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सीएमएलआरई ने सस्टेनेबल ब्लू इकोनॉमी को बढ़ावा देने के लिए भारतीय ईईज़ेड के गहरे समुद्र और दूर-समुद्र के मछली संसाधनों पर महत्वपूर्ण राष्ट्रीय रिपोर्ट जारी की

नई दिल्ली — जैसे-जैसे समुद्र से मिलने वाली खाद्य सुरक्षा और जलवायु नियंत्रण पर दुनिया का ध्यान बढ़ रहा है, भारत ने अपनी विशाल और अब तक अनजानी समुद्री सीमाओं की मैपिंग और प्रबंधन की दिशा में ठोस कदम उठाया है। ‘सेंटर फॉर मरीन लिविंग रिसोर्सेज एंड इकोलॉजी’ (सीएमएलआरई) की रजत जयंती (25वीं वर्षगांठ) के अवसर पर, पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय ने भारतीय ईईज़ेड के गहरे समुद्र और दूरसमुद्र के मछली संसाधनों पर राष्ट्रीय रिपोर्ट जारी की है।

यह महत्वपूर्ण दस्तावेज़ भारत के 2.37 मिलियन वर्ग किलोमीटर के अनन्य आर्थिक क्षेत्र’ (ईईज़ेड) में लगभग चार दशकों के अग्रणी समुद्र-विज्ञान अनुसंधान और तीन दशकों के व्यवस्थित सर्वेक्षणों की जानकारी को एक साथ लाता है। यह रिपोर्ट सिर्फ़ वैज्ञानिक जानकारी का संग्रह नहीं है, बल्कि भारत की ‘ब्लू इकोनॉमी’ के सतत विकास के लिए स्पष्ट रूपरेखा भी प्रस्तुत करती है, जिसमें संसाधनों के आकलन और जैव-विविधता के संरक्षण के बीच संतुलन बनाया गया है।

इस रिपोर्ट को औपचारिक रूप से पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय के पूर्व सचिव डॉएमरविचंद्रन; सीएमएलआरई के पूर्व निदेशक डॉ. पी. मदेश्वरन और डॉ. एम. सुधाकर; डीप ओशन मिशन के निदेशक डॉ. एम. वी. रमना मूर्ति; और सीएमएलआरई के प्रमुख डॉ. आर. एस. महेशकुमार की उपस्थिति में जारी किया गया। इस दौरान समुद्री विज्ञान समुदाय के वरिष्ठ सदस्य भी मौजूद थे।

तैरती हुई प्रयोगशाला में दशकों की खोज

रिपोर्ट में पेश किए गए नतीजे अभूतपूर्व सामूहिक वैज्ञानिक प्रयास को दर्शाते हैं। इसमें 1990 के दशक की शुरुआत से ‘मरीन लिविंग रिसोर्सेज प्रोग्राम’ (एमएलआरपी) के अंतर्गत 400 से ज़्यादा समुद्रवैज्ञानिक अभियान (क्रूज़) शामिल हैं। इस बड़े प्रयास के केंद्र में भारत का प्रमुख अनुसंधान पोत (रिसर्च वेसल), फिशरी एंड ओशनोग्राफिक रिसर्च वेसल‘ (एफओआरवीसागर संपदा है।

आधुनिक तैरती हुई प्रयोगशाला के तौर पर, यह जहाज़ वैज्ञानिकों की कई तरह की टीमों को अरब सागर, बंगाल की खाड़ी, लक्षद्वीप के पानी, अंडमान सागर और दक्षिणी महासागर (अंटार्कटिका) में हफ़्तों तक चलने वाले मुश्किल अभियानों पर ले गया। इन अभियानों का उद्देश्य प्रजातियों के फैलाव का नक्शा बनाना, मछलियों की संख्या का अंदाज़ा लगाना और पर्यावरण से जुड़ी ज़रूरी जानकारी एकत्र करना था।

गहरे समुद्र के नए इलाकों की मुख्य बातें

  • ट्वाइलाइट ज़ोन” (मेसोपेलाजिक लेयरको समझना: 200 से 1,000 मीटर की गहराई तक फैले इस इलाके में लैंटर्नफ़िश (माइक्टोफिड्स), गहरे समुद्र में रहने वाले झींगे और सेफेलोपोड्स (जैसे ऑक्टोपस और स्क्विड) की बड़ी आबादी रहती है। रिपोर्ट में बताया गया है कि कैसे रात में इनका ऊपर-नीचे आना (वर्टिकल माइग्रेशन) समुद्र के “बायोलॉजिकल कार्बन पंप” को चलाता है, जिससे ग्लोबल क्लाइमेट को नियंत्रित करने के लिए सतह से गहरे समुद्र तक कार्बन पहुँचता है।
  • गहरे समुद्र के तल पर रहने वाले संसाधन: रिपोर्ट 200 मीटर से ज़्यादा गहरे कॉन्टिनेंटल स्लोप (महाद्वीपीय ढलान) पर रहने वाले जीवित संसाधनों का बारीकी से आकलन करती है। इसमें गहरे समुद्र के झींगे, पर्च, स्कॉम्ब्रॉइड्स, फ़्लैटफ़िश और ईल के बड़े स्टॉक की पहचान की गई है, जिनका अभी बहुत कम इस्तेमाल हुआ है।
  • दूरदराज़ के इलाकों में मछली पकड़ना: खुले समुद्र और गहरे पानी की ज़्यादा कीमत वाली प्रजातियों (जैसे टूना, बिलफ़िश, शार्क, ओशनिक स्क्विड और अंटार्कटिक क्रिल) के बारे में पूरी जानकारी एकत्र की गई है।
  • समुद्री जैवविविधता वाले अहम इलाकों (हॉटस्पॉट्सकी सुरक्षा: सबसे ज़रूरी बात यह है कि यह रिपोर्ट उन इलाकों के बारे में जानकारी देती है जो पर्यावरण के लिहाज़ से बहुत महत्वपूर्ण हैं और कमज़ोर इकोसिस्टम के लिए नर्सरी और रहने की जगह का काम करते हैं। इनमें शामिल मुख्य इलाके हैं:
  • कोल्लम बैंक और अंग्रिया बैंक
  • मैंगलोर के पास गहरे समुद्र की ढलान
  • तिरुवनंतपुरम के पास टेरेस (समुद्र के नीचे का चपटा इलाका)
  • लक्षद्वीप और अंडमान-निकोबार द्वीप समूह

2047 के लिए टेक्नोलॉजी पर आधारित विज़न

रिपोर्ट में बताया गया है कि कैसे आधुनिक और नई टेक्नोलॉजी भारतीय समुद्र विज्ञान को बदल रही हैं। पुराने फ़ील्ड ऑब्ज़र्वेशन को फ़िशरीज़ एकॉस्टिक्सएनवायरनमेंटल डीएनए  (eDNA), ऑटोनॉमस ऑब्ज़र्विंग प्लेटफ़ॉर्मसैटेलाइट ऑब्ज़र्वेशनआर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआईऔर एडवांस्ड इकोसिस्टम मॉडलिंग के साथ जोड़कर, भारत समुद्री इलाकों की प्लानिंग के लिए अत्याधुनिक ढांचा तैयार कर रहा है।

यह वैज्ञानिक आधार सीधे तौर पर भारत के विज़न 2047″ को मज़बूत करता है, जो राष्ट्रीय विकास के मुख्य स्तंभ के रूप में “ब्लू इकोनॉमी” को प्राथमिकता देता है।  यह संयुक्त राष्ट्र (यूएन) के सतत विकास लक्ष्य 14 (पानी के नीचे जीवन) और सतत विकास के लिए संयुक्त राष्ट्र के ओशन साइंस दशक के प्रति भारत की वैश्विक प्रतिबद्धताओं को भी मज़बूत करता है।

डॉ. एम. रविचंद्रन ने कहा, “टिकाऊ समृद्धि केवल नए समुद्री संसाधनों की खोज से नहीं आएगी, बल्कि उन्हें समझने, उन्हें बनाए रखने वाले इकोसिस्टम का सम्मान करने और विज्ञान को मार्गदर्शक मानकर उनका प्रबंधन करने से आएगी।”

इस प्रकाशन का संपादन डॉवीएनसंजीवन (पूर्व निदेशक, CMLRE) और डॉबबन इंगोले (सेवानिवृत्त वैज्ञानिक, NIO गोवाने किया और इसे डॉआरएसमहेशकुमार के नेतृत्व में प्रकाशित किया गया। कई विषयों से जुड़े डेटा के इस विशाल संग्रह को तैयार करने वाली मुख्य लेखक टीम में डॉ. हाशिम मंजेब्रयाकथ, डॉ. स्मिता बी. आर., डॉ. राजेश कुमार एम. पी., डॉ. मीरा के. एम., डॉ. पुरबली साहा, डॉ. सहिना अख्तर, डॉ. चिन्मय कर और डॉ. दावूद निहाल शामिल हैं।

चित्रपृथ्वी विज्ञान मंत्रालय के पूर्व सचिव डॉएमरविचंद्रन ने कोच्चि स्थित सेंटर फॉर मरीन लिविंग रिसोर्सेज एंड इकोलॉजी (सीएमएलआरईके रजत जयंती समारोह के दौरान भारतीय ईईज़ेड (अनन्य आर्थिक क्षेत्रके गहरे समुद्र और दूर के जल क्षेत्र में मछली पकड़ने के संसाधनों पर राष्ट्रीय रिपोर्ट जारी की। इस अवसर पर पूर्व निदेशकवरिष्ठ वैज्ञानिकसीएमएलआरई के प्रमुखलेखक और समुद्री विज्ञान समुदाय के प्रतिष्ठित सदस्य मौजूद थे।

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