आशीष महर्षि

काशी विश्‍वनाथ कॉरिडोर प्रोजेक्‍ट जब शुरू हुआ था तब पक्‍के महाल को बचाने के लिए जो शख्‍स आगे आए थे, उनमें सबसे आगे वरिष्‍ठ पत्रकार पदमपति शर्मा का नाम था। लेकिन बाद में उन्‍होंने खुद को आंदोलन से अलग कर लिया। उन पर इल्‍जाम लगा कि उन्‍होंने सत्‍ता से मिलकर पूरे आंदोलन को जमींदोज कर दिया। कुछ लोगों ने उन्‍हें पक्‍का महाल के विभिषण तक की संज्ञा दी। 1 जून 2020 को सरस्‍वती फाटक स्थित मां सरस्‍वती की प्रतिमा को हटाया गया तो पदमपति शर्मा का नाम फिर से चर्चा में आ गया। क्‍योंकि आदि शंकराचार्य द्वारा 1205 वर्ष पूर्व स्थापित मां सरस्‍वती की हटाई गई प्रतिमा पदमपति शर्मा के पुश्‍तैनी ज्योतिष कार्यालय के नीचे विराजमान थी। इस भवन को उन्‍होंने मंदिर प्रशासन को दान किया था। मां सरस्‍वती की हटाई गई प्रतिमा और आरोपों को लेकर पदमपति शर्मा से खुलकर बात की गई। पेश है बातचीत के मुख्‍य अंश…

आखिरकार सरस्‍वती मंदिर भी तोड़ दिया गया। क्‍या कहेंगे आप?

पदमपति शर्मा ने बताया कि मां सरस्‍वती की प्रतिमा को दीवाल सहित हटाया गया है। ताकि प्रतिमा को कोई नुकसान न हो। इसके लिए मुझे विशेषतौर से बुलाया गया था। मां की प्रतिमा को मेरी देख रेख में वहां से सुरक्षित हटाकर गोयनका भवन में अन्य मूर्तियों के साथ रखा गया है। आप फोटो में देख भी सकते हैं। वहां दुर्मुख विनायक सहित अन्य मूर्तियों के लिए खासतौर से दो पुजारियों को लगाया गया है, जो सुबह शाम हटाए गए विग्रहों और प्रतिमाओं की पूजा करते हैं। लेकिन माता सरस्वती की मूर्ति की पूजा आरती का जिम्मा कन्हैया यादव और उनके परिवार पर मैने छोड़ रखा है। वही परिवार आगे भी करता रहेगा। श्री काशी विश्वनाथ न्यास की ओर से इसकी अनुमति भी मिल चुकी है। आपकी जानकारी के लिए बता दूं कि सरस्‍वती मंदिर वाले मकान के लिए हमें साठ लाख रूपए मिल रहे थे। लेकिन हमारे परिवार ने इस शर्त पर दान किया था कि इस स्थान पर माँ का भव्य मंदिर बने। स्वयं मुख्यमंत्री ने यह घोषणा भी की थी कि केवल मंदिर ही नहीं बल्कि आचार्य शंकर की प्रतिमा भी वहां स्थापित की जाएगी।

क्‍या फिर से उसी मूल स्‍थान पर मंदिर बनेगा?

पदमपति शर्मा ने कहा, “जो भी बड़े मंदिर जहां खड़े हैं, उन्‍हें कोई नुकसान नहीं पहुंचाया गया है। इनकी संख्‍या 43 से ज्‍यादा है। इनका जीर्णोदार करवाया जाएगा। लेकिन जहां तक सरस्‍वती मंदिर, दुर्मुख विनायक जैसी अधिगृहित मकान के भीतर की प्रतिमाओं का सवाल है तो शासन और मंदिर प्रशासन ने भरोसा दिलाया है कि उन्‍हीं स्‍थानों पर मंदिर बनाए जाएंगे। इसकी पुष्टि काशी विद्वत परिषद ने भी की है।

आदि शंकराचार्य द्वारा स्थापित माता सरस्वती की मूर्ति

आखिर ये 43 बड़े मंदिर कैसे बच गए? इस पर प्रकाश डालिए

पदमपति शर्मा ने कहा, “देखिए शुरूआत में सभी मंदिरों की प्रतिमाओं और विग्रह को संग्रहालय में रखने की बात थी। लेकिन जब 2018 में मेरी मुख्‍यमंत्री मुलाकात हुई तब मैंने सर्किट हाउस मे उनसे कहा कि इन मंदिरों मे विराजमान देवी- देवता कोई पत्थर के विग्रह नहीं हैं। इनकी प्राण प्रतिष्ठा हुई है। ये मंदिर नहीं काशी की विरासत हैं। इनको बचाइए। आप सिर्फ यूपी के सीएम नहीं स्वयं पीठाधीश्वर हैं। इसके बाद मुख्‍यमंत्री ने आश्वासन दिया कि सभी मंदिर संरक्षित किए जाएंगे। मै श्रेय देना चाहूँगा न्यास के सीईओ विशाल सिंह को भी कि जिन्‍होंने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के यहां हुई मीटिंग मे मुख्‍यमंत्री की बात को बल देते हुए पावर प्वाइन्ट प्रेजेन्टेशन मे तमाम मंदिरों को दिखाया। इसके बाद पीएम की मंदिरों को सरक्षित करने पर सहमति की मुहर लग गई। बाबा भोलेनाथ ने मेरी सुन ली। उन मंदिरों के नवीनीकरण का कार्य जल्‍द ही शुरू होने जा रहा है।”

आप पर आरोप लगता है कि आपने अपने घर की कीमत ज्‍यादा लगवाने के लिए पूरे आंदोलन को खत्‍म कर दिया

यह बात पूरी तरह बकवास है। कितना मिला है यह आनलाइन है और आपने भी देखा होगा। मुझे अपने बेटे के बंगले के गृह प्रवेश के लिए अमेरिका जाना था। 2018 में जुलाई से लेकर दिसंबर तक करीब पांच महीने में अमेरिका में ही था। इसी बीच भाइयों और बहन ने मेरे पीछे से अपने हिस्‍से की रजिस्ट्री कर दी। मजबूरी में मुझे दिसंबर में अपने हिस्‍से को देना पड़ा। इसके बदले मुझे करीब 77 लाख रूपए मिले।”

लेकिन लोगों का लगता है कि शासन से मिलकर आपने मकान को करोड़ों में बेच दिया?

ऐसे लोगों को क्‍या कहूं मैं। मिले 77 लाख में मैंने पांच हिस्‍से बांट दिए। दो बेटे, एक बेटी के अलावा एक हिस्‍सा मैंने अपने पास और एक हिस्‍सा पत्‍नी को दिया। इतना ही हम पति-पत्‍नी ने अपने हिस्‍सों को भी अपने पोते-पोतियों के नाम कर दिया। आज आपको एक बात और बता देते हैं। पहली बार यह बात आज सार्वजनिक रूप से कह रहा हूं। रजिस्‍ट्री के अलावा मंदिर ट्रस्‍ट हमारे परिवार को 1.20 करोड़ अलग से दे रहा था। दरअसल हिस्सेदारो के बेटे बेटियों को जिनकी शादी हो चुकी है, प्रति परिवार दस लाख दिए जाते हैं। लेकिन यह सरकारी खजाने से नहीं बल्कि मंदिर को दान और चढ़ावे में मिली राशि से चेक काट कर दिया जाता है जो हमारे परिवार को कुबूल नहीं था। दान लेना हमारी फितरत नहीं है। ऐसे में जो लोग मुझ पर आरोप लगा रहे हैं, वे पहले अपने गिरेबान में झांक लें। क्‍योंकि पक्‍के महाल में बहुत से ऐसे लोग हैं, जिन्‍होंने बाबा के दान को लिया है। शर्म आती है ऐसे दोहरे चरित्र वाले लोगों पर।”

पदमपति आगे कहते हैं कि मैं चुप रहा। अपमान सहता रहा। मेरे सहयोगी, मित्र सभी जानते हैं कि देश के चार बड़े राष्ट्रीय अखबारों के इस खेल प्रभारी की किताब कोरी रही है। किसी का पान ही खाया होगा इसके अलावा कुछ नहीं। अरे मेरे पास तो एक साइकिल भी नहीं है। खेल पत्रकारिता मेरी रोजी-रोटी नहीं एक जुनून था और थी एक दीवानगी। आलोचकों को विश्वनाथ माफ कर दें। यही प्रार्थना है।

निर्विमाणाधीन विश्वनाथ धाम में पदम पति शर्मा ( माला पहने हुए)

बातचीत के अंतिम दौर में पदमपति शर्मा ने बताया कि मां सरस्वती की मूर्ति अत्यंत जागृत है। लगभग 90 वर्ष पहले एक विद्यार्थी लगातार परीक्षा मे फेल होने से इतना दुखी हुआ कि उसने मां सरस्‍वती के सामने अपनी जीभ काट कर चढ़ा दी। तीन दिनों तक भूखा मूर्ति के आगे रास्ते में ही पड़ा रहा। अंत में मंदिर के बगल में स्थित मकान में मां एक महिला में आ गईं। उन्‍होंने हमारे दादा जी भृगु सम्राट ज्योतिष सम्राट पं. गौरी शंकर शास्त्री को बुलवाया। दादा जी उनके आगे हाथ जोड़ कर खड़े रहे। उनसे कहा कि विद्यार्थी के भाग्य मे विद्या नहीं है। उससे बोलो कि लेकिन धन दौलत की कमी नहीं होगी। उस विद्यार्थी की जीभ वापस आ गई और उसने मां की स्तुति की। पिताजी और चाचा लोगों ने बताया था मुझे कि यह घटना तब मित्र प्रकाशन इलाहाबाद की पत्रिका माया मे प्रकाशित हुई थी। जब मै बालक था, तब उस विद्यार्थी को जो एक बुजुर्ग धनवान जमींदार हो चुके थे, घर मे दादा जी के पास बैठे देखा था। साथ में वह काफी फल, मिठाई और अनाज लाए थे।

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