पदम पति शर्मा
प्रधान संपादक

यद्यपि भाजपा-शिवसेना गठबंधन महाराष्ट्र मे अपेक्षित पूर्वानुमान के मुताबिक सफलता नहीं प्राप्त कर सका, बावजूद इसके कि ये दोनों दल 2014 की तुलना मे इस बार साथ मिल कर मैदान मे उतरे थे तब भी पूर्व की तुलना मे इनको कम सीट मिलती नजर आ रही है। लेकिन इसके बावजूद मुख्यमंत्री देवेन्द्र फड़नवीस ने एक इतिहास तो रच ही दिया। इस पर भाजपा जरूर अपनी पीठ थपथपा सकती है कि साफ धवल छवि के गैर मराठा फड़नवीस कदाचित राज्य के ऐसे पहले मुख्यमंत्री हैं जिन्होंने न केवल पांच साल का कार्यकाल पूरा किया बल्कि वह अपने कमकाज की वजह से पुनः गठबंधन को सत्तासीन करने मे भी सफल हुए हैं।

यह समाचार लिखने के समय कुल 288 मे सत्तारूढ गठबंधन 160 सीट पर बढत बनाए हुए था और कांग्रेस-एनसीपी 99 के आसपास थे।

जिस तरह इस राज्य मे कभी भाजपा अपनी साझेदार शिवसेना के अनुज की भूमिका मे हुआ करती थी और अब अग्रज हो चुकी है। वही हाल एनसीपी का है जो अब काग्रेस को पीछे छोड़ते हुए बढत के मामले मे अर्धशतक की संख्या पीछे छोड़ चुकी है। यह प्रत्याशित था भी। बताने की जरूरत नहीं कि कांग्रेस ने एक तरह से हथियार डाले हुए थे। देवड़ा और निरूपम घर बैठ गये थे और कई दिग्गजों ने चुनावी वैतरणी पार करने के लिए भाजपा का पल्ला थाम लिया था। पार्टी की कार्यकारी अध्यक्ष सोनिया गांधी और उनकी पुत्री प्रियंका वाड्रा ने महाराष्ट्र का रुख तक नहीं किया। राहुल गांधी ने अनमने अंदाज मे कुछ सभाओं मे जरूर शिरकत की। मगर वह इनमे छह महीने पुराना राग ही अलापते नजर आए।

कांग्रेस को आभारी होना चाहिए शरद पवार का कि वैश्विक आतंकी दाऊद इब्राहीम के साथ उनके व पार्टी के अन्य नेताओं के साथ संबंधों के आरोप से अविचलित इस 80 वर्षीय कद्दावर ने अथक परिश्रम से चुनावी सभाओं मे भीड़ भी खूब जुटायी और अपने वरिष्ठ सहयोगी दल को भी मुह दिखाने लायक संख्या में सीट दिलायी।

भाजपा के लिए जरूर यह आत्म चिंतन का समय है कि राष्ट्रीय मुद्दों के सहारे ही राज्यों मे चुनाव नहीं जीते जा सकते। ठीक है कि लोकसभा के लिए ये आज भी ट्रम्प कार्ड हैं। लेकिन इन चुनावों मे आपको क्षेत्रीय मुद्दों पर फोकस रखना होगा। साथ ही यह भी सोचना होगा कि सिर्फ नरेन्द्र मोदी के सहारे आप कब तक सफलता हासिल करते रहेंगे। भीड़ जुटाऊ तेज तर्रार क्षेत्रीय नेताओं का उभार बेड़ा पार करने मे सहायक होगा, यह भी पार्टी को सोचना होगा। फिर, बेरोजगारी और आर्थिक मंदी भी वांछित सफलता मे एक बड़ा अवरोध बन कर खड़ी हो गयी। नेतृ वर्ग को इस ओर वरीयता के साथ त्वरित योजना बनाने की सख्त जरूरत है। आने वाले समय मे बिहार, झारखंड और बंगाल आदि राज्यों मे होने वाले चुनावी दंगल मे एनआरसी, अनुच्छेद 370 की विदाई और पाकिस्तान जैसे मुद्दों से काम नहीं चलने वाला। नये उद्योग और विदेशी निवेश से विकास को गति देना समय की माँग है, यह भी भाजपा को याद रखना होगा।
बहरहाल फड़नवीस एण्ड कंपनी को अगले पांच वर्ष कुछ कर दिखाने के लिए मिले हैं।इस मौके को उन्हें दोनो हाथों से भुनाना होगा। हमारी ओर से देवेन्द्र जी आपको हार्दिक शुभकामनाएँ ।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here