इस्लामिक कैलेंडर के पहले व मुस्लिम समुदाय के पाक महीने मुहर्रम का आज (10 सितंबर) 10वां दिन है, जिसे आशुरा भी कहा जाता है। इस दिन तक मुस्लिम समुदाय के लोग लगातार रोजे रखते हैं। माना जाता है कि इस दौरान रखे गए हर रोजे का सवाब 30 रोजों के बराबर होता है। आखिर क्या होता है इन रोजों का महत्व और मुहर्रम के महीने में सिर्फ 10 दिन ही क्यों रखे जाते हैं रोजे, जानते हैं इस रिपोर्ट में।

कर्बला की लड़ाई से जुड़ा है मुहर्रम का महत्व: जानकारों के मुताबिक, 14वीं शताब्दी में आशुरा के दिन (मुहर्रम के महीने का 10वां दिन) पैगंबर मुहम्मद के पोते इमाम हुसैन अपने अनुयायियों के साथ कर्बला की निर्दयी शासक यजीद की फौज से लड़ते वक्त शहीद हो गए थे। बताया जाता है कि यह घटना इस्लामिक कैलेंडर के 61वें साल में हुई थी।

अल्लाह का महीना है मुहर्रम: बता दें कि मुहर्रम इस्लामी वर्ष यानी हिजरी सन का पहला महीना कहलाता है। कर्बला की लड़ाई में इमाम हुसैन की शहादत के बाद लोगों ने इसे नए साल के रूप में मनाना छोड़ दिया और बाद में यह गम व दुख के महीने के रूप में बदल गया। मुस्लिम जानकारों की मानें तो मुख्तलिफ हदीसों यानी हजरत मुहम्मद ने एक बार मुहर्रम का जिक्र करते हुए इसे अल्लाह का महीना भी कहा था।

यह है मुहर्रम के रोजों का महत्व: हजरत मुहम्मद के साथी इब्ने अब्बास के मुताबिक, हजरत मुहम्मद ने कहा था कि जो मुहर्रम की 9वीं तारीख का रोजा रखता है, उसके 2 साल के गुनाह माफ हो जाते हैं। वहीं, मुहर्रम के एक रोजे का सवाब 30 रोजों के बराबर होता है। हालांकि, यह रोजे अनिवार्य नहीं हैं, लेकिन मुहर्रम के रोजों का सवाब बहुत माना जाता है।

साभार : जनसत्ता

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