क्या मुस्लिमों के लिए संस्कृत कोई विदेशी भाषा है? 

भारतीय उपमहाद्वीप के इतिहास पर नजर डालें तो ऐसा बिल्कुल नहीं लगता है। भारतीय इतिहास में शायद ही कोई ऐसा कालखंड हो, जिसमें मुस्लिम संस्कृत विद्वानों का उल्लेख ना मिलता हो। यही वजह है कि बनारस हिंदू विश्वविद्यालय (बीएचयू) के संस्कृत विद्या धर्म विज्ञान विभाग में मुस्लिम प्रोफेसर फिरोज खान की नियुक्ति का विरोध, मनुस्मृति के अनुयायियों का नया तरीका लग रहा है।

मुस्लिम संस्कृत विद्वानों का रहा है समृद्ध इतिहास 

पंचतंत्र की दंत कथाएं 250 बीसी में संस्कृत में किताब के रुप में लिखी गई थीं। इसके बाद आठवी सदी में इसे ‘अब्दुल्ला इब्न-अल-मुकफ्फा’ द्वारा ‘कलिला-वा-दिमनाह’ के रुप में अरबी भाषा में अनुवादित किया गया। इसके बाद अरबी से ही इसे भारत की अन्य भाषाओं में अनुवादित किया गया।

मध्यकालीन इस्लामिक युग के महान साहित्यकार अल बरुनी (973-1050 AD), जिन्हें संस्कृत का विद्वान भी माना जाता है। उनकी रचना तहकीक मा लिल-ए-हिंद मिन मकुलाह में भारतीय जीवन के हर पहलू का जिक्र किया गया है।

 जाति न पूछो साधु की पूछ लीजिए ज्ञान

विद्यार्थी परिषद के बवाल नाराज आर एस एस ने पूछा- बीएचयू में मुस्लिम प्रोफेसर संस्कृत पढ़ाए तो इसमें गलत क्या?

संस्कृत की सूका-सप्तति, जो सबसे पहली किताब थी, जिसे फारसी भाषा में तूतीनामा के नाम से अनुवादित किया गया था। तूतीनामा को काफी लोकप्रियता मिली थी, जिसे बाद में कई यूरोपीय भाषाओं में भी अनुवादित किया गया था। इसके अलावा भारत में रहने वाले फारसी चिकित्सक जिया नकशाबी ने भी संस्कृत की किताब ‘कोक शास्त्र या रति रहस्यम’ को भी फारसी भाषा में अनुवादित किया था।

सूफी कवि और विद्वान अमीर खुसरो (1253-1325) को वेदों और पुराणों का काफी ज्ञान था। अपनी रचनाओं में अमीर खुसरो ने संस्कृत के कई शब्दों का प्रयोग किया है।

मुहम्मद बिन तुगलक को इतिहास में एक मूर्ख राजा के तौर पर जाना जाता है, लेकिन उनके शासनकाल में भी संस्कृत की दो अहम रचनाएं हुई थीं। ब्रिटिश इतिहासकार स्टेनले लेन पूले ने तुगलक को एक ज्ञानी आदमी करार दिया था।

दिल्ली सल्तनत के फिरोज शाह तुगलक ने भी संस्कृत की कई रचनाओं को फारसी भाषा में अनुवाद कराया था। जम्मू कश्मीर के 15वीं सदी के राजा जैनुल आबदीन ने भी महारभारत और कल्हण द्वारा रचित राजतरंगिणी को भी फारसी भाषा में अनुवाद कराया था।

मुगल बादशाह अकबर के शासनकाल को संस्कृत साहित्य का स्वर्ण युग माना जाता है। इसी समय में मुस्लिमों के बीच संस्कृत साहित्य और हिंदू धर्म को लेकर रुचि बढ़ी थी। अकबर के समय में ही मुल्ला अब्दुल कादिर बदायूंनी ने सिंहासन बत्तीसी, अथर्ववेद, रामायण का अनुवाद किया था।

मुगल शासन में दारा शिकोह को महान विद्वान माना जाता है। दारा शिकोह ने ही भागवद गीता का फारसी भाषा में अनुवाद कराया। स्वामी नंद दास और बानवाली दास ने दारा शिकोह के लिए प्रबोध चंद्रोदय और योग वशिष्ठ का अनुवाद किया था। दारा शिकोह की समुद्र संगमा सबसे महत्वपूर्ण रचना मानी जाती है। दारा शिकोह ने संस्कृत के 52 उपनिषदों का फारसी भाषा में अनुवाद किया था।

मुगल बादशाह शाहजहां के दरबार में भी संस्कृत के दो विद्वान बंशीधर मिश्रा और हरि नारायण रहते थे। इस दौरान कई संस्कृत रचनाओं को फारसी भाषा में अनुवाद किया गया था।

मशहूर उर्दू शायर अल्लामा इकबाल भी संस्कृत के विद्वान थे और आदि शंकराचार्य के कट्टर अनुयायी बताए जाते हैं। उन्होंने भृतहरि के कई श्लोकों का अनुवाद किया था।

मुस्लिम अभी भी संस्कृत भाषा पढ़ रहे हैं। 1993 में वेदों के ज्ञान के लिए राष्ट्रपति से पुरस्कार लेने वाले इजरायल खान ने भी संस्कृत में कई किताबें लिखी हैं। मोहम्मद हनीफ खान शास्त्री को भी संस्कृत भाषा में योगदान के लिए पद्मश्री अवार्ड से सम्मानित किया गया था। हसनैन नियाजी भी संस्कृत के कवि हैं। बीएचयू के संस्कृत विभाग के प्रोफेसर ने भी अपने एक लेख में बताया है कि इस्लामिक साहित्य पहले संस्कृत में लिखा गया था। आज भी पूरे देश में सैंकड़ों मुस्लिम छात्र संस्कृत पढ़ रहे हैं।

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