अनिता चौधरी
राजनीतिक संपादक

2020 की शुरुआत हो चुकी है और अगर बात करें इसके पहले दिन की तो कश्मीर से खबर सकून भरी थी । सीमा सहित वहां जहां चतुर्दिक शान्ति रही वहीं कश्मीर में दूरसंचार में भी ढील देते हुए सरकार ने मोबाइल सेवा में एसएमएस सुविधा तकरीबन 5 महीने बाद बहाल कर दी । साथ ही अस्पताल जैसी तत्काल सेवा के लिए
इंटरनेट सुविधा में भी ढील दे दी गयी । कश्मीर से धारा 370 हटाने के बाद सरकार की तरफ से मोबाइल सुविधा को लेकर बेहद अहम कदम है ,जिसको लेकर आये दिन विपक्ष हमला कर रहा था।

गौरतलब है कि भाजपा की मोदी सरकार ने अपने दूसरे कार्यकाल में संसद के पहले सत्र में कश्मीर पर कड़ा फैसला लेते हुए 5 अगस्त 2019 को पूरे राज्य से धारा 370 हटा दी थी । साथ ही सरकार ने कश्मीर को दो राज्यों जम्मू-कश्मीर और लदाख में बांटते हुए यूनियन टेरेटरी का दर्जा दे दिया था । सरकार के इस फैसले के बाद से ही कश्मीर में मोबाइल सुविधा बंद थी ।

बीते 2019 की अगर बात करें तो मोदी सरकार के लिए वह उपलब्धियों से भरा रहा तो वहीं साल 2020 में बीजेपी सरकार को तमाम चुनौतियों से दो चार होना पड़ेगा । साल 2019 में ही लोकसभा चुनाव हुए थे और तमाम विरोधी गठबंधन की एकजुटाता और विरोध के बावज़ूद बीजेपी अपने दम पर 303 सीटों के प्रचंड बहुमत के साथ लोकसभा मे च आयी और सरकार बनाई । भाजपा की विजयगाथा टैब से ही शुरू हो गयी थी । 26 फरवरी 2019 को मोदी सरकार का पहला टर्म जब अपने अंतिम चरण पर था तब आतंकवाद के खिलाफ भारत ने पाकिस्तान पर बड़ी करवाई की और भारतीय वायुसेना ने पाकिस्तान के बालाकोट पर हवाई हमला करते हुए कई आतंकी ठिकानों को नष्ट कर दिया । इस हवाई हमले को कश्मीर के पुलवामा में सीआरपीएफ पर हुए हमले का बदला भी माना जाता है । इस दौरान पाकिस्तान और भारत के वायुसेना की बीच एक टग ऑफ वॉर जैसी स्थिति होगयी थी और इस रस्साकसी भरे शीत युद्ध जैसे माहौल में भारतीय वायुसेना का एक जाबाज़ विंग कमांडर अभिनंदन पाकिस्तान के चंगुल में फंस गया लेकिन भारत ने ब।पूरी सूझ-बूझ के साथ सही सलामत एक मार्च को विंग कमांडर अभीनंदन को भारत वापस लाने में अहम सफलता प्राप्त की । 30 मई को अपनी दूसरी पारी खेलने के लिए भाजपा की मोदी सरकार ने अपने 303 चुने हुए लोकसभा सांसदों के साथ शपथ ग्रहण की । शपथ लेने के ठीक दो महीने बाद दूसरी पारी के संसद के पहले सदन के दौरान ही दोनों सदनों से ट्रिपल तलाक़ बिल पास हुआ । और इसी सेशन में कश्मीर में स्थिरता लाने के लिए मोदी सरकार की तरफ से एक बेहद यहां और ऐतिहासिक फैसला लिया गया कश्मीर से धारा 370 हटाने का । इस फैसले से पूरा देश चकित था और विपक्ष सदमें में । यही नही कश्मीर का दो राज्यों में विभाजन हुआ जम्मू-कश्मीर और लद्धाख औए दोनों केन्द शासित प्रदेश बने । कश्मीर में तकरीबन 3 महीने तक फोन सेवा बंद रही, 5 महीने तक एसएमएस और नेट सेवा । मोबाइल में एसएमएस और नेट सेवा 5 महीने बाद 1 जनवरी 2020 को फिर से एक बार चालू की गयी ।

22 सितंबर को अमेरिका में प्रधानमंत्री मोदी के howadi मोदी कार्यक्रम के दौरान पूरी दुनिया ने भारत की ताकत देखी । 4 नवम्बर को देश के किसानों और उद्यमियों के हित को ध्यान में रखते हुए भारत ने विश्वपटल पर एक बार फिर अपना कड़ा रुख दिखाया और RCEP से खुद को किनारे किया । 2019 में ही मोदी सरकार के कार्यकाल के दौरान 9 नवम्बर को देश की उच्चतम न्यायालय ने अहम फैसला दिया, । ये फैसला अयोध्याय रामजन्मभूमि के पक्ष में था । 4 दिसंबर को दिल्लीवासियों के के हित में अहम फैसला लेते हुए केंद्र की मोदी सरकार ने अनिधिकृत कॉलोनियों को वैध किया और 40 लाख गरीब लोगों को घर का मालिकाना हक़ दिया । दिसंबर में ही 20 साल से सेना में चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ के नियुक्ति को हरि झंडी दी और जनरल बिपिन रावत के रूप में देश को पहला सीडीएस मिला ।

लेकिन 11 दिसंबर को नागरिकता संसोधन कानून लेकर मोदी सरकार आयी । हालांकि ये बिल दोनों सदनों से पास हो गया लेकिन इस बिल को लेकर पूरा देश जल उठा । भारत का अल्पसंख्यक समुदाय इस बिल के विरोध में सड़क पर उतर आया । इनके विरोध प्रदर्शन को विपक्ष खासकर , दिल्ली की आम आदमी पार्टी और कांग्रेस का साथ मिला और धीरे-धीरे ये विरोध प्रदर्शन हिंसक रूप धारण कर बैठा जिसमें आम जनता और पुलिस कर्मी की फजीहत हुई। हालांकि विरोध की गूंज अभी धीमी पड़ गयी है लेकिन राजनीतिक फायदे को देखते हुए फिलहाल इस विरोध की रफ्तार ही कम हुई है येह थमा या बंद नहीं हुआ । इस बिल की आड़ में सत्तापक्ष से लेकर विपक्ष सभी ने येसी राजनीतिक रोटी सेंकी कि सामाजिक तौर पर धार्मिक दरार सी दिखने लगी ।

मोदी सरकार अपने दूसरे कार्यकाल में बीजेपी के मूल एजेंडे को अमलीजामा पहनाने में भी कामयाब रही है। लेकिन आर्थिक मोर्चे पर सुस्ती छाई राही तो सीएए और एनआरसी को लेकर देश के कई हिस्सों में विरोध प्रदर्शन जारी है। ऐसे में माना यही जा रहा है की साल 2019 जहां मोदी सरकार के लिए कामयाब बनाने वाला रहा वहीं साल 2020 नरेंद्र मोदी के लिए चुनौती भरा होगा।

सियासी जंग जीतने की चुनौतियां

बीजेपी भले ही 2019 का लोकसभा चुनाव जीतने में कामयाब रही हो, लेकिन राज्य में हुए विधानसभा चुनाव में उसकी राह आसान नहीं रही है। कांग्रेस के साथ मिलकर क्षेत्रीय दल महाराष्ट्र और झारखंड जैसे राज्य की सत्ता से बीजेपी को बेदखल करने में कामयाब रहे हैं। ऐसे में साल 2020 में दिल्ली और बिहार जैसे महत्वपूर्ण राज्य में विधानसभा चुनाव होने हैं, जहां पार्टी को जिताने की जिम्मेदारी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के कंधों पर होगी।

दिल्ली में अरविंद केजरीवाल को मात देकर वहां 20 साल के सत्ता के वनवास को खत्म करना बीजेपी के बड़ी चुनौती है तो बिहार में आरजेडी-कांग्रेस की जोड़ी नीतीश कुमार के सामने कड़ा मुकाबला पेश कर रही है हाल में हुए विधानसभा चुनाव में जिस तरह से बीजेपी को हार मिली है, ऐसे में उसका सियासी असर बिहार और दिल्ली के चुनाव पर भी पड़ सकता है.

अल्पसंख्यकों का विश्वास जीतने की चुनौती

नागरिकता संशोधन कानून (सीएए) और एनआरसी को लेकर अल्पसंख्यक समुदाय खासकर मुस्लिम देश के कई शहरों में सड़क पर उतर विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं । हालांकि इस कानून से देश के किसी भी मुसलमान पर कोई असर नहीं पड़ेगा। जम्मू-कश्मीर को स्पेशल दर्जा देने वाले अनुच्छेद 370 को मोदी सरकार ने हटा दिया, लेकिन अभी भी वहां पर स्थिति सामान्य नहीं हुई है। घाटी के सैकड़ों राजनीतिक और सामाजिक नेता नजरबंद हैं। ऐसे में जम्मू-कश्मीर से लेकर देश के बाकी हिस्से में अल्पसंख्यक समुदाय के विश्वास को जीतने की मोदी सरकार के सामने बड़ी चुनौती है.

अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने की चुनौती

देश की अर्थव्यवस्था में सुस्ती की वजह से सरकार का राजकोषीय घाटा बढ़ा है। इससे देश की आर्थिक स्थिति डगमगाई हुई है, जिसका असर नौकरियों से लेकर व्यवसाय तक पर पड़ रहा है। सुस्त अर्थव्यवस्था की रफ्तार बढ़ाने की तमाम कोशिशों के बावजूद नरेंद्र मोदी सरकार को साल 2019 में बहुत सफलता नहीं मिली है।

देश की आर्थिक व्यवस्था को पटरी पर लाने, रफ्तार देने और उच्च विकास-दर हासिल करने के लिए मोदी सरकार को कई मोर्चों पर काम करने की चुनौती होगी। आरबीआई के अनुमान के मुताबिक जनवरी से मार्च 2020 तक खाने-पीने की वस्तुओं पर महंगाई बढ़ेगी। अगर मंहगाई बढ़ती है तो जाहिर सी बात है मांग प्रभावित होगी । ऐसे में देश की अर्थव्यवस्था को रफ्तार देना सरकार के लिए आसान नहीं होगा।

एनडीए को एकजुट रखने का चैलेंज

बीजेपी के नेतृत्व वाले एनडीए की सबसे पुरानी सहयोगी शिवसेना महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव के बाद नाता तोड़कर अलग हो गई है। शिवसेना एनडीए से अलग होने के साथ-साथ कांग्रेस के नेतृत्व वाले यूपीए कुनबे में जुड़ गई है। बीजेपी के लिए शिवेसना का एनडीए से अलग होना किसी बड़े झटके से कम नहीं है। ऐसे ही झारखंड में बीजेपी की सहयोगी आजसू के साथ सीट शेयरिंग पर सहमति न बन पाने पर दोनों की सियासी राह अलग हो गई है।

इसका राजनीतिक असर बीजेपी पर साफ पड़ा है और महाराष्ट्र और झारखंड दोनों जगह उसे सत्ता गवांनी पड़ी है। ऐसे में बीजेपी के बनने वाले नए अध्यक्ष और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सामने साल 2020 में एनडीए के कुनबे को जोड़कर रखने की चुनौती है। खासकर बिहार में बीजेपी को जेडीयू के साथ बेहतर तालमेल बनाकर रखना होगा क्योंकि साल के आखिरी में वहां पर विधानसभा चुनाव होने हैं। बीजेपी ने 2015 में जेडीयू से अलग होकर सियासी खामियाजा भुगत चुकी है।

पड़ोसी देशों से बेहतर तालमेल

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सामने देश के अंदर ही नहीं बल्कि बाहरी चुनौतियां से भी पार पाना होगा। पीएम मोदी के सामने सबसे बड़ी चुनौती पड़ोसी देशों के साथ बेहतर तालमेल बनाए रखने की है। पाकिस्तान के मामले में भारत के लिए अब भी यह चुनौती है कि किस तरह से आतंकवाद और बातचीत साथ-साथ न होने के अपने रुख पर कायम रहते हुए उससे रिश्तों को सामान्य बनाया जाए। इसके अलावा नेपाल, बांग्लादेश जैसे BIMSTEC देशों से रिश्ते मजबूत करने की चुनौती है, जहां चीन का पहले से प्रभाव बन गया है। हमारे पड़ोस में चीन जैसा देश है जो अपनी आक्रामक सामरिक नीति की वजह से हमेशा मुश्किल खड़ा करता रहा है। चीन के साथ हमारे कई अनसुलझे मसले हैं. ऐसे में साल 2020 में पीएम मोदी के सामने पड़ोसी देशों में चीन के प्रभाव को कम कर उनके विश्वास को जीतने की चुनौती होगी।

राज्यस्तरीय सत्ता में और मज़बूती और राजनीति में विपक्ष विरोधियों और जनता पर अपना दबदबा कायम रखने के लिए बीजेपी शीर्ष की निगाहें फिलहाल दिल्ली चुनाव पर हैं लेकिन दिल्ली की रेस में अरविंद केजरीवाल आगे चल रहे हैं । इसी साल के अंत में बिहार में चुनाव होना है मगर जेडीयू के लिए प्रशांत किशोर अभी से तीखे तेवर दिखा रहे हैं । ऐसे में देखना ये होगा कि आखिर इस चुनौतियों से मोदी और शाह की सरकार कैसे निबटते हुए निकलती है या राजनीति की रस्साकसी में मुद्दे पीछे रहेंगे और राजनीतिक खिचड़ी एक नई कहानी रचेगी ।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here