मत्स्य पालन और जलीय खेती का क्षेत्र भारत की आर्थिक वृद्धि का एक महत्वपूर्ण स्तंभ बनकर उभरा है। यह देश के लगभग तीन करोड़ मछुआरों और मछली किसानों की आजीविका का समर्थन करता है और इनके उत्पादन, प्रसंस्करण, विपणन और निर्यात तक फैली विशाल मूल्य श्रृंखला में रोज़गार सृजित करता है। आज भारत विश्व का दूसरा सबसे बड़ा मछली उत्पादक है, जो वैश्विक मछली उत्पादन में लगभग 8 प्रतिशत योगदान देता है। यह दुनिया में दूसरा सबसे बड़ा एक्वाकल्चर उत्पादक होने के साथ, झींगा का सबसे बड़ा उत्पादक और निर्यातक, तथा प्राकृतिक स्रोतों से मछली पकड़ने में दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा उत्पादक है। ये उपलब्धियां खाद्य और पोषण सुरक्षा, ग्रामीण समृद्धि, निर्यात आय और देश की ब्लू इकॉनमी यानी नीली अर्थव्यवस्था की महत्वाकांक्षाओं को आगे बढ़ाने में इस क्षेत्र के बढ़ते रणनीतिक महत्व को दर्शाती हैं।
देश में इस परिवर्तन की नींव लगातार नीतिगत समर्थन और अभूतपूर्व सार्वजनिक निवेश से संभव हुई है। वर्ष 2015 के बाद से, भारत सरकार ने मत्स्य पालन और एक्वाकल्चर के समग्र विकास के उद्देश्य से अपनी विभिन्न योजनाओं और प्राथमिकताओं में ₹39,272 करोड़ से अधिक के संचयी निवेश को मंजूरी दी या घोषित की है। इन निवेशों ने मत्स्य उत्पादन प्रणालियों को मज़बूत किया, बुनियादी ढांचे का आधुनिकीकरण किया, प्रौद्योगिकी अपनाने को बढ़ावा दिया, इनकी बाज़ार पहुंच में सुधार किया और साथ साथ वैश्विक प्रतिस्पर्धात्मकता को बढ़ाया। इससे देश में एक लचीले, टिकाऊ और वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी मत्स्य पालन क्षेत्र की नींव रखी गई।
इन हस्तक्षेपों का प्रभाव पिछले दशक में इस क्षेत्र की उल्लेखनीय वृद्धि दर से परिलक्षित हुआ है। देश का वार्षिक मछली उत्पादन 2013-14 में 95.79 लाख टन से बढ़कर 2024-25 में रिकॉर्ड 198 लाख टन तक पहुँच गया, यानी दोगुने से अधिक। इस वृद्धि का अधिकांश हिस्सा आंतरिक मत्स्य पालन और एक्वाकल्चर के तेज़ी से विस्तार से आया है, जिनका उत्पादन इस अवधि में 147% बढ़कर 61.36 लाख टन से 151.60 लाख टन हो गया।
भारत के समुद्री खाद्य निर्यात में भी इसी तरह की बढ़ोत्तरी की प्रवृत्ति देखी गई है, जो 2013-14 में ₹30,213 करोड़ से बढ़कर 2025-26 में रिकॉर्ड ₹73,890 करोड़ तक पहुँच गई, यानी दोगुने से अधिक। उल्लेखनीय है कि यह निरंतर निर्यात वृद्धि जटिल बनते गए वैश्विक व्यापार माहौल और उभरते टैरिफ-संबंधी चुनौतियों के बीच हासिल की गई।
यह स्थिति भारतीय समुद्री खाद्य उत्पादों के लचीलेपन, प्रतिस्पर्धात्मकता और बढ़ती वैश्विक स्वीकार्यता को रेखांकित करती है।
प्रौद्योगिकी का समावेश, विशेषकर एक्वाकल्चर में, इस क्षेत्र के परिवर्तन का मूल आधार रहा है। प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना (PMMSY) के तहत पुनर्चक्रिय जलीय खेती प्रणाली( रिसर्कुलेटरी एक्वाकल्चर सिस्टम)(RAS) और बायोफ्लॉक तकनीक जैसे उन्नत उत्पादन तंत्रों को अपनाकर अधिक गहन, संसाधन-कुशल और व्यावसायिक रूप से आकर्षक मछली पालन के तरीकों की ओर यह संक्रमण संभव हुआ है। केज कल्चर और अन्य आधुनिक खेती प्रथाओं के साथ, ये नवाचार एक अधिक उत्पादक, लचीला और भविष्य-तैयार एक्वाकल्चर पारिस्थितिकी तंत्र बनाने में मदद कर रहे हैं, जो मछली और मत्स्य उत्पादों की बढ़ती घरेलू और वैश्विक मांग को पूरा करने में सक्षम है।
रिसर्कुलेटरी एक्वाकल्चर सिस्टम (RAS) और बायोफ्लॉक तकनीक जलीय खेती प्रथाओं की एक नई पीढ़ी का प्रतिनिधित्व करती हैं, जो मछलियों को नियंत्रित वातावरण में पालने की अनुमति देती हैं। जबकि RAS इष्टतम विकास स्थितियों को बनाए रखने के लिए जल उपचार और पुनःसंचरण प्रणालियों पर निर्भर करता है। बायोफ्लॉक तकनीक जल गुणवत्ता में सुधार और मछली विकास का समर्थन करने के लिए लाभकारी सूक्ष्मजीवों का उपयोग करती है। ये तकनीकें आपस में मिलकर, विविध कृषि-जलवायु परिस्थितियों और उन स्थानों में मछली पालन को संभव बनाकर एक्वाकल्चर की पहुंच का विस्तार कर रही हैं जहाँ पारंपरिक एक्वाकल्चर संभव नहीं हो सकता था।
पानी का 90–95% तक पुनर्चक्रण करके, RAS प्रणाली एक संसाधन-कुशल मछली उत्पादन व्यवस्था का समर्थन करता है और शहरी उपभोग केंद्रों और निर्यात हबों के करीब खेती इकाइयों की स्थापना को सक्षम बनाता है। इससे इस चक्रीय और टिकाऊ एक्वाकल्चर का अर्थव्यवस्था में योगदान मिलता है।
प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना (PMMSY) के तहत, 9,467 रिसर्कुलेटरी एक्वाकल्चर सिस्टम (RAS) और 4,573 बायोफ्लॉक इकाइयों को मंजूरी दी गई है, जो वर्ष भर मछली पालन को सुविधाजनक बनाती हैं। इससे गहन तथा व्यावसायिक रूप से व्यवहार्य मछली उत्पादन मॉडलों की ओर एक बदलाव की शुरुआत का संकेत उपजा हैं, जो एक्वाकल्चर को पारंपरिक खेती को भौगोलिक क्षेत्रों से परे विस्तारित कर रहे हैं। इस प्रौद्योगिकी के समावेश को PMMSY के तहत ₹4,120 करोड़ के निवेश द्वारा समर्थन प्राप्त हुआ है, जो मत्स्य पालन उत्पादन प्रणालियों के आधुनिकीकरण और उन्नत एक्वाकल्चर प्रथाओं के अपनाने में तेजी लाने पर सरकार के जोर को दर्शाता है।
घरेलू उत्पादन को मज़बूत करने से परे, RAS और बायोफ्लॉक तकनीकें उच्च-मूल्य समुद्री खाद्य निर्यात में भारत की महत्वाकांक्षाओं का भी समर्थन कर रही हैं। नियंत्रित खेती वातावरण में उत्पादन को सक्षम बनाकर, ये प्रणालियां गुणवत्ता, पहचानजन्य और जैवसुरक्षा में स्थिरता सुनिश्चित करने में मदद करती हैं—ये विशेषताएं वैश्विक समुद्री खाद्य बाजारों में भारत के बढ़ते महत्व को दर्शाती हैं।
जैसे-जैसे यह क्षेत्र मूल्य संवर्धन और निर्यात-उन्मुख उत्पादन की ओर बढ़ रहा है, वैसे वैसे प्रौद्योगिकी-संचालित एक्वाकल्चर प्रणालियों से भारतीय समुद्री खाद्य की प्रतिस्पर्धात्मकता को बढ़ाने और अंतरराष्ट्रीय बाजारों में देश की स्थिति को सुदृढ़ करने में इसकी महत्वपूर्ण भूमिका निभाने की उम्मीद जागी है।
RAS और बायोफ्लॉक तकनीकों की बहुमुखी प्रतिभा देश भर में विशेष एक्वाकल्चर खंडों के विस्तार को भी सक्षम बना रही है। ये प्रणालियां जम्मू और कश्मीर, लद्दाख, उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश में ट्रॉट जैसी प्रीमियम-मूल्य प्रजातियों की खेती के लिए ठंडे पानी की मत्स्य पालन क्लस्टर में तेज़ी से अपनाई जा रही हैं। जबकि लवणीय और खारे पानी के एक्वाकल्चर सिस्टम में निर्यात-उन्मुख झींगा के उत्पादन का भी ये समर्थन कर रही हैं। सजावटी मछली पालन इकाइयों में इनके अनुप्रयोग से इससे विशिष्ट बाज़ारों को मज़बूती मिल रही है और उद्यमियों के लिए नए अवसर खुल रहे हैं। कुल मिलाकर, ये तकनीकें एक्वाकल्चर की पहुंच को व्यापक बना रही हैं और उच्च-मूल्य मत्स्य पालन में विकास के लिए नए रास्ते बना रही हैं।
भारत के मत्स्य पालन क्षेत्र के आगे का रास्ता प्रौद्योगिकी, नवाचार और स्थिरता के निरंतर एकीकरण से तय होगा। जैसे-जैसे देश एक लचीली और वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी ब्लू इकॉनमी बनाने का प्रयास कर रहा है, RAS और बायोफ्लॉक प्रणालियों के डिजिटल मॉनिटरिंग प्लेटफॉर्म, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, ड्रोन-सक्षम सेवाओं और नवीकरणीय ऊर्जा समाधानों के साथ अभिसरण परिचालन दक्षता बढ़ाने और उत्पादन लागत कम करने की क्षमता बढ़ाते जायेंगे। उतना ही महत्वपूर्ण झींगा, ट्रॉट, सीबास, तिलापिया, मुर्रल और पंगासियस जैसी उच्च-मूल्य प्रजातियों की ओर एक्वाकल्चर का विविधीकरण भी होगा, जो अधिक मूल्य प्राप्ति और अंतरराष्ट्रीय बाजारों तक बेहतर पहुंच को सक्षम बनाएगा।
निरंतर कौशल विकास, उद्योग साझेदारी और एक मज़बूत नीतिगत ढांचे द्वारा समर्थित, ये प्रौद्योगिकी-संचालित उत्पादन प्रणालियां देश की खाद्य सुरक्षा को मज़बूत करने, ग्रामीण रोज़गार सृजित करने, समुद्री खाद्य निर्यात का विस्तार करने और विकसित भारत के तहत एक टिकाऊ और समृद्ध ब्लू इकॉनमी की दृष्टि को आगे बढ़ाने में परिवर्तनकारी भूमिका निभा सकती हैं।
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