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फसल विविधीकरण और सूक्ष्म सिंचाई

भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर), कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय ने भारत के विभिन्न क्षेत्रों में प्रचलित फसल पैटर्न और जल विज्ञान की वास्तविकताओं का अध्ययन किया है। केन्‍द्रीय भू-जल बोर्ड (सीजीडब्ल्यूबी) के डेटा और मासिक ग्रिडेड ग्रेस (जीआरएसीई)  उपग्रह डेटा का उपयोग करके आईसीएआर के अध्ययन ने देश की शुष्क और अर्ध-शुष्क जलवायु को शामिल करते हुए, भूजल की कमी वाले राज्यों विशेष रूप से पंजाब, हरियाणा, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, महाराष्ट्र, कर्नाटक और तमिलनाडु में मौजूदा फसल पैटर्न की जल की आवश्यकता और जल की उपलब्धता के बीच बेमेल का संकेत दिया।  आईसीएआर ने ‘भारत में फसल प्रणालियों का एटलस’ भी तैयार किया है और प्रचलित कृषि-जलवायु परिस्थितियों, जल उपलब्धता सहित संसाधन उपलब्धता और बाजार के अवसरों को ध्यान में रखते हुए अनाज-प्रधान प्रणालियों के स्थायी विकल्प के रूप में वैकल्पिक फसल प्रणालियों की पहचान की है।

इसके अलावा, आईसीएआर ने 14 प्रमुख फसलों जैसे चावल, गेहूं, मक्का, बाजरा, ज्वार, अरहर, चना, सोयाबीन, सरसों, मूंगफली, कपास, गन्ना, आलू और प्याज के लिए सापेक्ष प्रसार सूचकांक (आरएसआई), सापेक्ष उपज सूचकांक (आरवाईआई), सतत उपज सूचकांक (एसवाईआई) और मृदा-जलवायु उपयुक्तता सूचकांक (एससीएसआई) को मिलाकर कृषि-पारिस्थितिक और जिला विशिष्ट फसल योजना तैयार की है।

भारत में उगाई जाने वाली प्रमुख जल-गहन फसलों में चावल, गन्ना, कपास और जूट शामिल हैं और ये एक साथ लगभग 62.7 मिलियन हेक्टेयर पर होती हैं, जो देश के सकल फसली (सस्य) क्षेत्र का लगभग एक तिहाई है। स्थानीय जल उपलब्धता के साथ फसल पैटर्न को संरेखित करने की आवश्यकता को पहचानते हुए, आईसीएआर ने वर्षा और जल उपलब्धता के संबंध में प्रमुख जल-गहन फसलों की खेती का आकलन किया। मूल्यांकन में पाया गया कि 68 जिलों में लगभग 2.89 मिलियन हेक्टेयर में धान की खेती की जाती है, जहां 650 मिमी से कम वार्षिक वर्षा होती है, जो कुल धान क्षेत्र (51 मिलियन हेक्टेयर) का लगभग 5.67 प्रतिशत है। इसी तरह, 91 जिलों में लगभग 0.721 मिलियन हेक्टेयर में गन्ना उगाया जाता है, जहां 700 मिमी से कम वार्षिक वर्षा होती है, जो कुल गन्ना कृषि क्षेत्र (6.7 मिलियन हेक्टेयर) का लगभग 10.76 प्रतिशत है। ये आकलन स्थान-विशिष्ट फसल विविधीकरण को बढ़ावा देने के लिए वैज्ञानिक आधार प्रदान करते हैं, विशेष रूप से जल की कमी वाले क्षेत्रों में जो जल सुरक्षा, किसान आजीविका और कृषि उत्पादकता को संतुलित करते हुए बार-बार जल दबाव और गिरते भूजल स्तर का अनुभव करते हैं।  

सरकार स्थानीय जल उपलब्धता, मृदा की विशेषताओं, कृषि-जलवायु उपयुक्तता और प्राकृतिक संसाधनों के सतत उपयोग को ध्यान में रखते हुए, जल-गहन फसलों से अपेक्षाकृत कम पानी की आवश्यकता वाली फसलों जैसे दलहन, तिलहन, मोटे अनाज (मिलेट्स) और बागवानी फसलों में फसल विविधीकरण को बढ़ावा दे रही है। फसल विविधीकरण पर पायलट परियोजना के तहत, आईसीएआर ने इन मानदंडों के आधार पर चिन्हित 47 जिलों में स्थान-विशिष्ट फसल विविधीकरण क्रियाकलापों को लागू किया है। विविध फसल प्रणालियों का समर्थन करने के लिए, आईसीएआर ने जल-उपयोग दक्षता और उत्पादकता बढ़ाने के लिए विभिन्न फसलों के लिए इष्टतम सिंचाई शेड्यूलिंग और ड्रिप फर्टिगेशन को भी मानकीकृत किया है और बढ़ावा दिया है। इसके अलावा, 2023-24 से 2025-26 के दौरान, आईसीएआर ने वैज्ञानिक फसल विविधीकरण और सतत फसल प्रबंधन प्रथाओं को बढ़ावा देने के लिए 457 प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित किए, जिससे 8,749 किसानों और 4,592 विस्तार कार्यकर्ताओं को लाभ हुआ।

सरकार टिकाऊ कृषि, सूक्ष्म सिंचाई, मृदा स्वास्थ्य प्रबंधन और प्राकृतिक संसाधनों के कुशल उपयोग को बढ़ावा देने के लिए कई योजनाओं और कार्यक्रमों को लागू कर रही है। प्रधानमंत्री धन-धान्य कृषि योजना (पीएम-डीडीकेवाई) फसल विविधीकरण, सिंचाई विकास, कटाई उपरांत संबंधी बुनियादी ढांचे, प्राकृतिक और जैविक खेती, एकीकृत नाशीजीव प्रबंधन (आईपीएम) और एकीकृत पोषक तत्व प्रबंधन (आईएनएम) जैसे हस्तक्षेपों के अभिसरण के माध्यम से 100 आकांक्षी कृषि जिलों में टिकाऊ कृषि को बढ़ावा देती है। प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना (पीएमकेएसवाई) का प्रति बूंद अधिक फसल (पीडीएमसी) घटक टपक सिंचाई और फुहार सिंचाई प्रणालियों को अपनाने के माध्यम से सिंचाई जल के कुशल उपयोग को बढ़ावा देता है। मृदा स्वास्थ्य कार्ड कार्यक्रम किसानों को मृदा की उर्वरता और पोषक तत्वों के उपयोग की दक्षता में सुधार के लिए फसल-विशिष्ट उर्वरक सिफारिशें प्रदान करके संतुलित और एकीकृत पोषण प्रबंधन को बढ़ावा देता है। इसके अलावा, पीएमकेएसवाई  का जलसंभर विकास घटक (डब्ल्यूडीसी-पीएमकेएसवाई 2.0) मृदा और जल संरक्षण, वर्षा जल संचयन, भूजल पुनर्भरण, निम्नीकृत भूमि के पुनरुद्धार और प्राकृतिक संसाधनों के स्थायी प्रबंधन के माध्यम से एकीकृत जलसंभर प्रबंधन को बढ़ावा देता है।

इसके अलावा, आईसीएआर मृदा परीक्षण आधारित संतुलित और एकीकृत पोषक तत्व प्रबंधन (आईएनएम), मृदा परीक्षण फसल प्रतिक्रिया (एसटीसीआर) आधारित सामान्य उर्वरक सिफारिशों, और स्थान-विशिष्ट पोषक तत्वों की सिफारिशों के साथ सूक्ष्म पोषक तत्वों की मैपिंग के माध्यम से मृदा स्वास्थ्य प्रबंधन को बढ़ावा देता है। परिषद ने समय पर मृदा उर्वरता आकलन और स्थल-विशिष्ट पोषक तत्व प्रबंधन की सुविधा के लिए त्वरित और कुशल मृदा परीक्षण किट और डिजिटल निर्णय-समर्थन (डिसिजन सपोर्ट) उपकरण विकसित किए हैं। इन तकनीकों का प्रसार कृषि विज्ञान केंद्रों (केवीके), फ्रंटलाइन प्रदर्शनों और किसान क्षमता-निर्माण कार्यक्रमों के माध्यम से संतुलित उर्वरक को बढ़ावा देने, पोषक तत्वों के उपयोग की दक्षता में सुधार करने और मृदा के स्वास्थ्य को बनाए रखने के लिए किया जाता है।

सरकार भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) के नेतृत्व में अनुसंधानप्रौद्योगिकी विकास और खेत प्रदर्शनों के माध्यम से दीर्घकालिक जल सुरक्षा और जलवायु अनुकूल कृषि को बढ़ावा दे रही है। इन पहलों में वर्षा जल संचयनखेत तालाबों और अन्य सतही जल भंडारण संरचनाओं का निर्माणभूजल पुनर्भरणसतही और भूजल का संयुक्त उपयोगसंचित जल का बहु-उपयोगयथास्थान नमी संरक्षणसंरक्षण कृषियथास्थान नमी संरक्षणसुरक्षात्मक सिंचाईसूक्ष्म सिंचाईऔर एआई- सेंसर- और मौसम आधारित सिंचाई शेड्यूलिंगऔर जल-उपयोग दक्षता और जलवायु अनुकूलन में सुधार के लिए सलाहकार प्रणालियाँऔर जल-गहन फसलों से दलहनोंतिलहनोंमक्का और कृषि वानिकी में फसल विविधीकरण शामिल हैं। आईसीएआर कृषि विज्ञान केंद्रों (केवीके) और राज्य विस्तार एजेंसियों के माध्यम से किसान प्रशिक्षणफ्रंटलाइन प्रदर्शनों द्वारा सूक्ष्म सिंचाईसीधे बुवाई वाले चावल (डीएसआर)धान के गहनता प्रणाली (एसआरआई)वैकल्पिक भिगोना (नमी) और सुखाना (एडब्ल्यूडी)उठी हुई-क्यारी रोपणलेजर भूमि समतलीकरणमल्चिंगस्प्रिंकलर और ड्रिप सिंचाई और जलवायु-अनुकूलजल-कुशल फसल किस्मों को भी बढ़ावा देता है।

सरकार प्रमुख सरकारी स्कीमों द्वारा पूरित अनुसंधानप्रौद्योगिकी विकास और फील्ड-स्तरीय हस्तक्षेपों के माध्यम से जलवायु की अस्थिरता के प्रति भारतीय कृषि की अनुकूलन क्षमता को मजबूत कर रही है। जलवायु अनुकूल कृषि में राष्ट्रीय नवाचार (एनआईसीआरए) के तहतआईसीएआर सूखाबाढ़लवणता और गर्मी के तनाव के प्रति सहनशील जलवायु अनुकूल फसल किस्मों को बढ़ावा देती है। यह 151 अति संवेदनशील जिलों में जलवायु अनुकूल गांवों (सीआरवी)651 जिलों के लिए तैयार किए गए जिला कृषि आकस्मिकता योजनाओं के साथ साथ मौसम आधारित कृषि-परामर्श और कृषि विज्ञान केंद्रों (केवीके) के माध्यम से किसान क्षमता निर्माण को बढ़ावा देता है। इन पहलों को राष्ट्रीय सतत कृषि मिशन (एनएमएसए)प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना (पीएमकेएसवाई) – प्रति बूंद अधिक फसल (पीडीएमसी)पीएमकेएसवाई का वाटरशेड विकास घटक (डब्ल्यूडीसी-पीएमकेएसवाई 2.0) और प्रधानमंत्री धन-धान्य कृषि योजना (पीएम-डीडीकेवाई) जैसी सरकारी योजनाओं के माध्यम से सहयोग दिया जाता हैजो जलवायु परिवर्तन के प्रति अनुकूलन में सुधार करते हैं और पर्यावरण की दृष्टि से टिकाऊ कृषि पद्धतियों का समर्थन करते हैं।

कृषि एवं किसान कल्‍याण राज्‍य मंत्री श्री भागीरथ चौधरी ने लोक सभा में एक लिखित उत्तर में यह जानकारी दी।

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