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आईआईसीए  ने ‘आईबीसी: संशोधनों के ज़रिए विकसित होता कानून’ विषय पर एक महत्वपूर्ण सत्र आयोजित किया


आईबीबीआई के पूर्व चेयरमैन एम.एस. साहू ने कहा कि बाज़ार कानूनी मुकदमों की तुलना में तेज़ी से होते हैं, इसलिए उभरती स्थितियों से निपटने के लिए सहायक कानून और नियामक तंत्र महत्वपूर्ण साधन बन जाते हैं

“दिग्गज से मिलिए” (मीट द लीजेंड) कार्यक्रम के तहत, भारतीय कॉरपोरेट कार्य संस्थान (आईआईसीए), मानेसर ने “आईबीसी: संशोधनों के ज़रिए विकसित होता कानून” विषय पर एक ज्ञानवर्धक सत्र आयोजित किया। इस सत्र में भारतीय दिवाला और शोधन अक्षमता बोर्ड (आईबीबीआई) के पूर्व चेयरमैन और दिवाला और शोधन अक्षमता संहिता (आईबीसी) के विकास और बदलाव में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले जाने-माने विशेषज्ञ डॉ. एम. एस. साहू ने भाग लिया।

सत्र की शुरुआत आईआईसीए के डीजी और सीईओ श्री ज्ञानेश्वर कुमार सिंह के स्वागत भाषण और संदर्भ-परिचय के साथ हुई। उन्होंने भारत के दिवाला इकोसिस्टम के विकास में महत्वपूर्ण योगदान देने वाले प्रतिष्ठित विशेषज्ञों और विचारकों से सीधे सीखने के महत्व पर ज़ोर दिया।

डॉ. एम. एस. साहू ने प्रतिभागियों को लगातार संशोधनों और नियामक बदलावों के ज़रिए आईबीसी के विकास के बारे में व्यापक जानकारी दी। अपने व्यापक अनुभव के आधार पर, उन्होंने आर्थिक कानूनों में प्रयोग की अवधारणा पर चर्चा की और इस बात पर ज़ोर दिया कि बाजार की बदलती वास्तविकताओं के अनुसार आर्थिक कानूनों में लगातार बदलाव होते रहने चाहिए।

उन्होंने इस बात पर प्रकाश डाला कि बाज़ार कानूनी मुकदमों की गति की तुलना में बहुत तेज़ी से बदलते हैं, जिससे उभरती स्थितियों से निपटने के लिए सहायक कानून और नियामक तंत्र महत्वपूर्ण साधन बन जाते हैं।

उन्होंने व्याख्या करते हुए कहा कि संहिता के प्रावधानों और संहिता के उद्देश्यों को पूरा करने के लिए नियम बनाए जा सकते हैं, ताकि दिवाला फ्रेमवर्क व्यावहारिक चुनौतियों का अधिक प्रभावी ढंग से सामना कर सके।

इस सत्र ने पीजीआईपी प्रतिभागियों को दिवाला कानून की गतिशील प्रकृति; कानून, सहायक कानून और बाज़ार के विकास के बीच आपसी संबंध तथा उभरती आर्थिक और कानूनी चुनौतियों से निपटने के लिए दिवाला फ्रेमवर्क को लगातार अनुकूलित करने के महत्व के बारे में बहुमूल्य जानकारी प्रदान की।

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इस बातचीत ने छात्रों को आईबीसी को केवल एक स्थिर कानून के रूप में नहीं, बल्कि बाज़ार के अनुभव, न्यायिक व्याख्या, नियामक हस्तक्षेप और विधायी संशोधनों से आकार लेने वाले एक विकसित होते आर्थिक कानून के रूप में समझने का अवसर दिया।

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