डा रजनीकांत दत्ता
पूर्व काग्रेसी विधायक

भारत में बहुदलीय संसदीय प्रजातंत्र है। जिसकी कार्यप्रणाली संविधान में वर्णित नियमों के अनुसार संचालित होती है और उसके लिए निर्वाचन आयोग हर पांचवें वर्ष ग्राम पंचायत से लेकर विधानसभा,लोकसभा एवं राज्यसभा के प्रतिनिधियों का चुनाव करता है।इस चुनाव में वे ही वयस्क भारतीय नागरिक हिस्सा ले सकते हैं,जिनका नियमानुसार पंजीकरण कर वोटर आईडेंटिटी कार्ड जारी किया गया हो।यही नहीं डायरेक्ट, इनडायरेक्ट टैक्स जमा करने के लिए भी पैन कार्ड बनाना होता है और समुचित जानकारी लेने के बाद रजिस्ट्रेशन भी कराना होगा।भारत की बाह्य और आंतरिक सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए बच्चों से लेकर वृद्ध तक बायोमेट्रिक पहचान वाला सभी अर्हताओं को पूरा करते हुए आधार कार्ड भी बना दिया गया है।

हर पांचवे साल विकास की योजना बनाने के और हर दसवें साल उसका मूल्यांकन करने के लिए यह जानना आवश्यक है कि देश की आबादी और उस आबादी की क्षमताएँ क्या क्या है ? इसके लिए पूरे देश में यह निश्चित करना आवश्यक है कि परिवार जो देश की सबसे छोटी इकाई है, वे इसके प्रामाणिक नागरिक हैं या नहीं है।है तो कितने हैं और उनकी क्षमताएं और सामाजिक स्तर क्या है।इसलिए हर साल पूरे देश में प्रमाणित जनसंख्या रजिस्टर बनाया जाता है।

1947 में अल्पसंख्यक मुसलमानों की जिद पर देश का बंटवारा हुआ और एक इस्लामिक राष्ट्र पूर्वी और पश्चिमी पाकिस्तान बन गया। दूसरा धर्मनिरपेक्ष समाजवादी भारतीय गणतंत्र बना।शायद आप नहीं जानते होंगे अगर बंटवारे के पूर्व मोहम्मद अली जिन्ना को अविभाजित भारत का प्रधानमंत्री घोषित कर दिया होता तो ऐसा ना होता। गांधीजी तो इसके लिए तैयार भी थे। लेकिन नेहरू की जिद के कारण यह मिशन पूरा न हो सका और देश बट गया।

फलस्वरुप इस बंटवारे में अधिकांश अल्पसंख्यक पाकिस्तान से हिंदुस्तान आए जिनमें हिंदू,सिख,ईसाई आदि थे।लेकिन मुसलमान नहीं और हिंदुस्तान के देशभक्त मुसलमानों को छोड़कर, कुछ कट्टरवादी मुसलमान ही पाकिस्तान गए।

कालांतर में पूर्वी पाकिस्तान ने बंगाली मुसलमानों पर अमानुषिक अत्याचार इन पश्चिमी पाकिस्तान के मुसलमानों ने किया। और 1972 में वह स्वतंत्र बांग्लादेश बन गया।

यही हाल पश्चिमी पाकिस्तान में रहने वाले बलूचिस्तान और सिंध प्रांत के मुसलमानों का भी किया गया। जिनमें से अधिकांश आज भी शरणार्थियों के तरह विभिन्न देशों में रह रहे हैं। अल्पसंख्यकों पर यह अत्याचार वर्तमान पाकिस्तान में इस हद तक बढ़ गया है कि 1947 में जो अल्पसंख्यक जनसंख्या का 22% था और आज वह 2019 में लगभग 2% रह गया है।उनमें से कुछ तो दूसरे देश में शरणार्थियों की तरह बस गए है और जो हिंदू, सिख, ईसाई, पारसी, बलूच, पख्तून सिंध प्रांत से अल्पसंख्यक भारत आए।उनके लिए मानवीय दृष्टिकोण के आधार पर नागरिकता लेने के लिए लोकसभा और राज्यसभा में भारी बहुमत से सिटिजन अमेंडमेंट एक्ट पास कराया गया। संसदीय प्रजातंत्र के अंतर्गत अगर कोई भी बिल बहुमत से लोकसभा और राज्यसभा में पारित होता है तो वह कानून बन जाता है। और यदि 2/3 बहुमत से अपर और लोअर हाउस में नया बिल पारित होता है तो संविधान के वर्णित मूल ढांचे को छोड़, किसी भी धारा को परिवर्तित किया जा सकता है।

अगर इसके खिलाफ असंतोष है,तो कानून के दरवाजे खुले हुए हैं हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट जाया जा सकता है।लेकिन उसे निरस्त करने के लिए कोई भी हिंसक आंदोलन या भ्रामक प्रचार पार्लियामेंट्री डेमोक्रेसी के विपरीत दंडनीय अपराध है।भारत सरकार को अपनी इस नीति पर कि, सबका साथ सबका विकास, की जगह इस सिद्धांत को लागू करना होगा कि उसकी नीतियां केवल देशभक्त प्रमाणित भारतीय नागरिकों के विकास के लिए, उनको विश्वास में लाते हुए होगी और विचारों की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर देश के टुकड़े-टुकड़े करने वाले गैंग,कट्टरवादी धर्मान्ध व्यक्तियों,अर्बन नक्सलाइट्स और बुद्धिजीवियों और दुश्मन देशों के स्लीपर सेल्स के घुसपैठियों को चिन्हित कर,अगर वे भारतीय नागरिक है,तो उन्हें देशद्रोही की तरह कठोरतम दंड दिया जाए और अगर वे घुसपैठिए हैं तो संदेह होने पर उनका डिटेंशन कैंपो में,उन्हें रखा जाए,जब तक कि उनकी वास्तविक नागरिकता चिन्हित न हो जाए और अगर वह भारतीय नागरिक नहीं है,तो उन्हें देश से निकाल बाहर कर दिया जाए।

जय हिंद।
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डा रजनीकांत दत्ता
पूर्व काग्रेसी विधायक

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