरा गांधी राष्ट्रीय मुक्त विश्वविद्यालय (आईजीएनओयू) ने सामुदायिक कार्डियोलॉजी में डिप्लोमा प्रारंभ किया था, जो एमबीबीएस चिकित्सकों के लिए एक दो वर्षीय संरचित कार्यक्रम था और इसे भारत के प्रमुख हृदय संस्थानों के सहयोग से संचालित किया गया था। इसने सफलतापूर्वक 2,500 से अधिक गैर-हस्तक्षेपात्मक हृदय रोग विशेषज्ञों को प्रशिक्षित किया, जिन्होंने ग्रामीण और अर्ध-शहरी समुदायों में प्रारंभिक हृदयाघात संबंधी हस्तक्षेपों का प्रबंधन किया और बाल हृदय संबंधी जांच कार्यक्रम संचालित किए। यद्यपि एनएमसी ने हाल ही में उन प्रारंभिक 2,500 चिकित्सकों की मान्यता को वैध माना है, तथापि पूर्ववर्ती भारतीय चिकित्सा परिषद (एमसीआई) के समय से चली आ रही आपत्तियों के कारण प्रशिक्षण की प्रक्रिया अभी भी स्थगित है। अतः, समिति एनएमसी से अपेक्षा करती है कि वह सामुदायिक कार्डियोलॉजी में डिप्लोमा को पुनः संस्थागत रूप देने पर विचार करे, ताकि गैर-हस्तक्षेपात्मक हृदय देखभाल विशेषज्ञों को सीधे उप-जिला स्तर पर तैनात किया जा सके।
(पैरा 6.2.35)
पॉइंट-ऑफ-केयर अल्ट्रासाउंड (पीओसीयूएस) की उपलब्धता सुनिश्चित करना
315 समिति समुक्ति करती है कि गर्भधारण-पूर्व और प्रसव-पूर्व नैदानिक तकनीक (पीएनडीटी) अधिनियम, यद्यपि कन्या भ्रूण हत्या की रोकथाम के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है, परंतु इसने एक परिचालन संकट उत्पन्न कर दिया है। यह कानून किसी पंजीकृत रेडियोलॉजिस्ट या स्त्री रोग विशेषज्ञ के अतिरिक्त किसी अन्य चिकित्सक द्वारा अल्ट्रासाउंड मशीन संचालित करने पर कड़े दंड का प्रावधान करता है, जबकि वर्तमान समय में पॉइंट-ऑफ-केयर अल्ट्रासाउंड (पीओसीयूएस) एक महत्वपूर्ण नैदानिक उपकरण है, जो आधुनिक स्टेथोस्कोप के समान है और आघात, हृदय संबंधी घटनाओं तथा तीव्र उदर संबंधी आपात स्थितियों के त्वरित मूल्यांकन के लिए आवश्यक है। समिति सिफारिश करती है कि पॉइंट-ऑफ-केयर उपकरणों के लिए विनियामक तंत्र को सरल बनाया जाए। द लैंसेट कमीशन ऑन ग्लोबल सर्जरी के अनुसार, निम्न और मध्यम आय वाले देश अत्यधिक शल्य चिकित्सा अभाव का सामना कर रहे हैं। भारत में प्रतिवर्ष लगभग 25 मिलियन शल्य प्रक्रियाएँ की जाती हैं, जबकि वास्तविक अनुमानित आवश्यकता 70 मिलियन शल्य प्रक्रियाओं की है, जिसका एक प्रमुख कारण स्थानीय स्तर पर नैदानिक सुविधाओं की कमी है। भारत में पंजीकृत रेडियोलॉजिस्ट की संख्या 12,000 से कम है। इनमें से एक महत्वपूर्ण भाग मुख्य रूप से दूरस्थ रूप से टेलीरेडियोलॉजी सीटी और एमआरआई जांचों की रिपोर्ट तैयार करने पर केंद्रित है, क्योंकि सामान्य भौतिक अल्ट्रासाउंड के लिए स्थानीय स्तर पर प्रत्यक्ष शारीरिक संलग्नता के लगभग 20 मिनट की आवश्यकता होती है, जिससे जांच क्षमता कम हो जाती है। समिति सिफारिश करती है कि प्रारंभिक लिवर रोग के निदान के लिए मिशन मोड में जांच को बढ़ावा दिया जाए, क्योंकि देश फैटी लिवर रोग की महामारी का सामना कर रहा है। लिवर जांच के लिए फाइब्रोस्कैन मशीनें सीएचसी स्तर पर स्थापित की जाएँ , जहाँ चिकित्सा पेशेवरों को इनके निष्कर्षों की व्याख्या करने के लिए प्रशिक्षित किया जाए।
(पैरा 6.2.36)
316. अतः, समिति सिफारिश करती है कि सरकार को 14 वर्ष पूर्व दिए गए उच्चतम न्यायालय के निर्देश को क्रियान्वित करना चाहिए, जिसमें छह माह के संरचित प्रशिक्षण प्रमाणन प्राप्त एमबीबीएस चिकित्सकों को सामान्य अल्ट्रासाउंड जांच करने और उनकी व्याख्या करने की अनुमति प्रदान की गई थी। अवैध भ्रूण लिंग निर्धारण के जोखिम को समाप्त करने के लिए, भारत सरकार को भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद (आईसीएमआर) के माध्यम से चिकित्सा इमेजिंग उपकरण निर्माताओं के साथ सहयोग कर दोहरे फर्मवेयर आधारित बाजार विभाजन, अर्थात् तकनीकी सुरक्षा उपाय, को अनिवार्य करना चाहिए। समिति सिफारिश करती है कि एमबीबीएस चिकित्सकों के लिए रेडियोलॉजी में छह माह का पाठ्यक्रम प्रारंभ किया जाए, ताकि वे सीएचसी स्तर पर जांचों की व्याख्या कर सकें।
(पैरा 6.2.37)
317. समिति का मत है कि सार्वजनिक संसाधनों के आवंटन को प्रारंभिक पहचान की दिशा में केंद्रित किया जाना चाहिए, ताकि हृदयवाहिका रोगों और कैंसर संबंधी घातक रोगों से होने वाली समयपूर्व मृत्यु को व्यवस्थित रूप से कम किया जा सके। अतः, समिति सिफारिश करती है कि 40 वर्ष से अधिक आयु के प्रत्येक नागरिक के लिए एक किफायती वार्षिक नैदानिक पैकेज उपलब्ध कराया जाए। इस पैकेज में मानकीकृत रक्त संबंधी जांच, इलेक्ट्रोकार्डियोग्राम (ईसीजी), एक बेसिक इकोकार्डियोग्राम तथा छाती और उदर के निम्न-खुराक कंप्यूटेड टोमोग्राफी (एलडीसीटी) स्कैन सम्मिलित किए जाने चाहिए, ताकि उपचारात्मक और कम लागत वाले हस्तक्षेपों को सुगम बनाया जा सके।
(पैरा 6.2.38)
नर्सिंग क्षमता निर्माण
318. समिति का मत है कि प्रारंभिक स्तर के नर्सों में नैदानिक दक्षता की कमी, नैदानिक अनुभव से वंचित पृथक संस्थानों के कारण उत्पन्न होती है। अतः, समिति सिफारिश करती है कि भारतीय नर्सिंग परिषद और राज्य लाइसेंसिंग बोर्ड नर्सिंग शिक्षा को सक्रिय नैदानिक वातावरण से कानूनी रूप से संबद्ध करें। समिति का मत है कि किसी भी संस्था को नर्सिंग महाविद्यालय संचालित करने का लाइसेंस तब तक प्रदान नहीं किया जाना चाहिए, जब तक कि वह एक कार्यशील, न्यूनतम 100-बिस्तरों वाले सामान्य अस्पताल का स्वामित्व और संचालन न करती हो। अतः, समिति बेडसाइड शिक्षण रूपरेखा लागू करने की सिफारिश करती है। इससे एक साथ अस्पतालों में तत्काल नर्सिंग क्षमता में सुधार होगा और संस्थानों को शिक्षण शुल्क कम करने में सहायता मिलेगी, जिससे शिक्षा अधिक सुलभ होगी तथा उच्च कौशलयुक्त स्नातक तैयार किए जा सकेंगे। समिति एक ऐसी व्यवस्था के निर्माण की सिफारिश करती है, जिसके अंतर्गत नर्सिंग स्नातक संसाधन की कमी वाले देशों के लिए जनशक्ति उपलब्ध कराने हेतु स्थानांतरित हो सकें।
(पैरा 6.2.39)
319. ग्रामीण और अर्ध-शहरी क्षेत्रों में प्राथमिक देखभाल चिकित्सकों की दीर्घकालिक कमी को दूर करने के लिए, समिति का मत है कि भारत को उन्नत प्रैक्टिस नर्सिंग रूपरेखा को अपनाना चाहिए। अतः, समिति प्रमाणित नर्स प्रैक्टिशनर (एनपी) रूपरेखा प्रारंभ करने की सिफारिश करती है। इस प्रमाणन को प्राप्त करने वाले अनुभवी नर्सों को प्राथमिक देखभाल की 47 आवश्यक औषधियों की स्पष्ट रूप से निर्धारित सूची के लिए सीमित स्वतंत्र औषधि-निर्धारण अधिकार प्रदान किए जाने चाहिए। स्वास्थ्य एवं आरोग्य केंद्र (एचडब्ल्यूसी) स्तर पर इन प्रमाणित एनपी की तैनाती प्राथमिक देखभाल की कमी को तत्काल पूरा करेगी।
(पैरा 6.2.40)
स्वास्थ्य बीमा प्रीमियम पर जीएसटी छूट
320. समिति का मत है कि वर्तमान राजकोषीय व्यवस्था, जिसमें समूह स्वास्थ्य बीमा पर 18% कर लगाया जाता है, जबकि व्यक्तिगत खुदरा पॉलिसियों को इससे छूट प्राप्त है, गिग श्रमिकों और अनौपचारिक समूहों जैसे संवेदनशील कार्यबलों के लिए अनपेक्षित दंड का कारण बनती है। समिति, अतः, प्रति बीमित व्यक्ति के लिए निर्धारित सीमा तक कम लागत वाले समूह स्वास्थ्य बीमा प्रीमियम पर पूर्ण जीएसटी छूट की सिफारिश करती है। यह समायोजन मंचों और सहकारी संस्थाओं को लाखों निम्न-आय वाले श्रमिकों के लिए आवश्यक सुरक्षा तंत्र सुनिश्चित करने हेतु सक्रिय रूप से प्रोत्साहित करेगा।
(पैरा 6.2.41)
एकीकृत चिकित्सा शिक्षा और विनियामक मानदंडों के युक्तिकरण के माध्यम से स्वास्थ्य देखभाल वितरण को सुदृढ़ करना
321. समिति का मत है कि किफायती स्वास्थ्य देखभाल का सीधा संबंध पर्याप्त, सक्षम और अच्छी तरह प्रशिक्षित स्वास्थ्य देखभाल कार्यबल की उपलब्धता से है। समिति का मानना है कि चिकित्सा शिक्षा को सुदृढ़ करने और स्वास्थ्य देखभाल वितरण में सुधार के लिए मौजूदा शिक्षण अवसंरचना, नैदानिक संसाधनों और विशेषज्ञता का इष्टतम उपयोग आवश्यक है। अतः चिकित्सा शिक्षा को विनियमित करने वाली रूपरेखा को चिकित्सा शिक्षा की गुणवत्ता बनाए रखते हुए एकीकरण, संसाधनों के कुशल उपयोग और एकसमान मानकों को बढ़ावा देना चाहिए।
(पैरा 6.3.1)
322. समिति नोट करती है कि सरकारी और निजी चिकित्सा महाविद्यालयों के लिए भिन्न-भिन्न वैधानिक आवश्यकताएँ चिकित्सा शिक्षा में एकसमान मानकों को बनाए रखने के उद्देश्य को आगे नहीं बढ़ाती हैं। संकाय संख्या, बेड संख्या, अवसंरचना और शैक्षणिक संसाधनों से संबंधित विनियामक मानदंडों का निर्धारण संस्थान के स्वामित्व के आधार पर नहीं, बल्कि शैक्षणिक आवश्यकताओं और रोगी देखभाल की आवश्यकताओं के आधार पर किया जाना चाहिए। अतः, समिति सरकारी और निजी चिकित्सा महाविद्यालयों पर लागू वैधानिक मानकों के सामंजस्य की सिफारिश करती है।
(पैरा 6.3.2)
323. समिति आगे नोट करती है कि रोगों के बदलते स्वरूप, रोगों की बढ़ती जटिलता और चिकित्सा विज्ञान में हो रही प्रगति के लिए विशिष्टता और सुपर-स्पेशलिटी सेवाओं के बीच अधिक एकीकरण की आवश्यकता है। समिति सिफारिश करती है कि जहाँ भी संभव हो, उपयुक्त शैक्षणिक और नैदानिक अनुभव के माध्यम से स्नातक और स्नातकोत्तर चिकित्सा शिक्षा में विशिष्टता और सुपर-स्पेशलिटी विभागों का अधिक एकीकरण किया जाए। ऐसा एकीकरण मौजूदा शैक्षणिक और नैदानिक संसाधनों के इष्टतम उपयोग को सुनिश्चित करेगा तथा बहुविषयक नैदानिक प्रशिक्षण को सुदृढ़ करेगा।
(पैरा 6.3.3)
324. समिति आगे सिफारिश करती है कि संबंधित सुपर-स्पेशलिटी विभागों में संकाय और बिस्तरों को राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग द्वारा निर्धारित मानदंडों के अनुसार संबंधित व्यापक विशिष्टता के शिक्षक-छात्र अनुपात और बेड संख्या संबंधी आवश्यकताओं के अंतर्गत शामिल किए जाने पर विचार किया जाए। इससे मौजूदा अवसंरचना और विशेषज्ञता के बेहतर उपयोग में सहायता मिलेगी, साथ ही चिकित्सा शिक्षा को सुदृढ़ करने तथा सुपर-स्पेशलिटी शिक्षा और स्वास्थ्य देखभाल सेवाओं के विस्तार को बढ़ावा मिलेगा।
(पैरा 6.3.4)
325. समिति का मत है कि प्रत्येक सुपर-स्पेशलिटी कार्यक्रम के लिए पृथक संकाय और बेड संख्या की आवश्यकता सुपर-स्पेशलिटी शिक्षा और सेवाओं के विस्तार को सीमित कर सकती है। साझा शैक्षणिक और नैदानिक संसाधनों को मान्यता प्रदान करके इन विनियामक मानदंडों का युक्तिकरण मौजूदा अवसंरचना के अधिक उपयोग को प्रोत्साहित करेगा, प्रशिक्षण क्षमता का विस्तार करेगा, विशिष्ट स्वास्थ्य देखभाल सेवाओं तक पहुंच में सुधार करेगा और विशेषज्ञ स्वास्थ्य देखभाल कार्यबल को सुदृढ़ करेगा।
(पैरा 6.3.5)
326. समिति का मत है कि ये उपाय उपलब्ध संसाधनों के कुशल उपयोग को बढ़ावा देंगे, चिकित्सा शिक्षा को सुदृढ़ करेंगे, विशिष्ट स्वास्थ्य देखभाल सेवाओं के विस्तार को सुगम बनाएँगे और गुणवत्तापूर्ण स्वास्थ्य देखभाल तक पहुंच में सुधार करेंगे। यह किफायती, समान और गुणवत्तापूर्ण स्वास्थ्य देखभाल के उद्देश्य की प्राप्ति में योगदान देगा।
(पैरा 6.3.6)
327. अत:, समिति सिफारिश करती है कि राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग (एनएमसी) द्वारा चिकित्सा शिक्षा की गुणवत्ता से समझौता किए बिना एकीकृत चिकित्सा शिक्षा को बढ़ावा देने, संस्थागत संसाधनों के इष्टतम उपयोग को सुगम बनाने, सुपर-स्पेशलिटी शिक्षा के विस्तार को प्रोत्साहित करने और स्वास्थ्य देखभाल वितरण प्रणाली को सुदृढ़ करने के उद्देश्य से संकाय और बेड संबंधी मानदंडों से संबंधित मौजूदा विनियामक रूपरेखा की व्यापक समीक्षा की जाए।
(पैरा 6.3.7)
वरिष्ठ नागरिकों के लिए सीजीएचएस सुविधाएँ
328. समिति का सुविचारित मत है कि केंद्रीय सरकार स्वास्थ्य योजना (सीजीएचएस) के लाभार्थी, सेवानिवृत्ति के बाद किफायती और सुलभ स्वास्थ्य सेवाओं की आवश्यकता रखने वाले स्वास्थ्य लाभार्थियों का एक महत्वपूर्ण वर्ग हैं। लॉजिस्टिक तथा प्रशासनिक कठिनाइयों के कारण उनके लिए उपचार संबंधी आवश्यकताओं हेतु सीजीएचएस वेलनेस केंद्रों से रेफरल प्राप्त करना कठिन हो जाता है। समिति नोट करती कि 70 वर्ष से अधिक आयु के लाभार्थी सभी प्रकार के परामर्श (कंसल्टेशन) तथा चिकित्सीय प्रक्रियाओं (प्रोसीजर) के लिए रेफरल प्रक्रिया से गुज़रे बिना सीधे सीजीएचएस से पैनल में शामिल अस्पतालों से संपर्क कर सकते हैं। वर्तमान व्यवस्था के अंतर्गत उपचार प्राप्त करने की प्रक्रिया स्वयं में समय-साध्य है, जिसमें लंबी कतारों का सामना करना पड़ता है तथा कई बार प्रक्रिया मनमानी भी प्रतीत होती है। वर्तमान में लाभार्थी केवल आपातकालीन परिस्थितियों में ही रेफरल के बिना स्वास्थ्य सेवाओं का लाभ प्राप्त कर सकते हैं।समिति सिफारिश करती है कि 70 वर्ष की आयु सीमा को घटाकर 60 वर्ष किया जाए, ताकि सभी सेवानिवृत्त लाभार्थी अपनी स्वास्थ्य संबंधी आवश्यकताओं के लिए समय-साध्य एवं जटिल रेफरल प्रक्रिया से गुज़रे बिना सीधे सीजीएचएस से पैनल में शामिल अस्पतालों से संपर्क कर सकें। इससे न केवल अनावश्यक कागजी कार्यवाही में कमी आएगी, बल्कि सेवानिवृत्त कर्मियों के लिए जीवन को अधिक सुगम और सुविधाजनक बनाने में भी सहायता मिलेगी।
(पैरा 6.4.1)
जलवायु परिवर्तन और स्वास्थ्य
329. समिति यह समझती है कि लैंसेट काउंटडाउन द्वारा आकलित लगभग प्रत्येक संकेतक पर भारत उन देशों में शामिल है जो जलवायु परिवर्तन के प्रभावों के प्रति सर्वाधिक संवेदनशील हैं जो वायु प्रदूषण के कारण होने वाली मृत्यु के कुल भार के संदर्भ में भारत, चीन के साथ, विश्व के सर्वाधिक प्रभावित देशों में से एक है। देश में तापमान इस प्रकार बढ़ रहा है कि हीटवेव (लू) की आवृत्ति तथा अवधि में स्पष्ट रूप से वृद्धि हो रही है। साथ ही, वर्ष 2001 से 2023 के बीच लगभग 23.3 लाख हेक्टेयर वृक्षावरण का क्षरण हुआ है, जो अन्यथा अत्यधिक गर्मी तथा वायु प्रदूषण के प्रभावों को कम करने में सहायक होता। ग्लोबल बर्डन ऑफ डिजीज 2019 अध्ययन, जिसे भारत में पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय के आमंत्रण पर संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम के सहयोग से संचालित किया गया, के अनुसार वर्ष 2019 में देश में हुई कुल मृत्यु का 17.8 प्रतिशत वायु प्रदूषण के कारण हुआ। इनमें परिवेशीय सूक्ष्म कणीय वायु प्रदूषण तथा घरेलू वायु प्रदूषण दोनों का योगदान शामिल था।
(पैरा 6.5.2)
330. यूएनईपी ने आगे अवगत कराया कि मध्यम स्तर के उत्सर्जन परिदृश्यों के अंतर्गत भी इस शताब्दी के मध्य तक हीटवेव (लू) की आवृत्ति तथा तीव्रता में निरंतर वृद्धि होने की संभावना है। साथ ही, डेंगू जैसे जलवायु-संवेदनशील संक्रामक रोगों के भौगोलिक विस्तार के वर्तमान में कम जोखिम वाले राज्यों तक पहुँचने तथा उनके मौसमी स्वरूप में परिवर्तन होने का अनुमान है, जिसके परिणामस्वरूप देश के अधिकांश भागों में संक्रमण के प्रसार की अवधि लंबी हो जाएगी। इसके परिणामस्वरूप स्वास्थ्य सेवाओं की वहनीयता एवं पहुँच भी प्रभावित होती है। हीट स्ट्रोक, श्वसन संबंधी रोगों तथा वाहक-जनित संक्रमणों के उपचार पर होने वाला अतिरिक्त व्यय अपेक्षाकृत अधिक मात्रा में निम्न-आय वर्ग एवं असंगठित क्षेत्र के उन परिवारों पर पड़ता है, जिनके पास अत्यधिक गर्मी से सुरक्षित कार्यस्थल अथवा स्वास्थ्य बीमा उपलब्ध नहीं है। इसके अतिरिक्त, ग्रामीण एवं पर्वतीय क्षेत्रों के निवासियों को जलवायु-संवेदनशील आपात स्थितियों के उपचार हेतु आवश्यक सुविधाओं से युक्त स्वास्थ्य संस्थानों तक पहुँचने में प्रायः अधिक समय लगता है।समिति यह भी नोट करती है कि स्वास्थ्य वित्तपोषण की योजना-प्रक्रिया में जलवायु परिवर्तन से उत्पन्न इन अतिरिक्त लागतों को अभी तक व्यवस्थित रूप से समाहित नहीं किया गया है। लैंसेट काउंटडाउन के आकलन के अनुसार, समयपूर्व मृत्यु तथा उत्पादकता में होने वाली हानि को सम्मिलित करने पर भारत में इन जलवायु-जनित लागतों का वार्षिक आर्थिक बोझ पहले ही कई अरब अमेरिकी डॉलर तक पहुँच चुका है।
(पैरा 6.5.3)
वाहक-जनित एवं जल-जनित रोग
331. समिति को अवगत कराया गया कि राष्ट्रीय वेक्टर जनित रोग नियंत्रण केंद्र को दर्ज कराए गए डेंगू के मामलों की संख्या वर्ष 2010 में लगभग 28,000 से बढ़कर वर्ष 2023 में लगभग 2,89,000 हो गई, जो लगभग दस गुना वृद्धि को दर्शाती है। मॉडलिंग अध्ययनों से यह भी संकेत मिलता है कि तापमान में वृद्धि तथा मानसूनी प्रतिरूपों में परिवर्तन के कारण डेंगू के संचरण के लिए अनुकूल महीनों की संख्या में आगे और वृद्धि होने की संभावना है। साथ ही, ऊपरी हिमालयी क्षेत्र, थार मरुस्थल के कुछ भाग तथा पूर्वोत्तर के ऐसे राज्यों में भी डेंगू के संक्रमण का नया जोखिम उभर रहा है, जहाँ पूर्व में डेंगू की गतिविधि अत्यंत सीमित थी। इसी प्रकार की जलवायु-संवेदनशीलता मलेरिया, चिकनगुनिया तथा बाढ़ एवं जल-संकट से संबंधित जल-जनित रोगों पर भी लागू होती है। तथापि, इन रोगों पर संभावित प्रभावों की तीव्रता विभिन्न क्षेत्रों तथा उत्सर्जन परिदृश्यों के अनुसार भिन्न-भिन्न हो सकती है।
(पैरा 6.5.4)
असंक्रामक रोग एवं मानसिक स्वास्थ्य
332. अत्यधिक गर्मी तथा वायु प्रदूषण, दोनों ही हृदय संबंधी, श्वसन संबंधी तथा गुर्दा (वृक्क) संबंधी रोगों को और अधिक गंभीर बना देते हैं। इसके अतिरिक्त, बढ़ते हुए वैज्ञानिक साक्ष्य यह संकेत देते हैं कि अत्यधिक गर्मी एवं आर्द्रता का मानसिक स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है तथा कुछ अध्ययनों में इनके कारण पारस्परिक हिंसा की घटनाओं में वृद्धि होने की भी पुष्टि हुई है। बाह्य वातावरण में कार्य करने वाले श्रमिक, झुग्गी-बस्तियों के निवासी, वृद्धजन, गर्भवती महिलाएँ तथा पूर्व से असंक्रामक रोगों से ग्रस्त व्यक्ति जैसे संवेदनशील वर्ग इस बोझ का अनुपातहीन रूप से अधिक भार वहन करते हैं, जिसके परिणामस्वरूप स्वास्थ्य समानता से संबंधित विद्यमान असमानताएँ और अधिक गहरी हो जाती हैं।
(पैरा 6.5.5)
नीतिगत एवं संस्थागत
333. समिति का मत है कि सरकार को जलवायु परिवर्तन के प्रति संवेदनशील सभी वर्गों, जिनमें बच्चे, गर्भवती महिलाएँ तथा शहरी गरीब आबादी शामिल हैं, तक लक्षित स्वास्थ्य रणनीतियों और सेवाओं की पहुँच को व्यापक बनाने के लिए ठोस कदम उठाने चाहिए। इसके साथ-साथ वृद्धजन एवं बाह्य कार्यस्थलों पर कार्य करने वाले श्रमिकों, जिन्हें पहले से प्राथमिकता दी जा रही है, के लिए भी प्रभावी उपाय जारी रहने चाहिए। सरकार को जलवायु से जुड़े पोषण एवं खाद्य सुरक्षा संबंधी जोखिमों (जैसे कृषि उत्पादकता में व्यवधान के कारण उत्पन्न अल्पपोषण तथा सूक्ष्म पोषक तत्वों की कमी) तथा अत्यधिक गर्मी, आपदाओं और विस्थापन से संबंधित मानसिक तनाव को भी स्पष्ट रूप से संबोधित करना चाहिए।इसके अतिरिक्त, समिति यह भी समुक्ति करती है कि सरकार को सभी जिलों (केवल शहरों तक सीमित नहीं) के लिए न्यूनतम मानक वाले हीट एक्शन प्लान तैयार करने चाहिए, जिनमें स्पष्ट उत्तेजक (ट्रिगर) बिंदु, शीतलन केंद्रों की व्यवस्था, अस्पतालों में बढ़ते रोगी भार से निपटने के प्रोटोकॉल तथा स्वतंत्र मूल्यांकन की व्यवस्था हो। इन योजनाओं का विकास अहमदाबाद मॉडल के आधार पर किया जा सकता है। बाह्य एवं असंगठित क्षेत्र के श्रमिकों के लिए व्यावसायिक गर्मी-सुरक्षा मानकों को औपचारिक रूप दिया जाना आवश्यक है, जिनमें कार्य एवं विश्राम चक्र, छायादार विश्राम स्थलों की उपलब्धता तथा पर्याप्त जल सेवन की व्यवस्था शामिल होनी चाहिए। ये श्रमिक गर्मी से संबंधित स्वास्थ्य समस्याओं का अनुपातहीन रूप से अधिक भार वहन करते हैं।इसके अलावा, सरकार को हरित स्वास्थ्य सेवा संबंधी दिशानिर्देशों का विस्तार कर उन्हें एक व्यापक लचीलापन ढाँचे में परिवर्तित करना चाहिए। वर्तमान दिशानिर्देश मुख्य रूप से जलवायु परिवर्तन के शमन पर अधिक केंद्रित हैं, अर्थात स्वास्थ्य क्षेत्र के स्वयं के कार्बन उत्सर्जन को कम करने पर, जबकि इनमें अनुकूलन संबंधी उपायों को भी पर्याप्त रूप से शामिल किया जाना चाहिए। इनका विस्तार स्वास्थ्य संस्थानों में गर्मी एवं बाढ़ से निपटने की तैयारी, जलवायु आपदाओं के दौरान स्वास्थ्य सेवाओं की निरंतरता तथा स्वास्थ्य कर्मियों की सुरक्षा जैसे विषयों को सम्मिलित करने तक किया जाना चाहिए।
(पैरा 6.5.6)
जमीनी स्तर पर गुणवत्तापूर्ण स्वास्थ्य सेवा सुनिश्चित करना
334. समिति का विचार है कि सभी स्वास्थ्य संस्थानों में समान, न्यायसंगत और सुरक्षित रोगी देखभाल सुनिश्चित करने के लिए एकरूप नैदानिक प्रथाएं अत्यंत आवश्यक हैं। अतः समिति सार्वजनिक और निजी दोनों क्षेत्रों में अनिवार्य मानक उपचार दिशानिर्देशों के कड़ाई से अनुपालन की सिफारिश करती है। उपचार नवाचार और रोग–निदान संबंधी मानदंडों को मानकीकृत किया जाना चाहिए तथा उन्हें विश्व स्तर पर स्वीकृत साक्ष्य–आधारित मानकों, जैसे विश्व स्वास्थ्य संगठन या राष्ट्रीय स्वास्थ्य सेवा (यूके) द्वारा निर्धारित मानकों के अनुरूप बनाया जाना चाहिए।
(पैरा 6.6.4)
335. समिति का विचार है कि राष्ट्रीय नैदानिक प्रतिष्ठान परिषद की भूमिका को स्वीकार करते हुए भी, जमीनी स्तर पर निगरानी और सक्रिय पर्यवेक्षण को तत्काल सुदृढ़ किए जाने की आवश्यकता है। समिति का मानना है कि समय पर हस्तक्षेप सुनिश्चित करने के लिए स्थानीय स्तर का प्रशासन अत्यंत महत्वपूर्ण है। अतः समिति जिला स्तर पर समर्पित चिकित्सा समितियों के गठन को औपचारिक रूप देने की सिफारिश करती है, ताकि ये समितियां समय-समय पर समीक्षा कर सकें, स्थानीय शिकायतों का समाधान कर सकें तथा स्वास्थ्य सेवा महानिदेशक और राज्य अधिकारियों के साथ प्रत्यक्ष समन्वय स्थापित कर सकें। सभी स्वास्थ्य सेवाओं के कड़े वार्षिक लेखापरीक्षा को संस्थागत रूप दिया जाना चाहिए। जिला विनियामक प्राधिकरणों को निरीक्षण, लेखापरीक्षा और मानकों के अनुपालन न करने की स्थिति में दंडात्मक कार्रवाई करने के लिए पूर्ण रूप से सशक्त बनाया जाना चाहिए। समिति दृढ़तापूर्वक सिफारिश करती है कि राष्ट्रीय नैदानिक प्रतिष्ठान परिषद, राज्य परिषदें और जिला विनियामक प्राधिकरण सदैव सतर्क और सक्रिय रहें, ताकि नैदानिक प्रतिष्ठान अधिनियम, 2010 के प्रावधानों का प्रभावी क्रियान्वयन सुनिश्चित किया जा सके तथा जमीनी स्तर पर निर्धारित मानक उपचार प्रोटोकॉल का अनुपालन सुनिश्चित हो सके।
(पैरा 6.6.5)
336. समिति का मानना है कि यद्यपि भारतीय जन स्वास्थ्य मानक डैशबोर्ड के माध्यम से किए जा रहे स्व-मूल्यांकन और कायाकल्प पहल के व्यापक विस्तार से प्रगति प्रदर्शित होती है, फिर भी निरंतर अवसंरचनात्मक सुधार अत्यंत आवश्यक है। समिति का विचार है कि निवारक स्वास्थ्य सेवा का स्वास्थ्य सुविधाओं की स्वच्छता से गहरा और स्वाभाविक संबंध है। रोगों के प्रसार को रोकने के लिए, विशेष रूप से अपशिष्ट जल प्रबंधन और पर्यावरणीय नियंत्रण से संबंधित स्वच्छता के कड़े रखरखाव प्रोटोकॉल को सख्ती से लागू किया जाना चाहिए, ताकि जलवायु परिवर्तन और पारिस्थितिक असंतुलन के कारण उत्पन्न होने वाले रोग संचरण को रोका जा सके। भारतीय जन स्वास्थ्य मानकों और राष्ट्रीय गुणवत्ता आश्वासन मानकों के 100 प्रतिशत अनुपालन को सुनिश्चित करने के लिए बुनियादी अवसंरचना संबंधी कमियों को दूर करने हेतु निरंतर पूंजीगत और परिचालन निवेश किए जाने चाहिए।
(पैरा 6.6.6)
337. समिति स्वास्थ्य सेवा तंत्र के व्यापक क्षेत्र में राष्ट्रीय प्रत्यायन बोर्ड और राष्ट्रीय परीक्षण एवं अंशांकन प्रयोगशाला प्रत्यायन बोर्ड की प्रत्यायन व्यवस्था के क्रमिक विस्तार की सिफारिश करती है। समिति का विचार है कि पारदर्शिता संस्थागत उत्कृष्टता को बढ़ावा देती है। अतः स्वास्थ्य सुविधाओं के सार्वजनिक प्रदर्शन मूल्यांकन को समय-समय पर प्रकाशित किया जाना चाहिए, ताकि जनता के प्रति प्रत्यक्ष जवाबदेही सुनिश्चित हो सके। राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति, 2017 के आधार पर सभी सरकारी नीतियों की निरंतर समीक्षा, परिष्करण और सुधार किया जाना चाहिए, ताकि रोगी के अनुभव को प्राथमिकता दी जा सके। स्वास्थ्य सेवा का वितरण प्रत्येक स्तर पर स्पष्ट रूप से लैंगिक रूप से संवेदनशील, स्वभावतः सुरक्षित और पूर्णतः गोपनीय बना रहना चाहिए।
(पैरा 6.6.7)
सामुदायिक स्तर की स्वास्थ्य सुविधाओं और निगरानी प्रणाली का संस्थागतकरण
338. समिति का विचार है कि केंद्रीकृत योजना निर्माण से कभी-कभी विभिन्न जनसांख्यिकीय समूहों की विशिष्ट स्थानीय परिस्थितियों और आवश्यकताओं को पूरी तरह समझ पाना संभव नहीं हो पाता। स्वास्थ्य सुविधाओं का विस्तार समान धारणाओं के आधार पर नहीं, बल्कि जमीनी स्तर से प्राप्त वास्तविक आंकड़ों के आधार पर किया जाना चाहिए। अतः समिति सिफारिश करती है कि ग्रामीण क्षेत्रों में ग्राम स्वास्थ्य, स्वच्छता एवं पोषण समितियों तथा शहरी मलिन बस्तियों में महिला आरोग्य समितियों के साथ समन्वय करते हुए स्थानीय पंचायतों को यह दायित्व सौंपा जाए कि किसी भी नई स्वास्थ्य सुविधा की स्वीकृति या मौजूदा अवसंरचना के विस्तार से पहले वे व्यापक आवश्यकता-आधारित आकलन करें। समिति का मानना है कि इन स्थानीय निकायों द्वारा प्रबंधित अप्रतिबंधित निधियों का उचित उपयोग और कड़ी निगरानी सुनिश्चित की जानी चाहिए, ताकि व्यय स्थानीय स्तर पर पहचानी गई प्राथमिकताओं के अनुरूप किया जा सके और स्वास्थ्य सेवा प्रदाताओं तथा समुदाय के बीच की दूरी को कम किया जा सके।
(पैरा 6.7.4)
339. 35,870 रोगी कल्याण समितियों और 5.65 लाख से अधिक ग्राम स्वास्थ्य, स्वच्छता एवं पोषण समितियों की स्थापना को स्वीकार करते हुए, समिति यह नोट करती है कि केवल इनका गठन हो जाना प्रभावी निगरानी सुनिश्चित करने के लिए पर्याप्त नहीं है। समिति का मानना है कि पारदर्शी जवाबदेही जनविश्वास की आधारशिला है। अतः समिति सभी सार्वजनिक स्वास्थ्य सुविधाओं में समुदाय-आधारित निगरानी प्रणालियों को औपचारिक रूप से संस्थागत बनाने की सिफारिश करती है। सभी स्वास्थ्य कार्यक्रमों का नियमित और अनिवार्य सामाजिक लेखापरीक्षा रोगी कल्याण समितियों और जन आरोग्य समितियों के माध्यम से कराया जाना चाहिए। इन सामाजिक लेखापरीक्षा के निष्कर्षों को संबंधित स्वास्थ्य सुविधाओं के प्रदर्शन मूल्यांकन में शामिल किया जाना चाहिए।
(पैरा 6.7.5)
340. समिति 10.33 लाख आशा कार्यकर्ताओं की प्राथमिक स्वास्थ्य सेवा और सार्वजनिक स्वास्थ्य जागरूकता एवं जन-सक्रियता के आधार स्तंभ के रूप में निभाई जा रही महत्वपूर्ण भूमिका को स्वीकार करती है। हालांकि, वर्ष 2013 और 2014 में जारी किए गए परिचालन दिशानिर्देशों के आधुनिकीकरण और संशोधन की आवश्यकता है। अतः समिति सिफारिश करती है कि मंत्रालय ग्रामीण और शहरी दोनों क्षेत्रों के संदर्भ में आशा कार्यकर्ताओं के परिचालन दिशानिर्देशों को तत्काल संशोधित और अद्यतन करे, ताकि वे वर्तमान रोग-परिदृश्य तथा जलवायु परिवर्तन और वैश्विक पारिस्थितिक एवं पर्यावरणीय असंतुलन के कारण उत्पन्न हो रही उभरती सार्वजनिक स्वास्थ्य चुनौतियों के अनुरूप हो सकें। आशा कार्यकर्ताओं को निरंतर प्रशिक्षण कार्यक्रमों और क्षमता निर्माण के माध्यम से व्यवस्थित रूप से सक्षम बनाया जाना चाहिए, ताकि वे वंचित समुदायों को बेहतर ढंग से स्वास्थ्य शिक्षा प्रदान कर सकें और उन्हें स्वास्थ्य सेवाओं से जोड़ सकें। इसमें स्वास्थ्य के सामाजिक निर्धारकों पर विशेष ध्यान दिया जाना चाहिए तथा आयुष्मान आरोग्य मंदिरों की सेवाओं के उपयोग से संबंधित मानकों में सुधार सुनिश्चित किया जाना चाहिए।
(पैरा 6.7.6)
341. समिति का दृढ़ मत है कि केवल राज्य तंत्र के माध्यम से सतत स्वास्थ्य परिणाम प्राप्त नहीं किए जा सकते, जिसके लिए सामाजिक व्यवहार में व्यापक परिवर्तन की आवश्यकता है। समिति का मानना है कि सार्वजनिक स्वास्थ्य को सार्वभौमिक रूप से ‘व्यक्ति, परिवार, समुदाय और राज्य की संयुक्त जिम्मेदारी’ के रूप में मान्यता दी जानी चाहिए। अतः समिति सिफारिश करती है कि राज्य स्तर पर सांस्कृतिक संदर्भों के अनुरूप जागरूकता अभियानों को संचालित किया जाए, जिनका उद्देश्य विशेष रूप से सक्रिय स्वास्थ्य सेवा प्राप्ति व्यवहार को प्रोत्साहित करना और सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं में पूर्ण विश्वास को सुदृढ़ करना हो।
(पैरा 6.7.7)
आपातकालीन स्वास्थ्य देखभाल में परिवर्तनकारी सुधार
342. समिति का विचार है कि त्वरित और सुव्यवस्थित चिकित्सा परिवहन प्रभावी आपातकालीन हस्तक्षेप और आपदा प्रबंधन की आधारशिला है। अतः समिति सिफारिश करती है कि अत्यधिक दक्ष स्थलीय और हवाई एम्बुलेंस प्रणालियों का तत्काल निर्माण और संचालन किया जाए तथा दुर्गम क्षेत्रों, ग्रामीण क्षेत्रों और अधिक जनसंख्या घनत्व वाले शहरी क्षेत्रों में इनका समान वितरण सुनिश्चित किया जाए। परिवहन से उपचार तक पहुंचने में होने वाली देरी को समाप्त करने के लिए समिति मानकीकृत एम्बुलेंस-से-अस्पताल हस्तांतरण नवाचार के कठोर निर्धारण और प्रभावी क्रियान्वयन की सिफारिश करती है। समिति का मानना है कि आपातकालीन परिवहन तक आम जनता की तत्काल पहुंच को अत्यधिक सरल बनाया जाना चाहिए। अतः समिति व्यापक स्तर पर एक एकीकृत, अत्यधिक त्वरित प्रतिक्रिया देने वाली केंद्रीकृत और कार्यशील हेल्पलाइन संख्या का प्रचार-प्रसार तथा निरंतर संचालन सुनिश्चित करने की सिफारिश करती है।
(पैरा 6.8.5)
343. समिति का मानना है कि संकट के समय आकस्मिक और आपातकालीन चिकित्सा सेवाओं के लिए कुशल मानव संसाधन और पर्याप्त वित्तीय व्यवस्था का उपलब्ध होना अत्यंत आवश्यक है। अतः समिति सिफारिश करती है कि सभी जिला अस्पतालों, चिकित्सा महाविद्यालयों और सार्वजनिक तृतीयक स्वास्थ्य सेवा केंद्रों में विशेष रूप से प्रशिक्षित चिकित्सकों द्वारा संचालित समर्पित आपातकालीन चिकित्सा विभागों की स्थापना अनिवार्य की जाए। इसके अतिरिक्त, इन महत्वपूर्ण विभागों को अधिक संस्थागत मान्यता प्रदान की जानी चाहिए। समिति का विचार है कि वित्तीय बाधाएं जीवनरक्षक उपचार में कभी भी देरी का कारण नहीं बननी चाहिए। अतः समिति सिफारिश करती है कि सार्वजनिक और निजी दोनों अस्पतालों में उपचार के समय आपातकालीन देखभाल पूरी तरह निःशुल्क प्रदान की जाए। इस व्यवस्था को सरकारी योजनाओं के माध्यम से स्वचालित और त्वरित प्रतिपूर्ति तंत्र द्वारा समर्थित किया जाना चाहिए।
(पैरा 6.8.6)
344. आपातकालीन परिस्थितियों के दौरान और अस्पताल से छुट्टी मिलने के बाद भी निरंतर श्वसन सहायता की अत्यंत आवश्यकता को स्वीकार करते हुए, समिति का विचार है कि लक्षित अवसंरचनात्मक और नीतिगत सुधारों की आवश्यकता है। अतः समिति सिफारिश करती है कि सरकार मौजूदा सार्वजनिक स्वास्थ्य अवसंरचना के अंतर्गत जिला स्तर पर ऑक्सीजन कंसंट्रेटर बैंक की तत्काल स्थापना करे। समिति का मानना है कि दीर्घकालिक श्वसन देखभाल को वित्तीय सुरक्षा प्रदान किया जाना आवश्यक है। अतः समिति सिफारिश करती है कि दीर्घकालिक ऑक्सीजन चिकित्सा को मौजूदा बीमा योजनाओं के अंतर्गत व्यापक रूप से शामिल किया जाए। इसके अतिरिक्त, दीर्घकालिक ऑक्सीजन चिकित्सा प्राप्त कर रहे रोगियों के लिए अनिवार्य अनुवर्ती जांच और पुनर्मूल्यांकन प्रोटोकॉल लागू किए जाने चाहिए, ताकि रोगी सुरक्षा, उपचार की प्रभावशीलता और स्वास्थ्य प्रणाली की लागत-प्रभावशीलता सुनिश्चित की जा सके।
(पैरा 6.8.7)
345. समिति सड़क दुर्घटना पीड़ितों के लिए नकद रहित उपचार योजना, 2025 और प्रधानमंत्री आयुष्मान भारत स्वास्थ्य अवसंरचना मिशन (पीएम–एबीएचआईएम) के तहत चल रही अवसंरचना परियोजनाओं द्वारा स्थापित महत्वपूर्ण सुरक्षा उपायों को स्वीकार करती है। समिति का मत है कि अस्पतालों की सुदृढ़ तैयारी अत्यावश्यक है। अतः समिति सिफारिश करती है कि महामारी, बड़े पैमाने पर हताहतों की घटनाओं और प्राकृतिक आपदाओं के लिए तत्परता सुनिश्चित करने हेतु स्वीकृत 50-100 बिस्तरों वाले गहन चिकित्सा कक्षों (सीसीबी) के निर्माण और संचालन में तेजी लाई जाए।
(पैरा 6.8.8)
मजबूत प्रत्यायन प्रणाली की आवश्यकता
346. समिति समझती है कि एनएबीएच, आईएसक्यूयूए से सिद्धांतों को अपनाता है, जो एक विश्व स्तर पर प्रतिस्पर्धी मान्यता निकाय है, और गुणवत्ता प्रबंधन प्रणाली को लागू करने में अस्पतालों, क्लीनिकों और आयुष सुविधाओं के साथ काम करता है। समिति इस बात पर ध्यान देती है कि क्यूसीआई गुणवत्ता यात्रा और गुणवत्ता मित्र कार्यक्रम आयोजित करता है और गुणवत्ता पाठशालाओं के माध्यम से क्षमता निर्माण और कौशल विकास को बढ़ावा देता है। इसके अलावा, क्यूसीआई गुणवत्ता मंथन के माध्यम से व्यापार करने में सुगमता को बढ़ावा देता है और अस्पतालों को किफायती लागत पर स्वास्थ्य गुणवत्ता बनाए रखने के प्रति सकारात्मक दृष्टिकोण अपनाने के लिए प्रोत्साहित करता है। समिति चाहती है कि क्यूसीआई प्रथम, द्वितीय और तृतीय स्तर के शहरों में अस्पतालों को आईएसओ 15189 प्रमाणन प्राप्त करने के लिए प्रोत्साहित करे, जो नैदानिक प्रयोगशालाओं के लिए स्वर्ण मानक और विश्व स्तर पर मान्यता प्राप्त है। समिति का मानना है कि गुणवत्ता चक्र गतिविधियाँ और गुणवत्ता यात्राएँ निश्चित रूप से क्यूसीआई को किफायती लागत पर वैश्विक गुणवत्ता मानक सुनिश्चित करने के लिए प्रेरित करेंगी।
(पैरा 6.9.1)
सामान्य दवाओं की गुणवत्ता और नकली दवाओं पर नियंत्रण
347. समिति को जेनेरिक दवाओं की गुणवत्ता और प्रभावकारिता के बारे में जानकारी मिली है, इसलिए सीडीएससीओ को जन औषधि केंद्रों पर उपलब्ध जेनेरिक दवाओं की गुणवत्ता और प्रभावकारिता सुनिश्चित करने के लिए ठोस कदम उठाने की आवश्यकता है। इसके अलावा, समिति यह बताना चाहती है कि बाजार में नकली और मिलावटी दवाओं की उपलब्धता आम आदमी के स्वास्थ्य पर हानिकारक प्रभाव डालती है, इसलिए समिति का मानना है कि जेनेरिक दवाओं की गुणवत्ता को नियंत्रित करना और जनता को यह जागरूक करना अत्यंत आवश्यक है कि सस्ती दरों पर मिलने वाली जेनेरिक दवाएं बाजार में मिलने वाली महंगी ब्रांडेड दवाओं के समान ही प्रभावी होती हैं। जनता का विश्वास जीतना जरूरी है। समिति नकली दवाओं पर पूर्ण प्रतिबंध लगाने की पुरजोर सिफारिश करती है।
(पैरा 6.10.1)
विपरीत प्रतिभा पलायन
348. समिति को यह जानकारी मिली है कि बड़ी संख्या में भारतीय डॉक्टर जो विदेश में प्रवास कर चुके हैं और हमारे प्रवासी समुदाय का हिस्सा हैं, नवीनतम कौशल से संपन्न हैं और उन्नत स्वास्थ्य सेवाएं प्रदान करने के साथ–साथ हमारे मानव संसाधन को पोषित करने के लिए वापस आने को तैयार हैं। ऐसे डॉक्टरों की संख्या भी काफी अधिक है जो सेवानिवृत्त हो चुके हैं लेकिन कुशल वरिष्ठ डॉक्टर हैं और विदेश में रह रहे हैं, वे राष्ट्र की सेवा करने के इच्छुक हैं बशर्ते उन्हें देश के विभिन्न हिस्सों में आकर काम करने की अनुमति दी जाए। इसलिए, समिति चाहती है कि ऐसे डॉक्टरों को इस उद्देश्य के लिए बनाए गए पोर्टल पर पंजीकरण करने और देश के विभिन्न हिस्सों में, अधिमानतः अपने गृह राज्य में, वर्ष के कुछ निश्चित महीनों के दौरान राष्ट्र की सेवा करने की लिखित इच्छा व्यक्त करने का अवसर दिया जाए, उनके पेशेवर अनुभव और विशेषज्ञता का लाभ देश के कम सुविधा प्राप्त क्षेत्रों में गंभीर बीमारियों को दूर करने के लिए उपयुक्त रूप से उठाया जा सकता है। इसके अलावा, विभिन्न अस्पतालों में कार्यरत डॉक्टरों को भी जनहित में उनके अनुभव से अतिरिक्त लाभ प्राप्त होगा। इसलिए, समिति सरकार से इस दिशा में आवश्यक कदम उठाने की सिफारिश करती है।
(पैरा 6.11.1)
स्वास्थ्य व्यय और जीडीपी आवंटन
349. समिति स्वास्थ्य क्षेत्र के लिए कम बजट आवंटन पर गहरी चिंता व्यक्त करती है, जिसमें स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण विभाग, स्वास्थ्य अनुसंधान विभाग और आयुष मंत्रालय शामिल हैं, जो पिछले पांच वर्षों में सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) के 0.28% और 0.33% के बीच रहा है। हालांकि सरकारी स्वास्थ्य व्यय (जीएचई ) 2017-18 में जीडीपी के 1.35% से बढ़कर 2022-23 में 1.43% हो गया है, समिति का मानना है कि यह वित्तीय प्रगति अत्यंत अपर्याप्त है और राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति (एनएचपी) 2017 के 2025 तक जीडीपी के 2.5% तक सरकारी स्वास्थ्य व्यय बढ़ाने के लक्ष्य से बहुत कम है। चूंकि 2025-26 वित्तीय वर्ष इस लक्ष्य को प्राप्त किए बिना समाप्त हो गया है, समिति का मानना है कि स्वास्थ्य सेवा को सामाजिक–आर्थिक विकास के एक मूलभूत स्तंभ के रूप में तत्काल प्राथमिकता दी जानी चाहिए, जिसके लिए सार्वजनिक स्वास्थ्य अवसंरचना, निवारक देखभाल और समान सेवा वितरण में आक्रामक और निरंतर निवेश की आवश्यकता है। अतः समिति अपने 172वें प्रतिवेदन में की गई सिफारिश को दोहराती है कि राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति (एनएचपी) लक्ष्य का रणनीतिक समीक्षा की जाए, जिसमें अगले पांच वर्षों में सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) के 5% तक सरकारी स्वास्थ्य व्यय में तेजी से वृद्धि अनिवार्य हो, ताकि मजबूत और व्यापक स्वास्थ्य देखभाल विस्तार सुनिश्चित किया जा सके।
(पैरा 6.12.1)
स्वास्थ्य सेवा मूल्य निर्धारण और विनियामक एकीकरण
350. समिति गंभीर चिंता के साथ यह नोट करती है कि सीएजी ने अपनी 2023 के प्रतिवेदन में अन्य बातों के साथ–साथ यह भी कहा है कि राष्ट्रीय स्वास्थ्य प्राधिकरण (एनएचए) ने स्थानीय स्तर पर वैज्ञानिक नैदानिक लागत आकलन करने के बजाय मौजूदा केंद्रीय योजनाओं और राज्य औसत को दोहराकर तृतीयक प्रक्रिया दरों को निर्धारित किया है। आयुष्मान भारत–प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना (पीएमजेएवाई) के कार्यनिष्पादन संबंधी लेखापरीक्षण से यह बात उजागर हुई है कि अस्पतालों के पैनल में शामिल होने में प्रणालीगत कमियां एक चुनौती बनी हुई हैं, जो वास्तविक परिचालन लागत से काफी कम मूल्य निर्धारण प्रक्रियाओं से और भी बढ़ गई हैं, जिसके कारण प्रमुख निजी अस्पतालों ने पैनल में शामिल होने से इनकार कर दिया है। इसके अलावा, समिति का मानना है कि आईआरडीएआई द्वारा दोहरी मूल्य निर्धारण के खिलाफ सख्त नीति लागू करने में विफलता, जिसके तहत निजी अस्पताल बीमित रोगियों के लिए मनमाने ढंग से शुल्क बढ़ाते हैं, और जून 2026 की समय सीमा तक एकीकृत राष्ट्रीय स्वास्थ्य दावा विनिमय (एनएचसीएक्स) आईटी इंटरफेस को अनिवार्य करने में इसकी असमर्थता गंभीर नियामक चूक को दर्शाती है। इसलिए, समिति निम्नलिखित तत्काल हस्तक्षेपों की सिफारिश करती है:
क) वैज्ञानिक लागत निर्धारण संशोधन: एनएचए स्वास्थ्य लाभ पैकेज दरों को संशोधित और तर्कसंगत बनाने के लिए तत्काल व्यापक, स्थानीय वैज्ञानिक अध्ययन करे। इन मापदंडों में वर्तमान नैदानिक परिचालन लागतों का सटीक प्रतिबिंब होना चाहिए ताकि प्रमुख निजी स्वास्थ्य सेवा प्रदाताओं की सक्रिय भागीदारी सुनिश्चित हो सके।
- एनएचसीएक्स का अनिवार्य एकीकरण: आईआरडीएआई कड़े नियामक निर्देश जारी करे, जिसमें एनएचसीएक्स इंटरफेस को कॉर्पोरेट अस्पतालों के बिलिंग डेस्क के साथ तत्काल तकनीकी रूप से एकीकृत करना अनिवार्य हो, और जून 2026 के लक्ष्य से आगे की देरी के लिए दंड का प्रावधान हो।
- दोहरी मूल्य निर्धारण प्रणाली का उन्मूलन: आईआरडीएआई एक मजबूत, मानकीकृत नीतिगत ढांचा तैयार और लागू करे जो स्पष्ट रूप से दोहरी मूल्य निर्धारण की अनैतिक प्रथा को प्रतिबंधित करता हो, जिससे सभी रोगियों के लिए उनकी बीमा स्थिति की परवाह किए बिना न्यायसंगत और पारदर्शी बिलिंग प्रथाएं सुनिश्चित हो सकें।
(पैरा 6.13.1)
ग्रामीण स्वास्थ्य सेवा का कार्यान्वयन और पीएम–जेएवाई का विस्तार
351. समिति ग्रामीण सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों (सीएचसी) में विशेषज्ञ चिकित्सकों की 70-80% की गंभीर कमी पर गहरी चिंता व्यक्त करती है। समिति का मानना है कि पिछले दशक में स्नातकोत्तर चिकित्सा सीटों में 133% की वृद्धि के बावजूद, प्रभावी तैनाती रणनीतियों के अभाव के कारण ग्रामीण स्वास्थ्य सेवा में यह असमानता पूरी तरह से दूर नहीं हो पाई है। समिति का मानना है कि भारत में चिकित्सा पेशेवरों की पूर्ण कमी नहीं है; बल्कि, मूल संकट वितरण में अत्यधिक असंतुलन है, जिसमें चिकित्सक शहरी केंद्रों में अधिक केंद्रित हैं जबकि ग्रामीण क्षेत्र गंभीर रूप से उपेक्षित हैं। इस बढ़ी हुई शैक्षिक क्षमता का लाभ उठाने और उपेक्षित क्षेत्रों में चिकित्सा पेशेवरों की आत्मनिर्भर आपूर्ति सुनिश्चित करने के लिए, समिति का मानना है कि स्नातकोत्तर सीटों में वृद्धि से शैक्षिक क्षमता में वृद्धि हुई है, लेकिन ग्रामीण स्वास्थ्य सेवा में इस असमानता को दूर करने के लिए केवल सीटों की संख्या बढ़ाने के बजाय मजबूत प्रतिधारण और प्रोत्साहन ढांचे की आवश्यकता है। चिकित्सा स्नातकों को ग्रामीण सरकारी अस्पतालों और तालुका सुविधाओं में सेवा करने के लिए व्यवस्थित रूप से प्रोत्साहित करने के लिए, समिति एक अनिवार्य एक वर्षीय ग्रामीण सेवा नीति लागू करने की सिफारिश करती है। इसके अलावा, इस प्रतिधारण रणनीति को प्रभावी बनाने के लिए, समिति विस्तारित ग्रामीण सेवा पूरी करने वाले डॉक्टरों को नीट-पीजी परीक्षाओं में भारित प्रोत्साहन अंक (जैसे कि अतिरिक्त 10 से 20 अंक) देने साथ ही लक्षित ग्रामीण आरक्षण कोटा लागू करने की भी सिफारिश करती है। हालांकि, समिति का यह मत है कि ग्रामीण प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों (पीएचसी) और सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों (सीएचसी) में युवा डॉक्टरों की तैनाती के साथ–साथ बुनियादी ढांचे का तत्काल उन्नयन भी आवश्यक है। इसलिए, समिति मंत्रालय से आग्रह करती है कि ग्रामीण तैनाती को व्यवहार्य और टिकाऊ बनाने के लिए पर्याप्त आवासीय क्वार्टर, आधुनिक सुविधाएं और सुरक्षित बुनियादी ढांचा उपलब्ध कराया जाए।
(पैरा 6.14.1)
352. समिति का मानना है कि सख्त प्रतिधारण और तैनाती नीतियों की तत्काल आवश्यकता है। इसके अलावा, यह मानते हुए कि जेब से होने वाला खर्च (ओ.ओ.पी.ई.) मुख्य रूप से ओपीडी (बाहरी रोगी विभाग) की देखभाल और दवाओं पर होता है, वर्तमान पीएम–जेएवाई ढांचा, जो केवल अस्पताल में भर्ती मरीजों को ही कवर करता है, मौलिक रूप से अपर्याप्त है। इसलिए, समिति सिफारिश करती है कि मंत्रालय पीएम–जेएवाई का विस्तार करके इसमें ओपीडी उपचार और आवश्यक चिकित्सा आपूर्ति को भी व्यापक रूप से शामिल करे।
(पैरा 6.14.2)
353. समिति का मत है कि आयुष्मान भारत–प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना (एबी–पीएमजेएवाई) की वर्तमान कवरेज सीमा, जो प्रति परिवार 5 लाख रुपये है, अपर्याप्त है, विशेष रूप से 70 वर्ष से अधिक आयु के छह करोड़ वरिष्ठ नागरिकों को हाल ही में शामिल किए जाने के मद्देनजर, जिनमें कई बीमारियों का खतरा अधिक है। इसके अलावा, समिति का मानना है कि वर्तमान ढांचे से 600 उच्च स्तरीय, जटिल चिकित्सा प्रक्रियाओं को बाहर रखना लाभार्थियों को गुमराह करता है और कमजोर परिवारों पर असहनीय जेब खर्च का बोझ डालता है। इसलिए, समिति स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण विभाग, वित्त विभाग और नीति आयोग द्वारा तत्काल संयुक्त हस्तक्षेप की सिफारिश करती है ताकि इन 600 बहिष्कृत प्रक्रियाओं तत्काल कोड निर्धारण किया जा सके और एबी–पीएमजेएवाई के वार्षिक वित्तीय पैकेज को बढ़ाकर प्रति परिवार 10 लाख रुपये किया जा सके।
(पैरा 6.14.3)
कैशलेस स्वास्थ्य योजनाएं, समावेशी बीमा और अस्पताल को पैनल में शामिल करना
354. समिति का मानना है कि पीएम–जेएवाई जैसी प्रमुख कैशलेस स्वास्थ्य योजनाओं के तहत वित्तीय बकाया के भुगतान में हो रही व्यवस्थित और लंबी देरी निजी अस्पतालों को सेवाएं निलंबित करने के लिए मजबूर कर रही है, जिससे सूचीबद्ध सुविधाओं की गंभीर कमी और बढ़ रही है और चिकित्सा आपात स्थितियों में मरीज़ों को परेशानी का सामना करना पड़ रहा है। इसके अलावा, समिति का मानना है कि दिव्यांग व्यक्तियों का व्यापक स्तर पर बीमा कवरेज से वंचित रहना—जहाँ लगभग 53% मामलों में मनमाने ढंग से दावे या आवेदन अस्वीकार कर दिए जाते हैं, जिसके परिणामस्वरूप लगभग 16 करोड़ संवेदनशील नागरिक बीमा सुरक्षा से बाहर रह जाते हैं, तथा मानसिक स्वास्थ्य देखभाल अधिनियम, 2017 की धारा 21(4) के अंतर्गत अनिवार्य मानसिक स्वास्थ्य समानता का बीमा प्रदाताओं द्वारा स्पष्ट रूप से पालन न किया जाना, समान एवं न्यायसंगत स्वास्थ्य सेवाएँ उपलब्ध कराने में नियामकीय व्यवस्था की गंभीर विफलता को दर्शाता है। इसलिए, समिति सभी लंबित अस्पताल बकाया का भुगतान करने और कैशलेस स्वास्थ्य सेवा प्रणाली को स्थिर करने के लिए एक सख्त, समयबद्ध वित्तीय निपटान तंत्र को तत्काल लागू करने की सिफारिश करती है, जो सूचीबद्ध अस्पतालों के नेटवर्क के तेजी से विस्तार के लिए आवश्यक है। साथ ही, समिति नियामक अधिकारियों से आग्रह करती है कि वे उन बीमा कंपनियों को दंडित करने के लिए कड़े निर्देश जारी करें जो मनमाने ढंग से दिव्यंगजनों को कवरेज देने से इनकार करती हैं या मानसिक स्वास्थ्य स्थितियों और बाह्य रोगी (ओपीडी) उपचारों के लिए व्यापक, समान आधार पर कवरेज प्रदान करने में विफल रहती हैं।
(पैरा 6.15.1)
सार्वजनिक स्वास्थ्य अवसंरचना का उन्नयन और एम्स का विस्तार
355. समिति का मत है कि एम्स द्वारा सफलतापूर्वक प्रदर्शित की गई प्रौद्योगिकी–आधारित सर्वोत्तम पद्धतियों, जैसे कि एआई–आधारित निदान, डिजिटल शिकायत निवारण, रोगी मार्गदर्शन और उन्नत अस्पताल प्रबंधन, को सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणाली में शीघ्रता से मानकीकृत किया जाना चाहिए। समिति का मानना है कि ‘राष्ट्रीय अस्पताल कार्यक्रम‘ शुरू करने से इन सफल मॉडलों को सभी सरकारी मेडिकल कॉलेजों और प्रमुख जिला अस्पतालों में प्रभावी ढंग से लागू किया जा सकेगा, जिससे देश भर में रोगी देखभाल की गुणवत्ता और दक्षता में उल्लेखनीय वृद्धि होगी। इसके अलावा, समिति तृतीयक स्वास्थ्य सेवा तक पहुंच में व्याप्त क्षेत्रीय असमानताओं पर चिंता व्यक्त करती है। देश भर में 23 एम्स की स्वीकृति के बावजूद, महत्वपूर्ण क्षेत्र अभी भी उपेक्षित हैं, विशेष रूप से देश की आर्थिक राजधानी मुंबई और कर्नाटक राज्य, विशेष रूप से कर्नाटक क्षेत्र का उच्च आवश्यकता वाला आकांक्षी जिला रायचूर। इसलिए, समिति सिफारिश करती है कि सरकार इन भौगोलिक और जनसांख्यिकीय रूप से महत्वपूर्ण क्षेत्रों में नए एम्स सुविधाओं की स्वीकृति और स्थापना में तेजी लाए, साथ ही साथ सभी राज्यों में समान, प्रौद्योगिकी–सक्षम स्वास्थ्य सेवा वितरण सुनिश्चित करने के लिए राष्ट्रीय अस्पताल कार्यक्रम का क्रियान्वयन करे।
(पैरा 6.16.1)
आपातकालीन नवजात और बाल चिकित्सा रेफरल
356. समिति का मत है कि ज़िला अस्पतालों में नवजात और बाल चिकित्सा संबंधी विशेष सुविधाओं की गंभीर कमी जन स्वास्थ्य, विशेषकर नवजात शिशुओं और छोटे बच्चों के लिए, एक गंभीर खतरा है। समिति का मानना है कि वर्तमान प्रशासनिक प्रोटोकॉल, जिसके तहत किसी गंभीर रोगी को सूचीबद्ध अस्पताल में स्थानांतरित करने से पहले ज़िला अस्पताल से औपचारिक सहमति पत्र प्राप्त करना अनिवार्य है, अत्यंत त्रुटिपूर्ण और जीवन के लिए खतरा है। इस प्रकार की नौकरशाही बाधाओं के कारण चिकित्सा आपात स्थितियों के महत्वपूर्ण समय में अत्यधिक देरी होती है, जिससे संवेदनशील रोगियों और उनके परिवारों को अत्यधिक और अनावश्यक पीड़ा सहनी पड़ती है। अतः समिति सभी आपातकालीन नवजात और बाल चिकित्सा रेफरल के लिए पूर्व–सहमति की आवश्यकता को तत्काल समाप्त करने की सिफारिश करती है, ताकि निर्बाध और त्वरित चिकित्सा हस्तक्षेप सुनिश्चित किया जा सके। साथ ही, सभी ज़िला अस्पतालों में आत्मनिर्भर बाल चिकित्सा देखभाल इकाइयाँ स्थापित करने के लिए लक्षित अवसंरचनात्मक अभियान चलाने की भी सिफारिश करती है।
(पैरा 6.17.1)
वरिष्ठ नागरिकों का बीमा, आपातकालीन देखभाल और तृतीयक अवसंरचना विस्तार
357. समिति का मत है कि वर्तमान स्वास्थ्य सेवा वितरण और बीमा व्यवस्था वरिष्ठ नागरिकों को अपर्याप्त सुरक्षा प्रदान करती है और प्रक्रियात्मक वित्तीय बाधाओं के कारण आपातकालीन चिकित्सा हस्तक्षेपों में गंभीर रूप से देरी करती है। समिति का मानना है कि समान स्वास्थ्य सेवा पहुंच प्राप्त करने के लिए विकेंद्रीकृत चिकित्सा अवसंरचना और सुगम, स्वचालित वित्तीय तंत्र दोनों आवश्यक हैं। अतः समिति बहुआयामी हस्तक्षेप की सिफारिश करती है: पहला, भारतीय बीमा नियामक एवं विकास प्राधिकरण (आईआरडीएआई) को 60 वर्ष से अधिक आयु के नागरिकों के लिए किफायती बीमा पॉलिसियों को अनिवार्य करना चाहिए और विवाद–मुक्त डिजिटल दावा सत्यापन प्रणाली लागू करनी चाहिए; दूसरा, नीति आयोग और स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय को संयुक्त रूप से द्वितीय और तृतीय स्तर के शहरों में स्वायत्त तृतीयक स्वास्थ्य केंद्र स्थापित करने चाहिए, जो एक क्रॉस-सब्सिडाइज़ेशन मॉडल द्वारा संचालित हों, जहां निजी वार्डों के राजस्व से आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों के लिए देखभाल का वित्तपोषण किया जाए; और तीसरा, जीवन–घातक आपात स्थितियों के लिए तत्काल वित्तीय मंजूरी की गारंटी देने के लिए पीएम–जेएवाई के तहत एक विशिष्ट परिचालन प्रावधान स्थापित किया जाना चाहिए, जिसमें ‘पहले उपचार, बाद में भुगतान‘ प्रोटोकॉल को सख्ती से लागू किया जाए।
(पैरा 6.18.1)
358. समिति का मत है कि महानगरों से परे द्वितीय और तृतीय स्तर के शहरों तक उन्नत तृतीयक स्वास्थ्य सेवाओं का विस्तार करना सभी के लिए समान चिकित्सा पहुंच के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। समिति का मानना है कि लक्षित कर छूटों के माध्यम से निजी क्षेत्र की भागीदारी को प्रोत्साहित करके और इन निजी सुविधाओं के लिए आयुष्मान भारत के सभी लाभार्थियों और बीमा रहित रोगियों को मानकीकृत केंद्रीय स्वास्थ्य सेवा (सीजीएचएस) दरों पर नकद रहित उपचार प्रदान करने की अनिवार्य बाध्यता के साथ इसे प्रभावी ढंग से प्राप्त किया जा सकता है। अतः समिति सिफारिश करती है कि मंत्रालय छोटे शहरों में रियायती तृतीयक देखभाल केंद्र स्थापित करने के लिए एक रणनीतिक सार्वजनिक–निजी भागीदारी ढांचा तैयार करे, यह सुनिश्चित करते हुए कि वाणिज्यिक प्रोत्साहन सार्वभौमिक स्वास्थ्य सेवा की वहनीयता और जन कल्याण के साथ सीधे तौर पर जुड़े हों।
(पैरा 6.18.2)
359. सरकार को किफायती अस्थि मज्जा प्रत्यारोपण (बीएमटी) की सुविधा को व्यापक बनाने के लिए कदम उठाने चाहिए, जो वर्तमान में ज्यादातर निजी अस्पतालों में उपलब्ध है और प्रति मरीज लगभग 25-30 लाख रुपये के उच्च खर्च पर उपलब्ध है। सभी एम्स में समर्पित बीएमटी इकाइयां स्थापित की जानी चाहिए और देश में बड़ी संख्या में मेडिकल कॉलेजों को देखते हुए, व्यापक भौगोलिक पहुंच सुनिश्चित करने के लिए प्रत्येक पांच मेडिकल कॉलेजों के लिए एक नोडल बीएमटी केंद्र स्थापित किया जा सकता है। इन सुविधाओं को राष्ट्रीय अंग एवं ऊतक प्रत्यारोपण संगठन (एनओटीटीओ) के मौजूदा ढांचे के साथ एकीकृत किया जा सकता है और सिकल सेल रोग और थैलेसीमिया से पीड़ित बच्चों के उपचार के लिए इन्हें मजबूत बनाया जा सकता है। इसके अलावा, सरकार मरीजों पर वित्तीय बोझ कम करने और इस जीवन रक्षक उपचार तक समान पहुंच सुनिश्चित करने के लिए संबंधित सार्वजनिक स्वास्थ्य योजनाओं के तहत बीएमटी केंद्रों के पैनलिकरण का विस्तार करने पर विचार कर सकती है।
(पैरा 6.18.3)
बाजार विनियमन
360. समिति का मत है कि कुशल प्रबंधन वाले उच्च गुणवत्ता वाले सार्वजनिक स्वास्थ्य संस्थान न केवल सुलभ रोगी देखभाल प्रदान करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं, बल्कि वे निर्णायक बाजार नियामक के रूप में भी कार्य करते हैं जो निजी क्षेत्र के अत्यधिक चिकित्सा खर्चों को स्वाभाविक रूप से कम करते हैं। समिति का मानना है कि रोगियों की यात्रा के बोझ को कम करने के लिए स्वास्थ्य सेवा वितरण के वर्तमान केंद्रीकृत मॉडल को विकेंद्रीकृत किया जाना चाहिए, और सरकारी सुविधाओं को परिचालन दक्षता, जवाबदेही और मजबूत जनसंपर्क ढांचे द्वारा चिह्नित “कॉर्पोरेट संस्कृति” को तत्काल अपनाना चाहिए। इसलिए, समिति सभी राज्यों के राजस्व प्रभागों में स्वायत्त, कुशल प्रबंधन वाले सार्वजनिक क्षेत्र के बहु–विशेषज्ञता अस्पतालों की रणनीतिक स्थापना की सिफारिश करती है ताकि समान पहुंच सुनिश्चित की जा सके, राजधानी शहरों तक यात्रा का समय कम किया जा सके और बेहतर सार्वजनिक सेवा वितरण के माध्यम से क्षेत्रीय स्वास्थ्य सेवा मूल्य निर्धारण को सक्रिय रूप से विनियमित किया जा सके।
(पैरा 6.19.1)
निजी स्वास्थ्य सेवा में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश का विनियमन
361. समिति निजी अस्पताल श्रृंखलाओं के परिचालन प्रबंधन में भारी मात्रा में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) की बढ़ती प्रवृत्ति पर गंभीर चिंता व्यक्त करती है, जो अक्सर 51% से अधिक होता है। समिति का मानना है कि विदेशी पूंजी का यह अनियंत्रित प्रवाह बड़ी कंपनियों द्वारा किफायती, मध्यम स्तर के अस्पतालों के एकाधिकार अधिग्रहण को बढ़ावा दे रहा है। समिति का मानना है कि यह आक्रामक निगमीकरण स्वास्थ्य सेवा को एक सार्वजनिक सेवा क्षेत्र से पूरी तरह से पूंजीवादी उद्यम में बदल रहा है, जिससे चिकित्सा प्रक्रियाओं की लागत कृत्रिम रूप से बढ़ रही है और संपूर्ण स्वास्थ्य सेवा प्रणाली में कीमतों में वृद्धि का व्यापक प्रभाव पड़ रहा है। यह स्वीकार करते हुए कि विदेशी पूंजी विनिर्माण क्षेत्र, विशेष रूप से चिकित्सा उपकरणों, उपभोग्य सामग्रियों और दुर्लभ बीमारियों के लिए विशेष दवाओं के क्षेत्र में अत्यधिक लाभकारी है और इसे सक्रिय रूप से प्रोत्साहित किया जाना चाहिए, अस्पतालों के प्रत्यक्ष संचालन में इसका अनियंत्रित उपयोग किफायती रोगी देखभाल के लिए हानिकारक साबित हो रहा है। इसलिए, समिति सरकार से सिफारिश करती है कि वह किफायती मध्यम स्तर के अस्पतालों को कंपनियों द्वारा किए जाने वाले अनुचित अधिग्रहणों से बचाने के लिए मौजूदा स्वास्थ्य सुविधाओं के परिचालन प्रबंधन और अधिग्रहण से संबंधित प्रत्यक्ष विदेशी निवेश की सीमाओं की सख्ती से समीक्षा करे और उन्हें तर्कसंगत बनाए। साथ ही, सरकार को एक लक्षित नियामक ढांचा पेश करना चाहिए जो स्पष्ट रूप से ऐसे विदेशी निवेशों को चिकित्सा प्रौद्योगिकियों और फार्मास्यूटिकल्स के घरेलू विनिर्माण की ओर निर्देशित और प्रोत्साहित करे।
(पैरा 6.20.1)
दिल्ली के एम्स में भीड़ कम करना
362. समिति मार्च 2024 में एम्स नई दिल्ली और केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बलों (सीएपीएफ) के बीच मैदान गढ़ी में 970 बिस्तरों वाली विशेष अस्पताल सुविधा की स्थापना के लिए हस्ताक्षरित समझौता ज्ञापन को लागू करने में हो रही देरी पर गहरी चिंता व्यक्त करती है। समिति स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय से इस अत्याधुनिक सुविधा को बिना किसी और देरी के पूरी तरह से चालू करने के लिए प्रशासनिक मंजूरी में तेजी लाने की सिफारिश करती है। इसके अलावा, एम्स नई दिल्ली के मुख्य परिसर में मरीजों की भारी भीड़ और बढ़ते दबाव को कम करने के लिए, समिति राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में उपलब्ध भूमि संसाधनों के उपयोग का पुरजोर समर्थन करती है। विशेष रूप से, समिति स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय से आवासन और शहरी कार्य मंत्रालय और दिल्ली विकास प्राधिकरण (डीडीए) के समन्वय से बदरपुर सीमा, सरिता विहार के पास स्थित 400 एकड़ खाली एनटीपीसी भूमि के एक हिस्से का तत्काल मूल्यांकन करने और एक औपचारिक प्रस्ताव प्रस्तुत करने की सिफारिश करती है, ताकि एम्स की एक बड़ी नई शाखा की स्थापना की जा सके। प्रमुख राजमार्गों से सीधी कनेक्टिविटी को देखते हुए, यह रणनीतिक स्थान दक्षिण दिल्ली, फरीदाबाद, नोएडा और व्यापक एनसीआर की आबादी के लिए स्वास्थ्य सेवा तक पहुंच में काफी सुधार करेगा।
(पैरा 6.21.1)
363. समिति का मत है कि नई दिल्ली स्थित एम्स में मौजूदा बुनियादी ढांचा भारी स्थानीय आबादी, युवाओं में जीवनशैली से जुड़ी बीमारियों में चिंताजनक वृद्धि और पड़ोसी राज्यों से आने वाले मरीजों की निरंतर आमद के कारण अत्यधिक बोझ से दबा हुआ है। दक्षिणी उपग्रह संस्थानों द्वारा प्रदान की गई राहत को स्वीकार करते हुए, समिति का मानना है कि राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र के उत्तरी बाहरी इलाकों, जिनमें उत्तरी दिल्ली, उत्तरी हरियाणा के कुछ हिस्से और पश्चिमी उत्तर प्रदेश शामिल हैं, में सुलभ तृतीयक स्वास्थ्य देखभाल की गंभीर कमी बनी हुई है, जिसके कारण मुख्य परिसर में मरीजों की भारी भीड़ और चिकित्सा पेशेवरों पर अत्यधिक दबाव बना रहता है। इसलिए, समिति अपने 172वें प्रतिवेदन में की गई सिफारिश को दोहराती है कि सरकार दिल्ली के उत्तरी बाहरी इलाकों में एक अतिरिक्त, स्वतंत्र रूप से संचालित एम्स सुविधा या पूरी तरह से सुसज्जित उपग्रह केंद्र की स्थापना का तत्काल मूल्यांकन और कार्यान्वयन करे, ताकि तृतीयक स्वास्थ्य देखभाल के बोझ को रणनीतिक रूप से विकेंद्रीकृत किया जा सके और व्यापक क्षेत्र के लिए समान और समय पर चिकित्सा पहुंच सुनिश्चित की जा सके।
(पैरा 6.21.2)
मेडिकल कॉलेजों और जिला अस्पतालों में मानव संसाधनों को मजबूत बनाना
364. सरकार को स्वास्थ्य सेवा पेशेवरों, विशेष रूप से मेडिकल कॉलेजों में गैर–क्लिनिकल फैकल्टी और जिला अस्पतालों में एनेस्थेटिस्टों की उपलब्धता और तैनाती की व्यापक समीक्षा करनी चाहिए। मेडिकल कॉलेजों के पर्याप्त विस्तार के बावजूद, कई संस्थानों में गैर–क्लिनिकल शिक्षण फैकल्टी की गंभीर कमी बनी हुई है, जिससे चिकित्सा शिक्षा की गुणवत्ता पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है। इसी प्रकार, 10 लाख से अधिक आबादी वाले कई जिला अस्पतालों में कथित तौर पर केवल एक ही एनेस्थेटिस्ट है, जिससे निर्बाध सर्जिकल सेवाएं सुनिश्चित करना मुश्किल हो जाता है, खासकर छुट्टी या अनुपस्थिति के दौरान। इसलिए, सरकार को मानव संसाधन आवश्यकताओं का आकलन करना चाहिए और राष्ट्रीय चिकित्सा प्रबंधन (एनएचएम) और अन्य उपयुक्त तंत्रों के माध्यम से डॉक्टरों और विशेषज्ञों की पर्याप्त, तर्कसंगत और समान तैनाती सुनिश्चित करनी चाहिए। साथ ही, कुछ राज्यों में डॉक्टरों की उपलब्धता को देखते हुए, केवल डॉक्टरों की कुल संख्या बढ़ाने के बजाय, बेहतर वितरण, उचित पारिश्रमिक और रोजगार के अवसरों पर ध्यान केंद्रित किया जाना चाहिए।
(पैरा 6.22.1)
सरकारी स्वास्थ्य योजनाओं के बारे में जागरूकता और पहुंच को मजबूत करना
365. सरकार को एक व्यापक और निरंतर जागरूकता अभियान चलाना चाहिए ताकि ग्रामीण और वंचित आबादी को विभिन्न सरकारी स्वास्थ्य योजनाओं, कार्यक्रमों और उपलब्ध स्वास्थ्य सेवाओं के बारे में पर्याप्त जानकारी मिल सके। अनेक पहलों के शुभारंभ के बावजूद, जागरूकता की कमी अक्सर पात्र लाभार्थियों को उनके हकदार लाभों तक पहुँचने से रोकती है। रेडियो, टेलीविजन, स्थानीय मीडिया और अन्य उपयुक्त संचार माध्यमों, जिनमें सामुदायिक स्तर पर संपर्क भी शामिल है, का उपयोग स्थानीय भाषाओं में जानकारी प्रसारित करने के लिए प्रभावी ढंग से किया जा सकता है। सरकार को यह आकलन करने के लिए तंत्र भी स्थापित करना चाहिए कि क्या लक्षित लाभार्थी वास्तव में इन योजनाओं का लाभ उठा रहे हैं, ताकि जागरूकता, पहुँच और कार्यान्वयन में मौजूद कमियों की पहचान करके उन्हें दूर किया जा सके।
(पैरा 6.23.1)
366. समिति आगे सिफारिश करती है कि सरकार को मरीजों को रेफरल, जांच, एबी-पीएमजेएवाई के लाभ, दवाओं की उपलब्धता और शिकायत निवारण में सहायता के लिए प्रत्येक जिला अस्पताल और मेडिकल कॉलेज में रोगी मार्गदर्शन और सुविधा डेस्क स्थापित करना चाहिए। विशेष रूप से बुजुर्गों, महिलाओं और आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों के लिए स्वास्थ्य सेवाओं की पहुंच में सुधार करने की और आवश्यकता है।
(पैरा 6.24.1)
राष्ट्रीय स्वास्थ्य सेवा वहनीयता डैशबोर्ड
367. समिति का मानना है कि स्वास्थ्य सेवा की वहनीयता और सुलभता पर एक ज़िलेवार डिजिटल डैशबोर्ड बनाने की आवश्यकता है, ताकि इलाज की लागत, प्रतीक्षा समय, विशेषज्ञ रिक्तियों, निदान, दवाओं की उपलब्धता और रोगी की शिकायतों के निवारण को ट्रैक किया जा सके, और पारदर्शिता, जवाबदेही तथा साक्ष्य-आधारित नीतिगत हस्तक्षेपों को बढ़ावा दिया जा सके।
(पैरा 6.25.1)
परिणाम-आधारित अस्पताल मान्यता
368. समिति का मानना है कि बुनियादी ढांचे पर आधारित मान्यता के साथ-साथ परिणाम-आधारित गुणवत्ता संकेतकों को भी शामिल किया जाना चाहिए। समय की मांग है कि अस्पतालों का मूल्यांकन मरीजों की सुरक्षा, उपचार के परिणामों, संक्रमण दर, प्रतीक्षा समय, मरीज की संतुष्टि और शिकायत निवारण के आधार पर किया जाए, और इसके अलावा, केवल बुनियादी ढांचे के बजाय स्वास्थ्य परिणामों के आधार पर गुणवत्ता में सुधार को प्रोत्साहित किया जाए।
(पैरा 6.26.1)
*****
सिफारिशें/समुक्तियां – एक नजर में
(177वां प्रतिवेदन)
चिरकालिक गुर्दा रोग का अवलोकन और बोझ
परिचय
1. समिति इस बात पर चिंता व्यक्त करती है कि देश में चिरकालिक गुर्दा रोग (सीकेडी) सबसे तेजी से फैलने वाली गैर-संचारी बीमारियों में से एक बन गई है, जिसका प्रसार लगातार बढ़ रहा है और बड़ी संख्या में रोगियों का निदान गंभीर अवस्था में ही हो पाता है। समिति यह भी नोट करती है कि यद्यपि सीकेडी एक बड़ी सार्वजनिक स्वास्थ्य चुनौती है, फिर भी इस बीमारी के बढ़ते बोझ और दीर्घकालिक सामाजिक–आर्थिक प्रभाव के अनुपात में इस पर नीतिगत ध्यान नहीं दिया गया है। समिति का यह सुविचारित मत है कि सीकेडी से निपटने के लिए रोकथाम, शीघ्र निदान, उपचार, अनुसंधान और दीर्घकालिक रोगी देखभाल को शामिल करते हुए एक व्यापक और समन्वित राष्ट्रीय प्रतिक्रिया की आवश्यकता है। इसलिए, समिति स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय से राष्ट्रीय स्वास्थ्य एजेंडा में सीकेडी को उच्च प्राथमिकता देने और स्पष्ट रूप से परिभाषित उद्देश्यों, मापनीय परिणामों और स्वास्थ्य सेवा के सभी स्तरों पर समन्वित कार्यान्वयन के साथ एक व्यापक राष्ट्रीय कार्यनीति तैयार करने की सिफारिश करती है।
(पैरा 1.4.4)
भारत में गंभीर गुर्दा रोग पर प्रमुख महामारी विज्ञान अध्ययन
2. समिति समुक्ति करती है कि चिरकालिक गुर्दा रोग (सीकेडी) एक प्रगतिशील बहु–प्रणाली रोग है जो कई गंभीर जटिलताओं से जुड़ा है, जिनमें हृदय रोग सीकेडी रोगियों में मृत्यु का प्रमुख कारण है। समिति का मत है कि विलंबित निदान और अपर्याप्त प्रबंधन अक्सर रोग की प्रगति को तेज करते हैं, जिसके परिणामस्वरूप रुग्णता, मृत्यु दर में वृद्धि होती है और डायलिसिस या गुर्दा प्रत्यारोपण की आवश्यकता बढ़ जाती है। इसलिए, समिति का मानना है कि नैदानिक परिणामों में सुधार और सीकेडी के समग्र बोझ को कम करने के लिए रोग का समय पर पता लगाना और व्यापक प्रबंधन करना आवश्यक है। तदनुसार, समिति रोग की प्रगति को रोकने, जटिलताओं को कम करने और रोगी की जीवन रक्षा और जीवन की गुणवत्ता में सुधार के लिए सीकेडी की प्रारंभिक जांच, समय पर निदान और एकीकृत प्रबंधन को मजबूत करने की सिफारिश करती है।
(पैरा 1.5.2)
गंभीर गुर्दा रोग के पर्यावरणीय और व्यावसायिक निर्धारक
3. समिति सिफारिश करती है कि मंत्रालय गंभीर गुर्दा रोग के जोखिम कारकों का, विशेष रूप से कृषि और आर्थिक रूप से कमजोर आबादी के बीच, समाधान करने के लिए केंद्रित अनुसंधान, मजबूत निगरानी और लक्षित निवारक उपायों को प्राथमिकता दे।
(पैरा 1.8.2)
बच्चों में चिरकालिक गुर्दा रोग (सीकेडी)
4. समिति इस बात पर ज़ोर देती है कि भारत में मधुमेह और उच्च रक्तचाप अभी भी गंभीर गुर्दा रोग के प्रमुख कारण हैं, लेकिन बढ़ते प्रमाण, विशेष रूप से कृषि श्रमिकों और पर्यावरणीय एवं व्यावसायिक खतरों से प्रभावित आबादी के बीच, अज्ञात कारणों से होने वाले गंभीर गुर्दा रोग (सीकेडीयू) के बढ़ते बोझ की ओर इशारा करते हैं। समिति यह भी समुक्ति करती है कि दीर्घकालिक ताप तनाव, बार–बार होने वाला निर्जलीकरण, कीटनाशकों का संपर्क, दूषित पेयजल और भारी धातुओं का संपर्क वैज्ञानिक अनुसंधान की आवश्यकता वाले महत्वपूर्ण क्षेत्रों के रूप में उभरे हैं। समिति का यह सुविचारित मत है कि प्रभावी निवारक उपायों को तैयार करने के लिए इन निर्धारकों की बेहतर समझ आवश्यक है। अतः समिति स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय को भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद, स्वास्थ्य अनुसंधान विभाग और अन्य संबंधित मंत्रालयों एवं वैज्ञानिक संस्थानों के सहयोग से सीकेडीयू तथा सीकेडी के अन्य पर्यावरणीय एवं व्यावसायिक निर्धारकों पर व्यापक बहुविषयक अनुसंधान करने, चिन्हित स्थानिक क्षेत्रों में निगरानी को मजबूत करने और संवेदनशील आबादी के लिए साक्ष्य–आधारित निवारक कार्यनीतियाँ विकसित करने की सिफारिश करती है।
(पैरा 1.9.2)
गुर्दा संबंधी स्वास्थ्य देखभाल में क्षेत्रीय असमानताएं:
5. मंत्रालय द्वारा प्रस्तुत साक्ष्यों और कार्यक्रम कार्यान्वयन आंकड़ों के आधार पर समिति समुक्ति करती है कि विभिन्न राज्यों और संघ राज्य क्षेत्रों में गुर्दा रोग संबंधी स्वास्थ्य सेवाओं की उपलब्धता और पहुंच में काफी असमानताएं बनी हुई हैं। समिति को बताया गया कि ग्रामीण आबादी, आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग, आदिवासी समुदाय और दूरदराज एवं भौगोलिक रूप से दुर्गम क्षेत्रों के निवासियों को नेफ्रोलॉजिस्ट, निदान सुविधाओं, डायलिसिस केंद्रों और प्रत्यारोपण सेवाओं तक सीमित पहुंच का सामना करना पड़ता है। समिति ने पाया कि स्वास्थ्य सेवा अवसंरचना, विशेषज्ञों की उपलब्धता और कार्यक्रम कार्यान्वयन में भिन्नताओं के कारण गुर्दा रोग की देखभाल तक असमान पहुंच है, जिसके परिणामस्वरूप अक्सर निदान में देरी, उपचार में रुकावट और खराब स्वास्थ्य परिणाम होते हैं। इसलिए, समिति का यह सुविचारित मत है कि क्षेत्रीय असमानताओं को कम करना और गुणवत्तापूर्ण गुर्दा रोग संबंधी स्वास्थ्य सेवाओं तक समान पहुंच सुनिश्चित करना, गंभीर गुर्दा रोग की रोकथाम और प्रबंधन के लिए मंत्रालय की रणनीति का एक प्रमुख उद्देश्य होना चाहिए।
(पैरा 1.10.1)
आर्थिक और सामाजिक बोझ
6. समिति इस बात पर चिंता व्यक्त करती है कि पूरे देश में, विशेषकर ग्रामीण और कम विकसित क्षेत्रों में, जहां विशेषीकृत नेफ्रोलॉजी सेवाएं सीमित हैं, समान गुर्दा रोग स्वास्थ्य सेवा प्राप्त करने में उपचार का किफायती और उसकी सुलभता न होना बड़ी बाधाएं बने हुए हैं। समिति का यह सुविचारित मत है कि आर्थिक तंगी जीवन रक्षक गुर्दा रोग उपचार प्राप्त करने में बाधा नहीं बननी चाहिए। अतः समिति स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय से यह सिफारिश करती है कि वह गंभीर गुर्दा रोग के रोगियों के लिए वित्तीय सुरक्षा तंत्र को मजबूत करे, कम विकसित क्षेत्रों में डायलिसिस सहित किफायती गुर्दा रोग सेवाओं की पहुंच का विस्तार करे, गुर्दा रोग के लिए बीमा कवरेज बढ़ाए और समय–समय पर गुर्दा रोग स्वास्थ्य सेवा में क्षेत्रीय असमानताओं का आकलन करे ताकि पूरे देश में विशेषीकृत सेवाओं का समान वितरण सुनिश्चित हो सके।
(पैरा 1.11.4)
विलंब से निदान के परिणाम
7. समिति इस बात पर चिंता व्यक्त करती है कि विलंबित निदान खराब नैदानिक परिणामों, बढ़ी हुई मृत्यु दर, उच्च उपचार लागत और डायलिसिस तथा गुर्दा प्रत्यारोपण पर बढ़ती निर्भरता में योगदान देने वाले प्रमुख कारकों में से एक बना हुआ है। समिति का मानना है कि प्रारंभिक चरणों में गंभीर गुर्दा रोग के लक्षणहीन होने के साथ–साथ अपर्याप्त जन जागरूकता भी इसके प्रमुख कारण हैं।स्वास्थ्य सेवाओं के लिए विलंबित दृष्टिकोण और उच्च जोखिम वाले व्यक्तियों की सीमित पहचान के कारण, बड़ी संख्या में मरीज़ों का इलाज तब शुरू होता है जब गुर्दे को अपरिवर्तनीय क्षति हो चुकी होती है। समिति का यह सुविचारित मत है कि निदान में देरी को कम करना दीर्घकालिक रोगी परिणामों में सुधार और गंभीर गुर्दे की बीमारी के समग्र बोझ को कम करने के लिए आवश्यक है। अतः समिति सिफारिश करती है कि स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय प्राथमिक स्वास्थ्य सेवा प्रणाली के माध्यम से गंभीर गुर्दा रोग के उच्च जोखिम वाले व्यक्तियों की शीघ्र पहचान और समय पर रेफरल के लिए तंत्र को मजबूत करे, साथ ही स्वास्थ्य सेवा प्रदाताओं और आम जनता के बीच गुर्दे की बीमारी के शीघ्र मूल्यांकन के महत्व के बारे में जागरूकता बढ़ाए। समिति आगे यह भी सिफारिश करती है कि समय पर हस्तक्षेप को सुविधाजनक बनाने और रोग की प्रगति में देरी करने के लिए स्वास्थ्य सेवा के सभी स्तरों पर जोखिम–आधारित मूल्यांकन और रेफरल के लिए उपयुक्त प्रोटोकॉल लागू किए जाएं।
(पैरा 1.12.2)
चिरकालिक गुर्दा रोग (सीकेडी) और जलवायु परिवर्तन: सार्वजनिक स्वास्थ्य की एक उभरती हुई चिंता
8. चिरकालिक गुर्दा रोग (सीकेडी) और जलवायु परिवर्तन: सार्वजनिक स्वास्थ्य की एक उभरती हुई चिंता 8. समिति समुक्ति करती है कि जलवायु परिवर्तन और पर्यावरणीय गिरावट, संवेदनशील व्यावसायिक समूहों में गंभीर गुर्दा रोग, विशेष रूप से गंभीर गुर्दा रोग (सीकेडीयू) के बोझ को प्रभावित करने वाले महत्वपूर्ण निर्धारक बनकर उभरे हैं। समिति का यह सुविचारित मत है कि गुर्दे की बीमारी पर जलवायु परिवर्तन के स्वास्थ्य प्रभावों के लिए नीतिगत ध्यान, वैज्ञानिक अनुसंधान और विभिन्न क्षेत्रों में समन्वित कार्रवाई की आवश्यकता है। अतः समिति सिफारिश करती है कि स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय, पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन, श्रम और रोजगार, कृषि एवं किसान कल्याण तथा जल शक्ति मंत्रालय के सहयोग से, गंभीर गुर्दा रोग के पर्यावरणीय और जलवायु संबंधी निर्धारकों से निपटने के लिए एक समन्वित राष्ट्रीय ढांचा विकसित करे। समिति आगे सिफारिश करती है कि जलवायु–अनुकूल गुर्दा स्वास्थ्य कार्यनीतियों को, जिनमें संवेदनशील आबादी की निगरानी, व्यावसायिक ताप शमन उपायों को बढ़ावा देना, सुरक्षित पेयजल की उपलब्धता और गंभीर गुर्दा रोग पर क्षेत्र–विशिष्ट अनुसंधान शामिल हैं, गंभीर गुर्दा रोग की रोकथाम एवं नियंत्रण के लिए राष्ट्रीय नीतियों और कार्यक्रमों में एकीकृत किया जाए।
(पैरा 1.13.2)
शीघ्र निदान और निवारक स्वास्थ्य देखभाल की आवश्यकता
9. समिति समुक्ति करती है कि गुर्दे की बीमारी के मामलों की एक बड़ी संख्या का गंभीर अवस्था में ही निदान हो पाता है, जिसका कारण गुर्दे के स्वास्थ्य के प्रति जन जागरूकता की कमी, जोखिम कारकों की अपर्याप्त समझ और स्वास्थ्य संबंधी सहायता लेने में देरी है। समिति की यह सुविचारित राय है कि निरंतर जन जागरूकता और निवारक स्वास्थ्य संवर्धन, गुर्दे की बीमारी के बोझ को कम करने की सबसे प्रभावी दीर्घकालिक कार्यनीति है। इसलिए, समिति सिफारिश करती है कि मंत्रालय निरंतर सूचना, शिक्षा और संचार (आईईसी) अभियानों, सामुदायिक आउटरीच कार्यक्रमों और गैर-संचारी रोगों के प्रति जागरूकता से संबंधित मौजूदा पहलों में गुर्दे के स्वास्थ्य से संबंधित संदेशों को शामिल करके गुर्दे के स्वास्थ्य संवर्धन पर अधिक जोर दे। समिति यह भी सिफारिश करती है कि उच्च जोखिम वाली आबादी को स्वस्थ जीवनशैली, प्रारंभिक लक्षणों, जोखिम कारकों और समय पर चिकित्सा परामर्श के महत्व के बारे में शिक्षित करने पर विशेष जोर दिया जाए।
(पैरा 1.14.2)
रोकथाम रणनीतियाँ
गंभीर गुर्दा रोग की रोकथाम: एक अवलोकन:
10. समिति स्वीकार करती है कि मंत्रालय ने गंभी गुर्दा रोग की रोकथाम को गैर-संचारी रोगों की रोकथाम और नियंत्रण के राष्ट्रीय कार्यक्रम के एक अभिन्न अंग के रूप में मान्यता दी है और स्वस्थ जीवन शैली को बढ़ावा देने और प्रमुख जोखिम कारकों को कम करने के उद्देश्य से कई उपाय शुरू किए हैं। रोकथाम को केवल एक चिकित्सा हस्तक्षेप के रूप में नहीं बल्कि एक सार्वजनिक स्वास्थ्य रणनीति के रूप में भी देखा जाना चाहिए जिसमें व्यवहार परिवर्तन, जीवनशैली में संशोधन, पोषण, पर्यावरण संरक्षण और सामुदायिक भागीदारी शामिल हो।समिति समुक्ति करती है कि चिरकालिक गुर्दा रोग (सीकेडी) का बढ़ता बोझ रोगियों, परिवारों और सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणाली पर अत्यधिक आर्थिक प्रभाव डालता है। समिति इस बात से चिंतित है कि जहां डायलिसिस और अन्य गुर्दा प्रतिस्थापन उपचारों के लिए पर्याप्त संसाधन समर्पित किए जा रहे हैं, वहीं रोग की प्रगति और दीर्घकालिक स्वास्थ्य देखभाल लागत को कम करने की क्षमता के बावजूद निवारक नेफ्रोलॉजी को नीतिगत और वित्तीय रूप से उतना महत्व नहीं दिया गया है।निवारक नेफ्रोलॉजी को मजबूत करने से दीर्घकालिक स्वास्थ्य देखभाल व्यय में कमी आएगी, जीवन की गुणवत्ता में सुधार होगा और डायलिसिस सेवाओं पर बढ़ते बोझ में कमी आएगी।समिति का यह सुविचारित मत है कि रोकथाम, शीघ्र निदान और जोखिम कारकों के प्रबंधन में निरंतर निवेश से न केवल स्वास्थ्य परिणामों में सुधार होगा, बल्कि भविष्य में महंगी तृतीयक देखभाल सेवाओं की मांग में भी काफी कमी आएगी। अतः समिति स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय को स्वास्थ्य नियोजन और संसाधन आवंटन में निवारक नेफ्रोलॉजी को उच्च प्राथमिकता देने, निवारक उपायों की लागत–प्रभावशीलता का आवधिक मूल्यांकन करने और साक्ष्य–आधारित नियोजन एवं प्रदर्शन मूल्यांकन को सुगम बनाने के लिए गैर–संचारी रोगों के राष्ट्रीय निगरानी ढांचे में मापने योग्य गुर्दा स्वास्थ्य संकेतकों को शामिल करने की सिफारिश करती है। समिति इस दृष्टिकोण का समर्थन करती है कि व्यापक रोकथाम रणनीति को जीवनशैली, पर्यावरणीय, व्यावसायिक और प्रणालीगत कारकों को संबोधित करना चाहिए, साथ ही सामुदायिक स्तर पर मौजूदा स्वास्थ्य बुनियादी ढांचे का लाभ उठाना चाहिए।
(पैरा 2.1.5)
प्रारंभिक और प्राथमिक रोकथाम: रोग के शुरू होने से पहले जोखिम कारकों को कम करना
11. समिति ने स्वस्थ जीवन शैली को बढ़ावा देने और गैर-संचारी रोगों के बारे में जागरूकता पैदा करने के लिए लगभग 1.8 लाख आयुष्मान आरोग्य मंदिरों के माध्यम से 6.43 करोड़ से अधिक स्वास्थ्य और कल्याण सत्र आयोजित करने में मंत्रालय के प्रयासों को स्वीकार करती है। हालाँकि, समिति यह समुक्ति करने के लिए विवश है कि चिरकालिक गुर्दा रोग (सीकेडी) का बोझ लगातार बढ़ रहा है, जो दर्शाता है कि निवारक प्रयासों को स्वास्थ्य केंद्र-आधारित सत्रों से परे और अधिक सुदृढ़ करने की आवश्यकता है। समिति का यह सुविचारित मत है कि इन सत्रों की प्रभावशीलता आयुष्मान आरोग्य मंदिरों में उपस्थिति पर निर्भर करती है और इसलिए, जोखिमग्रस्त आबादी के एक बड़े हिस्से तक पर्याप्त रूप से नहीं पहुंच पाती है। सीकेडी के शुरुआती चरणों में लक्षण न दिखने की प्रवृत्ति को देखते हुए, समिति सिफारिश करती है कि मंत्रालय स्वास्थ्य सुविधाओं से परे जाकर, घर-घर अभियान, ग्राम और वार्ड स्तर के आउटरीच कार्यक्रमों, और ‘आशा’, ‘एएनएम’ व अन्य फ्रंटलाइन स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं को शामिल करते हुए लक्षित आईईसी गतिविधियों के माध्यम से गुर्दा स्वास्थ्य जागरूकता के लिए एक सक्रिय, समुदाय-आधारित दृष्टिकोण अपनाए। समिति का मानना है कि ऐसे उपायों से सामुदायिक भागीदारी में सुधार होगा, सीकेडी के जोखिम कारकों और लक्षणों के बारे में जागरूकता बढ़ेगी और शीघ्र निदान एवं समय पर उपचार में सहायता मिलेगी।
(पैरा 2.2.5)
12. समिति का यह सुविचारित मत है कि भारत की विशाल जनसंख्या और स्वास्थ्य सेवा प्रणाली पर बढ़ते बोझ को देखते हुए, गंभीर गुर्दा रोग के उपचार की तुलना में रोकथाम कहीं अधिक प्रभावी और टिकाऊ उपाय है। तदनुसार, समिति सिफारिश करती है कि स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय स्वयं सहायता समूहों, स्कूलों, कार्यस्थलों और स्थानीय सामुदायिक संगठनों के माध्यम से स्वस्थ जलयोजन प्रथाओं और गर्मी के तनाव के प्रति जागरूकता को संस्थागत बनाकर निवारक और समुदाय-आधारित हस्तक्षेपों को प्राथमिकता दे। समिति आगे यह भी सिफारिश करती है कि ऐसे निवारक संदेशों को स्वच्छ भारत मिशन और पोषण अभियान जैसे मौजूदा प्रमुख कार्यक्रमों में एकीकृत किया जाए ताकि व्यापक पहुंच सुनिश्चित हो सके, स्थायी व्यवहार परिवर्तन को बढ़ावा मिले और विशेषकर संवेदनशील ग्रामीण और कृषि समुदायों में गंभीर गुर्दा रोग की घटनाओं में कमी आए।
(पैरा 2.2.6)
13. समिति समुक्ति करती है कि सीकेडी की प्रभावी रोकथाम, स्वस्थ जीवन शैली अपनाने और परिवर्तनीय जोखिम कारकों के प्रभावी प्रबंधन के माध्यम से निरंतर व्यवहार परिवर्तन से आंतरिक रूप से जुड़ी हुई है। हालाँकि, समिति को यह समुक्ति करने के लिए विवश है कि मौजूदा सार्वजनिक स्वास्थ्य जागरूकता अभियानों में गुर्दे के स्वास्थ्य को पर्याप्त महत्व नहीं मिला है। इसलिए, समिति दृढ़तापूर्वक सिफारिश करती है कि स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय को तपेदिक (टीबी) और एचआईवी/एड्स जैसे सफल जन स्वास्थ्य जागरूकता अभियानों की तर्ज पर एक समर्पित राष्ट्रीय गंभीर गुर्दा रोग जागरूकता कार्यक्रम तैयार और कार्यान्वित करना चाहिए, जिसका प्रिंट, इलेक्ट्रॉनिक, डिजिटल और सोशल मीडिया के माध्यम से निरंतर राष्ट्रव्यापी प्रचार-प्रसार हो। समिति स्कूलों, कार्यस्थलों और समुदायों में जागरूकता अभियान और स्वास्थ्य शिक्षा कार्यक्रम आयोजित करके सामुदायिक भागीदारी को मजबूत करने की भी सिफारिश करती है। समिति अपने जागरूकता अभियानों में स्वस्थ आहार संबंधी आदतों को बढ़ावा देने की भी सिफारिश करती है, जिसमें नमक का सेवन कम करना, नियमित शारीरिक गतिविधि, तंबाकू और शराब से परहेज, पर्याप्त जलयोजन और उच्च जोखिम वाले व्यक्तियों की आवधिक जांच शामिल है। इसलिए, समिति दृढ़तापूर्वक सिफारिश करती है कि आयुष मंत्रालय स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय के समन्वय से अपने मौजूदा स्वास्थ्य कार्यक्रमों के माध्यम से साक्ष्य-आधारित स्वस्थ जीवनशैली प्रथाओं और निवारक स्वास्थ्य देखभाल को बढ़ावा देकर इन प्रयासों को सक्रिय रूप से पूरक करे।
(पैरा 2.2.9)
चिरकालिक गुर्दा रोग (सीकेडी) के प्रति जागरूकता:
14. समिति समुक्ति करती है कि चिरकालिक गुर्दा रोग (सीकेडी) की रोकथाम के लिए एक प्रभावी जागरूकता रणनीति को स्वास्थ्य सुविधाओं तक सीमित न रखकर, कम उम्र से ही स्वास्थ्य शिक्षा और जागरूकता के माध्यम से प्राथमिक रोकथाम पर अधिक जोर देना चाहिए। समिति का मत है कि युवा आबादी अस्वास्थ्यकर खान–पान की आदतों, निष्क्रिय जीवनशैली, मोटापा, तंबाकू और शराब के सेवन और गुर्दे के स्वास्थ्य के बारे में कम जागरूकता के प्रति अधिक संवेदनशील और व्यवहारिक रूप से प्रवण होती है। समिति का यह भी मानना है कि कि देश में किडनी स्वास्थ्य साक्षरता अभी भी काफी हद तक रोगी-केंद्रित बनी हुई है, जो जनसंख्या स्तर पर सार्थक रोकथाम हासिल करने के लिए अपर्याप्त है। समिति का मानना है कि चिरकालिक गुर्दा रोग (सीकेडी) की रोकथाम के लिए रोगी–केंद्रित दृष्टिकोण से हटकर समग्र समाज–केंद्रित दृष्टिकोण अपनाना आवश्यक है। इसके लिए स्कूली बच्चों, आम जनता, स्वास्थ्य सेवा प्रदाताओं और समुदायों में गुर्दे के स्वास्थ्य संबंधी साक्षरता को मजबूत करना होगा। तदनुसार, समिति सिफारिश करती है कि स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय, शिक्षा मंत्रालय के समन्वय से, गुर्दे के स्वास्थ्य की बुनियादी अवधारणाओं, स्वस्थ आहार, पर्याप्त जलयोजन, शारीरिक गतिविधि, गैर–संक्रामक रोगों की रोकथाम और गुर्दे की कार्यप्रणाली की सुरक्षा के महत्व को स्कूली स्वास्थ्य शिक्षा कार्यक्रमों और उपयुक्त स्कूली पाठ्यक्रम में शामिल करे। समिति आगे सिफारिश करती है कि आयुष्मान आरोग्य मंदिरों, शैक्षणिक संस्थानों, कार्यस्थलों, जनसंचार माध्यमों और डिजिटल प्लेटफार्मों के माध्यम से निरंतर राष्ट्रव्यापी जागरूकता अभियान चलाए जाएं ताकि आम जनता में गुर्दे के स्वास्थ्य संबंधी साक्षरता में सुधार हो और सीकेडी की रोकथाम के लिए आजीवन स्वस्थ व्यवहारिक प्रथाओं को बढ़ावा मिले।
(पैरा 2.3.3)
15. समिति का मानना है कि देश में चिरकालिक गुर्दा रोग (सीकेडी) का बढ़ता बोझ मधुमेह, उच्च रक्तचाप, मोटापा और हृदय रोगों जैसे चयापचय जोखिम कारकों के बढ़ते प्रसार से निकटता से जुड़ा हुआ है, जो बदले में, बदलते खान-पान, नमक, चीनी और संतृप्त वसा से भरपूर अत्यधिक प्रसंस्कृत और डिब्बाबंद खाद्य पदार्थों के बढ़ते सेवन, गतिहीन जीवन शैली और स्वस्थ जीवन के बारे में अपर्याप्त सार्वजनिक जागरूकता के कारण बढ़ रहे हैं। समिति इस बात की सराहना करती है कि स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय ने गैर–संचारी रोगों की रोकथाम एवं नियंत्रण के लिए राष्ट्रीय कार्यक्रम (एनपी–एनसीडी), पोषण अभियान और अन्य स्वास्थ्य संवर्धन कार्यक्रमों के तहत कई पहलें की हैं। समिति का यह सुविचारित मत है कि इन जोखिम कारकों को दीर्घकालिक रोग में परिवर्तित होने से पहले ही रोकने के उद्देश्य से प्राथमिक रोकथाम पर अधिक जोर देने की आवश्यकता है। अतः, समिति सिफारिश करती है कि स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय, भारतीय खाद्य सुरक्षा और मानक प्राधिकरण (एफएसएसएआई) और अन्य संबंधित हितधारकों के साथ समन्वय में, उपयुक्त फ्रंट-ऑफ-पैक खाद्य लेबलिंग, रंग कोडिंग और अन्य साक्ष्य-आधारित नियामक हस्तक्षेपों के माध्यम से पैकेज्ड खाद्य उत्पादों की पोषण गुणवत्ता के बारे में उपभोक्ता जागरूकता को मजबूत करने के लिए उचित उपायों की जांच करे, जो सूचित आहार विकल्पों को सक्षम बनाते हैं। समिति आगे सिफारिश करती है कि मंत्रालय आहार में अत्यधिक सोडियम और छिपे हुए नमक के खतरों पर एक लक्षित, उच्च–प्रभाव वाला राष्ट्रीय जनसंचार अभियान शुरू करे। इसके अलावा, मंत्रालय को स्कूलों, कार्यस्थलों और स्थानीय आयुष्मान आरोग्य मंदिरों में आयुष कल्याण प्रणालियों और दैनिक शारीरिक गतिविधि मॉड्यूल का लाभ उठाते हुए, सामुदायिक स्तर पर जीवनशैली संशोधन कार्यक्रमों को संस्थागत रूप देना चाहिए ताकि जनसंख्या स्तर पर चयापचय संबंधी जोखिम कारकों को कम किया जा सके।
(पैरा 2.3.4)
16. समिति चिंता के साथ समुक्ति करती है देश में नॉन-स्टेरॉयडल एंटी-इंफ्लेमेटरी दवाओं (एनएसएआईडीएस) और अन्य नेफ्रोटॉक्सिक दवाओं का अंधाधुंध और बिना निगरानी के उपयोग रोकी जा सकने वाली किडनी की क्षति में योगदान दे रहा है। समिति का मानना है कि लंबे समय तक स्वयं दवा लेने के संभावित दुष्प्रभावों के बारे में सीमित जन जागरूकता और अनुचित दवा उपयोग का अपर्याप्त विनियमन, विशेष रूप से ग्रामीण और पिछड़े क्षेत्रों में, महत्वपूर्ण जन स्वास्थ्य संबंधी चिंताएं बनी हुई हैं। समिति का यह मत है कि दवा–प्रेरित गुर्दे की बीमारी की रोकथाम के लिए जन जागरूकता, तर्कसंगत दवा लिखने की प्रथा और प्रभावी नियामक निगरानी का संयोजन आवश्यक है। अतः समिति स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय को केंद्रीय औषधि मानक नियंत्रण संगठन (सीडीएससीओ) के परामर्श से गुर्दे को नुकसान पहुंचाने वाली दवाओं की बिना प्रिस्क्रिप्शन के उपलब्धता और अनुचित उपयोग से संबंधित मौजूदा नियामक और जागरूकता उपायों की समीक्षा करने की सिफारिश करती है। समिति यह भी सिफारिश करती है कि दर्द निवारक और अन्य संभावित रूप से गुर्दे को नुकसान पहुंचाने वाली दवाओं के अंधाधुंध उपयोग से जुड़े जोखिमों के बारे में नागरिकों को जागरूक करने के लिए उचित जन शिक्षा अभियान चलाए जाएं। सरकार को एंटीबायोटिक दवाओं के अत्यधिक उपयोग को रोकने के लिए भी ठोस उपाय करने चाहिए क्योंकि ये गुर्दे के स्वास्थ्य को गंभीर नुकसान पहुंचाते हैं, इसलिए समिति चाहती है कि इस बढ़ते खतरे से निपटने के लिए एक मजबूत, विज्ञान-संचालित और साक्ष्य-आधारित नीति बहुत जरूरी है।
(पैरा 2.3.5)
17. समिति, ‘स्वस्थ नारी, सशक्त परिवार अभियान‘, ‘पोषण माह‘, ‘आयुष्मान शिविर‘ और ‘नेशनल एनसीडी कैंपेन‘ जैसी विभिन्न पहलों के अंतर्गत बड़े पैमाने पर स्वास्थ्य शिविर और सामुदायिक आउटरीच कार्यक्रम आयोजित करने के लिए मंत्रालय के प्रयासों की सराहना करती है, साथ ही ‘आयुष्मान आरोग्य मंदिर‘ नेटवर्क के माध्यम से नियमित रूप से स्वास्थ्य और जांच गतिविधियों के संचालन की भी सराहना करती है। इन पहलों से प्रमुख गैर–संक्रामक रोगों की स्क्रीनिंग तक पहुंच में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है और निवारक स्वास्थ्य देखभाल के प्रति जन जागरूकता बढ़ाने में योगदान मिला है। हालांकि, समिति का मानना है कि ऐसे अभियान मुख्य रूप से मधुमेह, उच्च रक्तचाप और कैंसर जैसे सामान्य गैर–संक्रामक रोगों पर केंद्रित रहे हैं, जबकि गुर्दे की सेहत और चिरकालिक गुर्दा रोग (सीकेडी) , इन बीमारियों से निकटता से जुड़े होने के बावजूद, सामुदायिक जागरूकता गतिविधियों में उतना ध्यान नहीं दिया गया है। इसलिए, समिति का यह सुविचारित मत है कि इस तरह के बड़े पैमाने पर आयोजित जन स्वास्थ्य मंच गुर्दे की सेहत को बढ़ावा देने, शुरुआती जोखिम की पहचान करने और जन शिक्षा, विशेष रूप से उच्च जोखिम वाली आबादी के बीच, को एकीकृत करने का आदर्श अवसर प्रदान करते हैं। अतः समिति स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय से यह सिफारिश करती है कि वह गुर्दा स्वास्थ्य संवर्धन को सभी प्रमुख राष्ट्रीय स्वास्थ्य जागरूकता अभियानों और सामुदायिक स्क्रीनिंग पहलों के अभिन्न अंग के रूप में संस्थागत रूप दे। समिति आगे सिफारिश करती है कि गैर–संचारी रोगों की रोकथाम एवं नियंत्रण के राष्ट्रीय कार्यक्रम (एनपी–एनसीडी) के अंतर्गत तथा आयुष्मान आरोग्य मंदिरों के माध्यम से आयोजित स्वास्थ्य शिविरों में मानकीकृत गुर्दा स्वास्थ्य शिक्षा, जोखिम मूल्यांकन, निवारक जीवनशैली उपायों पर परामर्श और उच्च जोखिम वाले व्यक्तियों के लिए रेफरल मार्गों को शामिल किया जाए। समिति दृढ़तापूर्वक चाहती है कि विश्व गुर्दा दिवस और अन्य राष्ट्रीय जन स्वास्थ्य अभियानों जैसे अवसरों पर समर्पित जागरूकता और स्क्रीनिंग गतिविधियों का आयोजन किया जाए ताकि देश में गंभीर गुर्दा रोग का शीघ्र पता लगाया जा सके, सामुदायिक जागरूकता में सुधार किया जा सके और दीर्घकालिक बोझ को कम किया जा सके।
(पैरा 2.3.7)
प्राथमिक रोकथाम में आयुष प्रणालियों की भूमिका
18. समिति का मानना है कि मंत्रालय ने एक एकीकृत दृष्टिकोण अपनाया है, जिसमें आयुष हस्तक्षेपों का उद्देश्य स्वास्थ्य संवर्धन, जीवनशैली परामर्श, तनाव प्रबंधन और निवारक देखभाल के माध्यम से आधुनिक चिकित्सा का पूरक बनना है। समिति चाहती है कि आयुष संस्थान गैर–संक्रामक रोग बाह्य रोगी क्लीनिकों, स्वास्थ्य शिविरों, विद्यालय स्वास्थ्य कार्यक्रमों और सामुदायिक जागरूकता पहलों के माध्यम से स्वास्थ्य संवर्धन गतिविधियाँ संचालित करें, जिनका उद्देश्य मधुमेह और उच्च रक्तचाप की शीघ्र पहचान और प्रबंधन करना है जिससे अप्रत्यक्ष रूप से गुर्दे की बीमारियों की रोकथाम और उच्च जोखिम वाले व्यक्तियों में बीमारी की प्रगति को धीमा करने में योगदान मिल सके।
(पैरा 2.4.3)
19. समिति समुक्ति करती है कि चिरकालिक गुर्दा रोग (सीकेडी) मुख्य रूप से जीवनशैली से जुड़े जोखिम कारकों जैसे मधुमेह, उच्च रक्तचाप, मोटापा और अस्वास्थ्यकर आहार संबंधी आदतों के कारण होती है, जिसके लिए निरंतर व्यवहार परिवर्तन और स्वस्थ जीवनशैली अपनाने की आवश्यकता है। समिति यह भी मानती है कि भारत की पारंपरिक चिकित्सा प्रणालियों की व्यापक सामुदायिक पहुँच है और वे संतुलित पोषण, शारीरिक गतिविधि, योग, तनाव प्रबंधन और स्वस्थ जीवन के माध्यम से निवारक स्वास्थ्य देखभाल पर काफी जोर देती हैं। समिति का यह सुविचारित मत है कि यद्यपि आधुनिक चिकित्सा सीकेडी के निदान और नैदानिक प्रबंधन के लिए आधारशिला बनी हुई है, आयुष के निवारक सिद्धांत चल रहे जन स्वास्थ्य प्रयासों के पूरक हो सकते हैं, विशेष रूप से स्वस्थ जीवन शैली को बढ़ावा देने, जागरूकता पैदा करने और जीवन शैली विकारों को रोकने में जो व्यक्तियों को सीकेडी के प्रति जागरूक बनाते हैं। इसलिए, समिति दृढ़तापूर्वक सिफारिश करती है कि स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय, आयुष मंत्रालय के समन्वय से, सीकेडी के लिए एक एकीकृत निवारक ढांचा विकसित करे जो दोनों प्रणालियों की शक्तियों का लाभ उठाते हुए स्वास्थ्य संवर्धन, योग–आधारित स्वास्थ्य हस्तक्षेप, आहार परामर्श, जन जागरूकता, व्यवहार परिवर्तन संचार और आयुष्मान आरोग्य मंदिरों और अन्य सामुदायिक मंचों के माध्यम से प्रारंभिक जोखिम कारक प्रबंधन पर ध्यान केंद्रित करे। आयुष मंत्रालय को ओपीडी क्लीनिकों, स्वास्थ्य शिविरों, स्कूली स्वास्थ्य पहलों और किडनी स्वास्थ्य जागरूकता के लिए सामुदायिक पहुंच पहलों के माध्यम से स्वास्थ्य संवर्धन गतिविधियों को अपनाकर निवारक स्वास्थ्य देखभाल के लिए सक्रिय रूप से काम करना चाहिए। समिति का मानना है कि साक्ष्य–आधारित एकीकृत दृष्टिकोण निवारक स्वास्थ्य देखभाल को मजबूत करेगा, जोखिम वाले व्यक्तियों की शीघ्र पहचान में सहायता करेगा और सीकेडी के दीर्घकालिक बोझ को कम करने में योगदान देगा।
(पैरा 2.4.6)
द्वितीयक रोकथाम: शुरूआती पहचान और जोखिम कारकों का नियंत्रण
20. समिति इस बात की सराहना करती है कि मंत्रालय ने गैर–संक्रामक रोगों के लिए जनसंख्या–आधारित स्क्रीनिंग शुरू की है, जो कि एनपी–एनसीडी के अंतर्गत आती है, और आयुष्मान आरोग्य मंदिरों के माध्यम से व्यापक प्राथमिक स्वास्थ्य देखभाल को मजबूत किया है। समिति ने अपने समक्ष प्रस्तुत साक्ष्यों पर ध्यान दिया है कि चिरकालिक गुर्दा रोग (सीकेडी) का पता अभी भी मुख्य रूप से उन्नत अवस्था में ही चलता है, क्योंकि मधुमेह, उच्च रक्तचाप और अन्य उच्च जोखिम वाली स्थितियों के नियमित प्रबंधन में गुर्दे के स्वास्थ्य मूल्यांकन को अभी तक समान रूप से एकीकृत नहीं किया गया है। समिति विशेषज्ञों के इस मत का समर्थन करती है और शीघ्र पहचान, निगरानी और नीति नियोजन को सुगम बनाने के लिए व्यवस्थित जोखिम–आधारित स्क्रीनिंग की पुरजोर वकालत करती है। समिति का यह मत है कि द्वितीयक रोकथाम को मजबूत करना अंतिम चरण के गुर्दे के रोग की प्रगति को कम करने और भविष्य में डायलिसिस और प्रत्यारोपण की मांग को कम करने के लिए सबसे प्रभावी उपायों में से एक है। इसलिए, समिति सिफारिश करती है कि स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय मधुमेह, उच्च रक्तचाप, हृदय रोग, मोटापा, गुर्दे की बीमारी का पारिवारिक इतिहास और अन्य मान्यता प्राप्त जोखिम कारकों वाले व्यक्तियों के आवधिक मूल्यांकन को सुनिश्चित करके सभी एनपी–एनसीडी सेवाओं में लक्षित जोखिम–आधारित गुर्दे के स्वास्थ्य मूल्यांकन को एकीकृत करे।
(पैरा 2.5.4)
तृतीयक रोकथाम
21. समिति समुक्ति करती है कि चिरकालिक गुर्दा रोग (सीकेडी) एक जटिल, लगतार बढ़ने वाली और बहु-प्रणालीगत विकार है जो अक्सर मधुमेह, उच्च रक्तचाप, हृदय रोग, एनीमिया, खनिज और अस्थि विकार, पोषण संबंधी कमियों और मनोसामाजिक चुनौतियों से ग्रस्त होता है। समिति का सुविचारित मत है कि प्रभावी तृतीयक रोकथाम केवल नेफ्रोलॉजी देखभाल से संभव नहीं है, बल्कि इसके लिए चिकित्सकों, नेफ्रोलॉजिस्ट, मधुमेह विशेषज्ञों, हृदय रोग विशेषज्ञों, आहार विशेषज्ञों, क्लिनिकल फार्मासिस्टों, नर्सों, फिजियोथेरेपिस्टों, मानसिक स्वास्थ्य पेशेवरों और सामाजिक कार्यकर्ताओं के समन्वित, बहु-विषयक दृष्टिकोण की आवश्यकता है। हालाँकि, बहु-विषयक सीकेडी देखभाल सेवाएँ सीमित हैं और मुख्य रूप से तृतीयक देखभाल संस्थानों तक ही सीमित हैं, और स्वास्थ्य प्रणाली के विभिन्न स्तरों पर देखभाल के समन्वय और निरंतरता का अभाव है। इसलिए, समिति सिफारिश करती है कि मंत्रालय एकीकृत देखभाल मार्गों, साझा इलेक्ट्रॉनिक रोगी अभिलेखों, संरचित अनुवर्ती तंत्रों, रोगी शिक्षा कार्यक्रमों और नियमित बहुविषयक केस समीक्षाओं को अपनाकर तृतीयक रोकथाम के एक अभिन्न अंग के रूप में बहुविषयक गंभीर गुर्दा रोग प्रबंधन को संस्थागत रूप दे, ताकि देखभाल की निरंतरता सुनिश्चित हो सके और दीर्घकालिक नैदानिक परिणामों में सुधार हो सके, साथ ही अंतिम चरण के गुर्दा रोग (ईएसकेडी) की प्रगति में देरी हो सके।
(पैरा 2.6.2)
पर्यावरणीय और व्यावसायिक रोकथाम
22. समिति चिंता के साथ यह नोट करती है कि उभरते हुए साक्ष्य संकेत देते हैं कि देश के कुछ हिस्सों में पर्यावरणीय और व्यावसायिक कारक, अज्ञात कारण से होने वाले गंभीर गुर्दा रोग (सीकेडीयू) के उभरते हुए कारक हैं। लगभग 16% सीकेडीयू प्रसार को ध्यान में रखते हुए, समिति का दृढ़ मत है कि कृषि श्रमिकों और अन्य बाहरी श्रमिकों के बीच सीकेडीयू का बढ़ता बोझ एक एहतियाती और सक्रिय जन स्वास्थ्य प्रतिक्रिया को आवश्यक बनाता है। समिति का मानना है कि मौजूदा निवारक प्रयास कई क्षेत्रों में बिखरे हुए हैं और संवेदनशील जिलों में निगरानी, जोखिम मूल्यांकन और समन्वित हस्तक्षेप के लिए कोई व्यापक ढांचा मौजूद नहीं है। समिति सीकेडीयू के पर्यावरणीय और व्यावसायिक निर्धारकों पर साक्ष्य जुटाने के लिए स्वास्थ्य अनुसंधान विभाग और भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद द्वारा किए गए अनुसंधान प्रयासों की सराहना करती है। हालांकि, समिति का मानना है कि निवारक जन स्वास्थ्य कार्रवाई वैज्ञानिक अनुसंधान के साथ–साथ चलनी चाहिए और पूर्ण कारण निर्धारण स्थापित होने तक इसे स्थगित नहीं किया जाना चाहिए। अतः समिति सिफारिश करती है कि स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय, श्रम और रोजगार मंत्रालय, कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय, जल शक्ति मंत्रालय, पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय तथा संबंधित राज्य सरकारों के समन्वय से, उच्च जोखिम वाले क्षेत्रों के लिए जिला–विशिष्ट कार्यान्वयन रणनीतियों के साथ, सीकेडीयू की रोकथाम एवं निगरानी हेतु एक राष्ट्रीय ढांचा तैयार करे। इस ढांचे में सीकेडीयू हॉटस्पॉट की व्यवस्थित निगरानी; संवेदनशील श्रमिकों की आवधिक व्यावसायिक स्वास्थ्य जांच; कार्यस्थलों पर सुरक्षित पेयजल और पर्याप्त जलयोजन सुविधाओं की उपलब्धता; लंबे समय तक बाहरी कार्य में नियमित जलयोजन विराम सहित व्यवसायों में गर्मी से राहत के उपायों का कार्यान्वयन; जहां आवश्यक हो, पर्यावरणीय निगरानी को सुदृढ़ करना; मौजूदा कानूनों और दिशानिर्देशों के अनुसार कृषि रसायनों का विनियमन और सुरक्षित संचालन; और भविष्य के नीतिगत हस्तक्षेपों के लिए ठोस साक्ष्य जुटाने हेतु निरंतर बहुविषयक अनुसंधान का प्रावधान होना चाहिए। इस संबंध में, समिति सीकेडीयू–प्रवण क्षेत्रों में स्वास्थ्य, व्यावसायिक सुरक्षा, पर्यावरण एवं जलवायु अनुकूलन उपायों के कार्यान्वयन की आवधिक समीक्षा और समन्वय को सुगम बनाने हेतु एक अंतर–मंत्रालयी समन्वय तंत्र की स्थापना की सिफारिश करती है।
(पैरा 2.7.2)
जांच और निदान
23. समिति का यह भी मानना है कि गुर्दे की दीर्घकालिक बीमारी (सीकेडी) का शीघ्र पता लगाना इसके प्रभावी प्रबंधन के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह बीमारी अक्सर तब तक लक्षणहीन बनी रहती है जब तक कि गुर्दा की कार्यक्षमता में काफी कमी (60-70% तक) न आ जाए। समिति का मानना है कि स्क्रीनिंग और निदान रोकथाम और उपचार के बीच एक महत्वपूर्ण कड़ी का काम करते हैं। भारत में, जहां सीकेडी की कुल व्यापकता लगभग 13.24% अनुमानित है और इसमें क्षेत्रीय भिन्नता काफी अधिक है, गुर्दा रोग की अंतिम अवस्था (ईएसकेडी) तक पहुंचने की गति को कम करने, उपचार लागत को घटाने और रोगियों के परिणामों में सुधार के लिए एक मजबूत, सुलभ और किफायती स्क्रीनिंग प्रणाली आवश्यक है। समिति, इस बात को ध्यान में रखते हुए कि मधुमेह, उच्च रक्तचाप और अन्य गैर–संक्रामक रोगों का बढ़ता बोझ पूरे देश में गुर्दा रोग की बढ़ती व्यापकता का कारण बन रहा है, इस बात से अवगत है कि इससे निपटने के लिए एक एहतियाती दृष्टिकोण या रणनीतिक कार्य योजना की आवश्यकता है और तदनुसार, गैर–संक्रामक कार्यक्रमों के माध्यम से उच्च जोखिम वाले समूहों, विशेष रूप से मधुमेह और उच्च रक्तचाप वाले व्यक्तियों के लिए नियमित स्क्रीनिंग की सिफारिश करती है।
(पैरा 3.1.4)
गंभीर गुर्दा रोग की जांच
स्क्रीनिंग का औचित्य
24. समिति का दृढ़ विश्वास है कि व्यवस्थित स्क्रीनिंग के माध्यम से शीघ्र निदान न केवल चिकित्सकीय रूप से लाभकारी है, बल्कि भारतीय स्वास्थ्य प्रणाली के लिए आर्थिक रूप से भी लाभदायक है। उच्च जोखिम वाले व्यक्तियों की स्क्रीनिंग और समय पर उपचार शुरू करने की लागत, जटिल चिरकालिक गुर्दा रोग (सीकेडी) के प्रबंधन में होने वाले खर्च से काफी कम है, जिसमें अक्सर डायलिसिस, गुर्दा प्रत्यारोपण और कई जटिलताओं के उपचार की आवश्यकता होती है। इसलिए, स्क्रीनिंग सीकेडी के समग्र बोझ को कम करने के लिए सबसे किफायती सार्वजनिक स्वास्थ्य उपायों में से एक है। समिति सरकार को नियमित चिकित्सा परामर्श और रक्तचाप एवं रक्त शर्करा के स्तर की आवधिक निगरानी और प्रभावी नियंत्रण के लिए साक्ष्य–आधारित नैदानिक मार्गदर्शन का पालन करने के लिए प्रोत्साहित करने की सिफारिश करती है। साथ ही, गुर्दे के कार्य को संरक्षित करने और अंतिम चरण के गुर्दा रोग (ईएसकेडी) की ओर बढ़ने के जोखिम को कम करने के लिए जीवनशैली में समय पर बदलाव और चिकित्सकीय सलाह के अनुसार साक्ष्य–आधारित औषधीय उपचार को शीघ्र शुरू करने की आवश्यकता पर भी बल देती है। समिति का यह मत है कि गंभीर गुर्दे की बीमारी के इलाज की तुलना में रोकथाम और प्रारंभिक हस्तक्षेप में निवेश करना कहीं अधिक लागत प्रभावी है, क्योंकि गंभीर गुर्दे की बीमारी का इलाज स्वास्थ्य सेवा प्रणाली पर काफी वित्तीय बोझ डालता है, साथ ही इससे मरीजों को लंबे समय तक कष्ट सहना पड़ता है, जीवन की गुणवत्ता कम हो जाती है और मृत्यु दर बढ़ जाती है।
(पैरा 3.3.2)
जांच परीक्षण
25. समिति ने गौर किया कि सीरम क्रिएटिनिन देश भर में गुर्दे की कार्यक्षमता का आकलन करने के लिए सबसे व्यापक रूप से निर्धारित प्रयोगशाला परीक्षण बना हुआ है। हालांकि, समिति इस बात से सहमत है कि चिरकालिक गुर्दा रोग (सीकेडी) का प्रारंभिक पता लगाने के लिए केवल सीरम क्रिएटिनिन मूल्यों पर निर्भर रहना अपर्याप्त है, क्योंकि गुर्दे की लगभग आधी कार्यक्षमता नष्ट होने तक भी सीरम क्रिएटिनिन अक्सर सामान्य सीमा के भीतर ही रहता है। इसके अलावा, आयु और लिंग के अनुसार समायोजन किए बिना कच्चे क्रिएटिनिन मूल्यों की व्याख्या करने से विशेष रूप से प्रारंभिक सीकेडी की पहचान में कमी आ सकती है। समिति विशेषज्ञों की सर्वसम्मत राय को भी स्वीकार करती है कि उच्च जोखिम वाले व्यक्तियों में गुर्दे की कार्यक्षमता के आकलन में केवल सीरम क्रिएटिनिन पर निर्भर रहने के बजाय मूत्र एल्ब्यूमिन आकलन के साथ–साथ अनुमानित ग्लोमेरुलर फिल्ट्रेशन रेट (ईजीएफआर) का स्वचालित आकलन भी शामिल होना चाहिए, अधिमानतः सीकेडी–ईपीआई समीकरण का उपयोग करके। उपरोक्त बातों को ध्यान में रखते हुए, समिति सिफारिश करती है कि अधिमानतः सीकेडी–ईपीआई समीकरण का उपयोग करते हुए, बिना किसी अलग परीक्षण अनुरोध या रोगी के लिए अतिरिक्त लागत की आवश्यकता के स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय सार्वजनिक और निजी निदान प्रयोगशालाओं में किए जाने वाले प्रत्येक सीरम क्रिएटिनिन परीक्षण के साथ अनुमानित ग्लोमेरुलर फिल्ट्रेशन रेट (ईजीएफआर) का स्वचालित आकलन और रिपोर्टिंग अनिवार्य करे। समिति आगे सिफारिश करती है कि इस आवश्यकता के देश भर में एकसमान कार्यान्वयन को सुनिश्चित करने के लिए उपयुक्त प्रयोगशाला मानकों और गुणवत्ता आश्वासन नयाचार को संशोधित किया जाए। समिति का मानना है कि अनिवार्य ईजीएफआर रिपोर्टिंग से गंभीर गुर्दा रोग का शीघ्र पता लगाने में सुविधा होगी, समय पर नैदानिक हस्तक्षेप और रेफरल संभव होगा, और सीकेडी की रोकथाम और नियंत्रण के लिए राष्ट्रीय रणनीति को महत्वपूर्ण रूप से मजबूती मिलेगी।
(पैरा 3.4.3)
जोखिम–आधारित स्क्रीनिंग के लिए लक्षित जनसंख्या
26. समिति समुक्ति करती है कि चिरकालिक गुर्दा रोग (सीकेडी) अपने शुरुआती चरणों में काफी हद तक लक्षणहीन रहती है और इसलिए अक्सर गुर्दे की कार्यक्षमता में महत्वपूर्ण और अपरिवर्तनीय कमी आने के बाद ही इसका निदान हो पाता है। समिति गंभीर चिंता के साथ नोट करती है कि युवा पीढ़ी द्वारा दर्द निवारक दवाओं का अत्यधिक उपयोग हो रहा है, जो कि निष्क्रिय जीवनशैली और उससे जुड़ी जोखिमों का सामना कर रहे हैं। बिना जांच के उच्च रक्तचाप के मामलों में वृद्धि हुई है, जो युवा पीढ़ी में गुर्दे की बीमारी के चुपचाप शुरू होने का कारण बन रही है, और अब यह महामारी के रूप ले रही है। यद्यपि राष्ट्रीय स्तर पर सीकेडी की जांच को गैर–संचारी रोगों की रोकथाम एवं नियंत्रण कार्यक्रम (एनपी–एनसीडी) के तहत एकीकृत किया गया है, वर्तमान दृष्टिकोण काफी हद तक आयुष्मान आरोग्य मंदिरों और अन्य स्वास्थ्य केंद्रों में आने वाले व्यक्तियों की अवसरवादी स्क्रीनिंग पर आधारित है। समिति चिंतित है कि इस तरह के छिटपुट हस्तक्षेप से सभी उच्च जोखिम वाले व्यक्तियों की नियमित स्क्रीनिंग सुनिश्चित नहीं होती है और यह काफी हद तक जांच के लिए मरीजों की उपस्थिति पर निर्भर करता है, जिसके परिणामस्वरूप निदान में देरी होती है और प्रारंभिक हस्तक्षेप के अवसर छूट जाते हैं। इसलिए, समिति सिफारिश करती है कि मंत्रालय एनपी–एनसीडी के अंतर्गत सभी उच्च जोखिम वाले व्यक्तियों की नियमित वार्षिक चिरकालिक गुर्दा रोग (सीकेडी) स्क्रीनिंग को संस्थागत रूप दे और 20 साल तथा उससे अधिक आयु के सभी व्यक्तियों के लिए द्विवार्षिक किडनी फंक्शन टेस्ट (केएफटी) अनिवार्य करे, और गरीबी रेखा से नीचे जीवनयापन करने वाले लोगों (बीपीएल)के लिए यह जांच नि:शुल्क और बीपीएल से ऊपर की श्रेणी वाले लोगों के लिए सामान्य लागत पर यह जांच की जानी चाहिए, ताकि शीघ्र निदान हो सके और रोग बढ़ने की गति धीमी हो सके। स्क्रीनिंग में ईजीएफआर और मूत्र एल्ब्यूमिन/प्रोटीन परीक्षण का उपयोग करके गुर्दे की कार्यप्रणाली का आकलन, साथ ही उचित निर्देश और अनुवर्ती कार्रवाई शामिल होनी चाहिए। समिति रोग बढ़ने की निगरानी, देखभाल की निरंतरता को सुनिश्चित करने, कार्यक्रम की निगरानी को मजबूत करने और भविष्य की नीति निर्माण और संसाधन योजना के लिए विश्वसनीय साक्ष्य उत्पन्न करने के लिए स्क्रीनिंग किए गए व्यक्तियों के अनुदैर्ध्य डिजिटल रिकॉर्ड बनाए रखने की भी सिफारिश करती है।
(पैरा 3.5.2)
27. समिति समझती है कि नियमित जांच की आवश्यकता वाले प्रमुख उच्च जोखिम वाले समूहों में मधुमेह और उच्च रक्तचाप से पीड़ित व्यक्ति शामिल हैं, जो देश में चिरकालिक गुर्दा रोग (सीकेडी) के अधिकांश मामलों के लिए जिम्मेदार हैं। ऐसे व्यक्तियों को नियमित रूप से, अधिमानतः वार्षिक आधार पर, गुर्दे की कार्यप्रणाली का मूल्यांकन करवाना चाहिए, ताकि शीघ्र निदान और समय पर उपचार सुनिश्चित किया जा सके। अन्य प्राथमिकता वाले समूहों में 60 वर्ष से अधिक आयु के वयस्क; गुर्दे की बीमारी का पारिवारिक इतिहास रखने वाले व्यक्ति; मोटापे या तंबाकू के सेवन से ग्रस्त व्यक्ति; और गुर्दे की गंभीर चोट (एकेआई), बार–बार मूत्र पथ के संक्रमण, बार–बार गुर्दे की पथरी या नॉन–स्टेरॉयडल एंटी–इंफ्लेमेटरी ड्रग्स (एनएसएआईडी) सहित नेफ्रोटॉक्सिक दवाओं के लंबे समय तक संपर्क में रहने वाले व्यक्ति शामिल हैं। समिति अज्ञात एटियलॉजी (सीकेडीयू) से प्रभावित क्षेत्रों में रहने वाली व्यावसायिक और कृषि आबादी, विशेष रूप से आंध्र प्रदेश, ओडिशा और कर्नाटक के कुछ हिस्सों में, स्क्रीनिंग के बढ़ते महत्व को ध्यान में रखती है। साक्ष्य बताते हैं कि लंबे समय तक गर्मी के तनाव, बार–बार शरीर में पानी की कमी और कृषि रसायनों के संपर्क में रहने से इन आबादी में गुर्दे की क्षति हो सकती है। अतः समिति का मानना है कि प्रभावित व्यक्तियों की शीघ्र पहचान करने के लिए रोग का शीघ्र पता लगाने और आवश्यक चिकित्सा हस्तक्षेप के लिए रोग के बोझ और उसके निर्धारकों को बेहतर ढंग से समझने के लिए महामारी विज्ञान संबंधी साक्ष्य उत्पन्न करने के लिए ऐसे महामारी क्षेत्रों में लक्षित स्क्रीनिंग आवश्यक है।
(पैरा 3.5.3)
भारत में मौजूदा जांच ढांचा
28. समिति इस बात को स्वीकार करती है कि मंत्रालय ने राष्ट्रीय स्तर पर गंभीर गुर्दा रोग की स्क्रीनिंग को गैर–संचारी रोगों की रोकथाम और नियंत्रण के लिए कार्यक्रम (एनपी–एनसीडी) के तहत एकीकृत कर लिया है और आयुष्मान आरोग्य मंदिरों के व्यापक नेटवर्क का लाभ उठाते हुए प्रमुख गैर–संचारी रोगों की बड़े पैमाने पर जनसंख्या–आधारित स्क्रीनिंग की जा रही है। हालांकि, समिति इस बात से चिंतित है कि बुनियादी ढांचे, प्रशिक्षित कर्मचारियों की उपलब्धता, निदान सुविधाओं और निर्देश तंत्र में भिन्नता के कारण राज्यों में गुर्दे के स्वास्थ्य मूल्यांकन का कार्यान्वयन एक समान नहीं है। समिति का मानना है कि संवेदनशील समूहों में पुरानी गुर्दे की बीमारी का शीघ्र पता लगाने के लिए मौजूदा जांच ढांचे को सुव्यवस्थित करने की आवश्यकता है। मानकीकृत प्रोटोकॉल की कमी, राज्यों में असमान कार्यान्वयन और मधुमेह और उच्च रक्तचाप के नियमित प्रबंधन में गुर्दे के स्वास्थ्य मूल्यांकन का अपर्याप्त एकीकरण इसकी प्रभावशीलता को सीमित करता है, इसलिए समिति सिफारिश करती है कि स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय को एनपी–एनसीडी के तहत पुरानी गुर्दे की बीमारी के लिए एक समान राष्ट्रीय स्क्रीनिंग प्रोटोकॉल विकसित और लागू करना चाहिए। समिति आगे यह सिफारिश करती है कि आयुष्मान आरोग्य मंदिरों सहित सभी प्राथमिक स्वास्थ्य सुविधाओं को उच्च जोखिम वाले कारकों वाले व्यक्तियों के लिए अनिवार्य मानकीकृत जांच प्रक्रियाओं को अपनाना चाहिए, जो स्पष्ट रूप से परिभाषित निर्देश तंत्र, मानक संचालन प्रक्रियाओं और कार्यक्रम के परिणामों की आवधिक निगरानी द्वारा समर्थित हों।
(पैरा 3.6.3)
29. समिति का मानना है कि राष्ट्रीय गैर–संचारी रोग निवारण एवं नियंत्रण कार्यक्रम के तहत आयुष्मान आरोग्य मंदिरों के माध्यम से की जाने वाली चिरकालिक गुर्दा रोग (सीकेडी) की स्क्रीनिंग की प्रभावशीलता स्वाभाविक रूप से व्यक्तियों द्वारा स्वेच्छा से इन केंद्रों का दौरा करने पर निर्भर करती है। चूंकि सीकेडी अपने प्रारंभिक चरणों में काफी हद तक लक्षणहीन रहती है और गुर्दे के स्वास्थ्य के प्रति जन जागरूकता का स्तर अभी भी कम है, इसलिए जोखिम वाले व्यक्तियों की एक महत्वपूर्ण संख्या बीमारी के गंभीर चरण में पहुंचने तक जांच नहीं करवाती है। परिणामस्वरूप, शीघ्र निदान और समय पर उपचार के महत्वपूर्ण अवसर अक्सर चूक जाते हैं। इसलिए समिति का मत है कि सामुदायिक जागरूकता अभियान सुविधा–आधारित जांच का पूरक होना चाहिए। इस संबंध में, मान्यता प्राप्त सामाजिक स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं (आशा) जैसे अग्रिम पंक्ति के कार्यकर्ता, अपने नियमित घरेलू दौरों और समुदाय के साथ घनिष्ठ जुड़ाव के माध्यम से, सीकेडी के जोखिम वाले व्यक्तियों की पहचान करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। इसलिए समिति सिफारिश करती है कि मंत्रालय उच्च जोखिम वाले व्यक्तियों में प्रोटीनुरिया की जांच के लिए घर–घर जाकर या ग्राम स्वास्थ्य गतिविधियों के दौरान प्रारंभिक मूत्र डिपस्टकि परीक्षण करने के लिए आशा कार्यकर्ताओं को प्रशिक्षित करने की व्यवहार्यता की जांच करे। जिन व्यक्तियों में प्रतिकूल परिणाम पाए जाते हैं, उन्हें सीरम क्रिएटिनिन की जांच, मूत्र एल्ब्यूमिन की जांच और ईजीएफआर मूल्यांकन सहित पुष्टि संबंधी जांचों के लिए निकटतम आयुष्मान आरोग्य मंदिर या उच्चतर स्वास्थ्य केंद्र में भेजा जा सकता है। इस प्रकार की विकेन्द्रीकृत स्क्रीनिंग प्रणाली से प्रारंभिक मामलों का पता लगाने में काफी सुधार होगा, संवेदनशील आबादी में कवरेज बढ़ेगा, निदान में देरी कम होगी और अंततः गंभीर चिरकालिक गुर्दा रोग (सीकेडी) का बोझ कम होगा जिसके लिए महंगी गुर्दा प्रतिस्थापन चिकित्सा की आवश्यकता होती है।
(पैरा 3.6.4)
उभरते बायोमार्कर और उन्नत नैदानिक दृष्टिकोण
30. समिति ने वर्तमान में उपलब्ध विभिन्न नैदानिक तकनीकों के साथ–साथ चिरकालिक गुर्दा रोग (सीकेडी) के निदान के लिए उभरते बायोमार्कर और प्रौद्योगिकियों पर गौर किया है। समिति ने पाया कि कोई भी एक नैदानिक पद्धति सर्वोपरि नहीं है।यह सुनिश्चित किया जाता है कि चिरकालिक गुर्दा रोग (सीकेडी) का सटीक पता लगाने और उसका आकलन करने के लिए सभी जांच पर्याप्त रूप से प्रभावी हों और प्रत्येक जांच की नैदानिक प्रस्तुति, रोग की अवस्था और अंतर्निहित कारण के आधार पर एक विशिष्ट और पूरक भूमिका हो। समिति का यह मत है कि सीकेडी का निदान एक व्यापक नैदानिक मूल्यांकन पर आधारित होना चाहिए जिसमें गुर्दा फंक्शन टेस्ट, मूत्र परीक्षण, इमेजिंग अध्ययन और, जहां चिकित्सकीय रूप से आवश्यक हो, हिस्टोपैथोलॉजिकल मूल्यांकन शामिल हो। समिति का यह भी मानना है कि नैदानिक अवसंरचना को मजबूत करना, गुणवत्ता–सुनिश्चित प्रयोगशाला सेवाओं को सुनिश्चित करना, मानकीकृत रिपोर्टिंग प्रथाओं को बढ़ावा देना और उन्नत नैदानिक तकनीकों तक समान पहुंच को सुगम बनाना शीघ्र निदान में सुधार, उचित उपचार मार्गदर्शन और दीर्घकालिक रोगी परिणामों को बेहतर बनाने के लिए आवश्यक है।
(पैरा 3.10.2)
31. समिति ने गौर किया है कि हालांकि ये उभरते हुए बायोमार्कर जैसे किसिस्टैटिन–सी, एनजीएएल, केआईएम-1, आईएल-18, माइक्रोग्लोबिन आदि।हालांकि उभरते बायोमार्कर प्रारंभिक और अधिक सटीक निदान की अपार क्षमता प्रदान करते हैं, लेकिन वर्तमान लागत, बुनियादी ढांचे की आवश्यकताएं और सीमित उपलब्धता बड़े पैमाने पर जनसंख्या स्क्रीनिंग के लिए उनकी तत्काल प्रयोज्यता को सीमित कर सकती हैं। हालांकि, समिति सिफारिश करती है कि उभरते बायोमार्करों के प्रारंभिक उपयोग को पायलट परियोजनाओं, तृतीयक देखभाल केंद्रों और सीकेडीयू अनुसंधान कार्यक्रमों के लिए प्राथमिकता दी जानी चाहिए और पायलट परियोजनाओं की सफलता के बाद, इन्हें व्यापक स्तर पर लागू किया जा सकता है।
(पैरा 3.10.3)
गंभीर गुर्दा रोग का चरण निर्धारण
32. समिति समझती है कि गुर्दे की कार्यप्रणाली और एल्ब्यूमिनुरिया का संयुक्त मूल्यांकन रोग की गंभीरता और रोग बढ़ने के जोखिम का व्यापक आकलन प्रदान करता है। यह निगरानी की आवृत्ति, चिकित्सीय हस्तक्षेप की तीव्रता, संबंधित जटिलताओं के प्रबंधन और विशेषीकृत नेफ्रोलॉजी सेवाओं में निर्देश की आवश्यकता को निर्धारित करने का आधार भी बनता है। इसलिए, समिति मंत्रालय को एक मानकीकृत स्टेजिंग प्रणाली अपनाने की सिफारिश करती है, जिससे नैदानिक निर्णय लेने में एकरूपता और विभिन्न स्वास्थ्य संस्थानों में रोगी डेटा की तुलनात्मकता को और अधिक सुगम बनाया जा सके। समिति का मानना है कि स्वास्थ्य सेवा प्रणाली के सभी स्तरों पर केडीआईजीओ स्टेजिंग फ्रेमवर्क को समान रूप से अपनाने से निदान में एकरूपता को बढ़ावा मिलेगा, मानकीकृत नैदानिक प्रबंधन को सुगम बनाया जा सकेगा और निगरानी, कार्यक्रम की निगरानी और स्वास्थ्य नीति नियोजन के लिए चिरकालिक गुर्दा रोग (सीकेडी) के आंकड़ों का सार्थक एकत्रीकरण संभव हो सकेगा।
(पैरा 3.11.2)
विशेषज्ञ देखभाल के लिए निर्देश
33. समिति इस बात पर चिंता व्यक्त करती है कि देश के कई हिस्सों में प्राथमिक, माध्यमिक और तृतीयक स्वास्थ्य सुविधाओं के बीच निर्देश व्यवस्था अपर्याप्त रूप से विकसित है। विशेष रूप से ग्रामीण, आदिवासी और भौगोलिक रूप से दूरस्थ क्षेत्रों में नेफ्रोलॉजिस्टों की सीमित उपलब्धता के कारण अक्सर विशेषज्ञ परामर्श और निरंतर देखभाल में देरी होती है। इसलिए, निर्देश व्यवस्था को मजबूत करना और विशेषज्ञ सेवाओं तक पहुंच में सुधार करना, गंभीर गुर्दा रोग के समय पर निदान और उचित प्रबंधन को सुनिश्चित करने के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। समिति, अतः, मंत्रालय को प्रारंभिक निर्देश और व्यापक रोग प्रबंधन के लिए आवश्यक संस्थागत व्यवस्थाओं की योजना बनाने की सिफारिश करती है, जिससे आवश्यकता पड़ने पर गुर्दा प्रत्यारोपण चिकित्सा की समय पर तैयारी हो सके और दीर्घकालिक नैदानिक परिणामों में सुधार हो सके।
(पैरा 3.13.3)
प्रारंभिक निदान में अनुसंधान और नवाचार
34. समिति को यह जानकर हर्ष हुआ कि कई भारतीय संस्थान नए बायोमार्कर और उन्नत निदान उपकरणों के विकास के माध्यम से चिरकालिक गुर्दा रोग (सीकेडी) के प्रारंभिक निदान में सुधार के लिए अनुसंधान कर रहे हैं। समिति एसजीपीजीआईएमएस, लखनऊ स्थित उन्नत गुर्दा रोग अनुसंधान केंद्र द्वारा सीकेडी और मधुमेह संबंधी नेफ्रोपैथी के शुरुआती लक्षणों का पता लगाने के लिए पेटेंट प्राप्त मूत्र एक्सोसोम माइक्रोआरएनए बायोमार्कर विकसित करने की सराहना करती है। समिति समझती है कि जीनोमिक परीक्षण, गुर्दा आनुवंशिकी सेवाओं और रेटिनल इमेजिंग और नैदानिक मापदंडों को एकीकृत करने वाले कृत्रिम बुद्धिमत्ता–आधारित पूर्वानुमान मॉडल पर अनुसंधान जारी रहना चाहिए। समिति का मानना है कि ऐसी प्रौद्योगिकियां जोखिम स्तरीकरण और शुरुआती पहचान में सुधार की अपार संभावनाएं रखती हैं, विशेष रूप से उच्च जोखिम वाली आबादी में।
(पैरा 3.15.1)
डिजिटल स्वास्थ्य अवसंरचना के साथ एकीकरण
35. समिति इस बात को स्वीकार करती है कि आयुष्मान भारत डिजिटल मिशन, डिजिटल स्वास्थ्य अभिलेखों, इलेक्ट्रॉनिक निर्देश और बेहतर निरंतर देखभाल के माध्यम से चिरकालिक गुर्दा रोग (सीकेडी) की जांच, निदान और प्रबंधन को मजबूत करने के महत्वपूर्ण अवसर प्रदान करता है। समिति यह भी मानती है कि विशेषज्ञों ने रोग निगरानी, रोगी ट्रैकिंग और नैदानिक निर्णय सहायता के लिए डिजिटल प्रौद्योगिकियों के उपयोग के महत्व पर प्रकाश डाला है। समिति का मानना है कि डिजिटल स्वास्थ्य हस्तक्षेप मौजूदा स्वास्थ्य सेवाओं के पूरक होने चाहिए और उसे विशेष रूप से ग्रामीण और वंचित क्षेत्रों में जोखिम–आधारित जांच और निर्देश तंत्र के अधिक कुशल कार्यान्वयन में योगदान देना चाहिए। इसलिए, समिति स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय को आयुष्मान भारत डिजिटल मिशन का लाभ उठाकर गंभीर गुर्दा रोग के लिए एक एकीकृत डिजिटल ढांचा विकसित करने की सिफारिश करती है, जिसमें इलेक्ट्रॉनिक निर्देश मार्ग, दीर्घकालिक रोगी अभिलेख, उच्च जोखिम वाले व्यक्तियों की निगरानी और प्रस्तावित राष्ट्रीय सीकेडी आंकड़ों के साथ जुड़ाव शामिल है। समिति आगे सिफारिश करती है कि प्राथमिक स्वास्थ्य सेवा प्रदाताओं के लिए उपयुक्त डिजिटल निर्णय–सहायता उपकरण विकसित किए जाएं ताकि डेटा गोपनीयता और सुरक्षा के लिए उचित सुरक्षा उपयुक्त उपायों को सुनिश्चित करते हुए संदिग्ध सीकेडी मामलों की समय पर पहचान की जा सके और निर्देश देने में सुविधा हो।
(पैरा 3.16.4)
उपचार पद्धतियाँ
गंभीर गुर्दा रोग का चरणबद्ध प्रबंधन
36. समिति समुक्ति करती है कि चिरकालिक गुर्दा रोग (सीकेडी) का प्रभावी प्रबंधन नैदानिक उपचार से कहीं अधिक व्यापक है और यह निरंतर रोगी शिक्षा, आहार संबंधी परामर्श और निर्धारित दवाओं के नियमित सेवन तथा जीवनशैली में बदलाव पर अत्यधिक निर्भर करता है। हालाँकि, समिति इस बात पर चिंता व्यक्त करती है कि प्रशिक्षित गुर्दा आहार विशेषज्ञों की कमी, नियमित नेफ्रोलॉजी परामर्श के दौरान सीमित परामर्श समय और विशेष रूप से ग्रामीण क्षेत्रों में कम स्वास्थ्य साक्षरता वाले व्यक्तियों के लिए मानकीकृत, रोगी-अनुकूल शैक्षिक संसाधनों के अभाव के कारण स्वास्थ्य प्रणाली में रोगी शिक्षा और परामर्श सेवाएं अपर्याप्त बनी हुई हैं। इसलिए, समिति का मानना है कि जब तक इन प्रणालीगत कमियों को दूर नहीं किया जाता, रोगियों को उपचार के प्रति कम अनुपालन, रोग की अनावश्यक प्रगति और स्वास्थ्य देखभाल लागत में वृद्धि का सामना करना पड़ सकता है। इस संबंध में, समिति स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय को मानकीकृत बहुभाषी और कम साक्षरता वाले शैक्षिक संसाधनों को विकसित करके तथा सभी स्तरों की स्वास्थ्य सुविधाओं में संरचित परामर्श प्रोटोकॉल स्थापित करके रोगी शिक्षा और परामर्श सेवाओं को मजबूत करने की सिफारिश करती है। समिति आयुष्मान आरोग्य मंदिरों में चिरकालिक गुर्दा रोग (सीकेडी) परामर्श और रोगी शिक्षा में व्यावसायिक दक्षता सुनिश्चित करने के लिए चिकित्सा अधिकारियों, नर्सों और सामुदायिक स्वास्थ्य अधिकारियों की क्षमता निर्माण की भी सिफारिश करती है, साथ ही आवधिक घरेलू अनुवर्ती कार्रवाई, परामर्श, आहार और दवा के पालन को सुदृढ़ करने और जहां आवश्यक हो, सीकेडी रोगियों को समय पर रेफर करने के लिए आशा कार्यकर्ताओं के उचित प्रशिक्षण और प्रभावी उपयोग की भी सिफारिश करती है।
(पैरा 4.4.6)
डायलिसिस सेवाएं प्रदान किया जाना
37. समिति ने स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय के सचिव के बयान से यह नोट किया है कि प्रधानमंत्री राष्ट्रीय डायलिसिस कार्यक्रम (पीएमएनडीपी) के तहत हीमोडायलिसिस सेवाओं का उपयोग काफी बढ़ गया है, और पिछले पांच वर्षों में वार्षिक डायलिसिस सत्र लगभग 25 लाख से बढ़कर 70 लाख हो गए हैं, लेकिन कुछ राज्यों में उपलब्धता के बावजूद पेरिटोनियल डायलिसिस (पीडी) का उपयोग अभी भी सीमित है। समिति समुक्ति करती है कि घर पर पेरिटोनियल डायलिसिस के कई लाभ हैं, जैसे यात्रा का बोझ कम होना, जेब से होने वाला खर्च कम होना और मरीजों के जीवन की गुणवत्ता में सुधार होना। इसके बावजूद, अभी भी केन्द्र/क्लिनिक आधारित हीमोडायलिसिस पर निर्भरता जागरूकता, प्रशिक्षित कर्मचारियों की कमी, पीडी में उपयोग होने वाली सामग्रियों की उपलब्धता, संस्थागत सहयोग और रोगी परामर्श में कमियों को दर्शाती है, जहां हीमोडायलिसिस को अभी भी डिफ़ॉल्ट उपचार विकल्प के रूप में प्रस्तुत किया जाता है। समिति का मत है कि पेरिटोनियल डायलिसिस भारत की विशाल ग्रामीण और दूरस्थ आबादी के लिए विशेष रूप से उपयुक्त है और इसे चिकित्सकीय रूप से उपयुक्त रोगियों के लिए गुर्दा प्रतिस्थापन चिकित्सा हेतु पहली पसंद के रूप में बढ़ावा दिया जाना चाहिए। अतः समिति सिफारिश करती है कि मंत्रालय, चिरकालिक गुर्दा रोग (सीकेडी) के निदान के समय ही संरचित पूर्व–डायलिसिस रोगी परामर्श के माध्यम से पीएमएनडीपी के तहत पेरिटोनियल डायलिसिस को बढ़ावा देने के लिए एक व्यापक रणनीति तैयार करे और उसे लागू करे, जिसमें स्वास्थ्य सेवा प्रदाताओं की क्षमता को मजबूत करना, पीडी उपभोग्य सामग्रियों की निर्बाध उपलब्धता सुनिश्चित करना, घर–आधारित डायलिसिस के लिए आवश्यक वित्तीय और लॉजिस्टिकल सहायता प्रदान करना और पेरिटोनियल डायलिसिस पर रोगियों के अनुपात को बढ़ाने के लिए मापने योग्य राष्ट्रीय लक्ष्य निर्धारित करना शामिल है, जिससे केन्द्र/क्लिनिक आधारित हेमोडायलिसिस पर निर्भरता कम हो और किफायती, रोगी–केंद्रित गुर्दा देखभाल तक पहुंच में सुधार हो।
(पैरा 4.6.3)
गुर्दे का रूढ़िवादी (गैर-डायलिसिस) प्रबंधन और प्रशामक देखभाल का एकीकरण
38. समिति प्रधानमंत्री राष्ट्रीय डायलिसिस कार्यक्रम (पीएमएनडीपी) के माध्यम से डायलिसिस और गुर्दा प्रत्यारोपण तक पहुंच बढ़ाने के लिए मंत्रालय के प्रयासों की सराहना करती है। हालांकि, समिति का मानना है कि रूढ़िवादी गुर्दा प्रबंधन (सीकेएम) एक सक्रिय और रोगी–केंद्रित उपचार पद्धति है और इसे चिकित्सा देखभाल की वापसी या रोक के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। समिति यह भी मानती है कि सीकेएम को नीतिगत रूप से उतना महत्व नहीं दिया गया है, जबकि यह बुजुर्ग रोगियों, कई सह–बीमारियों से ग्रसित रोगियों और अन्य ऐसे रोगियों के लिए एक चिकित्सकीय रूप से मान्यता प्राप्त उपचार विकल्प है जो गुर्दा प्रतिस्थापन चिकित्सा के लिए अनुपयुक्त हैं या इसे नहीं कराना चाहते हैं। संरचित सीकेएम पद्धतियों और एकीकृत प्रशामक देखभाल सेवाओं की अनुपस्थिति से ऐसे रोगियों के लिए अनावश्यक हस्तक्षेप, वित्तीय बोझ में वृद्धि और जीवन की गुणवत्ता में कमी आ सकती है। अतः समिति सिफारिश करती है कि स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय को गैर–संचारी रोगों की रोकथाम एवं नियंत्रण के राष्ट्रीय कार्यक्रम (एनपी–एनसीडी) के अंतर्गत मानक उपचार प्रोटोकॉल, साझा निर्णय लेने के दिशानिर्देश, लक्षण प्रबंधन और प्रशामक देखभाल सेवाओं को शामिल करते हुए, रूढ़िवादी गुर्दा प्रबंधन के लिए एक संरचित ढांचा विकसित करना चाहिए और उसे संस्थागत रूप देना चाहिए, साथ ही स्वास्थ्य सेवा प्रदाताओं के पर्याप्त प्रशिक्षण और रोगियों एवं उनके परिवारों के लिए परामर्श सहायता सुनिश्चित करनी चाहिए।
(पैरा 4.7.2)
भारत में प्रत्यारोपण की स्थिति
39. समिति राष्ट्रीय अंग प्रत्यारोपण कार्यक्रम (एनओटीपी) के तहत सरकार द्वारा जन जागरूकता अभियानों, हितधारकों की भागीदारी, ऑनलाइन प्रतिज्ञा और मृत दाताओं के सम्मानजनक अंतिम संस्कार के लिए वित्तीय सहायता के माध्यम से मृतक अंगदान को बढ़ावा देने के लिए की गई पहलों की सराहना करती है। हालांकि, समिति यह समुक्ति करती है कि सामाजिक भ्रांतियों, अपर्याप्त जन जागरूकता, सीमित अंग प्राप्ति अवसंरचना और प्रक्रियात्मक बाधाओं के कारण भारत में मृतक अंगदान की दर वैश्विक मानकों से काफी कम बनी हुई है। समिति का मानना है कि प्रत्यारोपण के लिए अंगों की मांग और उपलब्धता के बीच बढ़ते अंतर को पाटने के लिए मृतक अंगदान को बढ़ाना अत्यंत महत्वपूर्ण है। इसलिए, समिति सिफारिश करती है कि स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय को भ्रांतियों को दूर करने के लिए राष्ट्रव्यापी व्यवहार परिवर्तन और जागरूकता अभियान तेज करने चाहिए, अस्पताल–आधारित अंग प्राप्ति और प्रत्यारोपण समन्वय अवसंरचना को मजबूत करना चाहिए, प्रक्रियात्मक प्रक्रियाओं को सरल बनाना चाहिए और राज्यों के लिए एक मजबूत प्रदर्शन निगरानी तंत्र स्थापित करना चाहिए ताकि देश भर में मृतक अंगदान को पर्याप्त रूप से बढ़ाया जा सके।
(पैरा 4.9.2)
प्रत्यारोपण के बाद की देखभाल
40. विशेषज्ञों द्वारा प्रस्तुत सुझावों के आधार पर समिति ने पाया है कि गुर्दा प्रत्यारोपण की विफलता को रोकने और प्रत्यारोपण की दीर्घकालिक सफलता सुनिश्चित करने के लिए आजीवन प्रतिरक्षादमनकारी चिकित्सा अनिवार्य है। समिति समुक्ति करती है कि प्रत्यारोपण के बाद की दवाओं का आवर्ती खर्च उन रोगियों पर भारी वित्तीय बोझ डालता है जो पहले ही डायलिसिस और प्रत्यारोपण पर काफी खर्च कर चुके हैं। समिति का मत है कि उपचार के पालन और प्रत्यारोपण के सफल होने के लिए प्रतिरक्षादमनकारी दवाओं की निर्बाध उपलब्धता आवश्यक है और इनकी उच्च लागत निरंतर देखभाल में बाधा नहीं बननी चाहिए। समिति का मानना है कि प्रत्यारोपण के पश्चात् अपर्याप्त देखभाल और प्रतिरक्षादमनकारी चिकित्सा में रुकावट से प्रत्यारोपण विफल हो सकता है, जिससे रोगी फिर से गुर्दा विफलता के शिकार हो सकते हैं और उन्हें डायलिसिस या दोबारा प्रत्यारोपण की आवश्यकता पड़ सकती है, जिससे रोगियों और स्वास्थ्य सेवा प्रणाली दोनों पर नैदानिक और वित्तीय बोझ और भी बढ़ जाता है। इसलिए, समिति स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय को यह सिफारिश करती है कि वह गुर्दा प्रत्यारोपण प्राप्तकर्ताओं को प्रत्यारोपण केंद्रों और सरकारी अस्पतालों के माध्यम से आवश्यक प्रतिरक्षादमनकारी दवाओं की निःशुल्क उपलब्धता सुनिश्चित करने की व्यवहार्यता की जांच करे, ताकि निर्बाध उपचार सुनिश्चित किया जा सके और प्रत्यारोपण के दीर्घकालिक परिणामों में सुधार हो सके।
(पैरा 4.10.2)
उपचार वितरण में प्रौद्योगिकी और नवाचार
41. समिति देश भर में डायलिसिस रोगियों के पंजीकरण, पोर्टेबिलिटी और ट्रैकिंग के लिए आयुष्मान भारत स्वास्थ्य खाते (एबीएचए) से एकीकृत पीएमएनडीपी पोर्टल को चालू करने में मंत्रालय के प्रयासों की सराहना करती है। हालांकि, समिति समुक्ति करती है कि वर्तमान में डिजिटल ट्रैकिंग मुख्य रूप से डायलिसिस के चरण से ही शुरू होती है, जबकि निरंतर देखभाल के लिए आयुष्मान आरोग्य मंदिरों और अन्य प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों में उच्च जोखिम वाले व्यक्तियों की पहचान और चिरकालिक गुर्दा रोग (सीकेडी) के निदान से लेकर दीर्घकालिक निगरानी की आवश्यकता होती है। समिति का मत है कि प्रौद्योगिकी को सीकेडी देखभाल की संपूर्ण प्रक्रिया में निर्बाध रोगी प्रबंधन को सक्षम बनाना चाहिए। इसलिए, समिति स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय को मौजूदा पीएमएनडीपी डिजिटल प्लेटफॉर्म को एक व्यापक सीकेडी रोगी प्रबंधन प्रणाली में विस्तारित करने की सिफारिश करती है, जिसमें प्राथमिक स्वास्थ्य देखभाल स्तर से ही उच्च जोखिम वाले व्यक्तियों और सीकेडी रोगियों की एबीएचए–लिंक्ड दीर्घकालिक ट्रैकिंग को एकीकृत किया जाए, साथ ही ई–संजीवनी प्लेटफॉर्म के माध्यम से क्लिनिकल डिसीजन सपोर्ट सिस्टम और एक राष्ट्रीय टेली–नेफ्रोलॉजी नेटवर्क का समर्थन प्राप्त हो, ताकि समय पर रेफरल, विशेषज्ञ परामर्श, उपचार की निरंतरता और प्रत्यारोपण के बाद सभी स्तरों पर अनुवर्ती कार्रवाई सुनिश्चित की जा सके।
(पैरा 4.11.4)
42. समिति गांवों में किडनी फेल्योर की बढ़ती घटनाओं को लेकर चिंतित है। यह देखा गया है कि क्षेत्रीय प्रत्यारोपण समितियों को बड़े मेट्रोपॉलिटन केंद्रों और शहरों में बनाया जाता है, जो प्रत्यारोपण के लिए मरीजों की पात्रता मानदंड और पैरामीटर तय करती हैं। इससे ग्रामीण आबादी को नुकसान होता है क्योंकि उन्हें लंबी प्रतीक्षा सूची में रखा जाता है, जहां प्रतीक्षारत मरीजों को आवश्यक अंग नहीं मिल पाता और इसके परिणामस्वरूप उनका जीवित रहने का प्रतिशत बहुत कम होता है। समिति का मानना है कि समय की मांग है कि प्रत्यारोपण के समय आवश्यक अंग प्राप्त करने का बराबर मौका मिलना चाहिए, और पारदर्शी एसओपी विकसित करने की सिफारिश करती है, ताकि वास्तिविक आवश्यकता के आधार पर मरीजों पर निर्णय लिया जा सके।
(पैरा 4.11.5)
सरकारी नीति परिदृश्य, पहल और प्रमुख कार्यक्रम
43. समिति का मानना है कि राष्ट्रीय गैर–संचारी रोगों की रोकथाम एवं नियंत्रण कार्यक्रम (एनपी–एनसीडी) ने अपने ढांचे में चिरकालिक गुर्दा रोग (सीकेडी) को शामिल किया है और इसमें मधुमेह, उच्च रक्तचाप और अन्य जोखिम कारकों वाले उच्च जोखिम वाले व्यक्तियों की लक्षित स्क्रीनिंग शामिल है। हालांकि, समिति का मानना है कि प्राथमिक स्वास्थ्य देखभाल स्तर पर सीकेडी स्क्रीनिंग अभी भी काफी हद तक अवसर और रेफरल–आधारित निदान पर निर्भर है। कई मामलों में, आयुष्मान आरोग्य मंदिरों में मधुमेह या उच्च रक्तचाप से पीड़ित पाए गए व्यक्तियों को सीरम क्रिएटिनिन अनुमान और ईजीएफआर आकलन के लिए उच्च प्रतिष्ठानों में भेजा जाता है, जिसके परिणामस्वरूप फॉलो–अप छूट जाता है और निदान में देरी होती है। सीकेडी की धीमी प्रगति को देखते हुए, समिति का मानना है कि माध्यमिक स्तर के रेफरल पर निर्भरता प्रारंभिक पहचान को कमजोर करती है और गुर्दे को अपरिवर्तनीय क्षति होने से पहले उच्च जोखिम वाले व्यक्तियों की एक बड़ी संख्या का पता नहीं चल पाता है। इसलिए, समिति पुरजोर सिफारिश करती है कि स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय को आयुष्मान आरोग्य मंदिरों तथा अन्य प्राथमिक स्वास्थ्य देखभाल सुविधाओं में आने वाले सभी उच्च जोखिम वाले व्यक्तियों के लिए नियमित स्क्रीनिंग प्रोटोकॉल में स्वचालित ईजीएफआर रिपोर्टिंग के साथ सीरम क्रिएटिनिन परीक्षण को धीरे–धीरे एकीकृत करना चाहिए।
(पैरा 5.4.5)
उपचार से रोकथाम की ओर: राष्ट्रीय प्राथमिकताओं का पुनर्निर्धारण
44. समिति समुक्ति करती है कि यद्यपि गैर-संचारी रोगों की रोकथाम एवं नियंत्रण के लिए राष्ट्रीय कार्यक्रम (एनपी-एनसीडी) में चिरकालिक गुर्दा रोग (सीकेडी) की रोकथाम और शीघ्र पहचान की परिकल्पना की गई है, फिर भी प्राथमिक स्वास्थ्य देखभाल स्तर पर गुर्दे के स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता पर ध्यान देना अत्यंत अपर्याप्त बना हुआ है। समिति का मत है कि गुर्दे के बुनियादी स्वास्थ्य के बारे में जन जागरूकता सीमित है, क्योंकि गुर्दे के स्वास्थ्य के प्रति निरंतर जागरूकता, जीवनशैली में बदलाव, जोखिम कारकों के बारे में परामर्श और समुदाय-आधारित निवारक उपायों पर पर्याप्त जोर नहीं दिया गया है। गुर्दा प्रत्यारोपण चिकित्सा की भविष्य की मांग को कम करने के लिए राष्ट्रीय प्राथमिकताओं को रोकथाम, शीघ्र पहचान और रोग की प्रगति को धीमा करने की दिशा में पुनर्निर्देशित करने की तत्काल आवश्यकता है। समिति का मानना है कि जब तक प्राथमिक स्वास्थ्य देखभाल स्तर पर निवारक प्रयासों को पर्याप्त रूप से मजबूत नहीं किया जाता, सीकेडी का बढ़ता बोझ डायलिसिस और प्रत्यारोपण सेवाओं पर लगातार दबाव डालता रहेगा, जिससे स्वास्थ्य देखभाल प्रणाली की दीर्घकालिक स्थिरता कमजोर होगी। समिति का यह भी मानना है कि आयुष्मान आरोग्य मंदिरों को गुर्दे के स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता बढ़ाने, जीवनशैली में बदलाव को प्रोत्साहित करने, जोखिम कारकों के बारे में परामर्श प्रदान करने और समुदाय स्तर पर उच्च जोखिम वाले व्यक्तियों में सीकेडी की शीघ्र पहचान को सुगम बनाने में कहीं अधिक महत्वपूर्ण भूमिका निभानी चाहिए। अतः समिति पुरजोर सिफारिश करती है कि मंत्रालय को गुर्दा स्वास्थ्य जागरूकता और व्यवहार परिवर्तन संचार को बढ़ावा देने में आयुष्मान आरोग्य मंदिरों की भूमिका को सुदृढ़ करके, एनपी-एनसीडी के कार्यान्वयन को रोकथाम-प्रथम दृष्टिकोण की ओर पुनर्निर्देशित करना चाहिए। समिति आगे सिफारिश करती है कि संरचित गुर्दा स्वास्थ्य शिक्षा, जीवनशैली संशोधन परामर्श, जोखिम कारक प्रबंधन और सामुदायिक जागरूकता कार्यक्रमों को प्राथमिक स्वास्थ्य देखभाल के अभिन्न अंग के रूप में संस्थागत रूप दिया जाए। मंत्रालय को चिकित्सा अधिकारियों, सामुदायिक स्वास्थ्य अधिकारियों, आशा कार्यकर्ताओं और अन्य अग्रिम पंक्ति के स्वास्थ्य कर्मियों की क्षमता को गंभीर गुर्दा रोग की रोकथाम, जोखिम संचार और प्रारंभिक व्यवहार संबंधी हस्तक्षेपों पर नियमित प्रशिक्षण के माध्यम से सुदृढ़ करना चाहिए और क्षेत्रीय भाषाओं में सांस्कृतिक रूप से उपयुक्त सूचना, शिक्षा और संचार (आईईसी) सामग्री विकसित करनी चाहिए।
(पैरा 5.5.2)
प्रधानमंत्री राष्ट्रीय डायलिसिस कार्यक्रम (पीएमएनडीपी)
45. समिति प्रधानमंत्री की राष्ट्रीय डायलिसिस योजना के विस्तार को स्वीकार करती है। हालांकि, कार्यक्रम के दौरान कई परिचालन संबंधी चुनौतियां डायलिसिस सेवाओं की गुणवत्ता और वितरण को प्रभावित करती रहती हैं। समिति प्रशिक्षित डायलिसिस तकनीशियनों और नर्सों की कमी, डायलिसिस उपकरणों की अपर्याप्त निगरानी और रखरखाव, वैस्कुलर एक्सेस मॉनिटरिंग में कमियों और उपभोग्य सामग्रियों की उपलब्धता में देरी तथा सेवा प्रदाताओं को धनराशि जारी करने में देरी पर चिंता व्यक्त करती है। समिति का मानना है कि पर्याप्त कुशल जनशक्ति, गुणवत्ता आश्वासन, समय पर रखरखाव और उपभोग्य सामग्रियों की निर्बाध आपूर्ति सुनिश्चित किए बिना केवल डायलिसिस अवसंरचना को बढ़ाने से डायलिसिस सेवाओं की गुणवत्ता, निरंतरता और सुलभता प्रभावित हो सकती है। इसलिए, समिति सिफारिश करती है कि मंत्रालय पीएमएनडीपी के तहत परिचालन क्षमता का व्यापक मूल्यांकन करे, जिसमें न केवल हीमोडायलिसिस मशीनों की उपलब्धता बल्कि प्रशिक्षित मानव संसाधन, मशीन उपयोग, रखरखाव प्रोटोकॉल, उपभोग्य सामग्रियों की पर्याप्तता और धनराशि की समयबद्धता भी शामिल हो। समिति आगे सिफारिश करती है कि सभी पीएमएनडीपी केंद्रों में एकसमान गुणवत्ता मानक और आवधिक नैदानिक ऑडिट लागू किए जाएं तथा सुरक्षित, निर्बाध और गुणवत्तापूर्ण डायलिसिस सेवाएं सुनिश्चित करने के लिए डायलिसिस तकनीशियनों और नर्सों के रिक्त पदों को प्राथमिकता के आधार पर भरा जाए।
(पैरा 5.6.5)
46. समिति इस विषय पर ध्यान देती है कि कार्यक्रम के तहत 29.46 लाख मरीजों को 375.88 लाख हीमोडायलिसिस सत्र प्रदान किए गए हैं, जिसका अर्थ है प्रति मरीज औसतन लगभग 12.8 डायलिसिस सत्र। समिति नोट करती है कि अंतिम चरण के गुर्दा रोग वाले मरीजों को आमतौर पर सप्ताह में दो से तीन बार रखरखाव हीमोडायलिसिस की आवश्यकता होती है, जो प्रति माह लगभग 8-12 सत्रों के बराबर है। यद्यपि समिति यह मानती है कि मंत्रालय द्वारा प्रस्तुत आंकड़े संचयी कार्यक्रम डेटा का प्रतिनिधित्व करते हैं और जरूरी नहीं कि व्यक्तिगत मरीजों के उपचार इतिहास को प्रतिबिंबित करें, फिर भी समिति का मानना है कि रिपोर्ट किए गए संकेतक यह आकलन करने के लिए अपर्याप्त हैं कि लाभार्थियों को चिकित्सकीय रूप से आवश्यक अवधि तक पर्याप्त और निर्बाध डायलिसिस मिल रहा है या नहीं। समिति का मानना है कि केवल संचयी मरीजों और संचयी सत्रों की रिपोर्टिंग से कार्यक्रम की पहुंच को बढ़ा–चढ़ाकर बताया जा सकता है, जबकि उपचार की निरंतरता, मरीजों की भागीदारी, डायलिसिस की पर्याप्तता या दीर्घकालिक परिणामों के बारे में सीमित जानकारी मिलती है। अतः समिति मंत्रालय को मौजूदा रिपोर्टिंग ढांचे में रोगी–केंद्रित परिणाम संकेतकों को शामिल करने की सिफारिश करती है, जिसमें प्रति सक्रिय रोगी प्रति माह डायलिसिस सत्रों की औसत संख्या, अनुशंसित आवृत्ति पर डायलिसिस प्राप्त करने वाले रोगियों की संख्या, उपचार का पालन, उपचार छोड़ने की दर, प्रत्यारोपण दर, मृत्यु दर और उपचार बंद करने के कारण शामिल हैं, ताकि कार्यक्रम के तहत डायलिसिस सेवाओं की प्रभावशीलता और गुणवत्ता का अधिक सार्थक मूल्यांकन किया जा सके।
(पैरा 5.6.6)
सतत एम्बुलेटरी पेरिटोनियल डायलिसिस (सीएपीडी)
47. समिति समुक्ति करती है कि एनएचएम के तहत समर्पित वित्तीय सहायता द्वारा समर्थित पीएमएनडीपी के अंतर्गत सीएपीडी को शामिल करने से डायलिसिस सेवाओं तक समान पहुंच में सुधार की संभावना है, विशेष रूप से दूरदराज के क्षेत्रों में रहने वाले रोगियों, बुजुर्गों और उन लोगों के लिए जिनके लिए हिमोडायलिसिस केंद्रों तक नियमित रूप से यात्रा करना मुश्किल है। हालांकि, समिति ने पाया कि सीएपीडी का उपयोग सीमित बना हुआ है, क्योंकि मंत्रालय ने 12 राज्यों में केवल 1,637 लाभार्थियों (सक्रिय पीएमएनडीपी लाभार्थियों का लगभग 1.1%) की रिपोर्ट दी है, जो इस घर–आधारित डायलिसिस पद्धति के और विस्तार की पर्याप्त संभावना को दर्शाता है। इसलिए, समिति पुरजोर सिफारिश करती है कि मंत्रालय को उपभोग्य सामग्रियों की निर्बाध उपलब्धता सुनिश्चित करके, मेडिकल कॉलेज हब–एंड–स्पोक मॉडल को मजबूत करके, उपचार पद्धति के चयन के लिए रोगियों की परामर्श प्रक्रिया को बढ़ाकर और घर–आधारित डायलिसिस सेवाओं की गुणवत्ता और उपयोग में सुधार के लिए पेरिटोनियल डायलिसिस नर्सों और स्वास्थ्य कर्मियों की क्षमता का निर्माण करके, विशेष रूप से ग्रामीण और दूरदराज के क्षेत्रों में, निरंतर एम्बुलेटरी पेरिटोनियल डायलिसिस (सीएपीडी) के कवरेज का विस्तार करना चाहिए।
(पैरा 5.7.3)
वन नेशन–वन डायलिसिस इनिशिएटिव बनाम पीएमएनडीपी पोर्टल:
48. समिति पीएमएनडीपी पोर्टल के तहत ‘एक राष्ट्र – एक डायलिसिस‘ पहल के संचालन की सराहना करती है जिससे एबीएचए एकीकरण, डिजिटल रोगी रिकॉर्ड, ओटीपी–आधारित प्रमाणीकरण और डायलिसिस सत्रों की वास्तविक समय निर्धारण के माध्यम से देशव्यापी डायलिसिस सेवाओं की सुगमता संभव हो पाई है। समिति का मत है कि यह पोर्टल रोजगार, शिक्षा या चिकित्सा उपचार के लिए पलायन करने वाले रोगियों के लिए देखभाल की निरंतरता में उल्लेखनीय सुधार लाने की क्षमता रखता है। हालांकि, मई 2022 में इसके शुभारंभ के बाद से केवल 39,983 रोगियों के स्थानांतरण को सुगम बनाए जाने को देखते हुए, समिति का मानना है कि सुगमता सुविधा का अभी भी पूरी तरह से उपयोग नहीं किया जा रहा है। इसलिए, समिति सिफारिश करती है कि मंत्रालय सुगमता सुविधा के उपयोग को बढ़ावा देने के लिए स्वास्थ्य सेवा प्रदाताओं और लाभार्थियों के बीच व्यापक जागरूकता और क्षमता निर्माण पहल करे। मंत्रालय को सभी पीएमएनडीपी केंद्रों का पीएमएनडीपी पोर्टल और आयुष्मान भारत डिजिटल मिशन (एबीडीएम) के साथ वास्तविक समय में एकीकरण सुनिश्चित करना चाहिए, अन्य राष्ट्रीय स्वास्थ्य प्लेटफार्मों के साथ अंतर-संचालनीयता को मजबूत करना चाहिए और उपचार की निरंतरता, डायलिसिस की पर्याप्तता, रोगी परिणामों और अंतर–राज्य रेफरल को ट्रैक करने में सक्षम एक व्यापक रोगी प्रबंधन प्रणाली विकसित करनी चाहिए।
(पैरा 5.8.2)
आयुष्मान भारत – प्रधान मंत्री जन आरोग्य योजना (एबी–पीएलजेएवाई)
49. समिति समुक्ति करती है कि गंभीर गुर्दा रोग के उपचार की लागत अक्सर मौजूदा स्वास्थ्य लाभ पैकेज से कहीं अधिक होती है।एबी–पीएमजेएवाई के अंतर्गत स्वास्थ्य और परिवार कल्याण संबंधी संसदीय स्थायी समिति ने अपने 172वें प्रतिवेदन में पाया था कि एबी–पीएमजेएवाई के तहत प्रति परिवार मौजूदा ₹5 लाख का स्वास्थ्य बीमा कवर महंगे चिकित्सा उपचारों के लिए अपर्याप्त हो सकता है और इसलिए प्रति परिवार प्रति वर्ष स्वास्थ्य बीमा कवरेज की सीमा को बढ़ाकर ₹10 लाख करने की सिफारिश की है। समिति का मानना है कि एबी–पीएमजेएवाई के अंतर्गत गंभीर गुर्दा रोग से संबंधित स्वास्थ्य लाभ पैकेजों की समय–समय पर समीक्षा की जानी चाहिए ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि वे प्रचलित उपचार लागतों, नैदानिक अभ्यास में प्रगति और गंभीर गुर्दा रोग प्रबंधन की प्रकृति को पर्याप्त रूप से प्रतिबिंबित करते हैं। अतः समिति सिफारिश करती है कि स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय, राष्ट्रीय स्वास्थ्य प्राधिकरण, नेफ्रोलॉजी विशेषज्ञों और अन्य हितधारकों के परामर्श से, एबी–पीएमजेएवाई के अंतर्गत सीकेडी–विशिष्ट स्वास्थ्य लाभ पैकेजों की व्यापक समीक्षा करे, जिसमें पैकेज दरें, उपचार प्रोटोकॉल और कवर की गई सेवाओं का दायरा शामिल हो, ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि पात्र लाभार्थियों को डायलिसिस, गुर्दा प्रत्यारोपण और प्रत्यारोपण के बाद देखभाल की पूरी प्रक्रिया में समय पर, व्यापक और निर्बाध उपचार प्राप्त हो, और यह सुनिश्चित किया जा सके कि योजना विकसित हो रहे नैदानिक मानकों और उपचार लागतों के अनुरूप बनी रहे।
(पैरा 5.9.3)
50. समिति आयुष्मान भारत–प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना (एबी–पीएमजेएवाई) के तहत स्वास्थ्य लाभ पैकेज दिशानिर्देशों पर विचार करते हुए समुक्ति करती है कि गुर्दा प्रत्यारोपण पैकेज के अंतर्गत अस्पताल से छुट्टी के बाद की देखभाल वर्तमान में केवल 15 दिनों के लिए ही उपलब्ध है। अतः समिति का दृढ़ मत है कि गुर्दा प्रत्यारोपण एक बार की शल्य चिकित्सा नहीं है, बल्कि इसके लिए प्रत्यारोपण के बाद गहन प्रबंधन की आवश्यकता होती है, विशेष रूप से पहले वर्ष के दौरान, जिसमें प्रत्यारोपण अस्वीकृति और संक्रमण का जोखिम सबसे अधिक होता है। समिति का मानना है कि प्रत्यारोपण के बाद कवरेज को 15 दिनों तक सीमित करना गुर्दा प्रत्यारोपण प्राप्तकर्ताओं की नैदानिक आवश्यकताओं के अनुरूप नहीं है। अतः समिति सिफारिश करती है कि स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय, राष्ट्रीय स्वास्थ्य प्राधिकरण और नेफ्रोलॉजी विशेषज्ञों के परामर्श से, एबी–पीएमजेएवाई के अंतर्गत गुर्दा प्रत्यारोपण के लिए मौजूदा स्वास्थ्य लाभ पैकेज की समीक्षा करे और प्रत्यारोपण के बाद देखभाल की स्वीकार्य अवधि को वर्तमान 15 दिनों से बढ़ाकर एक वर्ष कर दे। संशोधित पैकेज में प्रत्यारोपण के बाद पहले वर्ष के दौरान अनुवर्ती परामर्श, आवश्यक नैदानिक जांच, इम्यूनोसुप्रेसेंट दवाओं और प्रत्यारोपण से संबंधित जटिलताओं के प्रबंधन के लिए वित्तीय सहायता प्रदान की जानी चाहिए ताकि उपचार के प्रति पालन में सुधार हो, ग्राफ्ट अस्वीकृति को कम किया जा सके और दीर्घकालिक प्रत्यारोपण परिणामों को अधिकतम किया जा सके।
(पैरा 5.9.4)
राष्ट्रीय अंग प्रत्यारोपण कार्यक्रम (एनओटीपी)
51. समिति अंग प्रत्यारोपण के लिए संस्थागत ढांचे को मजबूत करने हेतु सरकार द्वारा राष्ट्रीय अंग प्रत्यारोपण कार्यक्रम के अंतर्गत शुरू की गई पहलों की सराहना करती है। हालाँकि, समिति विशेषज्ञ साक्ष्यों के आधार पर समुक्ति करती है कि जीवित दाताओं की सीमित उपलब्धता, राज्यों में, विशेष रूप से उत्तरी और पूर्वी भारत में, मृत अंगदान कार्यक्रमों का असमान विकास और आर्थिक रूप से कमजोर कई रोगियों की प्रत्यारोपण एवं प्रत्यारोपण के बाद देखभाल का खर्च वहन करने में असमर्थता के कारण गुर्दा प्रत्यारोपण तक समान पहुँच एक चुनौती बनी हुई है। समिति का मत है कि ये कारक गुर्दा प्रत्यारोपण तक पहुँच में महत्वपूर्ण क्षेत्रीय और सामाजिक–आर्थिक असमानताएँ उत्पन्न करते रहते हैं। अतः समिति सिफारिश करती है कि मंत्रालय गुर्दा प्रत्यारोपण में क्षेत्रीय असमानताओं को कम करने के लिए एक लक्षित कार्यनीति अपनाए, जिसमें कम प्रदर्शन करने वाले राज्यों में मृत अंगदान कार्यक्रमों को मजबूत करना, कम सेवा वाले क्षेत्रों में प्रत्यारोपण सुविधाओं का विस्तार करना और यह सुनिश्चित करना शामिल है कि आर्थिक रूप से कमजोर रोगियों को प्रत्यारोपण एवं प्रत्यारोपणोत्तर देखभाल के लिए पर्याप्त सहायता प्राप्त हो।
(पैरा 5.10.5)
स्वास्थ्य प्रणालियां: खामियां और चुनौतियां
राष्ट्रीय गुर्दा रजिस्ट्री की आवश्यकता
52. समिति का यह सुविचारित मत है कि विश्वसनीय राष्ट्रीय आंकड़ों की कमी का सार्वजनिक स्वास्थ्य नियोजन पर दूरगामी प्रभाव पड़ता है। महामारी विज्ञान संबंधी ठोस साक्ष्यों के अभाव में स्वास्थ्य सेवा अवसंरचना, डायलिसिस क्षमता, नेफ्रोलॉजी कार्यबल, वित्तीय आवंटन और आवश्यक दवाओं की खरीद की योजना वास्तविक रोग भार के बजाय अनुमानों के आधार पर बनाई जाती है, जिसके परिणामस्वरूप संसाधनों का अक्षम आवंटन होता है और गुर्दा देखभाल में क्षेत्रीय असमानताएं बढ़ती हैं। राष्ट्रीय रजिस्ट्री न होने से उच्च जोखिम वाली आबादी की पहचान, स्क्रीनिंग और उपचार के मूल्यांकन में भी बाधा उत्पन्न होती है। समिति कार्यक्रमों, रोगी परिणामों के आकलन, सरकारी हस्तक्षेपों की निगरानी और नैदानिक अनुसंधान, स्वास्थ्य प्रौद्योगिकी मूल्यांकन और सुविचारित नीति निर्माण के लिए साक्ष्य जुटाने में सहायता प्रदान करने हेतु स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय से आयुष्मान भारत डिजिटल मिशन और पीएमएनडीपी पोर्टल के साथ समेकित एक व्यापक राष्ट्रीय गुर्दा रजिस्ट्री स्थापित करने की पुरजोर सिफारिश करती है। इससे गंभीर गुर्दा रोग के सभी चरणों में वास्तविक समय, मानकीकृत और दीर्घकालिक डेटा उपलब्ध होगा, जिससे रोग निगरानी की सुदृढ़ता के साथ ही उपचार परिणामों की बेहतर निगरानी हो सकेगी, जिसके परिणामस्वरूप साक्ष्य–आधारित नीति निर्माण होगा और भारत की गुर्दा देखभाल प्रणाली सर्वोत्तम अंतरराष्ट्रीय प्रथाओं के अनुरूप होगी।
(पैरा 6.2.3)
नेफ्रोलॉजिस्ट और प्रशिक्षित डायलिसिस कर्मियों की अत्यधिक कमी
53. समिति ने यह नोट किया है कि जिला अस्पतालों में नेफ्रोलॉजिस्ट की अनुपलब्धता बुनियादी ढांचे के निर्माण और विशेषीकृत मानव संसाधनों की उपलब्धता के बीच एक गंभीर विसंगति को दर्शाती है, जिससे गंभीर गुर्दा रोग देखभाल की गुणवत्ता, सुरक्षा और निरंतरता प्रभावित होने के साथ ही नैदानिक निर्णय लेने में देरी होती है और विशेष रूप से ग्रामीण और कम सेवा वाले क्षेत्रों में रोग जटिलता प्रबंधन सीमित होने के साथ ही डायलिसिस सेवाओं की प्रभावशीलता कम हो जाती है। अतः समिति सिफारिश करती है कि स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय, राज्य सरकारों के समन्वय से, जिला अस्पतालों में नेफ्रोलॉजिस्ट, यूरोलॉजिस्ट और डायलिसिस तकनीशियनों के सभी रिक्त स्वीकृत पदों को समयबद्ध तरीके से भरने का अभियान चलाए जिसमें विशेषकर बिहार, राजस्थान, ओडिशा, असम, छत्तीसगढ़ आदि राज्यों को प्राथमिकता दी जाए जहां ऐसे विशेषज्ञों की उपलब्धता शून्य या अत्यंत अपर्याप्त है। मंत्रालय को सभी सरकारी मेडिकल कॉलेजों में समर्पित नेफ्रोलॉजी विभागों की चरणबद्ध स्थापना को अनिवार्य करने के साथ ही उसमें सहयोग करना चाहिए तथा डीएम नेफ्रोलॉजी सीटों और संबद्ध प्रशिक्षण क्षमता को भौगोलिक रूप से संतुलित पर्याप्तता तक बढ़ाना चाहिए ताकि सभी राज्यों में नेफ्रोलॉजिस्ट और प्रशिक्षित विशेषज्ञ मानव संसाधन की अत्यधिक कमी को दूर किया जा सके और जरूरतमंद रोगियों की पूरे देश में, विशेषकर जिला अस्पतालों में, विशेषज्ञ गुर्दा रोग देखभाल तक समान पहुंच सुनिश्चित की जा सके।
(पैरा 6.3.5)
वित्तीय सुरक्षा योजनाओं के बावजूद निरंतर जेब से होने वाला खर्च
54. समिति ने पाया कि पीएमएनडीपी और एबी–पीएमजेएवाई के कार्यान्वयन के बावजूद, उपचार की आजीवन प्रकृति, बार–बार होने वाले डायलिसिस खर्च, दवाओं, निदान, यात्रा, पोषण संबंधी आवश्यकताओं पर होने वाले खर्च और आजीविका के नुकसान तथा अन्य व्यय के कारण गंभीर गुर्दा रोग का वित्तीय भार काफी अधिक बना हुआ है। 2021-22 में 39.4 प्रतिशत से बढ़कर 2022-23 में 43.4 प्रतिशत तक पंहुचे जेब से किए जाने वाले खर्च (ओओपीई) में हाल ही में हुई 4% की वृद्धि से यह और स्पष्ट होता है कि मौजूदा वित्तीय सुरक्षा तंत्र परिवारों को स्वास्थ्य संबंधी भारी खर्चों से पर्याप्त रूप से सुरक्षित नहीं कर पाए हैं। समिति का मानना है कि जब तक चिरकालिक गुर्दा रोग (सीकेडी) के रोगियों और उनके परिवारों पर पड़ने वाले समग्र आर्थिक बोझ का व्यापक समाधान नहीं किया जाता, तब तक केवल गुर्दा प्रतिस्थापन उपचारों तक पहुंच बढ़ाना ही पर्याप्त नहीं है। इसलिए, समिति मंत्रालय को सीकेडी के विभिन्न चरणों में रोगियों द्वारा किए गए वास्तविक जेब खर्च का आकलन करने, मौजूदा योजनाओं के अंतर्गत शामिल न होने वाले खर्चों की पहचान करने और स्वास्थ्य संबंधी अत्यधिक खर्चों को कम करने के उपायों की सिफारिश करने के लिए मौजूदा सरकारी योजनाओं के तहत सीकेडी रोगियों को उपलब्ध वित्तीय सुरक्षा के संबंध में एक व्यापक राष्ट्रीय लागत अध्ययन करने की सिफारिश करती है। मंत्रालय को सार्वजनिक वित्तपोषण को मजबूत करके, वित्तीय सहायता के दायरे को डायलिसिस प्रक्रियाओं से आगे बढ़ाकर, विशेष रूप से प्रत्यारोपण के बाद की देखभाल तक विस्तारित करके, और विशेष रूप से ग्रामीण और आर्थिक रूप से कमजोर आबादी के लिए सार्वजनिक और निजी क्षेत्र के अस्पतालों में सस्ती गुर्दा देखभाल तक समान पहुंच सुनिश्चित करके, गंभीर गुर्दा रोग देखभाल के लिए जेब से होने वाले खर्च को धीरे–धीरे कम करने के लिए एक दीर्घकालिक रणनीति भी विकसित करनी चाहिए।
(पैरा 6.4.4)
बीमा कवरेज के विस्तार की आवश्यकता
55. समिति पीएमएनडीपी के तहत प्रदान की जा रही वित्तीय सुरक्षा की सराहना करते हुए इस बात पर संतोष व्यक्त करती है कि आयुष्मान भारत (पीएम–जेएवाई) या राज्य–विशिष्ट बीमा योजनाओं ने गंभीर चिरकालिक गुर्दा रोग (सीकेडी) के रोगियों के लिए डायलिसिस और गुर्दा प्रत्यारोपण तक पहुंच में सुधार करते हुए वित्तीय भार को काफी हद तक कम किया है। हालांकि, समिति का मानना है कि सीकेडी का प्रभावी ढंग से समाधान करने के लिए अंतिम चरण के उपचार के बाद भी सीकेडी रोगियों के लिए वित्तीय सुरक्षा की आवश्यकता है, जो मौजूदा ढांचे के तहत अपर्याप्त रूप से कवर की जाती है। इसलिए, समिति दृढ़ता से सिफारिश करती है कि मंत्रालय प्रत्येक व्यक्ति के लिए अनिवार्य स्वास्थ्य बीमा कवरेज लागू करने की व्यवहार्यता का पता लगाए, जिसका आंशिक वित्तपोषण सरकार और व्यक्ति दोनों द्वारा किया जाए, ताकि विशेष रूप से उच्च जोखिम वाले व्यक्तियों की स्क्रीनिंग, आवधिक नैदानिक जांच, बाह्य रोगी परामर्श, आवश्यक दवाएं, सीकेडी से संबंधित जटिलताओं का प्रबंधन और प्री–डायलिसिस देखभाल सहित सीकेडी देखभाल की संपूर्ण श्रृंखला को कवर किया जा सके। समिति का मानना है कि रोग के सभी चरणों में प्रत्येक व्यक्ति के लिए व्यापक अनिवार्य वित्तीय कवरेज शीघ्र निदान को बढ़ावा देगा, उपचार अनुपालन में सुधार करेगा, जेब से होने वाले खर्च को कम करेगा, स्वास्थ्य पर होने वाले भारी खर्च को रोकेगा और गुर्दे फेल होने की स्थिति को टाला जा सकेगा, जिससे रोगियों और सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणाली दोनों पर दीर्घकालिक भार कम होगा।
(पैरा 6.5.3 )
पंहुच और परिणामों में असमानताएं
56. समिति का यह सुविचारित मत है कि क्षेत्रीय और लैंगिक असमानताएं विशेषीकृत गुर्दा रोग देखभाल सेवाओं के समान वितरण में लगातार मौजूद प्रणालीगत कमियों को दर्शाती हैं और सार्वभौमिक स्वास्थ्य कवरेज के उद्देश्य को कमजोर करती हैं। जब तक भौगोलिक स्थिति, सामर्थ्य, लिंग और सामाजिक भेद्यता से संबंधित बाधाओं को लक्षित नीतिगत हस्तक्षेपों के माध्यम से दूर नहीं किया जाता, तब तक गंभीर गुर्दे की बीमारी (सीकेडी) के बुनियादी ढांचे और वित्तीय सुरक्षा योजनाओं में चल रहे निवेशों का लाभ ग्रामीण, आदिवासी और भौगोलिक रूप से अलग–थलग आबादी तक पहुंचने की संभावना नहीं है, जिन्हें वास्तव में सीकेडी उपचार और देखभाल की सबसे अधिक और तत्काल आवश्यकता है। इसलिए, समिति सिफारिश करती है कि स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय राज्य सरकारों के समन्वय से, ग्रामीण और कम सेवा वाले जिलों में विशेषज्ञ और नैदानिक सेवाओं को मजबूत करके, ग्रामीण और आदिवासी आबादी के लिए रेफरल और परिवहन सहायता में सुधार करके, समुदाय–आधारित स्क्रीनिंग और जागरूकता कार्यक्रमों का विस्तार करके, अप्रत्यक्ष उपचार लागतों के लिए वित्तीय सहायता सुनिश्चित करके और निदान, डायलिसिस और गुर्दा प्रत्यारोपण तक समान पहुंच को बढ़ावा देने के लिए लिंग–संवेदनशील उपायों को अपनाकर सीकेडी देखभाल में असमानताओं को कम करने के लिए एक लक्षित रणनीति तैयार करे।
(पैरा 6.6.4)
गुर्दा प्रत्यारोपण की मांग और क्षमता के बीच बढ़ता अंतर
57. समिति का यह मत है कि गुर्दे की मांग और आपूर्ति में असंतुलन को दूर करने के लिए दोहरी रणनीति की आवश्यकता है – निरंतर जन जागरूकता के माध्यम से मृत व्यक्तियों के अंगदान की दर को पर्याप्त रूप से सुदृढ़ करना और कम सेवा वाले राज्यों, विशेष रूप से उत्तर–पूर्वी और पहाड़ी क्षेत्रों में प्रत्यारोपण अवसंरचना और विशेषज्ञ क्षमता का विस्तार करना। अतः समिति स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय से सिफारिश करती है कि प्रत्येक बड़े राज्य में कम से कम तीन सरकारी मेडिकल कॉलेजों और छोटे राज्यों या केंद्र शासित प्रदेशों में एक सरकारी मेडिकल कॉलेज तक अंग प्रत्यारोपण केंद्रों और गुर्दा प्रत्यारोपण सुविधाओं के नेटवर्क का विस्तार करने के लिए समयबद्ध लक्ष्य निर्धारित करने और प्रत्यारोपण अवसंरचना तथा प्रत्यारोपण समन्वयकों के लिए राज्यों को वित्तीय और तकनीकी सहायता प्रदान करके उसे सुदृढ़ करने तथा मृत दाताओं से अंगदान के लिए, विशेष रूप से उन राज्यों में जहां वर्तमान में मृत दाताओं से अंगदान की गतिविधि नगण्य है, जन जागरूकता अभियान तेज करने की अनुशंसा करती है।
(पैरा 6.7.2)
58. समिति का यह मत है कि जीवित अंग दान और गुर्दा प्रत्यारोपण में देखी गई उल्लेखनीय लैंगिक असमानता की गहन जांच आवश्यक है ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि प्रत्यारोपण तक पहुंच केवल नैदानिक आवश्यकता पर आधारित हो और सामाजिक–आर्थिक या लिंग–संबंधी बाधाओं से प्रभावित न हो। अतः समिति सिफारिश करती है कि स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय राष्ट्रीय अंग एवं ऊतक प्रत्यारोपण संगठन (एनओटीटीओ) के माध्यम से एक व्यापक अध्ययन करे ताकि जीवित अंग दाताओं के रूप में महिलाओं और प्रत्यारोपण प्राप्तकर्ताओं के रूप में पुरुषों के असमान प्रतिनिधित्व में योगदान देने वाले कारकों की पहचान की जा सके। निष्कर्षों के आधार पर, मंत्रालय को उचित नीतिगत हस्तक्षेप करने के साथ ही परामर्श और सूचित सहमति प्रक्रियाओं को बेहतर बनाने, लिंग–विभाजित डेटा संग्रह और निगरानी को बढ़ाने और समाज के सभी वर्गों में गुर्दा प्रत्यारोपण और अंगदान सेवाओं तक समान पहुंच सुनिश्चित करने का प्रयास करना चाहिए।
(पैरा 6.7.4)
स्वास्थ्य साक्षरता, जागरूकता और विलंबित निदान
59. समिति का मानना है कि आहार संबंधी प्रतिबंधों, दीर्घकालिक दवाइयों और नियमित निगरानी सहित गंभीर क्रोनिक रोग (सीकेडी) की प्रबंधन जटिलता, सीमित स्वास्थ्य साक्षरता वाले रोगियों के लिए काफी चुनौतियां पेश करती है। समिति का यह मत है कि अपर्याप्त जन जागरूकता, रोग की प्रगति की खराब समझ और सीमित स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंच इस समस्या को और बढ़ा सकती है। परामर्श और सहायक देखभाल की कमी से निदान में देरी, उपचार के प्रति कम अनुपालन और गुर्दे की अंतिम अवस्था तक पहुंचने की संभावना बढ़ जाती है। समिति का यह भी मानना है कि विशेष रूप से आर्थिक रूप से कमजोर रोगियों में निरंतर रोगी शिक्षा और मनोसामाजिक सहायता के अभाव में उपचार बंद हो सकता है, अनुवर्ती जांच छूट सकती है और निर्धारित आहार एवं दवा नियमों का पालन ठीक से नहीं हो सकता है। इसके अलावा, ये चुनौतियां देखभाल करने वालों पर, विशेषकर कम आय वाले और ग्रामीण परिवारों पर, भावनात्मक, सामाजिक और वित्तीय भार डालती हैं, जिससे गुर्दे की बीमारी के परिणामों में मौजूदा असमानताएं और बढ़ जाती हैं। इसलिए, समिति स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय से यह पुरजोर सिफारिश करती है कि वह ग्रामीण क्षेत्रों और द्वितीय और तृतीय श्रेणी के शहरों पर विशेष ध्यान देते हुए, लिंग और क्षेत्र के प्रति संवेदनशील जागरूकता अभियान चलाए; क्षेत्रीय भाषाओं में सांस्कृतिक रूप से उपयुक्त आहार और उपचार अनुपालन संबंधी परामर्श सामग्री विकसित और वितरित करे और गुर्दे की बीमारी के रोगियों और उनके देखभाल करने वालों को निरंतर सामुदायिक स्तर पर परामर्श और सहायता प्रदान करने के लिए आशा कार्यकर्ताओं सहित अग्रिम पंक्ति के स्वास्थ्य कर्मियों की क्षमता को सुदृढ़ करे।
(पैरा 6.8.3)
अनियमित दवा उपयोग और गुणवत्ता आश्वासन में कमियां
60. समिति इस बात से चिंतित है कि कुछ आम तौर पर इस्तेमाल होने वाली दवाओं के गुर्दे पर विषाक्त प्रभाव के संबंध में जनता में अपर्याप्त जागरूकता है और उनके तर्कसंगत उपयोग को बढ़ावा देने के लिए एक मजबूत ढांचे की कमी के कारण, व्यक्तियों को गुर्दे की ऐसी क्षति का सामना करना पड़ रहा है जिसे टाला जा सकता है। समिति सिफारिश करती है कि मंत्रालय संबंधित नियामक प्राधिकरणों के समन्वय से उन दवाओं, विशेष रूप से बिना पर्चे के मिलने वाली दर्द निवारक दवाएं, के अनियंत्रित और लंबे समय तक उपयोग से जुड़े जोखिमों के बारे में जन जागरूकता बढ़ाए जो गुर्दे के कार्य को प्रतिकूल रूप से प्रभावित करने के लिए जानी जाती हैं। इसके अतिरिक्त, समिति विशेष रूप से मधुमेह, उच्च रक्तचाप और अन्य उच्च जोखिम वाली स्थितियों वाले व्यक्तियों के लिए जिन्हें लंबे समय तक दवा की आवश्यकता होती है, उचित रोगी परामर्श के माध्यम से दवाओं के तर्कसंगत उपयोग को बढ़ावा देने और फार्माकोविजिलेंस और प्रिस्क्रिप्शन प्रथाओं को सुदृढ़ करने की सिफारिश करती है।
(पैरा 6.9.2)
अनुसंधान और साक्ष्य संबंधी कमियाँ
61. समिति का मानना है कि भारत में चिरकालिक गुर्दा रोग (सीकेडी) के प्रति प्रतिक्रिया न केवल स्वास्थ्य सेवा वितरण में कमियों से बाधित है, बल्कि देश के अनुसंधान और साक्ष्य–संकलन तंत्र में खामियों से भी प्रभावित है। सीकेडी के कारणों के बारे में महत्वपूर्ण ज्ञान की कमी, स्वदेशी वैज्ञानिक नवाचारों का नैदानिक अभ्यास में सीमित उपयोग, अपर्याप्त बहुकेंद्रीय और सहयोगात्मक अनुसंधान और पूरक उपचारों का अपर्याप्त वैज्ञानिक सत्यापन जैसे सभी कारक मिलकर सीकेडी की रोकथाम और प्रबंधन के लिए साक्ष्य–आधारित नीतियों और प्रभावी उपायों के निर्माण को अवरुद्ध करते हैं। इसलिए, समिति सिफारिश करती है कि स्वास्थ्य अनुसंधान विभाग और भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद अज्ञात एटियलॉजी से होने वाली सीकेडी के अनुमानों में भिन्नता को दूर करने, स्वदेशी नैदानिक बायोमार्करों के बड़े पैमाने पर सत्यापन में तेजी लाने और अंतरराष्ट्रीय अनुसंधान सहयोग को सक्रिय रूप से आगे बढ़ाने के लिए एक समन्वित राष्ट्रीय अनुसंधान एजेंडा तैयार करें। समिति आगे यह सिफारिश करती है कि आयुष मंत्रालय, आईसीएमआर और डीएचआर के सहयोग से गंभीर गुर्दा रोग के प्रबंधन में योग और अन्य आयुष पद्धतियों की भूमिका का वैज्ञानिक रूप से मूल्यांकन करने के लिए कठोर, पर्याप्त रूप से सक्षम नैदानिक अध्ययन तैयार करे और उन्हें संचालित करने के साथ ही देश भर में योग चिकित्सा केंद्रों और निवारक स्वास्थ्य देखभाल इकाइयों के भौगोलिक विस्तार को भी सुनिश्चित करे।
(पैरा 6.10.5)
बाल गुर्दा देखभाल की आवश्यकता – गंभीर गुर्दा रोग में एक विशिष्ट प्राथमिकता
62. समिति का मानना है कि बच्चों में होने वाली चिरकालिक गुर्दा रोग (सीकेडी) मुख्य रूप से जन्मजात, आनुवंशिक या विकासात्मक कारणों से होते हैं, जिसके नैदानिक लक्षण अक्सर दो से तीन वर्ष की आयु में ही दिखाई देने लगते हैं। वयस्कों में होने वाली सीकेडी के विपरीत, बच्चों में होने वाली सीकेडी के लिए शैशवावस्था से लेकर वयस्कता तक निरंतर चिकित्सा देखभाल की आवश्यकता होती है, और प्रत्यारोपित गुर्दों के सीमित कार्यात्मक जीवनकाल के कारण कई रोगियों को अपने जीवनकाल में कई गुर्दा प्रत्यारोपण कराने की संभावना रहती है। इसलिए, समिति बच्चों में होने वाली सीकेडी को एक आजीवन स्वास्थ्य देखभाल प्रतिबद्धता मानती है जिसके लिए निरंतर संस्थागत सहायता की आवश्यकता होती है। समिति का मानना है कि सीकेडी से पीड़ित बच्चों को आयु-उपयुक्त डायलिसिस सुविधाओं, बाल चिकित्सा प्रत्यारोपण विशेषज्ञता और बहु-विषयक सहायता से सुसज्जित विशेष बाल चिकित्सा नेफ्रोलॉजी केंद्रों की आवश्यकता है। समिति का मानना है कि बच्चों में होने वाली सीकेडी को वयस्क सीकेडी कार्यक्रमों में शामिल करने के बजाय एक अलग स्वास्थ्य देखभाल प्राथमिकता के रूप में संबोधित किया जाना चाहिए। इसलिए, समिति स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय को राष्ट्रीय सीकेडी ढांचे के तहत बच्चों में होने वाली सीकेडी को एक अलग घटक के रूप में मान्यता देने और एक राष्ट्रीय बाल चिकित्सा गुर्दा स्वास्थ्य एवं समता कार्यक्रम, जिसमे प्रारंभिक निदान, व्यापक देखभाल और वयस्क नेफ्रोलॉजी सेवाओं में एक व्यवस्थित परिवर्तन शामिल हो, तैयार करने की अनुशंसा करती है। समिति आगे यह भी सिफारिश करती है कि प्रभावित बच्चों के लिए विशेष देखभाल तक समान पहुंच सुनिश्चित करने के लिए देश भर के तृतीयक देखभाल संस्थानों में समर्पित बाल चिकित्सा सीकेडी क्लीनिक धीरे-धीरे स्थापित किए जाएं।
(पैरा 6.11.4)
कम प्राथमिकता, संचार अंतराल और सेवा प्रदाताओं की चुनौतियां
63. समिति का मानना है कि अपर्याप्त संचार और परामर्श अक्सर उपचार के प्रति कम अनुपालन, निर्णय लेने में देरी और चिरकालिक गुर्दा रोग (सीकेडी) के अपर्याप्त प्रबंधन में योगदान करते हैं। अनुभव से पता चलता है कि रोगियों को अक्सर रोग की प्रगति, आहार संबंधी प्रतिबंधों और उपचार विकल्पों, विशेष रूप से रूढ़िवादी प्रबंधन से डायलिसिस या प्रत्यारोपण की ओर संक्रमण के दौरान, को समझने में कठिनाई होती है। समिति ने यह भी पाया कि सीमित उपचार विकल्पों वाले रोगियों के लिए लक्षणों के प्रबंधन, जीवन की गुणवत्ता से संबंधित मुद्दों और जीवन के अंतिम चरण की देखभाल पर परामर्श अपर्याप्त बना हुआ है। समिति का मत है कि उपचार परिणामों में सुधार और रोगी–केंद्रित देखभाल सुनिश्चित करने के लिए संचार, परामर्श और रोगी की भागीदारी को मजबूत करना आवश्यक है। इसलिए, समिति सिफारिश करती है कि मंत्रालय स्वास्थ्य साक्षरता, साझा निर्णय लेने और संरचित दीर्घकालिक परामर्श पर अधिक बल दे ताकि दवाओं, आहार संबंधी संशोधनों और जीवनशैली में बदलाव के प्रति निरंतर अनुपालन को बढ़ावा दिया जा सके।
(पैरा 6.12.3)
राष्ट्रीय सीकेडी प्रदर्शन डैशबोर्ड
64. समिति सरकार से सिफारिश करती है कि वह जिलेवार सीकेडी प्रदर्शन डैशबोर्ड विकसित करे ताकि स्क्रीनिंग कवरेज, प्रारंभिक निदान, डायलिसिस परिणाम, प्रत्यारोपण प्रतीक्षापत्र और विशेषज्ञ रिक्तियों की निगरानी की जा सके। समिति समझती है कि वास्तविक समय के डेटा का उपयोग क्षेत्रीय अंतराल की पहचान करने और जवाबदेही सुधारने में लाभकारी होगा। स्वस्थ किडनी बनाए रखने के उद्देश्य को प्राप्त करने के लिए साक्ष्य आधारित योजना और संसाधन आवंटन की आवश्यकता है।
(पैरा 6.13.1)
कार्यस्थल पर गुर्दा स्वास्थ्य कार्यक्रम
65. समिति चाहती है कि सरकार ज़्यादा जोखिम वाले कामों में लगे लोगों, जैसे कि खेती करने वाले, कंस्ट्रक्शन वर्कर और फ़ैक्टरी मज़दूरों के लिए किडनी हेल्थ प्रोग्राम शुरू करे। समिति यह भी सुझाव देती है कि समय-समय पर जांच के लिए लोगों में जागरूकता बढ़ाई जाए, पानी पीने की सुविधा और छायादार आराम करने की जगहें दी जाएं, और गर्मी के तनाव, डिहाइड्रेशन और पर्यावरण के असर से होने वाली सीकेडी (क्रोनिक किडनी डिज़ीज़) के बारे में काम से जुड़ी सेहत की शिक्षा और जागरूकता दी जाए।
(पैरा 6.14.1)
राष्ट्रीय स्वस्थ गुर्दा नीति
65. समिति समझती है कि सीकेडी एक बड़ी चुनौती है, इसलिए इसके कंट्रोल, शुरुआती पहचान, डायग्नोस्टिक टेस्ट, इलाज और इंटीग्रेटेड मैनेजमेंट को मज़बूत करके लंबे समय तक किडनी की देखभाल के लिए लोगों में जागरूकता पैदा करने और पॉलिसी बनाने की ज़रूरत है। सीकेडी को रोकने में आयुष सिस्टम की अहमियत को देखते हुए, समिति ऑल इंडिया आयुर्वेद इंस्टिट्यूट से गहराई से रिसर्च करने की सिफारिश करती है। समिति चाहती है कि आयुष्मान आरोग्य मंदिरों में मुफ़्त डायलिसिस की सुविधा हो।
(पैरा 6.15.1)
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