पदम पति शर्मा

याद आती है जून 2011 मे स्वामी रामदेव के रामलीला मैदान के आन्दोलन की। तत्कालीन सरकार ने प्रणव दा सहित पांच पांच मंत्री हवाई अड्डे पर भेजे थे। स्वामी रामदेव ने शर्त रखी जो मंजूर नहीं हुई और यूपीए सरकार की पुलिस ने मीडिया के सामने आधी रात के बाद सोए प्रदर्शनकारियों को मार मार कर भगाया और रामलीला मैदान से पूरा डेरा तम्बू उखाड दिया। कहा जाता है कि अगर रामदेव भेष बदल कर भागे न होते तो शायद उनकी हत्या हो जाती। यह बात सही है या गलत यह तो नहीं जानता लेकिन इसमे संदेह नहीं कि सोनिया गांधी के रिमोट से चलने वाली यूपीए सरकार ने तब एक तर्कसंगत आन्दोलन को मटियामेट करने मे 24 घंटे से भी कम का समय लिया था।

लज्जा आती है सीएए- एनआरसी के नाम पर शाहीन बाग मे लंबे सडक एक फर्जी धरना प्रदर्शन को चलते देख कर जिसके 69 दिन बीत चुके हैं । लेकिन खुद को राष्ट्रवादी सोच का दावा करने वाली नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में एनडीए सरकार हाथ पर हाथ धरे बैठी है। देश तोडने और गृह युद्ध को उकसावा देने वाले देश विरोधी मुस्लिम जमात के झंडाबरदार बच्चों और महिलाओं को ढाल बना कर शाहीन बाग मे जो कुकृत्य कर रहे हैं, जिस तरह से कार्यपालिका और न्यायपालिका को चुनौती दी जा रही है, सरकार क्यों मूक दर्शक बनी हुई है? हालाकि सेर को सवा सेर देने के लिए सुनाम पीएम मोदी को देर सबेर जगना है। मगर डर है कि कहीं हद से ज्यादा देर न हो जाय।

सुप्रीम कोर्ट ने संजय हेगड़े और साधना रामचंद्रन को बतौर वार्ताकार शाहीन बाग भेजा इस हिदायत के साथ कि धरने पर बैठी महिलाओं को शाहीन बाग से हट कर किसी अन्य स्थान पर धरना करने के लिए वे समझाए। सोमवार तक अगर वार्ताकार सफल नहीं होते हैं तब हम देखेंगे क्या करना है।

हठधर्मिता की सीमा तोड दी है शाहीन बाग ने। कहा जा रहा है सीएए कानून जब तक निरस्त नही किया जाएगा, एनआरसी नहीं लाने का लिखित सरकार की ऑर से वादा नहीं किया जाएगा और जिन पर मुकदमा चलाया गया है उन पर से केस हटा नहीं लिया जाता है तब तक हम नहीं हटेगे चाहे गोली क्यों न मार दी जाय।

जो संसद के दोनो सदनों से पालित होकर कानून बन चुका है उस सीएए को संसद ही निरस्त कर सकती है जो नहीं करने जा रही। प्रदर्शनकारी भी इस हकीकत से वाकिफ है कि इससे किसी की नागरिकता नहीं जानी है । लेकिन पर्दे के पीछे जो लोग हैं उनकी मंशा कुछ और ही है।

ताज्जुब है कि विभिन्न मंचों से वहाबी और गजबा-ए- हिन्द की घटिया सोच वाले जिस गंदी जुबान का इस्तेमाल कर रहे हैं, वह वास्तव मे देश विरोधी है और जिसे सुन कर सच्चे भारतीय का खून खुल उठता है। लेकिन प्रतिकार के नाम पर निल बटा सन्नाटा ही अभी तक नजर आया है।

आश्चर्य तो यह देख कर है कि सदस्य संख्या के लिहाज से दुनिया की नंबर एक पार्टी होने का दावा करने वाली भाजपा के पास दस हजार महिला कार्यकर्ता नहीं जो सीएए के समर्थन मे शाहीन बाग के सामने की पट्टी पर ढोल मजीरे के साथ सीताराम का अहर्निश जाप करें । दूसरे, सरकार को भी सोचना होगा कि अब समय आ गया है 2011 के रामलीला कांड को दोहराने का। दबने से काम चलने वाला नहीं है

चार दौर की वार्ता में भी कोई नतीजा निकल कर सामने नहीं आया। तीन दिन की बातचीत बेनतीजा निकलने के बाद चौथे दिन यानी आज वार्ताकार साधना रामचंद्रन शाहीन बाग में पहुंचीं और प्रदर्शनकारी महिलाओं से बातचीत की। लेकिन वे अडी हुई हैं। इन्तजार सोमवार का है जब सुप्रीम कोर्ट को दोनो वार्ताकार अपनी रिपोर्ट सौपेगे। कोर्ट की ये प्रदर्शनकारी अवमानना कर चुकी हैं यह जानते हुए भी कि सीएए केस की सुप्रीम सुनवाई होनी बाकी है। देखना है कि ऊट किस करवट बैठता है। अपन का तो यही मानना है कि शाहीन बाग के षड्यंत्रकारियो की नकाब नोच कर उनकी ‘कायदे’ से खबर ली जाय। क्योकि लातो के भूत बातों से मानने वाले नहीं है।

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