बॉम्बे हाईकोर्ट ने एक ऐसे व्यक्ति की अपील को खारिज कर दिया जिसने 2013 में अपनी पत्नी पर हथौड़े से हमला करने के लिए दोषी ठहराया गया था। आपको बता दें कि इस हमले में उसकी मौत हो गई थी। महिला के पति को दस साल की सश्रम कारावास की सजा सुनाई गई थी। सजा काट रहे पति ने कोर्ट से रियात की गुजारिश की।

अपनी सजा में कमी की मांग करते हुए उन्होंने कहा कि उसकी पत्नी ने उसके लिए चाय बनाने से इनकार कर दिया था। इस कारण से वह आवेग में आकर हमला कर दिया था। हालांकि, अदालत ने कहा कि अपनी पत्नी के साथ मारपीट करने के बाद, उसे अस्पताल ले जाने से पहले सबूत नष्ट करने में कीमती समय बर्बाद हुआ। इसलिए सजा में कोई अनहोनी नहीं हुई और इसलिए अपील खारिज की जाती है।

संतोष अटकर को एक जुलाई, 2016 को सजा सुनाई गई थी। उसकी याचिका पर सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति रेवती मोहिते डेरे को वकील सारंग अराध्य द्वारा सूचित किया गया कि संतोष को गैर इरादतन हत्या के लिए दोषी ठहराया गया था, न कि भारतीय दंड संहिता की धारा 304 और 201 के तहत। अराध्य ने कहा कि दोषी व्यक्ति की अतिरिक्त-न्यायिक स्वीकारोक्ति पर आधारित था और ट्रायल कोर्ट ने बेटी की गवाही को खारिज कर दिया था। वह 2013 से आदमी जेल में था। वह पहले ही जेल में सजा काट चुका था, इसलिए सजा को कम करने की अपील की गई ।

19 दिसंबर, 2013 को मृतक महिला के मामा द्वारा दर्ज शिकायत के अनुसार, जब वह विठ्ठल अस्पताल पहुंची, तो उसे पति द्वारा सूचित किया गया कि उसने अपनी पत्नी मनीषा के साथ मारपीट की है। पुलिस जांच में पता चला है कि दंपति अक्सर झगड़ा करते थे।

घटना के दिन, दोनों के बीच उस समय झगड़ा हुआ जब महिला ने उसके लिए चाय बनाने से इनकार कर दिया। इसके बाद उसने हथौड़े से उसके साथ मारपीट की। दोषी पति खून से लथपथ अपनी पत्नी को अस्पताल पहुंचाने के बजाय, पहले उसे नहलाया और खून साफ ​​किया। मारपीट के एक घंटे बाद वह उसे अस्पताल ले गया। दंपति की छह वर्षीय बेटी पूरी घटना की गवाह थी। मारपीट का करण बताने से पहले महिला ने 25 दिसंबर को दम तोड़ दिया।

दोषी पति के वकील की दलील सुनने के बाद न्यायाधीश मोहिते डेरे ने देखा कि बेटी एक प्राकृतिक गवाह थी और बेटी के बयान को दर्ज करने में देरी हुई। घटना के लगभग 11-12 दिनों के बाद बयान दर्ज किया गया। इसलिए इसे परीक्षण के समय अविश्वास नहीं किया जाना चाहिए था। पीठ ने इस तर्क को भी खारिज कर दिया कि हमला गंभीर और अचानक उकसावे का नतीजा था। जज ने कहा कि पत्नी द्वारा चाय नहीं बनाना, किसी भी तरह के उकसावे को बढ़ावा नही दे सकता है।

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