देश के पहले राष्ट्रपति डॉक्टर राजेन्द्र प्रसाद ने 1951 में प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू से हिन्दू लॉ को कानून में पिरोने का विरोध करते हुए कहा था कि अगर मौजूदा कानून अपर्याप्त और आपत्तिजनक है तो सभी नागरिकों के लिए समान नागरिक संहिता क्यों नहीं लागू की जाती ? सिर्फ एक समुदाय को ही कानूनी दखलंदाजी के लिए क्यों चुना गया ? गौरतलब है कि सुप्रीम कोर्ट ने दो दिन पहले समान नागरिक संहिता की तरफदारी करते हुए कहा था, यद्यपि 1956 में हिन्दू लॉ कोडीफाई हो गया, लेकिन पूरे देश में समान नागरिक संहिता लागू करने का कोई प्रयास नहीं हुआ.

सुप्रीम कोर्ट ने गत 13 सितंबर के फैसले में कहा है कि संविधान निर्माताओं ने राज्य के नीति निदेशक तत्व में इस उम्मीद से अनुच्छेद 44 जोड़ा था कि सरकार देश के सभी नागरिकों के लिए समान नागरिक संहिता सुनिश्चित करेगी, लेकिन आज तक इस दिशा में कुछ नहीं हुआ. शुरुआत से मामले पर निगाह डालें तो समान नागरिक संहिता का प्रावधान भले ही संविधान में शामिल कर दिया गया हो, लेकिन संविधान लागू होने के बाद वह सरकार की प्राथमिकता में नहीं रहा.

डॉक्टर राजेन्द्र प्रसाद के कहने के बावजूद न तो तब की नेहरू सरकार ने समान नागरिक संहिता के लिए कदम उठाया न उसके बाद कभी प्रयास हुए. 1951 में सिर्फ हिन्दुओं के लिए हिन्दू कोड बिल लाने पर तत्कालीन राष्ट्रपति राजेन्द्र प्रसाद और प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के बीच काफी घमासान मचा था. दोनों ओर से पत्राचार हुए थे, बात अधिकारों तक पहुंची और अंत में अटार्नी जनरल की राय ली गई तब मामला शांत हुआ था. दरअसल, 1951 में हिन्दू पर्सनल लॉ को कोडीफाई करने की कोशिश शुरू हुई और नेहरू सरकार हिन्दू कोड बिल लाई जिसका तत्कालीन राष्ट्रपति राजेन्द्र प्रसाद ने कड़ा विरोध किया था. उस समय की स्थिति की झलक इस मसले पर पहले राष्ट्रपति डाक्टर राजेन्द्र प्रसाद और प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के बीच हुए पत्राचार को देखने से मिलती है.

14 सितंबर’51 को राष्ट्रपति प्रसाद ने प्रधानमंत्री नेहरु को पत्र लिखा था जिसमे सिर्फ हिन्दुओं के लिए हिन्दू कोड बिल लाने का विरोध करते हुए कहा था कि अगर जो प्रावधान किये जा रहे हैं वो ज्यादातर लोगों के लिए फायदेमंद और लाभकारी हैं तो सिर्फ एक समुदाय के लोगों के लिए क्यों लाए जा रहे हैं बाकी समुदाय इसके लाभ से क्यों वंचित रहें. अगर मौजूदा कानून अपर्याप्त और आपत्तिजनक है तो सभी नागरिकों के लिए समान नागरिक संहिता क्यों नहीं लागू की जाती सिर्फ एक समुदाय को ही कानूनी दखलंदाजी के लिए क्यों चुना गया. उन्होंने कहा था कि वह बिल को मंजूरी देने से पहले उसे मेरिट पर भी परखेंगे. उन्होंने नेहरू को यह पत्र 15 सितंबर को भेजा था.

नेहरू ने उसी दिन उन्हें उसका जवाब भी भेज दिया जिसमें कहा कि आपने बिल को मंजूरी देने से पहले उसे मेरिट पर परखने की जो बात कही है वह गंभीर मुद्दा है. इससे राष्ट्रपति और सरकार व संसद के बीच टकराव की स्थिति बन सकती है. संसद द्वारा पास बिल के खिलाफ जाने का राष्ट्रपति को अधिकार नहीं है. डाक्टर प्रसाद ने नेहरू को 18 सितंबर को फिर पत्र लिखा जिसमें उन्होंने संविधान के तहत राष्ट्रपति को मिली शक्तियां गिनाई साथ ही यह भी कहा कि वह मामले में टकराव की स्थिति नहीं लाना चाहेंगे. इसके बाद मामले पर अटार्नी जनरल एमसी सीतलवाड़ की राय ली गई. सीतलवाड़ ने 21 सितंबर’51 को दी गई राय में कहा कि राष्ट्रपति मंत्रिपरिषद की सलाह से चलेंगे. मंत्रिपरिषद की सलाह राष्ट्रपति पर बाध्यकारी है.

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