विशेष संवाददाता

लाख कोशिशों के बावजूद भ्रष्टाचार कम होने के बजाय बढ़ता ही जा रहा है। एक रिपोर्ट के मुताबिक, बीते बारह सालों में सड़कों पर घूसखोरी में 120 प्रतिशत बढ़ोतरी हुई है। नेशनल हाईवे पर चलने के लिए केवल व्यावसायिक वाहनों के चालकों से ही रिश्वत के रूप में
प्रत्येक वर्ष औसतन 48000 करोड़ रुपये वसूल लिये जाते हैं।

रिश्वत लेने में स्थानीय पुलिस सबसे आगे, परिवहन विभाग दूसरे नंबर पर

सेव लाइफ़ फाउंडेशन (एसएलएफ) की ओर से शुक्रवार को जारी एक रिपोर्ट से यह खुलासा हुआ है। रिपोर्ट के मुताबिक, घूस लेने में स्थानीय पुलिस सबसे आगे है। परिवहन विभाग दूसरे स्थान पर है, जबकि जागरण और चंदे के नाम पर भी चालकों से वसूली करने वालों की कमी नहीं है।

सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय के अधिकारियों के अनुसार, राष्ट्रीय राजमार्गों पर घूसखोरी को लेकर कोई अध्ययन नहीं किया गया है, लेकिन वित्त वर्ष 2006-07 में ट्रांसपेरेंसी नाम की एजेंसी ने पहली बार व्यावसायिक वाहनों के चालकों से बातचीत के विश्लेषण के बाद अपनी रिपोर्ट में उल्लेख किया था कि भारत में सड़कों पर सालाना 22 हजार करोड़ रुपये घूस वसूली जाती है। मौजूदा समय में यह आंकड़ा बढ़कर 48 हजार करोड़ रुपये हो गया है।

एसएलएफ रिपोर्ट के मुताबिक, चालकों से हर साल सर्वाधिक 22 हजार करोड़ रुपये घूस स्थानीय पुलिस लेती है। दूसरे स्थान पर क्षेत्रीय परिवहन कार्यायल (आरटीओ) के अधिकारी आते हैं, जो सालाना 19500 हजार करोड़ रुपये रिश्वत लेते हैं। धर्मिक आयोजनों जैसे जागरण, मेला व भवनों के निर्माण आदि के नाम पर भी चालकों से 5900 हजार करोड़ रुपये वसूले जाते हैं। एसएलएफ के मुख्य कार्यकारी अधिकारी (सीईओ) पीयूष तिवारी ने बताया कि रिपोर्ट देशभर के 1310 ट्रक ड्राइवरों से बातचीत पर आधारित है। इसे बनाने के लिए ट्रक मालिक एसोसिएशन, ट्रांसपोर्टर एसोसिएशन, प्लीट ऑपरेटर्स और स्थानीय मीडिया से विभिन्न मुद्दों पर जानकारी जुटाई गयी है। 

जगने के लिए नशीले पदार्थ का सेवन

एसएलएफ के अनुसार, 22 फीसदी ड्राइवर रात में जागकर ट्रक चलाने के लिए कई प्रकार के नशीले पदार्थों का सेवन करते हैं। इसमें डोड शामिल है, जिससे ड्राइवर 12 से 14 घंटे लगातार ट्रक चला सकता है। 77 फीसदी ट्रक ड्राइवर अनेक प्रकार की बीमारियों से ग्रस्त हैं।

चालकों को सामाजिक सुरक्षा की दरकार

रिपोर्ट के मुताबिक, देश में सड़क दुर्घटनाओं के लिए व्यावसायिक वाहन तीसरे स्थान पर हैं। ट्रकों की टक्कर के कारण 23 हजार से अधिक जानें जाती हैं, जिसमें 15 हजार ड्राइवर भी शामिल हैं। 53 फीसदी ड्राइवर अपने पेशे से संतुष्ट नहीं हैं। उन्हें सामाजिक सुरक्षा की दरकार है।

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