पेंगॉन्ग लेक का इतिहास

अनिता चौधरी
राजनीतिक संपादक

पैंगोंग सो झील 14,270 फीट यानी 4,350 मीटर ऊंचाई पर स्थित है। पेंगोंग झील या पेंगोंग त्सो लद्दाख में भारत-चीन सीमा क्षेत्र में स्थित है। यह 134 किलोमीटर लंबी है और 6 किलोमीटर चौड़ी लेक है और लद्दाख से तिब्बत तक फैली हुई है । इस झील का 45 किलोमीटर क्षेत्र भारत के हिस्से में है और 90 किलोमीटर चीन के कब्जे में। वास्तविक नियंत्रण रेखा इस झील के मध्य से होकर गुजरती है । जाड़ों में यहां तापमान शून्य के बहुत नीचे चला जाता है। इस वजह से यह झील जम जाती है। लेक के लगभग एक तिहाई हिस्से पर चीन का कब्जा है। जिसके चलते यहां चौबीसों घंटे आर्मी का जमावड़ा रहता है। अक्सर भारतीय और चाइनीज आर्मी के बीच झड़पें भी होती रहती हैं। भारतीय सेना मोटरबोट से लेक में गश्त करती रहती है। सन् 1684 में लद्दाख तथा तिब्बत के बीच तिंगमोसमांग की संधि हुई थी जिसके अनुसार यह झील लद्दाख तथा तिब्बत के बीच सीमा रेखा का कार्य करती थी। यह संधि लद्दाख के तत्कालीन राजा देलदान नामग्याल तथा तिब्बत के रीजेंट के बीच खलसी के बीच हुई थी। तब इस झील को दो देशों के बीच सीमा के रूप में स्वीकार किया गया था। लेकिन, अब इस पर भारत और चीन का नियंत्रण है।

अनिता चौधरी पेन्गान्ग लेक के पास

19वीं शताब्दी के मध्य में यह झील जॉनसन रेखा के दक्षिणी छोर पर थी। जॉनसन रेखा अक्साई चीन क्षेत्र में भारत और चीन के बीच सीमा निर्धारण का एक प्रारंभिक प्रयास था।
यहां सामान्य तौर पर जब दोनों देशों के गश्ती दल आमने-सामने आते हैं तो एक “बैनर ड्रिल” (Banner Drill) का प्रदर्शन करते हैं जिसमें एक बैनर प्रदर्शित करते हुए दूसरे पक्ष से अपना क्षेत्र खाली करने के लिये कहा जाता है।

रणनीतिक महत्त्व

LAC रेखा झील के मध्य से होकर गुजरती है, लेकिन भारत और चीन इसकी सटीक स्थिति के विषय में सहमत नहीं हैं।
इस झील का 45 किमी. लंबा पश्चिमी भाग भारतीय नियंत्रण में, जबकि शेष चीन के नियंत्रण में है।

दोनों सेनाओं के बीच अधिकांश झड़पें झील के विवादित हिस्से में होती हैं। हालाँकि इसके इतर झील का कोई विशेष सामरिक महत्त्व नहीं है। लेकिन यह झील चुशूल घाटी के मार्ग में आती है, यह एक मुख्य मार्ग है जिसका चीन द्वारा भारतीय-अधिकृत क्षेत्र में आक्रमण के लिये उपयोग किया जा सकता है।

वर्ष 1962 के युद्ध के दौरान यही वह स्थान था जहाँ से चीन ने अपना मुख्य आक्रमण शुरू किया था, भारतीय सेना ने चुशूल घाटी (Chushul Valley) के दक्षिण-पूर्वी छोर के पहाड़ी दर्रे रेज़ांग ला (Rezang La) से वीरतापूर्वक युद्ध लड़ा था।

रेज़ांग ला
(Rezang La
)

यह केंद्रशासित प्रदेश लद्दाख क्षेत्र में चुशूल घाटी के दक्षिण-पूर्व में स्थित एक पहाड़ी दर्रा है।
इसकी लंबाई लगभग 2.7 किमी., चौड़ाई 1.8 किमी. और ऊँचाई 16000 फुट है।
वर्ष 1962 के भारत-चीन युद्ध में रेज़ांग ला कुमाऊँ रेजिमेंट के 13 कुमाऊँ दस्ते का अंतिम मोरचा था। इस दस्ते का नेतृत्व मेजर शैतान सिंह ने किया था। इस युद्ध को ‘रेज़ांग ला का युद्ध’ नाम से जाना जाता है।
पिछले कुछ वर्षों में चीनियों ने पैंगोंग त्सो के अपनी ओर के किनारों पर सड़कों का निर्माण भी किया है।
चीन के निंग्ज़िया हुई (Ningxia Hui) स्वायत्त क्षेत्र की राजधानी यिनचुआन (Yinchuan) के दक्षिण-पश्चिम में मिनिंगज़ेन (Minningzhen) में PLA के हुआंगयांगटन (Huangyangtan) बेस में अक्साई चीन (भारत और चीन के मध्य विवादित क्षेत्र) में इस विवादित क्षेत्र का एक दो-स्तरीय मॉडल भी मौजूद है। यह चीन के लिये इस क्षेत्र के महत्त्व को स्पष्ट रूप से इंगित करता है।

चुशूल घाटी
(Chushul valley)

चुशूल केंद्रशासित प्रदेश लद्दाख के लेह ज़िले में समुद्र तल से 4,300 मीटर या 15,000 फीट की ऊँचाई पर स्थित एक गाँव है।
यह चुशूल घाटी में अवस्थित है।
चुशूल घाटी रेज़ांग ला (दर्रा) और पांगोंग त्सो (झील) के पास स्थित है।

क्षेत्र में विवाद

वर्ष 1999 में जब ऑपरेशन विजय के लिये इस क्षेत्र से सेना की टुकड़ी को कारगिल के लिये रवाना किया गया, तो चीन को भारतीय क्षेत्र के अंदर 5 किमी. तक सड़क बनाने का अवसर मिल गया। यह स्पष्ट रूप से चीन की आक्रामकता को इंगित करता है।
वर्ष 1999 में चीन द्वारा निर्मित सड़क इस क्षेत्र को चीन के व्यापक सड़क नेटवर्क से जोड़ती है, यह G219 काराकोरम राजमार्ग से भी जुड़ती है।
इन सड़कों के माध्यम से चीन की स्थिति भौगोलिक रूप से पैंगोंग झील के उत्तरी सिरे पर स्थित भारतीय स्थानों की उपेक्षा अधिक मज़बूत बनी हुई है।
झील के उत्तरी किनारे पर उपस्थित पहाड़ यहाँ एक प्रमुख भूमिका निभाते हैं, जिसे सेना “फिंगर्स” (Fingers) के नाम से संबोधित करती है। भारत का दावा है कि LAC फिंगर 8 से जुड़ी है।

कहां है गलवां घाटी?

गलवां घाटी सामान्यतः उस भूमि को संदर्भित करती है, जो गलवां नदी के पास मौजूद पहाड़ियों के बीच स्थित है।गलवां नदी का स्रोत चीन की ओर अक्साई चीन में मौजूद है और आगे चल कर यह भारत की श्योक नदी से मिलती है। गौरतलब है कि यह घाटी पश्चिम में लद्दाख और पूर्व में अक्साई चीन के बीच स्थित है, जिसके कारण यह रणनीतिक रूप से काफी महत्त्वपूर्ण है।
इसका पूर्वी हिस्सा चीन के झिंजियांग तिब्बत मार्ग से काफी नजदीक है, जिसे जीG219 राजमार्ग कहा
इस क्षेत्र में खर्नाक किला है जो इस झील के उत्तरी किनारे पर स्थित है। यह किला अब चीन के नियंत्रण में है। 20 अक्तूबर, 1962 के भारत-चीन युद्ध के दौरान चीनी सेना ने यहां सैन्य कार्रवाई की थी।
पूर्व में इस झील से श्याक नदी (सिंधु नदी की एक सहायक नदी) निकलती थी लेकिन प्राकृतिक बांध के कारण यह बंद हो गई है।

वास्तविक नियंत्रण रेखा को लेकर दशकों से चला आ रहा विवाद।

चीन के विदेश मंत्रालय ने दावा किया था कि संपूर्ण गलवां घाटी ‘वास्तविक नियंत्रण रेखा’ के चीनी पक्ष पर स्थित है और इसलिए यह चीन का हिस्सा है। वहीं भारत ने चीन के इस दावे को अतिरंजित और असमर्थनीय बताया है।

चीन का हठ

उल्लेखनीय है कि वास्तविक नियंत्रण रेखा गलवां घाटी और श्योक नदियों के संगम के पूर्व में स्थित है, जिस पर भारत और चीन दोनों हाल के वर्षों में पेट्रोलिंग कर रहे हैं।
15 जून 2020 को हुई हिंसक झड़प के बाद चीन ने दावा किया है कि संपूर्ण गलवां घाटी चीन के नियंत्रण क्षेत्र में आती है।
गौरतलब है कि बीते महीनों से चीन गलवां घाटी और श्योक नदी के संगम तथा वास्तविक नियंत्रण रेखा के बीच के क्षेत्र में भारत की सड़क निर्माण गतिविधियों पर आपत्ति जता रहा है। भारत ने चीन के दावे को सिरे से खारिज कर दिया है।
चीन के लगभग सभी मानचित्रों में संपूर्ण गलवां घाटी को चीन के नियंत्रण वाले क्षेत्र का हिस्सा दिखा जाता है।
गौरतलब है कि वर्ष 1956 का मानचित्र संपूर्ण गलवां घाटी को भारत के एक हिस्से के रूप में प्रदर्शित करता है, हालांकि जून 1960 में चीन ने गलवां घाटी पर अपनी संप्रभुता का दावा करते हुए एक नया मानचित्र प्रस्तुत प्रस्तुत किया, जिसमें गलवां घाटी को चीन के हिस्से के रूप में दिखाया गया था।
इसके बाद नवंबर 1962 में भी एक नया मानचित्र जारी किया गया था, जिसमें संपूर्ण गलवां घाटी पर दावा प्रस्तुत किया गया था। लेकिन इसके बाद चीन की सरकार द्वारा जारी किए गए नक्शों में गलवां नदी के पश्चिमी सिरे को चीन के हिस्से के रूप में नहीं दिखाया गया।