जनजातीय कार्य राज्यमंत्री श्री दुर्गादास उइके ने बुधवार को लोकसभा में बताया कि ग्रामीण विकास मंत्रालय का भूमि संसाधन विभाग (डीओएलआर) केंद्र में भूमि से जुड़े मामलों के लिए नोडल मंत्रालय ने जानकारी दी है कि भारत के संविधान (सातवीं अनुसूची – सूची II (राज्य सूची) – प्रविष्टि संख्या (18)) के तहत, भूमि और उसके प्रबंधन का मामला राज्यों के विशेष विधायी और प्रशासनिक अधिकार क्षेत्र में आता है। इसके अलावा, भूमि अधिग्रहण और उससे जुड़े पुनर्वास का काम केंद्र और राज्य सरकारों द्वारा विभिन्न केंद्रीय और राज्य कानूनों के तहत किया जाता है।
पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय (एमओईएफसीसी) ने जानकारी दी है कि वन भूमि का इस्तेमाल गैर-वानिकी कार्यों के लिए करने के प्रस्तावों पर पीएआरआईवीईएसएच (परिवेश) पोर्टल (https://parivesh.nic.in) के ज़रिए ऑनलाइन कार्रवाई की जाती है। विपथन (डाइवर्जन) के लिए प्रस्तावित वन भूमि, प्रस्ताव की श्रेणी, यूज़र एजेंसी की जानकारी, प्रस्तावों की मौजूदा स्थिति, परियोजना से प्रभावित पेड़-पौधों आदि से जुड़ी जानकारी पीएआरआईवीईएसएच (परिवेश) पोर्टल पर उपलब्ध है।
अनुसूचित जनजाति और अन्य परंपरागत वन निवासी (वन अधिकारों की मान्यता) अधिनियम, 2006 की धारा 3(2) में सरकार द्वारा प्रबंधित खास विकास सुविधाओं के लिए वन भूमि के कम से कम विपथन का प्रावधान है, इसके लिए शर्त यह है कि हर मामले में ऐसा इस्तेमाल एक हेक्टेयर से ज़्यादा नहीं होना चाहिए और इसके लिए संबंधित ग्राम सभा की सिफारिश आवश्यक होगी। जनजातीय भूमि के विपथन का ब्यौरा जनजातीय कार्य मंत्रालय (एमओटीए) द्वारा केंद्रीय स्तर पर नहीं रखा जाता है।
इसके अलावा, पंचायत (अनुसूचित क्षेत्रों तक विस्तार) अधिनियम, 1996 के कार्यान्वयन का प्रशासनिक मंत्रालय होने के नाते, पंचायती राज मंत्रालय (एमओपीआर) ने सूचित किया है कि ग्रामीण क्षेत्रों के भूमि संबंधी मामलों सहित पंचायतों से संबंधित सभी मामले संबंधित राज्य सरकारों के दायरे में आते हैं और न तो राज्य सरकारों ने ऐसे मामलों का ब्यौरा एमओपीआर को प्रस्तुत किया है और न ही एमओपीआर ऐसे ब्यौरा रखता है।
एमओईएफसीसी की जानकारी के अनुसार, वन (संरक्षण एवं संवर्धन) नियम, 2023 के नियम सं. 11 (7) में यह प्रावधान है कि राज्य सरकार या संघ राज्यक्षेत्र प्रशासन, जैसा भी मामला हो, तभी विपथन, पट्टे पर देने या अनारक्षण का आदेश तभी जारी कर सकता है जब उसे अधिनियम की धारा 2 की उप-धारा (1) के तहत केंद्र सरकार से ‘अंतिम’ मंज़ूरी मिल जाए और साथ ही, ‘अनुसूचित जनजाति और अन्य परंपरागत वन निवासी (वन अधिकारों की मान्यता) अधिनियम, 2006 (2007 का 2)’ के तहत अधिकारों का निपटारा सुनिश्चित करने सहित लागू होने वाले अन्य सभी अधिनियमों और उनके तहत बने नियमों का पालन किया जाए। इसके अलावा, एमओटीए राज्य सरकारों और संघ राज्यक्षेत्र के प्रशासनों से लगातार यह सुनिश्चित करने को कहता रहा है कि एफआरए की धारा 4 (5) का पालन करने सहित किसी भी हकदार लाभार्थी को उसके वन अधिकारों से वंचित न किया जाए, जिसके तहत प्रावधान है कि जब तक अधिकारों को मान्यता देने और उनके सत्यापन की प्रक्रिया पूरी नहीं हो जाती, तब तक दावेदारों को उनके कब्ज़े वाली वन भूमि से बेदखल किया या हटाया नहीं जा सकता।
परियोजना से प्रभावित परिवारों की भूमि का अधिग्रहण पुनर्वासन और पुनर्व्यवस्थापन का काम-जिसमें मुआवज़े का भुगतान और नियमों को कार्यान्वित करना भी शामिल है-संबंधित राज्य सरकार/परियोजना प्राधिकरण द्वारा किया जा रहा है। इसलिए, खनन और भूमि के दूसरे प्रयोग वाली परियोजनाओं में भूमि अधिग्रहण, पुनर्वास और ग्राम सभा की सहमति के नियमों को लागू करने से जुड़े विवादों का ब्यौरा एमओटीए द्वारा केंद्रीय स्तर पर नहीं रखा जाता है।
एमओईएफसीसी ने जानकारी दी है कि राज्यों/संघ राज्यक्षेत्रों से वन भूमि के विपथन (डाइवर्जन) के लिए मिले प्रस्तावों की जांच ‘वन (संरक्षण एवं संवर्धन) अधिनियम, 1980’ और इसके तहत बने नियमों व दिशानिर्देशों के अनुसार की जाती है।
जब मंत्रालय को एफआरए (वन अधिकार अधिनियम) के प्रावधानों के उल्लंघन के बारे में कोई शिकायत/प्रतिवेदन मिलता है, तो उसे संबंधित राज्य/संघ राज्यक्षेत्र को समाधान के लिए भेज दिया जाता है, क्योंकि इस अधिनियम को लागू करने की ज़िम्मेदारी राज्य/संघ राज्यक्षेत्र की होती है। इसके अलावा, राज्य सरकारों को यह सुनिश्चित करने की सलाह दी गई है कि अनुसूचित जनजातियों के हितों की रक्षा संवैधानिक प्रावधानों और अजजा को सुरक्षोपाय वाले विभिन्न कानूनों के अनुसार ठीक से की जाए।
इसके अलावा, अनुसूचित क्षेत्रों में जनजातीय भूमि के विपथन (डाइवर्जन) से जुड़े छह कानूनी मामले लंबित हैं। इनके ब्यौरे निम्नानुसार हैं:
- ओडिशा राज्य में खनन परियोजना से जुड़े तीन मामले हैं जो रिट याचिकाओं के ज़रिए माननीय ओडिशा उच्च न्यायालय में लंबित हैं।
- दो मामले गुजरात राज्य से होकर गुज़रने वाले राष्ट्रीय राजमार्गों के निर्माण/चौड़ीकरण से संबंधित हैं और अहमदाबाद स्थित माननीय गुजरात उच्च न्यायालय में रिट याचिकाओं के रूप में लंबित हैं।
- एक मामला हिमाचल प्रदेश राज्य के चंबा मण्डल में पनबिजली परियोजना से संबंधित है और यह माननीय वरिष्ठ सिविल न्यायाधीश, चंबा, हिमाचल प्रदेश की अदालत में एक सिविल मुकदमे के रूप में लंबित है।
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