भूमि संसाधन विभाग (डीओएलआर) के सचिव श्री नरेंद्र भूषण ने सूखा पड़ने के बाद उससे निपटने के बजाय समेकित जलग्रहण क्षेत्र विकास, प्रौद्योगिकी और सामुदायिक भागीदारी के माध्यम से शुष्क-भूमि परिदृश्यों को सुदृढ़ और लचीला बनाने की दिशा में आगे बढ़ने की आवश्यकता पर जोर दिया। उन्होंने नई दिल्ली स्थित राष्ट्रीय कृषि विज्ञान परिसर (एनएएससी) में आयोजित ड्रायलैंड कांग्रेस 2026 पार्टनर स्पॉटलाइट कार्यक्रम में “रिइमैजिनिंग ड्राइलैंड्स: इंस्टीट्यूशन्स, डिजिटल पब्लिक इन्फ्रास्ट्रक्चर एंड कम्युनिटी एक्शन फॉर अ क्लाइमेट-रेज़िलिएंट फ्यूचर” विषय पर अपने विचार व्यक्त करते हुए यह बात कही।
10 सितंबर से नई दिल्ली में आयोजित ड्रायलैंड कांग्रेस 2026 शुष्क-भूमि में कृषि के भविष्य पर विचार-विमर्श के लिए एक महत्वपूर्ण अंतरराष्ट्रीय मंच के रूप में उभरा है। इस कांग्रेस में 25 से अधिक देशों के 800 से अधिक प्रतिभागी एक साथ आए हैं, जिनमें वैज्ञानिक, नीति-निर्माता, विकास भागीदार, उद्योग प्रतिनिधि, शिक्षाविद, नागरिक समाज संगठन और किसान शामिल हैं। इन प्रतिभागियों ने ज्ञान के आदान-प्रदान के साथ-साथ सुदृढ़ और सतत् शुष्क-भूमि कृषि प्रणालियों के निर्माण के लिए विज्ञान, प्रौद्योगिकी और नीति-आधारित दृष्टिकोणों पर विचार-विमर्श किया।
श्री भूषण ने कहा कि “शुष्क-भूमि बंजर भूमि नहीं हैं”, बल्कि ये जीवंत और उत्पादक परिदृश्य हैं, जिनकी क्षमता जलवायु परिवर्तनशीलता के कारण सीमित होती है। वर्षा आधारित कृषि लगभग 6.139 करोड़ हेक्टेयर क्षेत्र में फैली हुई है, जो भारत के शुद्ध बोए गए क्षेत्र का 43 प्रतिशत है और देश के कुल खाद्य उत्पादन में लगभग 40 प्रतिशत का योगदान देती है।

समेकित परिदृश्य प्रबंधन के महत्व पर प्रकाश डालते हुए, उन्होंने कहा, “यदि हम परिदृश्य को पुनर्स्थापित करते हैं, तो हम जल चक्र को पुनर्स्थापित करते हैं; यदि हम जल चक्र को पुनर्स्थापित करते हैं, तो हम आजीविका को पुनर्स्थापित करते हैं।” उन्होंने कहा कि शुष्क-भूमि के लिए जलग्रहण क्षेत्र आधारित दृष्टिकोण विशेष रूप से प्रासंगिक है, क्योंकि इसमें भूमि, जल, वनस्पति और आजीविका को एकीकृत किया जाता है।

श्री भूषण ने भूमि संसाधन विभाग (डीओएलआर) द्वारा कार्यान्वित प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना के जलग्रहण विकास घटक (डब्ल्यूडीसी-पीएमकेएसवाई) के योगदान पर प्रकाश डाला। पिछले 12 वर्षों में लगभग 3.4 करोड़ हेक्टेयर क्षेत्र को कवर करने वाली 7,602 जलग्रहण विकास परियोजनाएं कार्यान्वित की गई हैं। इन पहलों के तहत लगभग 9 लाख जल संचयन संरचनाओं का निर्माण या पुनरुद्धार किया गया है, लगभग 20 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में सुरक्षात्मक सिंचाई उपलब्ध कराई गई है, लगभग 60 लाख किसानों को लाभ मिला है, 6.7 करोड़ मानव-दिवस का रोजगार सृजित हुआ है और 3 लाख हेक्टेयर क्षेत्र को प्लांटेशन के अंतर्गत शामिल किया गया है।
श्री भूषण ने कहा कि जलग्रहण विकास को प्राकृतिक पूंजी में निवेश के रूप में देखा जाना चाहिए। उन्होंने बताया कि पूर्ण की जा चुकी परियोजनाओं में लगभग 2:1 का लाभ-लागत अनुपात देखा गया है तथा भूजल स्तर, खेती के क्षेत्र, फसल सघनता, दुग्ध उत्पादन और किसानों की आय में उल्लेखनीय सुधार हुआ है।
प्रौद्योगिकी के महत्व पर जोर देते हुए, उन्होंने कहा कि जलग्रहण विकास को “जीआईएस से आसूचना की ओर—किसी परिसंपत्ति के स्थान की जानकारी होने से लेकर यह जानने तक कि परिदृश्य अधिक लचीला बन रहा है या नहीं” आगे बढ़ना चाहिए। प्रस्तावित जलग्रहण पोर्टल एकीकृत डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना उपलब्ध कराएगा, जिसमें जलग्रहण परियोजनाओं के पूरे जीवनचक्र को शामिल किया जाएगा और प्रमुख भू-स्थानिक आंकड़ों को एकीकृत किया जाएगा।
उन्होंने जोर देकर कहा कि “डिजिटल उपकरण प्रमाण उपलब्ध करा सकते हैं, संस्थाएं रूपरेखा प्रदान कर सकती हैं और समुदाय स्वामित्व की भावना सुनिश्चित कर सकते हैं।”
सरकारों, अनुसंधान संस्थानों, विकास भागीदारों और समुदायों के बीच मजबूत साझेदारी का आह्वान करते हुए, श्री भूषण ने कहा कि भारत के पास एक ऐसे भारतीय शुष्क-भूमि विकास रोडमैप को विकसित करने का अवसर है, जिसे बड़े पैमाने पर लागू किया जा सके और परिदृश्य बहाली तथा ग्रामीण समृद्धि का वैश्विक मॉडल प्रस्तुत किया जा सके। इससे विकसित भारत@2047 के विजन को साकार करने में योगदान मिलेगा।
उन्होंने निष्कर्ष देते हुए कहा कि जलग्रहण क्षेत्र को “केवल एक परियोजना की सीमा से कहीं अधिक” बनना चाहिए—ऐसा मंच, जो प्राकृतिक पूंजी के पुनर्स्थापन, जल सुरक्षा, कृषि को सुदृढ़ करने, आजीविका के अवसर सृजित करने और जलवायु के प्रति लचीलापन बढ़ाने में सहायक हो।
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