डॉ. राम अवतार पांडेय, वरिष्ठ अधिवक्ता
(पूर्व अध्यक्ष, दि सेंट्रल बार एशोसिएशन बनारस वाराणसी)

भारत को आज़ाद हुए अभी सात दशक यानि 70 साल ही बीते हैं कि अनुशासनहीनता, उदंडता और देश की एकता और अखंडता को चोट पहुँचाने वाले वह दृश्य दिखाई देने लगे हैं जिसके कारण लंबे काल तक भारत पराधीन रहा। जिसको अपनी जवानी और अपने लहू की कीमत देकर शहीदों ने हासिल किया। हमारा देश दुनिया के सबसे बड़े और शश्क्त लोकतांत्रिक देश के रूप में जाना जाता हैं। किन्तु महाराष्ट्र में जो दृश्य अभी-अभी दिखाई पड़ा उससे घोर निराशा हुई। 

देश में चुनाव उस संविधान के अनुसार होता हैं। जिसे कहा जाता हैं कि हम भारत के लोगों ने अधिनियमित और आत्मार्पित कर सदन में यह संकल्प लिया कि हम इसके अनुसार चलेंगे। शपथ ग्रहण की एक सुनिश्चित संवैधानिक व्यवस्था है। यहां तक कि शपथ ग्रहण में क्या बोला जाएगा यह भी संविधान और विधि द्वारा सुनिश्चित है। चुनाव के नामांकन के समय और सदन में प्रवेश करने पर या मंत्रिमंडल में स्थान पाने पर देश की एकता अखंडता को अक्षुण्ण रखने का संकल्प परमावश्यक हैं। शपथ की शब्दावली में या उसके भाषा में छूट की व्यवस्था भी है। लेकिन उसकी उपेक्षा करके अपनी मनमानी करके उदंडता के बूते पर जो चाहे सो बोला जाए और विधि द्वारा स्थापित राज्यपाल को उनके निर्देशों को ऐसी तैसी करके उठल्लु का चूल्हा बना दिया जाए यह कदापि विधि सम्मत नहीं है न बर्दाश्त करने योग्य हैं।

महाराष्ट्र उद्धव ठाकरे का ही नहीं है अखंड भारत का अभिन्न अंग हैं तथा हर भारतवासी का है। इसलिए देश की भावना तथा देशवासियों की इच्छाओं व अपेक्षाओं का कानून के दायरे में ध्यान रखना होगा। सुनिश्चित शब्दावली व विधि व्यवस्था के विपरीत अपने मन से मनमानी घुसेड़ना और राज्यपाल की बातों को अनसुनी करना और यह कहना कि फलां नेता के प्रति निष्ठा जताकर मख्खनबाजी करते हुए शपथ ग्रहण समारोह का मजाक बनाना सर्वथा निंदनीय है। बेहतर हुआ होता कि ये अतिउत्साही और मुख्यमंत्री और मंत्री पद के लिए लार टपकाने वाले लोग भारत माता, भारत भूमि और हिंदुस्तान राष्ट्र के प्रति अपनी निष्ठा जताते। निःसन्देह शिवाजी, बाला साहेब ठाकरे, सोनिया गांधी, राहुल गांधी, शरद पवार समादरणीय हैं। लेकिन उनके उल्लेख का स्थान और समय और भी हैं। यहाँ विधि की व्यवस्था का और मर्यादा का सवाल है। शिवाजी, महाराणा प्रताप, राम-कृष्ण निःसन्देह देश के गौरव पुरुष है लेकिन कोई भी भारत देश से बड़ा नहीं हैं। सोनिया, ठाकरे और राहुल की उनके आगे बिसात क्या है। जैसे शपथ ग्रहण में इन जनप्रतिनिधियों ने मनमानी की ऐसी मनमानी यदि न्यायाधीशगण, अधिवक्तागण सभी कानून के साथ करें और मेरे जैसा आदमी ऐसे अवसर पिल्लईयादायी और नटनिया माई का स्मरण करने लगे तो क्या होगा। कानून को कानून की दृष्टि से देखना चाहिए और उसका शालीनता से पालन करना चाहिए उसका मख़ौल उड़ाना अपने भविष्य को गर्त में डालना है।

नेताओं ने वैसे ही इन सत्तर सालों में अपने कुत्सित आचरणों से देश को पहले ही काफी क्षति पहुंचा रखी है। इनके लिए देश नहीं इनका स्वार्थ इनकी चमचागिरी, इनका अर्थलोभ देश से बड़ा है जिसका कुफ़ल जनता ने भोगा है अबसे अगर ये इससे बाज़ आवे तो शायद ये जनता का कुछ भला कर पाए।

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