बहु-राज्यीय सहकारी समितियां (एमएससीएस) अधिनियम, 2002 के प्रावधानों के तहत पंजीकृत सहकारी समितियां स्वायत्त सहकारी संगठनों के रूप में कार्य करती हैं और अपने सदस्यों के प्रति उत्तरदायी होती हैं।
एमएससीएस अधिनियम, 2002 में जांच, निरीक्षण, समितियों के समापन, परिसमापक की नियुक्ति, अपराध, दंड और अपराधों के संज्ञान से संबंधित प्रावधान हैं। जब भी किसी शिकायत में लागू कानूनों के तहत धोखाधड़ी, जालसाजी या आपराधिक विश्वासघात जैसे संज्ञेय अपराधों का मामला सामने आता है, तो उसे जांच एवं अभियोजन हेतु प्रकरण के अनुसार संबंधित राज्य पुलिस, आर्थिक अपराध शाखा (ईओडब्ल्यू), केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (सीबीआई) या अन्य सक्षम जांच एजेंसियों को कानून के अनुसार भेज दिया जाता है।
परिसमापनाधीन समितियों की परिसंपत्तियों की वसूली तथा देयों की वसूली का कार्य बहु-राज्यीय समितियां अधिनियम, 2002 (एमएससीएस अधिनियम, 2002) तथा लागू नियमों के प्रावधानों के अनुसार परिसमापक किया जाता है। आपराधिक मामलों में जांच एवं अभियोजन का कार्य लागू आपराधिक कानूनों के अंतर्गत सक्षम जांच एजेंसियों और न्यायालयों द्वारा किया जाता है। केंद्रीय रजिस्ट्रार कार्यालय जांच एजेंसियों अथवा न्यायालयों द्वारा मांगे जाने पर अभिलेख, दस्तावेज और अन्य सूचनाएं उपलब्ध कराकर आवश्यक सहयोग प्रदान करता है।
बहु-राज्यीय सहकारी समितियों के जमाकर्ताओं/सदस्यों के अधिकारों की सुरक्षा के लिए बहु-राज्यीय सहकारी समितियां (एमएससीएस) (संशोधन) अधिनियम और नियम, 2023 के माध्यम से निम्नलिखित अनेक कदम उठाए गए हैं :
- सदस्यों की शिकायतों के निवारण के लिए एक तंत्र प्रदान करने हेतु केंद्र सरकार द्वारा सहकारी लोकपाल नियुक्त किया गया है और पारदर्शिता में सुधार के लिए बहु-राज्यीय सहकारी समितियों द्वारा सूचना अधिकारी नियुक्त किए गए हैं।
- समवर्ती लेखापरीक्षा की शुरुआत, एकसमान लेखांकन और लेखापरीक्षा मानकों का निर्धारण और संसद में शीर्ष बहु-राज्यीय सहकारी समितियों की लेखापरीक्षा रिपोर्टों को प्रस्तुत किए जाने की व्यवस्था के माध्यम से लेखापरीक्षा और लेखांकन ढांचे को मजबूत किया गया है।
- गवर्नेंस और पारदर्शिता में सुधार के लिए कई उपाय किए गए हैं, जिनमें वार्षिक रिपोर्टों में बोर्ड के गैर-सर्वसम्मत निर्णयों का प्रकटीकरण, निदेशकों की अयोग्यता के लिए अतिरिक्त आधार और निदेशकों को ऐसे मामलों में भाग लेने से प्रतिबंधित करना शामिल है, जहां उनका या उनके रिश्तेदारों के हितों का टकराव हो।
- बचत और ऋण के कारोबार में लगी बहु-राज्यीय सहकारी समितियों के लिए विवेकपूर्ण मानदंड (तरलता, जोखिम आदि) निर्धारित किए गए हैं और सुरक्षित निवेश सुनिश्चित करने के लिए निधियों के निवेश से संबंधित प्रावधानों को पुनर्परिभाषित किया गया है।
- धोखाधड़ी या गैरकानूनी कामकाज की जांच करने के लिए केंद्रीय रजिस्ट्रार को अधिक प्रदान कर नियामकीय निगरानी को सुदृढ़़ किया गया है।
- उचित प्रक्रिया का पालन करते हुए उन समितियों के समापन के लिए प्रावधान पेश किया गया है, जिनका पंजीकरण धोखाधड़ी या गलतबयानी के माध्यम से प्राप्त किया गया था।
- समितियों के सामूहिक हितों की रक्षा के लिए उपाय शुरू किए गए हैं, जिनमें निष्कासित सदस्यों के निष्कासन की न्यूनतम अवधि को एक वर्ष से बढ़ाकर तीन वर्ष करना शामिल है।
केन्द्रीय विधि एवं न्याय राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) और संसदीय कार्य राज्य मंत्री श्री अर्जुन राम मेघवाल ने यह जानकारी आज लोकसभा में एक प्रश्न के लिखित उत्तर में दी।
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