कोरोना महामारी के कहर से जंग के इस दौर में जहां आये दिन कोरोना योद्धाओं पर हमले और लाकडाउन की धज्जियां उड़ानें की देश का हौसला पस्त करने वाली वारदातें थमने का नाम नहीं ले रहीं, वहीं कभी कभार ही सही सकारात्मक और अनुकरणीय सोच की ऐसी मिसाल भी देखने को मिल जाती है जिससे यह उम्मीद बंधने लगती है कि तमाम नकारात्मक तेवरों से रू-ब-रू होने के बावजूद देश यह जंग ज़रूर जीतेगा।

दरअसल यह सिर्फ़ कोरी उम्मीद से उपजा विश्वास नहीं, बल्कि संकट के इस दौर में बेहद साधारण तबके के उन संवेदनशील लोगों की सकारात्मक दृष्टि है जो महामारी से जंग जीतने की धारणा को बल प्रदान करती है।
‌जी, आइये देखते हैं कौन हैं यह लोग और कैसा है इनका वह जज़्बा जो नकारात्मकता से जनमी निराशा को दूर कर हिम्मत, हौसला और सकारात्मक ऊर्जा का संचार करने वाला है।

राजस्थान के सीकर जिले में है एक गांव पलसाना। इस गांव के कुछ दिहाड़ी मजदूरों को स्थानीय शहीद सीताराम कुमावत और सेठ के एल ताम्बी राजकीय उच्च माध्यमिक विद्यालय में पिछले दिनों कोरोना संक्रमण की वजह से quarantine एकांतवास में रखा गया था। इस दौरान विद्यालय की जीर्ण-शीर्ण अवस्था को देखते हुए इन मजदूरों ने गांव के सरपंच से पेंट, ब्रश और अन्य ज़रूरी सामान मंगवाया। मजदूरों ने एकांतवास की अवधि का सकारात्मक सदुपयोग करते हुए कुछ ही दिनों में विद्यालय का जीर्णोद्धार कर कायाकल्प कर डाला। इन मजदूरों से

जब यह पूछा गया कि ऐसा करने का उनके मन में यह विचार कैसे आया तो जो जवाब उन्होंने दिया वहीं इनकी संवेदनशील सोच और जज़्बे की पूरी गाथा है। मजदूरों का कहना था कि एकांतवास के दौरान उन्हें मुफ़्त भोजन और हर तरह की सुविधा उपलब्ध करायी जा रही तो हमारा भी कुछ फ़र्ज बनता था कि हम भी कुछ योगदान करें। हमारे पास श्रम था और इसी का उपयोग कर हमने विद्यालय को चमकाने का कार्य कर दिया।

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