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जनजातीय कार्य मंत्रालय जनजातीय भाषाओं और संग्रहालयों पर राष्ट्रीय सम्मेलन का आयोजन कर्नाटक के  मैसूरु में करेगा


आदि वाणी प्लेटफॉर्म को 5 नई भाषाओं के साथ प्रमुख अपडेट किया जाएगा, आदि वाणी आईओएस ऐप लॉन्च किया जाएगा; ट्राइबॉट प्लेटफॉर्म लॉन्च किया जाएगा; जनजातीय संग्रहालयों और जनजातीय स्वतंत्रता सेनानी संग्रहालयों के लिए राष्ट्रीय दृष्टिकोण पर विचार-विमर्श किया जाएगा”

जनजातीय कार्य मंत्रालय 24-26 अगस्त 2026 तक मैसूरु, कर्नाटक में जनजातीय भाषाओं और संग्रहालयों पर तीन दिवसीय राष्ट्रीय सम्मेलन का आयोजन करेगा। इस सम्मेलन में पहली बार एक ही मंच पर जनजातीय भाषाओं के दस्तावेजीकरण, संरक्षण और पुनर्जीवन पर राष्ट्रीय स्तर पर संवाद के साथ-साथ देशभर में जनजातीय संग्रहालयों और जनजातीय स्वतंत्रता सेनानी संग्रहालयों को मजबूत करने के लिए समानांतर चर्चा होगी। यह राष्ट्रीय सम्मेलन विकसित भारत @2047 के प्रधानमंत्री के रोडमैप को आगे बढ़ाता है, जिसमें भारत की पारंपरिक ज्ञान प्रणालियों को पुनर्जीवित करना और यह सुनिश्चित करना कि कोई भी समुदाय पीछे न छूटे, समावेशी राष्ट्रीय विकास के प्रमुख आधार हैं।

भारत के जनजातीय समुदाय सैकड़ों भाषाओं और बोलियों के संरक्षक हैं। इनमें से बड़ी संख्या में भाषाओं की कोई लिखित परंपरा नहीं है, वे कक्षाओं में पढ़ाई नहीं जातीं और अब अगली पीढ़ी तक भी नहीं पहुंच पा रही हैं। इसी को ध्यान में रखते हुए कि किसी जनजातीय भाषा के खत्म होने के साथ पर्यावरण, चिकित्सा, कृषि और संस्कृति से जुड़ा पूरा ज्ञान भंडार भी समाप्त हो जाता है, मंत्रालय ने जनजातीय अनुसंधान संस्थानों और राज्य जनजातीय कल्याण विभागों के नेटवर्क के माध्यम से इस राष्ट्रीय सम्मेलन का आयोजन किया है। इसका उद्देश्य समुदायों की प्राथमिकताओं को एजेंडे के केंद्र में रखना और जनजातीय भाषाओं के दस्तावेजीकरण, संरक्षण तथा पुनर्जीवन के लिए राष्ट्रीय रोडमैप तैयार करना है।

यह सम्मेलन प्रधानमंत्री द्वारा 2016 के स्वतंत्रता दिवस संबोधन में घोषित उस दृष्टिकोण को भी आगे बढ़ाएगा, जिसमें भारत के स्वतंत्रता संग्राम में जनजातीय समुदायों के योगदान को मान्यता दी गई थी। इसके तहत मंत्रालय ने 10 राज्यों में 11 जनजातीय स्वतंत्रता सेनानी संग्रहालयों को मंजूरी दी है, जिनमें से चार का उद्घाटन हो चुका है। सम्मेलन में जनजातीय संग्रहालयों और जनजातीय स्वतंत्रता सेनानी संग्रहालयों के लिए एक साझा दृष्टिकोण पर विचार किया जाएगा, ताकि इन्हें समकालीन प्रस्तुति, कहानी कहने और समुदाय से जुड़े विरासत प्रतिनिधित्व के जीवंत संस्थानों के रूप में विकसित किया जा सके। यह प्रधानमंत्री की उस व्यापक विश्वास को दर्शाता है कि भाषा केवल संचार का माध्यम नहीं, बल्कि किसी समुदाय की संस्कृति, विरासत और पारंपरिक ज्ञान का जीवंत भंडार है। इस दृष्टिकोण में जनजातीय भाषाओं का महत्वपूर्ण स्थान है।

सम्मेलन का उद्घाटन जनजातीय कार्य मंत्रालय के माननीय राज्य मंत्री श्री दुर्गादास उइके करेंगे। इस अवसर पर कर्नाटक के जनजातीय कल्याण विभाग के माननीय मंत्री श्री रघुमूर्ति, जनजातीय कार्य मंत्रालय के संयुक्त सचिव श्री अनंत प्रकाश पांडे, कर्नाटक के जनजातीय कल्याण विभाग की सचिव एवं आईएएस अधिकारी श्रीमती कनागवल्ली तथा भारतीय भाषा संस्थान के निदेशक प्रोफेसर बसवराज कोडागुंटी उपस्थित रहेंगे। उद्घाटन सत्र में जनजातीय भाषाओं में कर्नाटक की प्रारंभिक पुस्तिकाओं का विमोचन, जनजातीय कार्य मंत्रालय और भारतीय भाषा संस्थान के बीच समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर तथा चैटबॉट का शुभारंभ किया जाएगा। साथ ही आदि वाणी मंच का बड़े स्तर पर उन्नयन किया जाएगा। इसमें इसका नया आईओएस एप्लिकेशन, पांच नई भाषाओं को जोड़ना और मंच पर कई नई सुविधाएं शामिल होंगी।

दूसरे दिन की शुरुआत इस विषय पर एक पैनल चर्चा से होगी कि भाषा पुनर्जीवन के प्रयासों से जनजातीय समुदाय स्वयं क्या चाहते हैं। इसमें जमीनी स्तर पर काम करने वाले लोगों और समुदाय से जुड़े भाषाविदों की भागीदारी होगी। इसके बाद जनजातीय भाषाओं पर संभावित घोषणा-पत्र का मसौदा तैयार किया जाएगा, उसे अपनाया जाएगा और उस पर हस्ताक्षर किए जाएंगे। इसके बाद सम्मेलन का ध्यान संग्रहालयों से जुड़े विषयों पर केंद्रित होगा। इसमें जनजातीय स्वतंत्रता संघर्ष की कहानियों को प्रामाणिक रूप से प्रस्तुत करने, स्मृति और पहचान के जीवंत संस्थानों के रूप में संग्रहालयों, भवन निर्माण से लेकर प्रदर्शनी तक संग्रहालय की योजना प्रक्रिया, आधुनिक प्रदर्शन तकनीकों और एआर/वीआर तथा इंटरैक्टिव कियोस्क जैसी डिजिटल तकनीकों तथा संग्रहालय निर्माण में समुदाय की भागीदारी पर चर्चा की जाएगी। इस दौरान भोपाल के जनजातीय संग्रहालय जैसे अनुभवों से भी सीख ली जाएगी।

इस सम्मेलन में जनजातीय कार्य मंत्रालय और राज्य जनजातीय कल्याण विभागों के वरिष्ठ अधिकारी, जनजातीय अनुसंधान संस्थान और कार्यान्वयन एजेंसियां, जनजातीय भाषाविज्ञान विशेषज्ञ, संग्रहालय विशेषज्ञ, क्यूरेटर, संरक्षण एवं प्रौद्योगिकी विशेषज्ञ, इतिहासकार, मानवविज्ञानी, जनजातीय समुदायों के प्रतिनिधि तथा देशभर के पारंपरिक ज्ञान के संरक्षक हिस्सा लेंगे।

सम्मेलन से अपेक्षित परिणामों में जनजातीय भाषाओं के दस्तावेजीकरण की एक समेकित राष्ट्रीय तस्वीर, विस्तार के लिए समुदाय के नेतृत्व वाले भाषा पुनर्जीवन मॉडलों की पहचान, जनजातीय विद्यालयों में बहुभाषी शिक्षा के लिए कार्य-आधारित दृष्टिकोण, जनजातीय भाषाओं पर घोषणा-पत्र को अपनाना तथा जनजातीय संग्रहालयों और जनजातीय स्वतंत्रता सेनानी संग्रहालयों के लिए एक साझा राष्ट्रीय दृष्टिकोण तैयार करना शामिल है। इसका उद्देश्य शोध, प्रस्तुति, संरक्षण और समुदाय की भागीदारी को मजबूत करना है।

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